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Nag Devta Temples In Uttarakhand - उत्तराखंड में नाग देवता के मंदिर

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, March 02, 2009, 01:23:08 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Nag Devta Mandir Mussorie

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Address :

Kath Macange road,Mussoorie
District-Dehradun, Uttarakhand


This temple is located on Kath Macange road, 7.1 kilometers from Masonic Lodge Bus Stand

Deity Worshipped:  Nag devta, Shiv, Parvati and other deites.
Remarks:  A fair is organised here on the occasion of Nagpanchmi which is attended by thousands of devotees.


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Some other naag temple in surrounding areas like :


-   Pingal Nag
-   Kali Naag
-           Kharhari Nag

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Nag Devta Temple

Situated at a distance of about six kilometers from Mussoorie, on the Cart Mackenjie Road is the ancient temple dedicated to Nag Devta. From the temple, one can also catch an enchanting view of the Doon valley and Mussoorie town.

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Nagdev Fair IN Pauri Garwal District of Uttarakhand.

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Nagdev Fair is a prominent festive occasion of Pauri Garhwal District in Uttaranchal. It is celebrated in the famous Nagdev Temple situated in the Pauri town. This fair is dedicated to Lord Hanuman. This annual event attracts a sizeable number of devotees, who throng to the temple to pay their humble worship to the lord. Apart from the religious rites, there are also various activities pertaining to entertainment.

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There are many Nag temples in Kumaon also. Sheshnag temple is at Bastarhi village of meharpatti. Berinag and Pungarao patti
have 8 nags as follows which are worshiped there–

1.   Beni Nag
2.   Kali Nag
3.   Feni Nag
4.   Dhaul Nag
5.   Karkotak Nag
6.   Pingal Nag
7.   Kharhari Nag
8.   Athguli Nag

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सेम मुखेम

यह जगह समुद्र तल से 2903 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह मंदिर नाग राज का है। यह मंदिर पर्वत के सबसे ऊपरी भाग में स्थित है। मुखेम गांव से इस मंदिर की दूरी दो किलोमी.है। माना जाता है कि मुखेम गांव की स्थापना पंड़ावों द्वारा की गई थी।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

सेम मुखेम

यह जगह समुद्र तल से 2903 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह मंदिर नाग राज का है। यह मंदिर पर्वत के सबसे ऊपरी भाग में स्थित है। मुखेम गांव से इस मंदिर की दूरी दो किलोमी.है। माना जाता है कि मुखेम गांव की स्थापना पंड़ावों द्वारा की गई थी।

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सर्प पूजा
प्राचीन समय में गढ़वाल में रहने वाले नागाओं के वंशज आज भी सर्प का पूजा करते हैं। इस क्षेत्र में अनेकों सर्प मन्दिर स्थापित हैं। उदाहरणार्थ कुछ सर्प मन्दिर निम्न हैं।

पान्डुकेश्वर का शेष नाग मन्दिर
रतगाँव का भेकल नाग मन्दिर
तालोर का सांगल नाग मन्दिर
भरगाँव का बम्पा नाग मन्दिर
निति घाटी में जेलम का लोहन देव नाग मन्दिर
देहरादून घाटी नाग सिद्ध का बामन नाग मन्दिर

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KALI NAAG TEMPLE



उ8ाराखंड की पावन धरती में भगवान शंकर सहित ३३ कोटि देवताओं के दर्शन होते हैं। आदि जगदगुरु शंकराचार्य ने स्वयं को इसी भूमि पर ही पधारकर धन्य मानते हुए कहा कि इस ब्रह्मïांड में उ8ाराखंड के तीर्थों जैसी अलौकिकता और दिव्यता कहीं नहीं है। इस क्षेत्र में श1ितपीठों की भरमार है। सभी पावन दिव्य स्थलों में से तत्कालिक फल की सिद्धि देने वाली माता कोकिला देवी मंदिर का अपना दिव्य महात्6य है।

इन्हें कोटगाड़ी देवी भी कहते हैं। कहा जाता है कि यहां पर सच्चे मन से निष्ठïा पूर्वक की गई पूजा-आराधना का फल तुरंत मिलता है और अभीष्टï कार्य की सिद्धि होती है।
किवदंतियों के अनुसार, जब उ8ाराखंड के सभी देवता विधि के विधान के अनुसार खुद को न्याय देने और फल प्रदान करने में अक्षम व असमर्थ मानते हैं और उनकी अधिकार परिधि शिव तत्व में विलीन हो जाती है। तब अनंत निर्मल भाव से परम ब्रह्मïांड में स्तुति होती है कोटगाड़ी देवी की। संसार में भटका मानव जब चौतरफा निराशाओं से घिर जाता है और हर ओर से अन्याय का शिकार हो जाता है, तो संकल्प पूर्वक कोटगाड़ी की देवी का जिस स्थान से भी सच्चे मन से स्मरण किया जाता है, वहीं से निराशा केबादल हटने शुरू हो जाते हैं। मान्यता है कि संकल्प पूर्ण होने के बाद देवी माता कोटगाड़ी के दर्शन की महत्वता अनिवार्य है। किसी के प्रति व्यर्थ में ही अनिष्टïकारी भावनाओं से मांगी गई मनौती हमेशा उल्टी साबित होती है। इस मंदिर में फरियादों के असं2य पत्र न्याय की गुहार के लिए लगे रहते हैं। दूर-दराज से श्रद्धालुजन डाक द्वारा भी मंदिर के नाम पर पत्र भेज कर मनौतियां मांगते हैं। मनौती पूर्ण होने पर भी माता को पत्र लिखते हैं और समय व मैया के आदेश पर माता के दर्शन के लिए पधारते हैं।
दंत कथाओं के अनुसार जब भगवान श्रीकृष्ण ने बालपन के समय में कालिया नाग का मर्दन किया और तब उसे परास्त कर जलाशय छोडऩे को कहा, तो कालिया नाग और उसकी पत्नियों ने भगवान श्रीकृष्ण से क्षमा याचना कर प्रार्थना की कि हे प्रभु, हमें ऐसा सुगम स्थान बताएं, जहां हम पूर्णत: सुरक्षित रह सकें। तब भगवान श्रीकृष्ण ने इसी कष्टï निवारिणी माता की शरण में कालिया नाग को भेजकर अभयदान प्रदान किया था। कालिया नाग का प्राचीन मंदिर कोटगाड़ी से थोड़ी ही दूर पर पर्वत की चोटी पर स्थित है। इस मंदिर की श1ित लिंग पर किसी शस्त्र के वार का गहरा निशान दिखाई देता है।
किंवदंतियों के अनुसार किसी ग्वाले की गाय इस श1ित लिंग पर आकर अपना दूध स्वयं दुहाकर चली जाती थी। ग्वाले का परिवार बहुत आश्चर्य में था कि आखिर गाय का दूध रोज कहां चला जाता है। एक दिन ग्वाले की पत्नी ने चुपचाप गाय का पीछा किया। जब उसने यह दृश्य देखा, तो धारदार शस्त्र से श1ित पर वार कर दिया। कहा जाता है कि इस वार से खून की तीन धाराएं बह निकलीं, जो क्रमश: पाताल, स्वर्ग और पृथ्वी पर पहुंचीं। पृथ्वी पर आने वाली धारा यहां विमान है। वार वाले स्थान पर आज भी कितना भी दूध 1यों न चढ़ा दिया जाए दूध श1ित के आधे भाग में ही शोषित हो जाता है।

कैसे पहुंचें:
कोकिला देवी यानी कोटगाड़ी मंदिर उ8ाराखंड के पिथौरागढ़ जिले के पाखू इलाके में स्थित है। कोकिला देवी मंदिर पहुंचने के लिए दिल्ली से हलद्वानी जाना पड़ता है। हलद्वानी से वाया बागेश्वर पाखू पहुंचा जा सकता  

Risky Pathak