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Freedom Fighters From Uttarakhand- उत्तराखंड के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी

Started by Devbhoomi,Uttarakhand, July 01, 2009, 10:23:22 PM

gireeshbhatt75@gmail.com

श्रीदेव सुमन बडोनी (निवासी ग्राम जौल) जिनके अमर बलिदान के साक्ष्य हैं टिहरी के वृक्ष जिसकी छाँव में हमें स्वतंत्र होने का आनंद प्राप्त होता है, टिहरी के पहाड़ जिनसे हमें अपने कर्तब्य के प्रति अटल रहने, कभी ना झुकने व जीवन की ऊँचाइयों को छूने की प्रेरणा मिलती है वह गंगा, भिलंगना, भागीरथी जैसे कई निरंतर प्रवाहित पवित्र नदियाँ जो किसी भी बाधा के समक्ष घुटने नहीं टेकती और अपने प्रयाण का मार्ग स्वयं ढूंड लेती हैं और यह विद्यालय जो कई वर्षों से सुमन जी के नाम की ज्वाला अपने विद्यार्थिओं के ह्रदय में निरंतर प्रज्वलित करता आ रहा है किन्तु आज हम उन मूल्यों को विस्मृत कर गए हैं जो सुमन जी ने हमें एक स्वतंत्र टिहरी का आजाद नागरिक बना सिद्ध किया था. जिन मूल्यों के लिए उन्होंने ८४ दिन अन्न जल का परित्याग कर पंचतत्व का आलिंगन किया था. उन्होंने एक स्वतंत्र टिहरी राज्य की ही नहीं अपितु कल्पना की थी एक ऐसे भारत वर्ष की जो एक उन्नत, स्वाबलंबी, शांति का द्योतक, गौरवमयी राष्ट्र हो, जिसमें प्रत्येक नागरिक को पूर्ण स्वतंत्रता का अधिकार हो..
-गिरीश भट्ट

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वर्षो से समस्याओं से जूझ रहा सेनानी गांव
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मुनस्यारी: स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नरीराम का गांव आजादी के छह दशक बीतने के बाद भी समस्याओं से जूझ रहा है। उपेक्षा का आलम यह है कि सेनानी के गांव तक मोटर मार्ग नहीं बना है। इतना ही नहीं गांव के लिए पेयजल योजना नहीं बनाने से यहां के ग्रामीणों को मीलों दूर से पानी जुटाना पड़ता है।


ग्राम सभा जोसा का गांधीनगर तोक अनुसूचित जाति बाहूल्य है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का गांव होने के बावजूद इसकी शासन-प्रशासन द्वारा घोर उपेक्षा की गई है। इस गांव के लिए न तो सड़क का निर्माण किया गया है और नहीं ग्रामीणों को मूलभूत सुविधाएं देने के अब तक प्रयास किए गए हैं।


ऐसे में लोगों को तहसील मुख्यालय पहुंचने के लिए 25 मील की दूरी तय करनी पड़ती है। खाद्यान्न सहित अन्य आवश्यक वस्तुओं का ढुलान करने के लिए तीन सौ रुपए का भाड़ा देना पड़ता है। चिकित्सा सुविधा नहीं होने से बीमारों को डोली में लाना पड़ता है।

ऐसे में गंभीर रोगी मार्गो में ही दम तोड़ देते हैं। भ्रमण के दौरान भाजपा मंडल महामंत्री हीरासिंह चिराल को ग्रामीणों ने समस्या से अवगत कराया। जिस पर महामंत्री ने जिलाधिकारी को ज्ञापन प्रेषित करते हुए गांधीनगर गांव की समस्याओं का समाधान करने की मांग प्रमुखता से उठाई है।


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सूबे के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को अब पारिवारिक पेंशन 6139 रुपये मिलेंगे। दरअसल सरकार ने इसमें 370 रुपये की बढ़ोतरी करने का निर्णय लिया है। प्रमुख सचिव गृह की ओर से इस बारे में शासनादेश जारी हुआ है।

देश को आजादी दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले सूबे के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को राज्य सरकार की ओर से 5769 रुपये पेंशन मिल रही है। इसे बढ़ाने को लेकर पिछले काफी समय से कवायद चल रही थी, इस पर अब जाकर अंतिम मुहर लगी है। अब सरकार ने इसमें 370 रुपये का इजाफा करने का निर्णय लिया है। लिहाजा स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को पेंशन अब 6139 रुपये मिलेंगे।

प्रमुख सचिव गृह राजीव गुप्ता की ओर से जारी शासनादेश में सभी जिलों के डीएम को पेंशन की नयी व्यवस्था को लागू करने के निर्देश दिए गए हैं।


Source dainik jagran

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स्व. गढ़वाली की प्रतिमा को नहीं मिला स्थान
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पेशावर कांड के नायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की स्मृति में बनायी गयी उनकी प्रतिमा आज अपने लिए एक स्थान ढूंढ रही है।

प्रख्यात मूर्तिकार डॉ.अवतार सिंह पंवार की नायाब कला का बेमिसाल नमूना है, तहसील परिसर में स्थित पेशावर कांड के नायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की आदमकद प्रतिमा। वर्ष 1997 में तत्कालीन रेल राज्य मंत्री सतपाल महाराज ने मूर्ति का अनावरण किया। मूर्ति को तहसील परिसर में स्थापित किया गया।

वर्ष 2009-10 में तहसील को नये भवन मे शिफ्ट किया गया और भारत इलेक्ट्रानिक्स लिमिटेड की स्थानीय इकाई ने पुराने स्थान पर एक पार्क बनाने का निर्णय किया। तहसील प्रशासन ने स्व.गढ़वाली की मूर्ति की सुध लेते हुए भाइलि प्रशासन से उक्त मूर्ति को पार्क के भीतर स्थापित करने का अनुरोध किया, जिस पर भाइलि प्रशासन ने सहमति भी जता दी। भाइलि ने पार्क निर्माण तो पूरा कर दिया, लेकिन अभी तक मूर्ति को पार्क के भीतर शिफ्ट करने की दिशा में कोई कार्रवाई नहीं की गयी है।

दूसरी ओर, स्व.गढ़वाली की इस आदमकद प्रतिमा के समक्ष फैली गंदगी इन तमाम लोगों के लिए सबक भी है, जो 'विशेष' मौकों पर स्व.गढ़वाली के आदर्शो को आत्मसात करने को 'संकल्प' लेते हैं।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal

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स्वाधीनता सेनानी कन्याल ने 23 वर्ष की उम्र में दी शहादत
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जैंती (अल्मोड़ा): 23 वर्ष की उम्र में देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की बाजी लगाने वाले शहीद टीका सिंह कन्याल ने अपनी छाती में अंग्रेजों की गोली खाकर यह दिखा दिया कि ब्रिटिश हुक्मरानों के अत्याचारों से निजात के लिए क्रांतिकारी गोली के भय से पीठ दिखाने वाले नहीं। अगस्त क्रांति में स्वर्णाक्षरों में दर्ज टीका सिंह का जन्म भी आज से 92 वर्ष पूर्व ठीक 15 अगस्त को हुआ।

लेकिन आज शहीद टीका सिंह कन्याल का जन्मदिन मनाने की तक शासन-प्रशासन ने जहमत नहीं उठाई। इस बार ग्रामीणों ने आगमी 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के साथ-साथ शहीद टीका सिंह का जन्मदिवस भी धूमधाम से मनाने का निर्णय लिया है।

15 अगस्त 1919 को कांडे निवासी जीत सिंह कन्याल के घर में पैदा हुए टीका ंिसह कन्याल पर बचपन में सालम के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राम सिंह धौनी के व्यक्तित्व की अमिट छाप पड़ी। स्कूली पढ़ाई छोड़ मात्र 18 वर्ष की उम्र में आजादी के तराने गाने का बीड़ा उठाया। अविवाहित टीका सिंह स्व.प्रताप सिंह बोरा व दुर्गा दत्त शास्त्री के साथ गांव-गांव जाकर नौजवानों को अपनी टोली में शामिल कर अंग्रेजों के जुल्म की कहानी बयां करते थे।

9 अगस्त को गांधी जी के करो या मरो नारे का पालन किया। 25 अगस्त को शहीद हुए टीका सिंह कन्याल ने धामद्यो के टीले में गोरी फौज से निहत्थे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने वह लोहा लिया। जिसकी मिशाल कम ही मिलती है। इस दौरान जहां टीका सिंह के साथ ही चौकुना निवासी नर सिंह धानक भी मौके पर ही शहीद हो गए।



Source Dainik jagran

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आजादी के 62 वर्ष: आहत हैं स्वतंत्रता सेनानी श्री बिष्ट
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देश आज आजादी की 62वीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है। इसके लिये स्थान-स्थान पर भव्य समारोह व कार्यक्रम होंगे तथा इस मौके पर जहां स्वतंत्रता आन्दोलन के क्रांतिबीरों की शहादत को याद किया जायेगा, वहीं कई सम्मानित भी होंगे, लेकिन आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाने वाले अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आज भी उपेक्षित हैं।
इन्हीं में एक हैं इस विकास खंड के छाना गांव निवासी 87 वर्षीय खेम सिंह बिष्ट। जिन्हें आवंटित जमीन के मामले में 37 वर्षो में भी न्याय नहीं मिल पाया। लंबी लड़ाई व पत्र व्यवहार के बाद भी उन्हें आवंटित भूमि पर न तो कब्जा मिल पाया, न ही कोई मुआवजा। श्री बिष्ट एक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी हैं, जिनका जीवन का एक भाग देश की प्रमुख राजनैतिक हस्तियों के साथ बीता है, मगर यह सब कुछ होने के बावजूद उनकी आवाज फाइलों में ही दब कर रह गई है।
थक हार कर बढ़ती उम्र में श्री बिष्ट ने अपने पैतृक गांव में खेतीबाड़ी शुरू कर दी, लेकिन आज काफी वृद्ध हो जाने के कारण वे असहाय से हो गये हैं। हैरत की बात है कि ऐसे शख्स आज भी जमीन पाने की आस में दर दर की ठोकरें खा रहे हैं, मगर सुनने वाला कोई नहीं है। जबकि गत वर्ष उन्हें स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्रपति ने भोज पर बुलाकर सम्मानित भी किया।
खेम सिंह बताते हैं कि सेनानी कोटे के अंतर्गत उन्हें सरकार द्वारा वर्ष 1961 में तराई के बेचालगढ,़ किसनपुर-कोटली में 5 एकड़ जमीन आवंटित की गई। लेकिन इस जमीन पर आज तक श्री बिष्ट को कब्जा नहीं मिल सका है। जबकि 1964 से वे तमाम सरकारों से गुहार लगाते लगाते थक गये हैं। बताया जाता है कि आवंटित जमीन पर असरदार लोग कब्जा जमाये बैठे हैं।

थके-हारे व परेशान श्री बिष्ट बीते कुछ वर्षो से मुआवजा दिलाने की मांग कर रहे हैं, फिर भी उनकी कोई नहीं सुन रहा है। श्री बिष्ट बताते हैं कि आजादी के बाद उनका पूर्व राष्ट्रपति राजेन्द्र बापू, पुरूषोत्तम टंडन, जवाहर लाल नेहरू, संजीवा रेड्डी व इंदिरा गांधी का साथ रहा है। इतना सब कुछ होने के बाद भी जीवन के इस आखिरी पढ़ाव में भी वे जमीन समस्या से जूझ रहे हैं।     
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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का निधन, राजकीय सम्मान से हुई अंत्येष्टि
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बेरीनाग (डीडीहाट) : तहसील में जीवित एकमात्र स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कुशल सिंह का 97 वर्ष की उम्र में निधन हो गया है। उनके निधन से पूरे क्षेत्र में शोक व्याप्त है। सेनानी का थल में रामगंगा नदी के तट पर राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया।

वर्ष 1914 में तहसील बेरीनाग के पुंगराऊं घाटी क्षेत्र के डाडल गांव में विशन सिंह के घर पैदा हुए थे। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में बढ़ चढ़ कर भाग लिया था। कुशल सिंह विगत कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे। मंगलवार की रात उन्होंने अंतिम सांस ली। बुधवार की प्रात: सेनानी के निधन का समाचार मिलते ही क्षेत्र में शोक की लहर व्याप्त हो गई। दूर-दूर से लोगों ने डाडल गांव पहुंच कर सेनानी के अंतिम दर्शन किये।

सूचना मिलते ही बेरीनाग से तहसीलदार बीएस गुंज्याल गांव पहुंचे। जहां प्रशासन की तरफ से सेनानी के पार्थिव शरीर पर पुष्पचक्र चढ़ाया। शव यात्रा में क्षेत्र के समस्त प्रधान, बीडीसी सदस्य सहित ग्रामीण उपस्थित थे। इधर विधायक जोगा राम टम्टा, ब्लाक प्रमुख खुशाल सिंह भंडारी, राज्य महिला आयोग के उपाध्यक्ष गीता ठाकुर, बलवंत धनिक, हेम पंत सहित अन्य लोगों ने दुख व्यक्त किया है।


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शहीद सकलानी व भरदारी का किया भावपूर्ण स्मरण
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टिहरी जनक्रांति के नायक शहीद नागेन्द्र सकलानी की 65वीं पुण्यतिथि पर क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों व सामाजिक संगठनों से जुड़े लोगों ने उनका भावपूर्ण स्मरण कर उन्हें श्रद्धांजलि दी।

बुधवार को चम्बा में उत्तराखंड शोध संस्थान, सामुदायिक रेडियो हेंवलवाणी और संगीत विद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित गोष्ठी में नगर पंचायत अध्यक्ष सूरज राणा,

समाजसेवी व शिक्षक सोमवारी लाल सकलानी ने कहा कि श्रीदेव सुमन के अलावा टिहरी जनक्रांति के नायकों में नागेन्द्र सकलानी का नाम बड़े सम्मान के साथ याद किया जाता है, लेकिन शासन, प्रशासन की ओर से कोई कार्यक्रम आयोजित न किया जाना चिंतनीय है। स्व. सकलानी का जन्म 20 फरवरी 1920 को जौनपुर प्रखंड के पुजारगांव में हुआ था।

बचपन में ही देश के लिए 1948 में टिहरी रियासत के खिलाफ चलाए गए आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की। इस मौके पर दूसरे शहीद मौलू भरदारी को भी याद किया गया। श्रद्धांजलि देने वालों में प्रो. बीडी शर्मा, रामप्रसाद डोभाल, पदम सिंह गुसांई, रवि गुसांई, राजेन्द्र सिंह, आरती बिष्ट, सीतल, भरत सिंह, जितेन्द्र सिंह आदि शामिल थे। कीर्तिनगर : मोलू भरदारी व नागेन्द्र सकलानी की पुण्यतिथि पर उनके बलिदान को याद किया गया।


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Ghansyam Shastri: A freedom fighter from Champawat District

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