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Etymology & Geography - उत्तराखंड,गढ़वाल तथा कुमाऊ की नामोत्पति,और भूगोल

Started by Devbhoomi,Uttarakhand, July 05, 2009, 09:15:40 AM

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०२-महाहिमालय (हिमाद्री)

इस प्रदेश का अधिकांस भाग वर्ष भर हिमान्छादित रहता है!अतःयह छेत्र हिमाद्री (वर्फ का घर)कहलाता है,१५से ३० किमी चौडा इस पेटी का औसत धरातल ४८०० से ६००० मी तक है!यहाँ नंदा देवी (७८१७मि)सर्वोच्च शिखर है,तथा कामेट बंदरपूंछ,केदारनाथ,गंगोत्री,चौमुखा,दूनागिरी,त्रिशूल,नंदाकोट,पंचाचूली,आदि हिमाच्छादित छेत्र है!जो ६०० मी से अधिक ऊँचे हैं!
यह प्रदेश प्रकिरित्क वनस्पति कि दिर्ष्टि से महत्वहीन है!इन परदेशों मैं फूलो कि घाटी स्तिथ है,कुछ जगहों पर छोटे-छोटे घास के मैदान हैं,जिन्हें बुग्याल,पन्यार तथा अल्पाइन पास्च्र्ष आदि नामों से जाना जाता है!
इस छेत्र मैं,मिलम केदारनाथ,गंगोत्री आदि विशाल हिमनद प्लिस्तोसीन युग मैं होने वाली हिमाच्छादन के स्पस्ट प्रमाण प्रस्तुत करते हैं!इसी छेत्र मैं गंगोत्री ओर यमनोत्री हिमनद क्रमश गंगा एवं यमुना नदियों के उदगम स्थान हैं,सम्पूरण प्रदेश अत्यंत पथरीला व कट्टा-फट्टा है!जो कई पंखाकार उपनदियों वाली मोड़दार श्रृंखलाओं द्वारा निर्मित है!यह प्रदेश अदिकतर ग्रिनाईट,नीस व शिस्टशैलों से आविरत है,जलवायु की दिर्ष्टि से यह छेत्र सबसे अधिक ठंडा है!
ग्रीष्मकालीन ग्रामों मैं भेड व बकरियों के आने से चहल पहल बढ़ जाती है,प्राय ३००० से ४५०० मी की ऊंचाई वाले छेत्रों के अल्पाइन चारागाह पशुचारण के प्रमुख केंद्र बन जाते है!
जहाँ भागीरथी व अलकनंदा घाटी से जाड,मार्छा व तोलचा तथा धौली,गौरी गंगा व काली गंगा नदी की घाटियों से भोटिया जनजाति के लोग अपने पशुओं को चराने आते है!ग्रेषम कालीन मानसून हवाएं पर्वतों को पार करके उत्तर की ओर नहीं जा सकती हैं!३००० मी की ऊंचाई वाले भागों मैं शितोषण कटिबंधीय सदाबहार नुकीली पत्ती वाले विर्छों,फार,सरों,चीड,आदि के वन मिलते हैं,उसके ऊपर ३९०० मी तक कुछ घासें ओर झाडियाँ मिलती हैं,आर्थिक दिर्ष्टि के आधार पर भी यह छेत्र पिछड़ा हुवा है!किर्षीकार्य केवल ग्रीष्मकाल के चार महीनों मैं ही केन्द्रित होते हैं!

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०३-मध्य हिमालय (हिमांचल)

यह छेत्र महाहिमालय के दछिन मैं है,जो ७० से १२० किमी के विस्तार के साथ औसतन ७५ किम चौडा है!इस छेत्र मैं अल्मोडा,गढ़वाल,टिहरी गढ़वाल तथा नैनीताल का उत्तरी भाग सम्मिलित है,इस छेत्र कि पर्वत श्रैनियाँ पूर्व से पश्चिम,मुख्य श्रेनी के सामान्तर फैली हुयी हैं!जो सामान्यतः १५०० मी से २०० मी कि ऊँची हैं इस छेत्र मैं वलित एवं काय्न्त्रित शैलियों से निमित श्रैनियाँ व गहरी घाटियाँ स्तिथ हैं!जहाँ पर ५०० से १२०० मी कि कि ऊंचाई पर अनेक नदी,घाटियाँ है,नैनीताल मैं २५ किमी लम्बी व ४ किमी चौडी पट्टी के अनेक ताल स्तिथ हैं,जिनमें मुख्य है-नैनीताल,नौकुचियाताल,खुर्पाताल,शुखाताल,सदियाताल एवं भीमताल!
शीत्रितु मैं यहाँ कड़ी सर्दी पड़ती है,पर्वतीय श्रृंखलाएं बहुदा हिमान्छादित रहती हैं!किन्तु नचले भागों कम सर्दी होती है,ग्रीस्म्कालीन मानसून द्वारा यहाँ पर भारी वर्षा होती है!वार्षिक वर्षा कि मात्रा१६०-२०० सेंटीमीटर के मध्य है,ग्रीष्मकालीन मौसम शीतल व सुहावना होता है,अथ ग्रीष्म ऋतू मैं मैदानी भागों से लोग नैसर्गिक शउन्द्रया का आनंद प्राप्त करने तथा स्वास्थ्य लाभ करने इस प्रदेश मैं आते हैं!इस छेत्र मैं शितोषण कटिबंधीय सदाबहार सघन वन मिलते हैं,सम्पूर्ण छेत्र के ४५-६०% भाग वनान्छादित है,यहाँ बाँज,खर्शो ,बुरांस,चीड,फ़र, देवदार,व सरो आदि विर्छों का बाहुल्य हैं!इनकी लकडी मुलायम होती है,कास्ट उद्योग व एनी कार्यों के लिए इनकी लकडी बहु उपयोगी होती है!
इस छेत्र कि मिटटी पथरीली व हलकी ओर कम उपजाऊ है,फिर भी २००० मी तक इ ऊंचाई पर उपजाऊ मिटटी वाली नदियों कि घाटियों मैं तथा पर्वतीय ढालो पर शिडिदार खेतों का निर्माण कर किर्शी की जाती है!इन छेत्रों मैं ढाल मिटटी की किस्म जल की प्राप्ति आदि अनुकूल दशाओं के आधार पर खरीप (ग्रीष्म) तथा रवि (शीत) की फसलें बोई जाती हैं!शिडिदार खेतों तथा घाटियों मैं उत्तम कोटि का धान उत्पन्न किया जाता है!

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०४-शिवालिक तथा दून

यह प्रदेश मध्य हिमालय के ध्छिं मैं है,इसको बारहा हिमालय के नाम से भी जाना जाता है!इस छेत्र का विस्तार १००० मी से २००० मी तक ऊंचाई वाले छेत्रों मैं,अल्मोडा,पोडी गढ़वाल व चम्पावत जनपदों के दछिनी भाग, मध्यवर्तीनैनीताल तथा देहरादून जिलों मैं है!शिवालिक श्रेणियों को हिमालय की पाद प्रदेश श्रैनियाँ भी कहते हैं!शिवालिक एवं मध्य श्रेणियों के बीच चौरस घाटियाँ पाईअन  जाती हैं!जिन्हें दून कहा जाता है,दून घाटियाँ प्राय २४ से ३२ किमी चौडी तथा ३५० से ७५० मी ऊँची हैं,जिनमें देहरादून अत्यंत महत्वपूर्ण है!
अन्य दून घाटियाँ हैं-पछुवा दून,पूर्वी दून,चंडी दून, कोटा दून,हर-की-दून, पातलिदून, चौखम्दून,कोटरीदून आदि मुख्य दून घटी ७५ किमी लम्बी तथा २५ किमी चौडी है!शिवालिक श्रेणियों का कर्म,नदियों द्वारा स्थान-स्थान पर बिछिन्न कर दिया गया है!हरिद्वार मैं गंगा नदी तथा विकाशनगर(देहरादून) के पश्चिम मैं यमुना नदी द्वारा शिवालिक श्रृंखला-कर्म का विच्छेदन स्पस्ट दिर्ष्टि गोचर ओता है!वहीँ से मैदानी भाग आरम्भ हो जाते हैं ,शिवालिक तथा दून छेत्र की जलवायु अपेछाकिर्त गर्म व आर्ध है, यहाँ ग्रीष्म कालीन तापमान २९.४० से ३२.८० सेंटीग्रेड तथा शीत ऋतू का तापमान ४.४० से ७.२० सेंटीग्रेड रहता है!
वार्षिक वर्षा की मात्र सामान्यतः २०० से २५० सेंटीमीटर रहती है इस प्रदेश के उत्तरी ढाल सघन वनों से ढके हैं,यहाँ के वन आर्थिक रूप से अत्यंत महत्वपूरण हैं !शीसम,शेमल,आंवला,बांस तथा शाल शगौन के विछ निचले भागों मैं चीड,देवदार,ओक व वर्च अधिक ऊंचाई वाले छेत्रों मैं पहडियों के ढालों पर मिलते हैं,वहां वनों पर आधारित कागज़ बनाने,लकडी स्लीपर तथा फर्नीचर निर्माण उद्योगों का विकास हुवा है!
खनिज पदार्थों की दिर्ष्टि से यह छेत्र अत्यंत महत्वपूर्ण हैं!ध्रादूं के मंदराशु व बड़कोट छेत्रों मैं लाखों टन चुना पत्थर प्राप्त होता है,देहरादून इस छेत्र का सबसे बड़ा नगर है!उत्तरी रेलमार्ग पर्वतीय छेत्र मैं यहीं समाप्त होता है!

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०५-तराई भाभर (६००-१५००मि)

यह प्रदेश बहिर्हिमालय अथवा शिवालिक श्रेणियों एवं गंगा के समतल मैदान के मध्य तंग पट्टी के रूप मैं फेला हुआ है!धरातलीय धषाओं के आधार पर इस प्रदेश को दो भागों मैं विभाजित किया जा सकता है-०१ भाभर ०२- तराई,

भाभर- कक्रिली एवं पथरीली मिटी द्वारा निर्मित यह छेत्र पर्वतीय टलती मैं ३५ से ४० किमी चोडी तंग पट्टी के आकर मैं तराई के उत्तरी भाग मैं मिलता है!इस छेत्र कि चौडाई पश्चिमी भागमैं पूर्वी भाग कि अपेछा अधिक है!भाभर छेत्र मैं नदियाँ एवं स्रोतों का जल धरातल के ऊपर न बहाकर अदिर्स्य होकर निचे बहता रहता है,जलधाराएँ निचे ही बहती रहती हैं!और तराई प्रदेश के ऊपर आकर प्रकट होती हैं,राज्य का भाभर छेत्र नैनीताल तथा गढ़वाल जिलों मैं पाया जाता है,

तराई-समतल,नम एवं दलदली मैदान हैं,जो भाभर के समानांतर तंग पट्टी के रूप मैं विश्त्रित हैं जलधाराएँ तराई प्रदेश मैं आकर धरातलीय भाग मैं फेलती हैं!इस छेत्र मैं वर्षा भी अधिक होती है,तथा जल सम्पूरण छेत्र मैं फेलकर दलदल उत्त्पन्न कर देता है! मैदानी भागो से उत्तराखंड के पर्वतीय भाग मैं प्रवेश स्थान घटे या द्वार कहलाते है,कुछ घटे /द्वार इस प्रकार हैं,हरिद्वार,कोटद्वार,द्वारकोट.चौकीघटा ,चिल्किला,चोरगलिया (हल्द्वानी)बमोरी (काठगोदाम)ब्रहमदेव (टनकपुर)तिमली तथा मोह्न्द्पास (देहरादून)सभी घाटे/ द्वार शिवालिक, दूं, व तराई छेत्रों मैं स्तिथ हैं!

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उत्तराखंड का स्थल रूप (Land Forms)  
उत्तराखंड के निम्नलिखित स्थल रूप महत्वपूरण हैं,
०१-नदी उत्तल-समुद्रतल से लगभग १५२० किमी तक अवस्थित स्थल जन्सवांस के लिए अनुओल्तम है!जो जलोढ़ मिटटी से निर्मित है,नदीतटोंकेयहसमतलभाग,सैन,सौड़तहबगड़कहलातेहैं,भागीरथी,गंगiपर,भटवाडी,बाडाहाट(उत्तरकाशी),चिन्यालीसौड़ अलकनंदा पर पनाई,गोचर और श्रीनगर रानीहाट आदि ऐसे उत्तल हैं!

०२ हिमानी उत्तल समुद्रतल से लगभग ३५०० मी से ४००० मी की ऊंचाई पर हिमानी उत्तल पाए जाते हैं!यमुना घटी मैं खरसाली ग्राम,भागीरथी घाटी, शिवलिंग शिखर के निचे तपोवन मन्दाकिनी उद्गम के पास केदारनाथ मंदिर आदि हिमानी उत्तल के उदाहरण हैं!

०३-हिमगह्र -यह मंडलाकार स्थल महाहिमालय मैं इसी ऊंचाई पर आरंभिक हिमानी छरण के कारन बने हैं,बद्रीनाथ मंदिर और माणा गाँव इन्हीं हिमागाह्रों मैं स्तिथ है!

०४- उषण जलस्रोत -यमनोत्री,गनगनाडी ,,गोरीकुंड, बद्रीनाथ,तपोवन आदि स्थान उषण जलस्रोतों के निकल स्तिथ हैं,इन स्थलों के अतिरिक्त नदी- संगम,हिमानिछ्रित घाटियाँ,झीलों से बने समतल भाग और मंद प्रवण भी अवस्थापना हेतु उपयुक्त स्थान माने गए हैं!

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पर्वत श्रेणियां एवं पर्वत शिखर
प्रदेश के प्रकिर्तिक प्रदेशों मैं महाहिमालय छेत्र मैं उल्लेखनीय पर्वत शिखर हैं,जिहने ६ श्रेणियों मैं वर्गिकिर्ट किया जा सकता है!
०१-बंदरपूंछ (६३२० मी) ०२-गंगोत्री (६६७२ मी)केदारनाथ (६९६८मि) चौखम्बा (७१३८ मी),०३-कामेट(७७५६मि ),०४नन्ददेवि (७८१७ मी),दूनागिरी ७०६६ मी),त्रिशूल( ७१२९० मी),नन्दकोट (६८६१ मी),०५-पंचाचूली (६९०४ मी )तथा कुटी सान्ग्तांग (६४८० मी)
यह शिहर समूह भागीरथी,अलकनंदा,धौली पश्चिमी,व धौली पूर्वी  तथा गोरी गंगा से निर्मित अनुप्रस्थ घाटियों द्वारा एक दुसरे से पिर्थक भ्रिदिर्स्य बनाती हैं महाहिमालय के उत्तर मैं ट्रांस हिमालय की जैंकर श्रेणी के साथ-साथ कोई गिरिद्वर (दरें) हैं,
ऊत्ताराखंड हिमालय मैं पर्वत शिन्खालाओं का विस्तार उत्तर पश्चिम से दछिन पूर्व दिशा मैं है!जिन्हें महाहिमालय छेत्र से निकलने वाली दछिन डिश मैं प्रभाव मान नदियों ने गहरी विस्तिरण घाटियों मैं विभक्त कर दिया है!प्रदेश के उत्तरी-पचिमी आँचल  मैं श्रीकंठ(६७२८ मी)शिखरों वाली पर्वत श्रेणियां हैं! नंदादेवी  शिखर समूह मैं हिमंछादित के हिखारों के साथ गढ़वाल और कुमाऊं की सीमा रेखा बनाने वाली अनेक विस्त्रीरण शिन्ख्लायें है,नंदादेवी पर्वत श्रृंखला तथा उसके उत्तरी पश्चिमी विस्तार के साथ- साथ दूनागिरी,कालोंका,दियोदामला,लातुधुरा,नंदादेवी,आदि शिखरों वाली श्रेणियां,पिथौरागढ़,तथा चमोली जनपदों की सीमा रेखा बनती हैं, आगे चलकर दछिनी नंदादेवी शिखर छेत्र का विस्तार,अल्मोडा  जनपद को चमोली से पिर्थक करता है,

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बुग्याल तथा गिरिद्वार (दरें)
महा-हिमालय अपने उतुंग शिर्न्गों,विस्तृत हिमानियों और हिमानी झीलों के लिए जितना प्रशिध है उतनी ही अपनी चर-भोमियों के लिए भी है!वर्षाऋतू मैं अर्ध-यायावर पशुपालक अपने पशुओं के साथ यहाँ दिखाई देते हैं,हिम रेखा से निचे ३५०० मी से ६००० मी की ऊंचाई के मध्य,कोमल घास की ढलाने उत्तराखंड मैं बुग्याल कहलाती हैं!ये बुग्याल बुगी ममला आदि मिर्दु घासों की पोष्टिक चर भोमियां है, और ब्रहमकमल, शाल्म्पंजा,सोम,निर्विषी,रुद ्रवंती,विशंकडआर आदि असंख्य प्रकार के पुष्पों के सागर है,ये गुग्गल,बिल,जटामासी जैसी धुप बूटियां एवं कूट ममिरी,रतन्ज्योति,जैसी ओसधियों के भण्डार हैं!
पशु चारण के लिए बुग्याल इतने लोक प्रिय हैं,कि इन्हें पशुपालकों का स्वर्ग कहा जाता है!इन्हें कश्मीर मैं मर्ग तःथा कुल्लू मैं थच कहते हैं!पशुचार्क अन्नुवाल,पालसी,चल्घुम्तु,गु जर,या गदि कहलाते है! कुमाओं मंडल के पिथौरागढ़ जनपद मैं
भेड़पालन आर्थिक सम्पन्नता का प्रतीक है,अनेक बुग्याल छेत्र मैं राज्राम्भा,नागलिंग,बुर्फू,च ोटी,लातुधरा,तिर्शूली,हर्देव ल,स्वियितिला,बम्बधुरा,नन्दग ों तथा छोटा कैलाश भेड बाहुल्य स्थान है!

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०१-फूलों की घाटी (३६०० मी से ४००० मी)
यह भ्युनदार उपत्यका का रमणीक बुग्याल हैजिसे सन १९१३ मैं बिर्टिश पर्वतारोही फ्रेंक स्माइथने २फूलोन की घाटी" और फूलों का स्वर्ग"नाम से संसार मैं बिख्यात कर दिया था!यहीं पारिजात पुष्पों की खोज मैं भीमसेन आये थे!पादप विज्ञान के शोधार्थियों के अनुसार विश्व मैं एक ही स्थान पर इतने प्रकार के पुष्प अन्यन्त नहीं मिलते फूलों की घाटी जुलाई से सितम्बर तक आकर्षक रंगीन फूलों se आच्छादित रही है!
१९३९ मैं क्युवेतेनिकल गार्डन, लन्दन की ओर से ५४ वर्षीय जोन मार्गेट लैगी, इस घाटी के फूलों की प्रजातियों का अद्ययन करने आयीं थीं!किन्तु दुभाग्य्वास फूलों को चुनते हुए,एक ढालदार पड़ी से फिशलकर उनकी मिर्त्यु हो गई!और वह इस घाटी को विश्व मानचित्र पर सथापित करे हए,इसी प्रकिरती पुष्प शैय्या पर समाधिस्त हो गई! वर्तमान पर्यटन व्यवस्था के अंतर्गत इस बुग्याल मैं पशु चारण आंशिक प्रतिबंध लगा दिया गया है!

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०२-ओली गुरसों
उत्तराखंड की सीमावर्ती जनपद चमोली मैं,जोस्जिमाथ से मात्र १५ किलोमीटर की दूरी पर सिन्धुतल से २५००-३०५० मी की ऊंचाई पर स्तिथ ओली शीतकालीन किर्डाओं का प्रमुख केंद्र हैं!इसी से सल्गन मखमली घास का गुरसों बुग्याल है,प्राकिर्तिक सौन्दर्य से सराबोर यह रमणीक स्थल,नंदादेवी,कामेट,माणाशिख र,दूनागिरी,नीलकंठ तथा हाथी-गोरी पर्वत शिर्न्ख्लाओं से घिरा है,ओली हिम किर्डा के लिए विश्व मैं सुन्दरतम ढलान हैं ,वास्तव मैं एसिया मह्द्वीप मैं यह अपनी तरह का एक्मार्ट सुन्दर आकर्षक हिम किर्डा केंद्र है!
०३-वेदनी बुग्याल
रूप कुण्ड मार्ग पर स्तिथ सिन्धुतल से ३३०० मी की ऊंचाई पर स्तिथ इस बुग्याल मैं नन्द प्रयाग तथा अल्मोडा से पहुँचने के सर्वाधिक सुगम मार्ग हैं,यह सुरम्य एवं मखमली घास के लिए प्रसिद्ध है!ऐसी मान्यता है कि वेदों कि रचना यहीं हुयी थी!
०४-पंवाली बुग्याल
यह बुग्याल यम्नोरती-केदारनाथ पैदल मार्ग पर है,शीतकाल मैं वर्फ कि चादर बिछ जाने पर यहाँ स्क्यिंग तथा अन्य शीतकालीन किर्डा आयोजित कि जाती हैं!
०५-दयारा बुग्याल
उत्तरकाशी जनपद का यह बुग्याल प्रदेश कि पर्वतारोही सहासी बालाओं कि प्रयासों से शीतकाल मैं हिम किर्डा सम्बंधित प्रतियोगिताओं के लिए लोकप्रिय हो गया है,समुद्र तल से इसकी ऊंचाई लगभग ३००० मी है!
०६-रूपकुंड
यह बुग्याल करणप्रयाग से ४५ किलोमीटर दूर,कर्ण प्रयाग ग्वालदम,अलोमोदा मोटर मार्ग पर ४७७८ मी कि ऊंचाई पर स्तिथ है!