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It Happens Only In Uttarakhand - यह केवल उत्तराखंड में होता है ?

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, May 26, 2009, 12:20:03 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

लेक मंदिर ने लगाया सड़क हादसों पर ब्रेक   Pithoragarh | अंतिम अपडेट 1 जून 2013 5:31 

  पिथौरागढ़। उत्तराखंड देवभूमि है। यहां चप्पे-चप्पे पर स्थित मंदिर लोगों की आस्था को दर्शाते हैं। आमतौर पर मंदिर मनोकामनाओं की पूर्ति में सहायक होते हैं। पर यहां एक ऐसा मंदिर है, जो लोगों को सड़क हादसों से बचाने में मददगार है।
यहां से करीब 48 किलोमीटर दूर लेक बेहद छोटी और गुमनाम जगह। बस यह गांव पिथौरागढ़ से थल होते हुए मुनस्यारी को जोड़ने वाले मार्ग का एक पड़ाव भर है। पर इस गुमनाम जगह को एक खास पहचान देता है लेक मंदिर और इस मंदिर की यहां खूब मान्यता है। यहां से आने-जाने वाले लोग इस स्थान पर रुककर देवी के सम्मुख नतमस्तक हो आगे बढ़ते हैं।
लेक में मंदिर की स्थापना की खास वजह रही। यह मंदिर एक भयंकर सड़क हादसे के बाद अस्तित्व में आया था। पंडित रमेश चंद्र पंत बताते हैं कि 30 अगस्त 1991 को स्थानीय लोगों के आपसी सहयोग से लेक मंदिर की स्थापना हुई थी। मंदिर के भीतर मां दुर्गा की मूर्ति है। तत्कालीन जिलाधिकारी राकेश शर्मा ने इस मंदिर का उद्घाटन किया था।
दरअसल इस मंदिर के निर्माण के पीछे एक दर्दनाक सड़क हादसे की भूमिका रही। 18 अक्तूबर 1990 को केमू की एक बस इस स्थान पर 400 मीटर गहरी खाई में गिर गई।  हादसे में 58 लोगों की मौत हो गई थी। दुर्घटना के बाद मृतकों की आत्मा की शांति और भविष्य में हादसा न होने के लिए यहां मंदिर की स्थापना करने का ग्रामीणों को सपना हुआ।
पंडित रमेश चंद्र पंत का कहना है कि मंदिर के निर्माण के बाद यहां कोई सड़क हादसा नहीं हुआ। जबकि आज भी यहां की सड़क की चौड़ाई बमुश्किल छह मीटर है। सड़क के किनारे पैराफीट भी नहीं हैं। मगर इसके बावजूद लेक मंदिर की कृपा से यहां कोई हादसा नहीं हुआ। (soure amar ujala)

अन्नू रावत (9871264699)

Bunkhal Kalinka Devi Temple: (Pabou -Paithani) Bunkhal Kalinga Mela is a famous fair celebrated at Bunkhal in Pauri Garhwal District of Uttrakhand. This event is held during the 'Shukla Paksh' (bright half) in the Hindu month of Margashirsh (November-December). It is dedicated to Goddess Kalinga.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Trees shakes automatically

कपकोट। नंदा-सुनंदा की मूर्ति के निर्माण के लिए कदली वृक्ष लेने उतरौड़ा गांव पहुंचे पोथिंग गांव के देव डांगरों ने बृहस्पतिवार सुबह अवतरित होकर दो केले के पेड़ उखाड़े। पोथिंग गांव पहुंचने पर डांगरों का ग्रामीणों ने ढोल नगाड़ों से स्वागत किया और इसी के साथ पेड़ों को एक खेत में रोपा गया। बुधवार शाम पोथिंग गांव के देव डांगरों में भीम सिंह दानू, जोगा सिंह, माधो सिंह, गिरीश जोशी और उनके साथ आए श्रद्धालु उतरौड़ा पहुंच गए थे। बृहस्पतिवार सुबह सरयू स्नान के बाद उन्होेंने भगवती मंदिर में पूजा की। इसके बाद अवतरित होकर कदलीवृक्ष में चावल के दाने फेंके। पेड़ों के हिलते ही डांगरों ने दोनों पेड़ों को उखाड़ लिया। डांगरों ने बड़ी संख्या में यहां मौजूद श्रद्धालुओं को आशीर्वाद दिया। ग्रामीण ढोल नगाड़ों, शंख, घड़ियाल, बुखौर की थाप पर डांगरों को गांव की सीमा तक छोड़ने गए।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

अटूट आस्था का केंद्र है 'कल्पवृक्ष'
:खासी मान्यता::::

= साक्षात शिव रूप में होती है इस वृक्ष की पूजा

= गिरि पत्ती मिलना भी माना जाता है बेहद शुभ

= एक गांठ डालने मात्र से मिलते हैं मनोवांछित फल

= हजारों वर्ष पुराने वृक्ष पर श्रद्धालुओं का लगती है भीड़

जागरण संवाददाता, अल्मोड़ा : जिला मुख्यालय से करीब सात किमी दूर हवालबाग ब्लाक के ग्राम छानी में मौजूद एवं क्षेत्र में दुर्लभ 'कल्पवृक्ष' महज औषधीय गुणों से ही लबरेज नहीं है, बल्कि आस्था, जन विश्वास व कौतुहल का केंद्र है। वानस्पतिक नाम ओलिया कस्पीडाटा के रूप में जाना जाने वाला यह वृक्ष क्षेत्रवासियों द्वारा साक्षात शिव शक्ति के रूप में माना जाता है। इसकी जड़ पर पूजा-अर्चना कर लोग मन्नतें मांगते हैं। विश्वास है कि यहां मांगी गई मन्नत अवश्य पूरी होती है।

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार धरती पर कल्पवृक्ष का समुद्र मंथन के वक्त अस्तित्व में आया। धर्म के प्रति अटूट आस्था रखने वाले लोग इस वृक्ष को साक्षात शिव रूप में पूजते हैं। यह नजारा अल्मोड़ा के निकट छानी गांव में मौजूद कल्पवृक्ष पर देखा जाता है। मान्यता है कि इस वृक्ष की पूजा-अर्चना से मनवांछित फल मिलता। तंत्र साधना के लिए इस जगह को श्रेष्ठ माना जाता है। संत महात्मा भी यहां पहुंचते हैं। मन्नतें लेकर श्रद्धालुओं का वर्ष भर इस वृक्ष के दर्शन व पूजा-अर्चना के लिए आना-जाना लगा रहता है। विशेष पर्वो व त्योहारों पर यहां पर खासी भीड़ रहती है। शिव रूप में खासी मान्यता होने के कारण महा शिवरात्रि पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। लोक मान्यता के अनुसार यह वृक्ष हजारों साल पुराना है। जनश्रुति के अनुसार भारत में काशी, कर्नाटक व अल्मोड़ा के ग्राम छानी में ही कल्पवृक्ष का पेड़ मौजूद है। यह फ्रांस व इटली में बहुत पाया जाता है। इसके बीजों का तेल हृदय रोगियों के लिए बेहद लाभदायी बताया गया है। हाइडेंसिटी कालेस्ट्रोल होता है। सदाबहार रहने वाले इस कल्पवृक्ष की पत्तियां इत्तफाक से ही गिरती है। कहते हैं कि किसी व्यक्ति को इसकी गिरी पत्ती मिलना बड़ा ही शुभ होता है। यदि यहां पर आने जाने की सहूलियतें हो जाए तो धार्मिक पर्यटन का नया केंद्र विकसित हो सकता है।

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मन्नत मांगने की अनूठी परंपरा

अल्मोड़ा के छानी गांव में स्थित कल्पवृक्ष मन्नत पूरी करवाने की अनूठी धार्मिक परंपरा है। मान्यता के अनुसार यहां आने वाले लोग मनोकामना पूरी करने के लिए कल्पवृक्ष की टहनी पर एक धागा बांधते हैं। इसके साथ यह परंपरा भी जुड़ी है कि मुराद पूरी होने पर कल्पवृक्ष जाकर वह धागा खोलना होता है। पूजा-अर्चना करने वाले लोगों द्वारा वहीं खिचड़ी बना कर खाने की परंपरा भी है।

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कल्पवृक्ष में धार्मिक आयोजन

छानी गांव में स्थित कल्पवृक्ष में 20 जुलाई से वाल्मिकी रामायण कथा का आयोजन किया जा रहा है। यह धार्मिक आयोजन क्षेत्रीय जनता और 108 महंत कैलाश गिरी महाराज द्वारा किया जा रहा है। जिसमें कथा व्यास ग्राम थापला के कैलाश चंद्र लोहनी होंगे। तय कार्यक्रमों के अनुसार प्रात: 8 बजे से पूर्वाह्न 11 बजे तक पूजन व मूलपाठ होगा जबकि दिन में एक बजे से सांय 5 बजे तक कथा प्रवचन, आरती व प्रसाद वितरण होगा। आयोजन का समापन भंडारे के साथ 28 जुलाई को होगा।

http://www.jagran.com/uttarakhand/almora-11483152.html

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

यहां श्रीराम के लौटने के एक माह बाद मनाते हैं दिवाली

अलग संस्कृति के लिए पहचाना जाने वाले उत्तराखंड का जौनसार-बावर क्षेत्र शनिवार को छोटी दिवाली (नांदरीदिआवी) के रंग में रंगा नजर आया।

देर रात तक लोग होलाडे़ (सूखी लकड़ी की मशाल) लेकर पंचायती आंगन में नाचते-गाते रहे। इससे पहले सुबह मंदिरों में देवता के दर्शन के लिए लोगों की लाइन लगी रही।

जौनसार के समाल्टा, कनबुआ, पानुवा, अलसी, सकनी, बिजऊ, कोटी, भुगतार, समाया, बडनू, उत्पाल्टा, उपरोली, कोरुवा, भंजरा, सुरेऊ, चंदेऊ, थंणता, क्यावा समेत दर्जनों गांवों में शनिवार को छोटी दिवाली का पर्व मनाया गया।

सुबह के समय ग्रामीण पंचायती आंगन में एकत्र हुए। यहां से महिलाएं, पुरुष, बच्चे ढोल दमाऊ के साथ नाचते-गाते एक निश्चित स्थान पर एकत्र हुए।

ग्रामीणों ने भीमल की सूखी लकड़ी के होलाडे़ जलाए। इसके बाद ग्रामीण फिर से पंचायती आंगन में लौटे और यहां देवी-देवताओं की पूजा अर्चना कर मन्नतें मांगी। इसके बाद नाच गाने का दौर शुरू हुआ जो देर रात तक जारी रहा।

मान्यता के अनुसार, जौनसार बावर में कार्तिक मास की अमावस्या के एक माह बाद पता चला था कि राम वनवास समाप्त कर अयोध्या पहुंच चुके हैं। इस कारण यहां एक माह बाद दिवाली मनाई जाती है।

चकराता में सैलानी जोड़े की हत्या के बाद पर्यटन की बिगड़ी सूरत संवारने के लिए अब स्थानीय लोगों ने कमान संभाल ली है।

पर्यटकों का जौनसार बावर से नाता न टूटे और वे पहले की तरह बिना किसी भय के जौनसार बावर आते रहे इसके लिए स्थानीय लोगों ने पर्यटकों के साथ बूढ़ी दिवाली का जश्न मनाने का निर्णय लिया है।

इसके लिए दिल्ली और हरियाणा के कई पर्यटकों को यहां बुलाया गया है। कार्यक्रम के जरिये यह संदेश दिया जाएगा कि चकराता पर्यटकों के लिए बिल्कुल सेफ है।

जौनसार बावर पर्यटन विकास समिति ने कार्यक्रम के लिए पूरी तैयारी कर ली है। समिति ने दिल्ली और हरियाणा के 40-50 पर्यटकों का चयन किया है जो 24 नवंबर को चकराता घूमने आ रहे हैं।

पर्यटकों को सेफ फील कराने के लिए समिति उनका ढोल-दमाऊ की थाप पर हरिपुर कालसी में स्वागत करेगी। इस मौके पर पर्यटन मंत्री दिनेश धनै भी मौजूद रहेंगे।

इसके बाद पर्यटक कोरूवा, लोखंडी, हाजा होते हुए चकराता जाएंगे। पर्यटकों को गांव के रीति रिवाजों से रूबरू करवाया जाएगा। उन्हें बूढ़ी दिवाली मनाने की परंपरा बताई जाएगी।

समिति के संयोजक भारत चौहान ने बताया कि सैलानी जोड़े की हत्या के बाद से पर्यटकों का क्षेत्र से मोह भंग होने लगा था। इसको देखते हुए समिति ने यह निर्णय लिया है। इससे जहां संस्कृति का प्रचार-प्रसार होगा, वहीं व्यापार को भी रफ्तार मिलेगी। (amar ujala)