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Story Of Miracles - उत्तराखंड के देव भूमि देवताओं के चमत्कार की कहानिया

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, February 02, 2009, 02:58:05 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


पिथोरागढ़ में प्रसिद्ध महा काली मंदिर !  काली माता ने दिखाया था कुमोँउ रेजिमेंट को चमत्कार
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चमत्कार को नमस्कार..  .. अगर आप इस मंदिर भी गए है तो यहाँ पर पाएंगे कुमोँउ रेजिमेंट द्वारा माँ काली को चदाये गए बड़े - २ घंटिया और गेट बनाई है !

चमत्कार की कहानी
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! एक बार कुमोँउ रेजिमेंट के सिपाही पानी के जहाज के कही कूच कर रहे थे अचानक जहाज में तकनीकी खराबी आ गयी और जहाज डूबने लगा !  पिथोरागढ़ के एक जवान जो की कुमोँउ रेजिमेंट में सिपाही था!

अब जहाज डूबने ही वाला था सब अपने अपने देवता को याद कर रहे थे तभी इस जवान ने कहा मै अपने ईष्ट देवी महा काली की आराधना करता हूँ ! कुछ ही समय पर जहाज ऊपर आने लगा और धीरे जहाज किनारे पर आ गया !

इस चमत्कार के बाद कुमोँउ रेजिमेंट युद्ध मै जाने से पहले और ट्रेनिंग मे भी काली माता का नाम लिए भीं आगे नहीं बड़ते !




Gate constructed by Kumoan Regiment.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


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उत्तरकाशी। पहाड़ में सदियों से चली आ रही मान्यताएं आज भी जिंदा है। इसका जीता जागता उदाहरण प्राचीन संग्रामी गांव में देखने को मिलता है। यहां पंडित की पोथी, डाक्टर की दवा और कोतवाल का डंडा यहां काम नहीं आता है। गांव में कंडार देवता का आदेश ही सर्वमान्य है।

देवभूमि उत्तराखंड के उत्तर में उत्तरकाशी के निकट वरुणावत पर्वत के शीर्ष पर बांयी ओर संग्राली गांव में कंडार देवता का प्राचीन मंदिर आस्था और विश्वास का केंद्र ही नहीं, बल्कि एक न्यायालय भी है। इस न्यायालय में फैसले कागजों में नहीं होते और न ही वकीलों की कार्यवाही होती है। यहां फैसला देवता की डोली सुनाती है। संग्राली गांव के लोग जन्मपत्री, विवाह, मुंडन, धार्मिक अनुष्ठान, जनेऊ समेत अन्य संस्कारों की तिथि तय करने के लिए पंडित की तलाश नहीं करते। कंडार देवता मंदिर के पंचायती प्रांगण में जमा होकर ग्रामीण डोली को कंधे पर रख कंडार देवता का स्मरण करते हैं। इस दौरान डोली के डोलने से इसका अग्रभाग जमीन का स्पर्श करता है। इससे रेखाएं खिंचने लगती हैं। इन रेखाओं में तिथि व समय लिख जाता है। आस्था है कि जन्म कुंडली भी जमीन पर रेखाएं खींचकर डोली स्वयं ही बना देती है। कई ऐसे जोड़ों का विवाह भी कंडार देवता करवा चुका है, जिनकी जन्मपत्री को देखने के बाद पंडितों ने स्पष्ट कह दिया था कि विवाह हो ही नहीं सकता। मात्र यहीं नहीं बल्कि गांव में जब कोई व्यक्ति बीमार हो जाता है तो उसे उपचार के लिए कंडार देवता के पास ले जाया जाता है। सिरर्दद, बुखार, दांत दर्द तो ऐसे दूर होता है जैसे पहले रोगी को यह दर्द था ही नहीं।

गांव में झगड़ा होने पर कंडार के प्रांगण में पंचायत बैठती है और डोली से न्याय मांगा जाता है। डोली तत्काल दोषी को दंडित करते हुए न्याय सुनाती है और उसे पूरा गांव स्वीकार करता है। पंचायत चुनाव में इस गांव के प्रधान सुख शर्मा का चयन कंडार देवता ने स्वयं किया। इससे पहले के प्रधान भी देवता ने स्वयं ही चुने थे। प्रधान के काम में गड़बड़ हुई तो उसे दंड देने का अधिकार भी देवता को ही होता है। गांव में आज तक कभी पुलिस का हस्तेक्षप ही नहीं हुआ।

गांव के बुजुर्ग महिमा नंद भट्ट, चन्द्र मोहन भट्ट, ज्योति प्रसाद नैथानी, परमानंद, शिवानंद भट्ट समेत अन्य कहते हैं कि कंडार सब जानता है। वे कहते हैं कि पंडित, डाक्टर और पुलिस की कोई आवश्यकता ही नहीं है। ये सब कार्य उनका देवता स्वयं ही कर देता है।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_5580770.html

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

इग्यार देवी , PITHORGARH DISTRICT OF UTTARAKHAND
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यह माता का मन्दिर कई चमक्तारो से भरा पड़ा है|एक बार नवरात्री के अवसर पर मन्दिर में पूजा के साथ विशाल भंडारे का आयोजन किया गया जिसमे लोगो ने बाद चदकर भागीदारी की | पूजा खत्म होने के बाद उस दिन पुजारी के द्वारा सभी को प्रसाद दिया गया | सभी प्रसाद लेकर अपने घर कि और लौटे |तभी जब भीड़ कम हो गई तो रात में एक बाघ ने मन्दिर के भीतर प्रवेश किया | अन्दर परिक्रमा पूरी कर उसने प्रसाद ग्रहण किया और फिर वापस चले गया |तभी से मदिर के प्रति लोगो कि आस्था दूनी हो गई | इसतरह के कई चमत्कार मन्दिर के बारे में है|एक अन्य चमत्कार के अनुसार जब भक्तो पर कोई संकट आता है तो माता उस समय ग्रामीणों का पथ आलोकित कर उनको अंधकार से ज्ञान के प्रकाश के और ले जातीहै | ऐसे अनेकानेक चमत्कारों कि साक्षी इग्यार देवी माता रही है|

Lalit Mohan Pandey

हमारे गाव का किस्सा है, कहते है एक बार बहुत पहले.. हमारे गाव से एक बारात कही गई थी, तो गाव के सभी आदमी बाराती गए थे, सिर्फ़ महिलाये और छोटे बच्चे गाव मै रह गए थे, एक छोटे बच्चे को भूत ने पकड़ लिया (छल लग गया), अब विभूति क्यों लगाये क्युकी गोरिल देवता सिर्फ़ आदमी मै ही कापता है ओरत मै नही, तो ladies रोने लगी की अब क्या होगा बच्चे का सोच के, कहते है उनका रोना सुन कर गोठ (जानवर बाधने की जगह) से एक बकरा ख़ुद ही रस्सी तोड़ कर अन्दर आया और बच्चे को सीग से एक मारी, तो बच्चे मै चडा हुआ भूत भाग गया, Actually वो बकरा उन्होंने पहले से देवता को भागा (चडाया) हुआ था.   

Lalit Mohan Pandey

ये घटना मेरे सामने हुए है, मै तब 6th मै पड़ता था, मेरे cousin की तबियत बहुत ख़राब थी, ज्यादा मेडिकल facilities तो थी नही तब, फ़िर भी जिस डॉक्टर को दिखा रहे थे उसने जबाब दे दिया, अब घर ले चलो कुछ नही हो सकता है कहके, तो घर मै सब लोग बड़े परेशान थे.
मेरे ताउजी को देवताओ मै बिल्कुल भी भरोषा नही था और वो मानते थे की जो भी लोग कापते है (देवता आने के बाद) जो सिर्फ़ नाटक कर रहे होते है क्युकी देवता आने जैसा कुछ भी नही होता.
रात को १० बजे के करीब भाई की तबियत और ज्यादा ख़राब हो गई तो आस पास के लोग भी रोना सुनकर आ गए, फ़िर ताउजी भी रोने लगे और रोते हुए बोले की कहते है किसी के घर मै बकरे मै भी देवता आया था, मेरे लिए तो देवता भी मर गए (upper wali ghatna ko refer karte hue), ताउजी के मुह से इतना निकलना था की ख़ुद उन पे देवता आ गया और भाई को एक फूक मारी जोर से तो वो 5 min के अन्दर ही नोर्मल हो गया. उस दिन से ताउजी देवता को मानने और ये accept करने लगे की सच मै देवता आता है.     

पंकज सिंह महर

उत्तराखण्ड की धरती में चमत्कार होना कोई असहज बात नही है, आज भी ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में कई बीमारियां, घरेलू दिक्कतें ईश्वरीय चमत्कार से सही हो जाती हैं। अनेक घटनायें ऐसी हैं, जिन्हें सुनने पर सामान्यतया हमारा भौतिक मन सही मानने की इजाजत नहीं देता। लेकिन कई मामले मैने भी ऐसे सुने हैं कि १० वर्ष से बच्चा नहीं था तो मन्दिर में मन्नत मांगने पर सूनी कोख भी भर गई। पी०जी०आई० या एम्स से भी निराश केस सही हो गये, इत्यादि। अभी भी मान्यता है कि जागेश्वर धाम तथा श्रीनगर के कमलेश्वर मंदिर में बैकुंठ चतुर्दशी के दिन यदि निःसंतान दंपत्ति रात भर दिया हाथ में लेकर शिव की अर्चना करें तो उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति अवश्य होती है।
इसी प्रकार से विश्व विख्यात नन्दा राजजात यात्रा में होमकुंड से आगे चौसिंगा खाडू कैलाश तक अनंत यात्रा पर अकेला चला जाता है। इस प्रकार से अनेकानेक घटनायें ऐसी होती हैं, जो इस क्षेत्र की दैवीय शक्ति से हमें परिचित कराती रहती हैं।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


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कुमाऊं में न्याय देवता के रूप में पूजे जाते हैं गोल ज्यू
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भवाली(नैनीताल): घोड़ाखाल गोलू देवता मंदिर में वैसे तो वर्ष भर देश-विदेश से पूजा अर्चना करने श्रद्धालुओं का आना लगा रहता है। मगर नवरात्रों में यहां भारी संख्या में श्रद्धालु पूजा करने पहुंचते है। न्याय के देवता के रूप में पूजे जाने वाले गोलू देवता मंदिर घोड़ाखाल में श्रद्धालुओं द्वारा टांगी गई छोटी-बड़ी सैकड़ों घंटियां उनकी आस्था का प्रतीक बन चुकी हैं।

किंवदन्तियों के अनुसार गोलू देवता की उत्पत्ति कत्यूर वंश के राजा झालराई से मानी जाती है। जिनकी तत्कालीन राज्य की राजधानी धूमाकोट चम्पावत थी, परन्तु गोलज्यू जिन्हे गौर भैरव का अवतार माना जाता है, इनकी उत्पत्ति कैसे हुई यह प्रसंग शिवपुराण, रुद्र संहिता पार्वती खण्ड में उल्लिखित है। द्वापर युग के अंत में देवी रुकमणि के गर्भ से प्रद्युम्न का जन्म हुआ। प्रद्युम्न पालने का बालक ही था कि गढ़ी चम्पावत के राजा वाणासुर के मंत्री सम्बर द्वारा उसका अपहरण कर लिया गया। समस्त द्वारिकापुरी में प्रद्युम्न के अपहरण की घटना से दु:खी होकर भगवान कृष्ण ने भगवती जगदम्बा का स्मरण किया। देवी जगदम्बा ने दर्शन देकर भगवान कृष्ण को बताया कि उनके पुत्र प्रद्युम्न का अपहरण वाणासुर के मंत्री सम्बर द्वारा किया गया है। उसकी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उन्होंने उसकी रक्षा के लिए गौर भैरव व काल भैरव को भेज दिया है। देवी कृपा से कृष्ण अपने पुत्र को लेने गढ़ी चम्पावत पहुंचे। पुत्र को सकुशल देखकर कृष्ण प्रसन्न हुए और उन्होंने गौर भैरव से कहा जिस तरह तुमने मेरे पुत्र की रक्षा की इसी तरह आज से तुम सम्पूर्ण हिमाचल खण्ड के आधिपति देव बनकर सम्पूर्ण क्षेत्र की रक्षा करोगे। मैं तुम्हें इसी समय से गढी चम्पावत के अवतारी देवता के रूप में स्थापित करता हूं। साथ ही कृष्ण ने आशीर्वाद देते हुए कहा कि इस सम्पूर्ण अंचल में तुम्हारी मान्यता न्यायकारी देवता के रूप में होगी। तब से गौर भैरव इस अंचल में सर्व सिद्धी दाता न्यायकारी व कृष्ण अवतारी देवता के रूप में प्रसिद्ध हो गए।

अक्सर कहा जाता है कि इंसान में ही भगवान वास करता है। भगवान ने किस तरह इंसान के रूप में अवतरित होकर सर्वफलदायी और न्यायकारी देवता के रूप में मान्यता ली किंवदंती के अनुसार इस गाथा से स्पष्ट हो जाता है। राजा झालराई की सात रानियां होने पर भी वह नि:संतान थे। संतान प्राप्ति की आस में राजा द्वारा काशी के सिद्ध बाबा से भैरव यज्ञ करवाया और सपने में उन्हें गौर भैरव ने दर्शन दिए और कहा राजन अब आप आठवां विवाह करो में उसी रानी के गर्भ से आपके पुत्र रूप में जन्म लूंगा। इस प्रकार राजा ने आठवां विवाह कालिंका से रचाया। मगर इससे सातों रानियों में कालिंका को लेकर ईष्या उत्पन्न हो गई। कालिंका का गर्भवती होना सातों रानियों के लिए असहनीय हो गया। तब तीनों रानियों ने ईष्या के चलते षडयंत्र रचते हुए कालिंका को बताया कि ग्रहों के प्रकोप से बचने के लिए माता से पैदा होने वाले शिशु की सूरत सात दिनों तक नहीं देखनी पड़ेगी। यह सुनकर वंश की परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए कालिंका तैयार हो गई। कालिंका को कोठरी में कर दिया गया। प्रसव पीड़ा होते ही उसकी आंखों में काली पट्टी बांध दी गई। सातों रानियों ने नवजात शिशु को हटाकर उसकी जगह सिलबट्टंा रख दिया गया। फिर उसे बताया कि उसने सिलबट्टे को जन्म दिया है। सातों रानियां नवजात शिशु को मारने की व्यवस्था करने लगी। सर्वप्रथम उन्होंने बालक को गौशाला में फेंककर यह सोचा की बालक जानवरों के पैर तले कुचलकर मर जाएगा। मगर देखा कि गाय घुटने टेक कर शिशु के मुंह में अपना थन डाले हुए दूध पिला रही है। अनेक कोशिशों के बाद भी बालक नहीं मरा तो रानियों ने उसे संदूक में डालकर काली नदी में फेंक दिया। मगर ईश्वरी चमत्कार से संदूक तैरता हुआ गौरी घाट तक पहुंच गया। जहां वह भाना नामक मछुवारे के जाल में फंस गया। संदूक में मिले बालक को लेकर नि:संतान मछुवारा अत्यन्त प्रसन्न होकर उसे घर ले गया। गौरी घाट में मिलने के कारण उसने बालक का नाम गोरिया रख दिया। बालक जब कुछ बड़ा हुआ तो उसने मछुवारे से घोड़ा लेने की जिद की। गरीब मछुवारे के लिए घोड़ा खरीद पाना मुश्किल था, उसने बालक की जिद पर उसे लकड़ी का घोड़ा बनाकर दे दिया। बालक घोड़ा पाकर अति प्रसन्न हुआ। बालक जब घोड़े पर बैठा तो वह घोड़ा सरपट दौड़ने लगा। यह दृश्य देख गांव वाले चकित रह गए। एक दिन काठ के घोड़े पर चढकर वह धोली धूमाकोट नामक स्थान पर जा पहुंचा, जहां सातों रानियां राजघाट से पानी भर रही थीं। वह रानियों से बोला पहले उसका घोड़ा पानी पियेगा, बाद में आप लोग पानी भरना। यह सुनकर रानियां हंसने लगी और बोली अरे मूर्ख जा बेकार की बातें मतकर कहीं कांठ का घोड़ा भी पानी पीता है। बालक बोला जब स्त्री के गर्भ से सिलबट्टा पैदा हो सकता है तो कांठ का घोड़ा पानी क्यों नहीं पी सकता। यह सुनकर सातों रानियां घबरा गई। सातों रानियों ने यह बात राजा से कहीं। राजा द्वारा बालक को बुलाकर सच्चाई जानना चाही तो बालक ने सातों रानियों द्वारा उनकी माता कालिंका के साथ रचे गये षडयंत्र की कहानी सुनायी। तब राजा झालराई ने उस बालक से अपना पुत्र होने का प्रमाण मंागा। इस पर बालक गोरिया ने कहा कि यदि मैं माता कालिंका का पुत्र हूं तो इसी पल मेरे माता के वक्ष से दूध की धारा निकलकर मेरे मुंह में चली जाएगी और ऐसा ही हुआ। राजा ने बालक को गले लगा लिया और राजपाठ सौंप दिया। इसके बाद वह राजा बनकर जगह-जगह न्याय सभाएं लगाकर प्रजा को न्याय दिलाते रहे। न्याय देवता के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त करने के बाद वह अलोप हो गए।

गोलज्यू का मूल स्थान चम्पावत माना जाता है। स्थानीय जनश्रुति के अनुसार उन्हे घोड़ाखाल में स्थापित करने का श्रेय महरागांव की एक महिला को माना जाता है। यह महिला वर्षो पूर्व अपने परिजनों द्वारा सतायी जाती रही। उसने चम्पावत अपने मायके जाकर गोलज्यू से न्याय हेतु साथ चलने की प्रार्थना की। गोलज्यू उसके साथ यहां पहुंचे। मान्यता है कि सच्चे मन से मनौती मांगने जो भी घोड़ाखाल पहुंचते हैं गोलज्यू उसकी मनौती पूर्ण करते हैं। न्याय के देवता के रूप पूजे जाने वाले गोलज्यू पर आस्था रखने वाले उनके अनुयायी न्याय की आस लेकर मंदिर में अर्जियां टांग जाते हैं। जिसका प्रमाण मंदिर में टंगी हजारों अर्जियां हैं। न्याय की प्राप्ति होने पर वह घंटियां चढ़ाना नहीं भूलते। जिसके चलते घोड़ाखाल का गोलू मंदिर पर्यटकों के बीच घंटियों वाले मंदिर के रूप में प्रसिद्ध हो चला है।


http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_5809097.html

Rajen


Devbhoomi,Uttarakhand

कुमाऊं में न्याय देवता के रूप में पूजे जाते हैं गोल ज्यू

घोड़ाखाल गोलू देवता मंदिर में वैसे तो वर्ष भर देश-विदेश से पूजा अर्चना करने श्रद्धालुओं का आना लगा रहता है।

मगर नवरात्रों में यहां भारी संख्या में श्रद्धालु पूजा करने पहुंचते है। न्याय के देवता के रूप में पूजे जाने वाले गोलू देवता मंदिर घोड़ाखाल में श्रद्धालुओं द्वारा टांगी गई छोटी-बड़ी सैकड़ों घंटियां उनकी आस्था का प्रतीक बन चुकी हैं।

किंवदन्तियों के अनुसार गोलू देवता की उत्पत्ति कत्यूर वंश के राजा झालराई से मानी जाती है। जिनकी तत्कालीन राज्य की राजधानी धूमाकोट चम्पावत थी, परन्तु गोलज्यू जिन्हे गौर भैरव का अवतार माना जाता है, इनकी उत्पत्ति कैसे हुई यह प्रसंग शिवपुराण, रुद्र संहिता पार्वती खण्ड में उल्लिखित है।

द्वापर युग के अंत में देवी रुकमणि के गर्भ से प्रद्युम्न का जन्म हुआ। प्रद्युम्न पालने का बालक ही था कि गढ़ी चम्पावत के राजा वाणासुर के मंत्री सम्बर द्वारा उसका अपहरण कर लिया गया। समस्त द्वारिकापुरी में प्रद्युम्न के अपहरण की घटना से दु:खी होकर भगवान कृष्ण ने भगवती जगदम्बा का स्मरण किया।

देवी जगदम्बा ने दर्शन देकर भगवान कृष्ण को बताया कि उनके पुत्र प्रद्युम्न का अपहरण वाणासुर के मंत्री सम्बर द्वारा किया गया है। उसकी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उन्होंने उसकी रक्षा के लिए गौर भैरव व काल भैरव को भेज दिया है। देवी कृपा से कृष्ण अपने पुत्र को लेने गढ़ी चम्पावत पहुंचे।

पुत्र को सकुशल देखकर कृष्ण प्रसन्न हुए और उन्होंने गौर भैरव से कहा जिस तरह तुमने मेरे पुत्र की रक्षा की इसी तरह आज से तुम सम्पूर्ण हिमाचल खण्ड के आधिपति देव बनकर सम्पूर्ण क्षेत्र की रक्षा करोगे। मैं तुम्हें इसी समय से गढी चम्पावत के अवतारी देवता के रूप में स्थापित करता हूं।

साथ ही कृष्ण ने आशीर्वाद देते हुए कहा कि इस सम्पूर्ण अंचल में तुम्हारी मान्यता न्यायकारी देवता के रूप में होगी। तब से गौर भैरव इस अंचल में सर्व सिद्धी दाता न्यायकारी व कृष्ण अवतारी देवता के रूप में प्रसिद्ध हो गए।

अक्सर कहा जाता है कि इंसान में ही भगवान वास करता है। भगवान ने किस तरह इंसान के रूप में अवतरित होकर सर्वफलदायी और न्यायकारी देवता के रूप में मान्यता ली किंवदंती के अनुसार इस गाथा से स्पष्ट हो जाता है। राजा झालराई की सात रानियां होने पर भी वह नि:संतान थे।

संतान प्राप्ति की आस में राजा द्वारा काशी के सिद्ध बाबा से भैरव यज्ञ करवाया और सपने में उन्हें गौर भैरव ने दर्शन दिए और कहा राजन अब आप आठवां विवाह करो में उसी रानी के गर्भ से आपके पुत्र रूप में जन्म लूंगा। इस प्रकार राजा ने आठवां विवाह कालिंका से रचाया। मगर इससे सातों रानियों में कालिंका को लेकर ईष्या उत्पन्न हो गई। कालिंका का गर्भवती होना सातों रानियों के लिए असहनीय हो गया। तब तीनों रानियों ने ईष्या के चलते षडयंत्र रचते हुए कालिंका को बताया कि ग्रहों के प्रकोप से बचने के लिए माता से पैदा होने वाले शिशु की सूरत सात दिनों तक नहीं देखनी पड़ेगी। यह सुनकर वंश की परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए कालिंका तैयार हो गई।

कालिंका को कोठरी में कर दिया गया। प्रसव पीड़ा होते ही उसकी आंखों में काली पट्टी बांध दी गई। सातों रानियों ने नवजात शिशु को हटाकर उसकी जगह सिलबट्टंा रख दिया गया। फिर उसे बताया कि उसने सिलबट्टे को जन्म दिया है। सातों रानियां नवजात शिशु को मारने की व्यवस्था करने लगी। सर्वप्रथम उन्होंने बालक को गौशाला में फेंककर यह सोचा की बालक जानवरों के पैर तले कुचलकर मर जाएगा। मगर देखा कि गाय घुटने टेक कर शिशु के मुंह में अपना थन डाले हुए दूध पिला रही है। अनेक कोशिशों के बाद भी बालक नहीं मरा तो रानियों ने उसे संदूक में डालकर काली नदी में फेंक दिया। मगर ईश्वरी चमत्कार से संदूक तैरता हुआ गौरी घाट तक पहुंच गया।

जहां वह भाना नामक मछुवारे के जाल में फंस गया। संदूक में मिले बालक को लेकर नि:संतान मछुवारा अत्यन्त प्रसन्न होकर उसे घर ले गया। गौरी घाट में मिलने के कारण उसने बालक का नाम गोरिया रख दिया। बालक जब कुछ बड़ा हुआ तो उसने मछुवारे से घोड़ा लेने की जिद की। गरीब मछुवारे के लिए घोड़ा खरीद पाना मुश्किल था, उसने बालक की जिद पर उसे लकड़ी का घोड़ा बनाकर दे दिया। बालक घोड़ा पाकर अति प्रसन्न हुआ। बालक जब घोड़े पर बैठा तो वह घोड़ा सरपट दौड़ने लगा। यह दृश्य देख गांव वाले चकित रह गए। एक दिन काठ के घोड़े पर चढकर वह धोली धूमाकोट नामक स्थान पर जा पहुंचा, जहां सातों रानियां राजघाट से पानी भर रही थीं।

वह रानियों से बोला पहले उसका घोड़ा पानी पियेगा, बाद में आप लोग पानी भरना। यह सुनकर रानियां हंसने लगी और बोली अरे मूर्ख जा बेकार की बातें मतकर कहीं कांठ का घोड़ा भी पानी पीता है। बालक बोला जब स्त्री के गर्भ से सिलबट्टा पैदा हो सकता है तो कांठ का घोड़ा पानी क्यों नहीं पी सकता।

यह सुनकर सातों रानियां घबरा गई। सातों रानियों ने यह बात राजा से कहीं। राजा द्वारा बालक को बुलाकर सच्चाई जानना चाही तो बालक ने सातों रानियों द्वारा उनकी माता कालिंका के साथ रचे गये षडयंत्र की कहानी सुनायी। तब राजा झालराई ने उस बालक से अपना पुत्र होने का प्रमाण मंागा। इस पर बालक गोरिया ने कहा कि यदि मैं माता कालिंका का पुत्र हूं तो इसी पल मेरे माता के वक्ष से दूध की धारा निकलकर मेरे मुंह में चली जाएगी और ऐसा ही हुआ। राजा ने बालक को गले लगा लिया और राजपाठ सौंप दिया। इसके बाद वह राजा बनकर जगह-जगह न्याय सभाएं लगाकर प्रजा को न्याय दिलाते रहे। न्याय देवता के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त करने के बाद वह अलोप हो गए।

गोलज्यू का मूल स्थान चम्पावत माना जाता है। स्थानीय जनश्रुति के अनुसार उन्हे घोड़ाखाल में स्थापित करने का श्रेय महरागांव की एक महिला को माना जाता है। यह महिला वर्षो पूर्व अपने परिजनों द्वारा सतायी जाती रही। उसने चम्पावत अपने मायके जाकर गोलज्यू से न्याय हेतु साथ चलने की प्रार्थना की। गोलज्यू उसके साथ यहां पहुंचे। मान्यता है कि सच्चे मन से मनौती मांगने जो भी घोड़ाखाल पहुंचते हैं गोलज्यू उसकी मनौती पूर्ण करते हैं। न्याय के देवता के रूप पूजे जाने वाले गोलज्यू पर आस्था रखने वाले उनके अनुयायी न्याय की आस लेकर मंदिर में अर्जियां टांग जाते हैं। जिसका प्रमाण मंदिर में टंगी हजारों अर्जियां हैं।
न्याय की प्राप्ति होने पर वह घंटियां चढ़ाना नहीं भूलते। जिसके चलते घोड़ाखाल का गोलू मंदिर पर्यटकों के बीच घंटियों वाले मंदिर के रूप में प्रसिद्ध हो चला है।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_5809097.html

Rajen

हमारे देवी देवताओं और ईष्ट जिसे हम पूजते हैं, में अपार शक्ति है.  हमारे बुजुर्ग लोग इस बात को अच्छी तरह जानते थे और इसी बात को ध्यान में रख कर पूरी श्रद्धा से नियत समय पर पूरे मनोयोग से और बिधि-बिधान से ईष्ट की पूजा करते थे|  वे अपने हर दुःख और परेशानी में अपने ईष्ट को याद करते और कष्टों से मुक्ति भी पा लेते थे.  मुझे लगता है कि समय बीतने के साथ हम लोग भौतिकता की और अधिक झुक गए और ईष्ट देवता की पूजा मात्र औपचारिकता पूरी करने हेतु ही 'निबटाने' लगे.  शायद आज की युवा पीढी (गाँव में भी) दैवीय शक्ति पर कम और मोबाइल, इन्टरनेट और डिस टीवी पर ज्यादा भरोसा करती है. श्रधा घट गयी है फलस्वरूप मंदिर में पूजा हो या जागर की धूनी, शराब के नशे में धुत लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है. 

इष्ट देवता की शक्ति को प्रतक्ष्य रूप से मैंने अपनी पिछली छुटिट्यौं मैं देखा जिसे मैं आपके साथ बाँटना चाहता हूँ.

मेरे गाँव में एक लड़का सिपाही था.  उसे ड्यूटी के समय कुछ मानसिक बीमारी हो गयी.  बहुत इलाज करने पर भी कोइ फायदा नहीं हुआ.  उसके अफसरों ने गरीब है बच्चे कैसे पलेंगे करके उसे किसी तरह पेंसन भेज दिया.  घर आकर वह मारपीट करने लगा|  अपनी पत्नी, बच्चे और माँ को मारता.  कुछ दिन बाद वह घर से निकल गया और फिर उसे किसी ने नहीं देखा.  उसका बड़ा भाई मेरा बछ्पन का दोस्त था जो फौज में रहते ही मृत्यु को प्राप्त हो गया था.  तो मैं घर गया तो उसकी बूढी माँ से मिलने गया और हाल चाल पूछने लगा.  बूढी तो बहुत दुखी थी और इसी दुःख में बोली कुछ नहीं बेटा देवी-देवता भी हमारी नहीं सुन रहे.  ग्यारह साल हो गए बेटा घर से गया आज दिन तक कोइ खबर नहीं.  दिमाग से कमजोर तो था ही न जाने जिन्दा भी होगा या.....तो मैंने ऐसे ही कह दिया कुछ गन्त (पूछ) भी कराई?  पहले बहुत कराई कुछ पता नहीं चला अब सब छोड़ दिया है.  तो फिर एक बार फिर गन्त करा लो मैंने कहा.  तो उस बुढ़िया ने उसी दिन गन्त के लिए डंगरिया को बुलवा लिया.  थोड़ी देर में ही शाम हो गयी और गंतुआ (डंगरिया) भी आ गया.  इष्ट देवता का आह्वान किया गया और डंगरिया ने कहा कि बहुत दिन के बाद तुझे अपने बेटे की याद आई.  अगर पहचान सके तो पहचान लेना तीन दिन के अन्दर वो इस गाँव में आएगा.
तीन दिन बीत गए, चौथे दिन सुबह ही फिर गन्त कराई गयी.  तब इष्ट देवता ने कहा कि मैंने तो तेरे घर के पास उसे भेजा था तूने उसे पहचाना ही नहीं.  अब एक काम करो कि फलां... जगह पर जाओ, वहां पर वह नहा धो कर बैठा है उसे ले आओ.  लोग तुंरत उस जगह की ओर गए / वह जगह मेरे गाँव से करीब ६-७ किलोमीटर दूर जंगल में रामगंगा के किनारे थी.  उस ओर लोगों का आना-जाना नहीं के बराबर है.  ठीक उसी बताये गए स्थान पर वह लड़का गीले कपडों में एक पत्थर पर बैठा मिल गया.  उसे घर लाया गया.   
जरा सोचिये ग्यारह वर्ष से घर से दूर, कमजोर दिमाग का ब्यक्ति, इष्ट देवता के सच्चे मन से आह्वान पर वापस आ गया यह दैवीय शक्ति नहीं तो और क्या है.