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It Happens Only In Uttarakhand - यह केवल उत्तराखंड में होता है ?

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, May 26, 2009, 12:20:03 PM

Devbhoomi,Uttarakhand

गोपीनाथ मंदिर परिसर में है अद्भुत कल्पतरु
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भगवान की महिमा अपार है। शायद इसी का उदाहरण है गोपीनाथ मंदिर में वर्षभर हरा-भरा रहने वाला अद्भुत कल्पतरु। इतना ही नहीं बारह महीने फूलों के खिलने से सदाबहार कल्पतरु की महत्ता और भी बढ़ जाती है। गोपीनाथ मंदिर परिसर में सदियों से जीवित सदाबहार कल्पतरु वृक्ष की विशेषता से वनस्पति वैज्ञानिक भी हैरान हैं।

जिला मुख्यालय स्थित गोपीनाथ मंदिर परिसर में सदियों से जीवित कल्पतरु पहुंचने वाले भक्तों को न सिर्फ अचंभित करता है, बल्कि भक्तों में ईश्वर के प्रति आस्था को भी बढ़ाता है। ऐसा इसलिए कि वृक्ष एक समय के बाद या तो कमजोर हो जाते हैं या फिर सूख जाते हैं, लेकिन सदियों से मंदिर परिसर में बारह महीने हरा-भरा रहने के साथ ही फूलों का खिलना कल्पतरु को अन्य वृक्षों से अलग बनाते हैं। कल्पतरु की इन्हीं खासियतों के कारण वनस्पति वैज्ञानिक भी इससे अचंभित हैं।

मान्यता है कि सदियों पहले कल्पतरु वृक्ष के नीचे स्थित स्वयं-भू शिव लिंग पर गंगोलगांव से एक दुधारू गाय रोज दूध देने आती थी। गाय के रोजाना कल्पतरु की झाड़ियों में घुस कर दूध देने का रहस्य जानने के लिए गाय का स्वामी भी कल्पतरु झाड़ियों में जा घुसा। उसने वहां घुसकर देखा तो उसे स्वयं-भू शिव लिंग दिखाई दिया इसके बाद इसकी सूचना राजा सगर को भी हो गई, जिसके बाद राजा सगर ने यहां भव्य शिव मंदिर का निर्माण कराया। मंदिर के पुजारी 73 वर्षीय एसपी तिवारी का कहना है कि इस कल्पतरु वृक्ष का वर्णन केदारखड में भी मिलता है। उनका कहना है कि वास्तव में कल्पतरु वृक्ष का धार्मिक महत्व तो है ही लेकिन अब वर्षो से सदाबहार होने के साथ ही इस पर फूलों का खिलना भी आश्चर्यजनक है। उन्होंने इसे शिव कृपा बताया।

Dainik jagaran

Devbhoomi,Uttarakhand

कुत्ते के बच्चे को पाल रहा है बंदर
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ऋषिकुल तिराहे के पास एक मकान की छत पर कुत्ते के बच्चे को गोद में लेकर बैठा बंदर सबके आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। शनिवार को बंदर और कुत्ते के बच्चे के बीच अजब ममता को देखने के लिए लोगों की भीड़ जुटी रही। कुत्ते के बच्चे को गोद में उठाए बंदर पर लोगों की नजर गई तो सब हैरत में रह गए। अभी तक लोगों ने बंदर को काटने के लिए पीछा करते कुत्ते और कुत्ते को पीटते बंदर को देखा था। लेकिन यहां पर मामला बिल्कुल उलट था। बंदर ने बड़े प्यार से कुत्ते के बच्चे को गोद में उठाया था। छत और पेड़ाें पर उछल-कूद के दौरान बच्चे को चोट नहीं लगे इसलिए बंदर से उसे मजबूती के साथ पकड़ रखा था। बंदर के पास में एक केला था लेकिन वह उसे खा नहीं रहा था। बंदर बार-बार केले को बच्चे के मुंह के सामने ले जाता। बच्चा उसे सूंघकर छोड़ देता। एक दुकानदार ने ब्रेड का टुकड़ा बंदर की ओर उछाला तो उसने लपक लिया। इसके बाद ़कुत्ते के बच्चे ने ब्रेड खानी शुरू कर दी तो बंदर भी मस्त होकर केला खाने लगा। अनिल शर्मा ने बताया कि यह बंदर ऋषिकुल के आसपास की कालोनियों में पिछले कई दिनों से कुत्ते के इस बच्चे को लिए घूम रहा है।

http://www.amarujala.com/state/Uttrakhand/7446-2.html

हेम पन्त

मन्दिर और मस्जिद साथ-साथ हैं, दोनों जगह जाने पर पूर्ण माने जाती है यात्रा..

Temple and Muslim Saint's Shrine built adjacent to each other

Devbhoomi,Uttarakhand

पहाड़ में घास से जलती है होली
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भले ही देश के अन्य हिस्सों में होलिका दहन के रोज जगह जगह मोहल्लों में लकडि़यां या गोबर के कंडे इकट्ठा कर उन्हें जलाया जाता हो, लेकिन पर्वतीय क्षेत्रों में अधिकांश ग्रामीण इलाकों में होलिका दहन धान के पराल से होता है।

जिससे होलिका दहन में लकड़ी की खपत नहीं होती है और पर्यावरण संरक्षण के साथ ही जंगल भी महफूज रहते हैं। हालांकि कुछ पर्वतीय शहरों में मैदानी इलाके की परंपरा के तहत लकड़ी इकट्ठा कर होलिका दहन होने लगा है।

source dainik jagran

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  यहां खेल है धनुष बाण का युद्ध     
          राधाकृष्ण उनियाल, पुरोला
चैत्र मास की समाप्ति व बैसाख के शुभागमन पर क्षेत्र में एक पर्व जैसा माहौल बन जाता है। इस पर्व को यहां बिसू मेले के रूप में मनाया जाता है। मेले का प्रमुख आकर्षण कौरव-पांडवों का धनुष युद्ध रहता है। युद्ध के प्रतीक के रूप में धनुष बाणों से खेले जाने वाले खेल को भी बैसाखी ठोऊड़ा के नाम से मनाया जाता है।
रवांई क्षेत्र में यह पर्व श्रीगुल देवता मन्दिर ढ़काड़ा व महासु मन्दिर मैजणी, भुटाणु, ठडियार सहित सोमेश्वर महादेव मंदिर जखोल, फिताड़ी आदि दर्जनों गांव में संक्रांति पर्व बिस्सू मेले के रूप में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। मेले का मुख्य आकर्षण श्रीगुल देवता की चौकी कथ्यान से एक किमी दूर जाखणी में देवदार के  घने जंगल के  बीच हर वर्ष 13 अपै्रल बैशाखी कोबाबर पट्टी क्षेत्र के  दो खत्तों सिलगांव व बाबर के हटाड़, भटाड़, भूनाड़, ऐठाण, दिनाड़, छजाड़, थत्यूड व डागुंठा क्षेत्र के हजारों महिला, पुरूष, बुढे़, जवान अपने पारंपरिक  परिधानों में लक-दक ढोल नगाड़ों के साथ कथियान पहुंचते हैं। क्षेत्र के  सैकड़ों बुजुर्ग महिला, पुरुष धनुष बाण व फरसे लेकर तांदी गीतों, रासों की कतारों में सबसे आगे दिखाई देते हैं। मेले में मुख्य आकर्षण पांडवों व कौरवों के युद्ध के रूप में ठोऊडा खेला जाता है, जिसमें दो खत्तों के लोग धनुष बाणों से एक दूसरे पर वार करते हैं। इसी में हार जीत का फैसला होता है। मेले के सम्बन्ध  में बुजुर्ग महेन्द्र सिंह व नागचन्द बताते हैं कि बैसाख सक्रान्ति के दिन हमारे पूर्वज पांडवों की याद में धनुष बाणों के ठोऊड़ा के खेल को खेलते आये हैं।


http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_7573553.html

   

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

     Apr 13, 06:22 pm देवप्रयाग, निज प्रतिनिधि : श्रीकृष्ण बैशाख महोत्सव रासलीला का बरसाने की प्रसिद्ध लठमार फूल होली के साथ समापन हुआ। वृंदावन के कलाकारों के साथ नगर वासियों ने भी पूरे हर्षोल्लास के साथ इसमें भागीदारी की।  श्री रघुनाथ मंदिर में रामनवमी की रात को रासलीला का लठमार फूल होली के साथ समापन हुआ। स्वामी रामशरण महाराज, प्रेमचंद तिवारी व गिरीराज किशोर की ओर से होली के मधुर गीतों की प्रस्तुतियां दी गयीं। यहां श्रीकृष्ण, राधा, गोपियों व ग्वाल बालों की रोचक बातचीत के बाद बरसाने की प्रसिद्ध लठमार होली शुरू हुई। देवप्रयाग वासी शालिनी भट्ट व कीर्ति भट्ट भी यहां गोपियां बनकर निकली। ग्वालों पर लठ चलाती गोपियां जब भीड़ में पहुंची, तो वहां भी होली का उत्साह भी उमड़ आया।
बाद में श्रीकृष्ण राधा की मधुर वार्ता होने के साथ ही नगरवासियों ने उनके साथ जमकर फूलों की होली खेली। रंग बिरंगे फूलों से ढके राधाकृष्ण देखते ही बनते थे। रासलीला मर्मज्ञ रामशरण महाराज ने कहा कि कृष्ण का नाम जपने से काम वासना खतम हो जाती है। गोपियों में भगवान ने प्रेमभाव जगाया था। इस अवसर पर तहसीलदार देवप्रयाग एमएल भेंतवाल व थाना प्रभारी बाह दर्मियान सिंह का भी आयोजकों ने स्वागत किया। आयोजक कैप्टन नवल सिंह ने देवप्रयाग को महातीर्थ बताते हुए नगरवासियों से इसे संवारने का आग्रह किया। उन्होंने रामशरण महाराज के साथ भजन भी प्रस्तुत किये। समाजसेवी केशव तिवारी, नवयुवक रामलीला समिति अध्यक्ष मुकेश ध्यानी, विनोद बडोला, अत्रेश ध्यानी आदि की ओर से रासलीला आयोजन में सहयोगियों का जताया।



http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_7576540.html

   

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

उत्तराखंड के चमोली जिले में वैशाखी के मौके पर किया जाने वाला परंपरागत मुखौटा नृत्य आज भी जीवंत है। पैनखंडा और पिंडर के इलाकों में तो वैशाखी से एक पखवाड़े पहले से ही लोग मुखौटा पहनकर नाचने लगते हैं। सर्दी के बाद हल्की गुनगनी धूप के बीच इन गांवों में लोकनृत्य के साथ देवपूजन की यह परंपरा काफी प्राचीन है।

देवी पूजन से जुड़ा है यह नृत्य
चमोली जिले के पेनखंडा इलाके में धौली गंगा के जलग्रहण क्षेत्र में लाता, सुभाई और तपोवन आदि गांव आते हैं। इन गांवों में पहली अपै्रल से लेकर वैशाखी तक मुखौटा नृत्य करने की परंपरा है। इस नृत्य को लाता स्थित नंदादेवी मंदिर में देवी की पूजा से जोड़कर देखा जाता है। वैशाखी के मौके पर होने वाले ये नृत्य नंदादेवी की पूजा के बाद ही शुरू होते हैं। इस नृत्य का आयोजन गांव के बीचो-बीच बने सामुदायिक चौक पर होता है। नृत्य के दौरान लकड़ी के मुखौटे पहनकर लोक कलाकार अलग-अलग कथानकों पर नृत्य करते हैं। नृत्य का ज्यादातर कथानक पुराणों पर आधारित कहानियों पर केंद्रित होता है।


वैशाखी के दिन होती है अंतिम प्रस्तुति

लाता में वैशाखी के दिन दोपहर में अंतिम मुखौटा नृत्य का मंचन किया जाता है, जो सूर्य पर केंद्रित होता है। वैशाखी के दिन दोपहर में होने वाले इस पखवाड़े भर के अंतिम मंचन को देखने के लिए क्षेत्रीय ग्रामीणों के अलावा दूर-दूर से दर्शक इस नृत्य का आनंद लेने के लिए लाता गांव पहुंचते हैं। इस पूरे आयोजन में लाता गांव के हर परिवार की भागीदारी पूर्वजों के समय से ही सुनिश्चित है। लाता के पूर्व प्रधान धनसिंह बताते हैं कि पात्रों का मंचन के लिए पात्र की जिम्मेदारी मुहल्ले के अनुसार सौंपी गई है।


लोक गायकों की भी होती है अहम भूमिका
पात्रों के अलावा मुखौटा नृत्य के मंचन में लोक गायकों की भी भागीदारी होती है। ये गायक ढोल - दमाऊ की ताल के साथ मधुर आवाज में गायन करते हुए पौराणिक कथानक को आम - भाषा में पेश करते हैं। गीतों में पुराणों में वर्णित सृष्टि की संरचना से लेकर गंगा की उत्पति तक का बखान बड़ी ही खूबसूरती से किया जाता है।

बता दें कि लाता गांव नीति घाटी का जनजातीय गांव है और विख्यात नंदादेवी राष्ट्रीय उद्यान का प्रवेशद्वार भी है। इस गांव के लोग हर मौसम में लाता में ही रहते हैं। इस बार अप्रैल में भी मौसम सर्द होने के बावजूद लोग हर साल की तरह उत्साहपूर्वक इस नृत्य का आनंद उठा रहे हैं ।


http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/7972973.cms

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 रुद्रनाथ: मुख से होती शिव की पूजा     May 19, 07:17 pm   बताएं       गोपेश्वर, जागरण कार्यालय: रुद्रनाथ वही जगह है जहां पांडवों को भगवान शिव के मुख के दर्शन हुये थे। लाल माटी पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य बसे समुद्रतल से 2286 मीटर की उंचाई पर स्थित रुद्रनाथ की यात्रा अपने आप में किसी कठोर तप से कम नहीं है। 18 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई पैदल ही पार कर रुद्रनाथ पहुंचने पर श्रद्धालु भगवान शिव के मुखारबिंद के दर्शन होते है। यह देश का एकमात्र तीर्थ है जहां शिव के मुख की पूजा होती है। अन्यत्र शिव की पूजा लिंग के रूप में होती है।
पूरे विश्व में एकानन के रूप में रूद्रनाथ तथा चतुरानन के रूप में नेपाल के पशुपतिनाथ व पंचानन के रूप में इंडोनेशिया में भगवान शिव के मुखारबिन्द के दर्शन होते है। रूद्रनाथ मंदिर में भगवान शिव एक गुफा में टेढ़ी गर्दन किये हुये ऐसे दर्शन देते है मानो वे भक्तों की प्रतीक्षा में हो। रुद्रनाथ को लेकर केदारखंड में लिखा है कि पांडवों ने मोक्ष प्राप्ति के लिए यही आकर भगवान शिव के मुख के दर्शन किये। शास्त्र मानता है कि यही पर भगवान शिव पार्वती के साथ तपस्या में लीन थे। और यहीं से पार्वती अपने पिता दक्ष के यज्ञ में शामिल होने के लिए हरिद्वार के कनखल गई थी। जहां अपने पति शिव के अपमान से क्षुब्ध पार्वती ने यज्ञ कुंड में आहूति दी थी।
रूद्रनाथ पौराणिक तीर्थस्थान है। यहां हजारों तीर्थयात्री भगवान शिव के दर्शनों के लिए आते हैं, लेकिन सरकार ने पंच केदारों में चतुर्थ केदार के नाम से विख्यात इस तीर्थ के विकास के लिए कुछ नहीं किया। हालत यह है कि सगर से पैदल 18 किलोमीटर की यात्रा मार्ग पर कहीं भी पीने के लिए पानी की व्यवस्था नहीं की गई है। यही नहीं पैदल मार्ग जर्जर होकर मौत को आमंत्रण दे रहा है। इससे शिव भक्तों में रोष है। मंदिर के पुजारियों में से एक पंडित हरीश भट्ट का कहना है कि सरकार तीर्थाटन के विकास के दावे तो करती है, लेकिन धरातल पर वास्तविकता एक दम विपरीत है।
-वन एवं पर्यावरण के अड़ंगे के कारण 2002 से नहीं बन पाई स्वीकृत पेयजल योजना। तत्कालीन गढ़वाल कमिश्नर सुभाष कुमार ने की थी पेयजल योजना स्वीकृत।
-वन विभाग ने जल संस्थान द्वारा 25 लाख से बनाई जा रही इस पेयजल योजना के पाइप कर दिये थे जब्त। नहीं सुलझ पाया आज तक मसला।
-पैदल सड़क के निर्माण की घोषणा मुख्यमंत्री ने 2010 में की थी। पर्यटन विभाग ने कार्य का प्राकलन शासन को भेजा, जो लौटकर नहीं आया।
http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_7747075.html

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

सुक्की गांव में होती है पेड़ों की पूजा 
औषधीय और पर्यावरणीय महत्व वाले थुनेर के वृक्ष बचाने के लिए सुक्की गांव के लोगों ने इसे हरा-भरा करने का बीड़ा उठाया। सुक्की गांव के ऊपर फैले इस जंगल से कोई भी ग्रामीण लकड़ी नही काटता है, ग्रामीणों में मान्यता है कि इन पेड़ों पर देवता के चित्र दिखाई देते हैं, इसलिए यहां पेड़ काटना पाप है।
उत्तरकाशी जिला मुख्यालय से 55 किमी दूर सुक्की गांव के डाबरा तोक में थुनेर का एक जंगल है। एक किमी लंबाई तथा पांच सौ मीटर चौड़ाई वाले इस जंगल को लेकर किवदंति है कि करीब पचास साल पहले यहां थुनेर के कुछ पेड़ हुआ करते थे। एक बार किसी ग्रामीण ने एक पेड़ को काटा तो उसके तने कुछ चित्र उभरे हुए नजर आए। जो देवी देवताओं के चित्रों से मिलते जुलते थे। अन्य ग्रामीणों को इसका पता चला तो उन्होंने जंगल में पूजा अर्चना शुरू कर दी। इसके बाद यह परंपरा शुरू हो गई और लोग इन पेड़ों की हिफाजत शुरू कर दी। इस पेड़ की लकड़ियों से पहले अनाज आदि रखने के लिये कोठार बनाए जाते थे, लेकिन ग्रामीणों ने अपनी इस जरूरत को भी त्याग दिया। समय के साथ अन्य क्षेत्रों में जहां थुनेर के पेड़ कम होते चले गये वहीं इस जगह पर एक जंगल ही विकसित हो गया। ग्रामीण अब भी विभिन्न धार्मिक पर्वो पर इस जंगल की पूजा करना नहीं भूलते और वन देवता की रक्षा का संकल्प लेते हैं। दशकों पहले शुरू की गई इस परंपरा को नई पीढि़यां सहर्ष स्वीकार करती हैं और इस जंगल को लेकर गांव के युवा भी काफी जागरुक हैं। ग्राम प्रधान एकादशी देवी बताती हैं कि अपने पुरखों की इस देन को सहेज कर रखना और उसे और हरा भरा बनाना हमारी जिम्मेदारी है। ग्रामीणों को लकड़ी की जरूरत होने के बावजूद इस जंगल का रुख कोई नहीं करता यह हमारे खून में शामिल हो चुका है। समुद्र तल से सत्रह सौ मीटर से अधिक ऊंचाई पर पनपने वाले थुनेर की पत्तियों से निकलने वाले टैक्सास बक्काटा नामक रसायन से कैंसर रोधी दवा तैयार की जाती है, लेकिन इसके लिये काफी तादाद में पत्तियों की जरूरत होती है इसीलिये इसे दुर्लभ माना जाता है।
वन विभाग भी कई वर्षो से संरक्षित प्रजाति के थुनेर को विकसित करने में जुटा है। टकनौर क्षेत्र में अनेक जगहों पर विभाग की ओर से थुनेर के वृक्षों का रोपण किया गया है। साथ ही इनकी सुरक्षा भी की जा रही है।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_7823593.html

Devbhoomi,Uttarakhand

दशरथ चोटी रवाना हुई कांवड़ पदयात्रा
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प्रतिवर्ष आयोजित होने वाली दशरथांजल श्रवण शिला कांवड़ पदयात्रा की शुरूआत संगम स्थल से हुई। ढोल नगाड़ों के साथ श्रवण कुमार की जय-जयकार करते हुए पदयात्रा दशरथ चोटी के लिए रवाना हुई। कृष्ण जन्माष्टमी पर करीब पांच हजार फीट स्थित दशरथ चोटी पर यात्रा पहुंचेगी।

यात्रा की शुरूआत पंडित जय प्रकाश जोशी द्वारा पूजन से की गई जिसमें पित्रों को समर्पित होने वाली गंगाजल कांवड़ में रखी गई। पूर्व क्षेपंस जनार्दन सिंह रावत ने यात्रा के सातवें वर्ष भी कांवड़ को रखकर यात्रा शुरू की गई। पूर्व विधायक मंत्री प्रसाद नैथानी की ओर से 2004 में मातृ-पितृ भक्त श्रवण कुमार के नाम से इस यात्रा की शुरूआत की गई थी।

सातवें वर्ष पदयात्रा की शुरूआत पर यहां श्रवण शिला कांवड़ पदयात्रा से अध्यक्ष दिलीप सिंह सजवाण, सचिव जगदीशचंद्र, गब्बर सिंह सजवाण, पूर्व जिपंस महिपाल सजवाण, विधानसभा युकां प्रभारी दीर्घपाल गुसांई, उदय प्रकाश टोडरिया, रायचंद सिंह, पूर्व प्रधान दिगंबर सिंह रावत, विनोद टोडरिया आदि लोग उपस्थित थे।

कांवड़ पदयात्रा शांति बाजार, मोटर स्टेशन, घटल गांव, रामपुर, श्यापुर, राणडांग, कांडाधार, चौंड, मंडाली होते रविवार सांय बमाणा पहुंचेगी। कृष्ण जन्माष्टमी पर कांवड़ पदयात्रा बमाणा से दशरथ चोटी के लिए चलेगी। बीहड़ रास्तों से चोटी तक जाने वाले इस यात्रा में निकटवर्ती गांवों के सैकड़ों श्रद्धालु यहां भी पहुंचेंगे।


Source Dainik Jagran