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Etymology & Geography - उत्तराखंड,गढ़वाल तथा कुमाऊ की नामोत्पति,और भूगोल

Started by Devbhoomi,Uttarakhand, July 05, 2009, 09:15:40 AM

Devbhoomi,Uttarakhand

३-हिमालयी शितोषण सदाबहार वन


इन वनों का विस्तार १५०० मीटर से २८०० मीटर की ऊंचाई वाले छत्रों मैं मिलता है इस वनों मैं मुख्या प्रजातियाँ बांज और बुरांस हैं !कहीं-कहीं देवदार,कैल ,राई,युरिन्डा,आदि की प्रजातियाँ भी पाई जाती है,यह वन छेत्र आर्थिक एवं पर्यावरण की दिर्ष्टि से अधिक महत्वपूरण है !

इन वनों मैं अधिकांस विक्षों की लम्बाई १५ मीटर से भी कम होती है और इन पेडों के तने मोटे होते हैं इन विक्षों की पत्तियां चौडी व मोटी होती हैं !

ये वन सदैव हरे-भरे रहते हैं तथा इनकी लकडी कठोर मजबूत व टिकाऊ होती है इन लकडियों को प्रयोग किर्शी यंत्र,लकडी के बर्तन आदि बनाने मैं किया जाता है !


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४-अल्पाइन वन छेत्र

इन वनों का विस्तार २८००से ३८०० मीटर की ऊंचाई वाले छेत्रों मैं मिलता है इन वनों मैं देवदार,स्पुर्स,सिल्वर,फर,ब्ल्युपाइन आदि नुकीली पट्टी के विर्क्ष तथा भोजपत्र विर्क्ष मुख्य रूप से पाए जाते हैं !

इन विर्क्षों की औसत ऊंचाई ३० मिटत तक तथा मोटाई ३ से ५ मीटर तक होती है,इनकी लकडी सुगन्धित,भूरी पिली तथा मुलायम और टिकाऊ होती है !

देवदार जैसे विर्क्षों से सुगन्धित तेल भी निकाला जाता है,इन वन-उपजों का उपयोग सभी तरह की इमारती लकडी एवं फर्नीचर बनाने मैं होता है !

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५-उत्तराखंड मैं घास के मैदान


मध्य हिमालय मैं ३८०० से ४२०० मीटर वन रेखा और हिम रेखा के बीच की ऊंचाई वाले क्षेत्र जलवायु की कठोरता के कारण विर्क्ष विहीन हैं !

किन्तु इन वन क्षेत्रों मैं वनों के स्थान पर छोटी-छोटी घासें उग आती हैं,जीहेन वहाँ बुग्याक व पन्यार नामों से जानते हैं अधिक ऊंचाई मैं स्तिथ इन घास के मैदानों को मीडो व अल्पं पास्चर भी कहा जाता है,उत्तराखंड मैं अल्पं घास के मैदानी क्षेत्रों का विस्तार उत्तरकाशी( ७८८ वर्ग किमी ) तथा चमोली (३७४ वर्ग किम ) में देखने को मिलता है !

शीत्रितु में यह समस्त धलुआं घास के मैदान हिम से ढक जाते हैं,मई से अक्तूबर के मध्य तक इन क्षेत्रों में मखमली घास व छोटे-छोटे फूलों का दृश्य मन्त्र-मुग्ध कर देता है,बुग्यालों में जडी-बूटियों की कई प्रजातियाँ पाई जाती हैं !


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उत्तराखंड के लिए वनों का महत्व 

ऋषियों के अनुसार विर्क्ष काटना पाप एवं लगाना पुन्य का कार्य है,अग्नि पुराण में "दश्पुत्रो समोद्र्म" कहा गया है !अर्थात दस पुत्रों को एक विर्क्ष के सामान माना गया है !

वैज्ञानिकों की राय के अनुसार देश में कम से कम एक तिहाई भाग में वन होने चाहिए !जैसे अरुणाचल ६०.६७ %) तथा तिर्पुरा में ६०.११ %)राज्यों में है

!इसलिए आवश्यक है कि-उत्तराखंड में जितने अधिक वन होंगे उतनी ही अधिक तीव्रता से हिमालय की नदियाँ अपने जल से करोड़ों भारत पुत्रों का पालन पोषण करती रहेगी !राज्य की अर्थ ब्यवस्था में वनों का सर्वोपरि स्थान है !

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१-पर्यावरण भूसरक्षण मैं सहायक


हिमालय के वनों से उत्तरी भारत की भूमि शास्यामला बनी हुई हैं ,वन वर्षा को आकर्षित करते हैं !और भूमि को जलविहीन होने से बचाते है !

गाड-गधेरों के किनारों की मिटटी के कटाव,भूस्खलन तथा भूमि की उर्वरा शक्ति का रक्षण से बचाव करते हैं !साथ ही पर्वतीय ढालों पर अत्यधिक वर्षा के कुप्रभावों को न्यून करने से बचाते हैं !

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२-बाढ़ नियंत्रण मैं सहायक



पर्वतीय क्षेत्रों मैं वनों की कमी के कारण प्रतिवर्ष लगभग सभी नदियों मैं प्रलयंकारी बाढ़ों का आना स्वाभाविक है !वनों की अधिकता से जल अधिक मात्रा मेंभुशौसित होता है ! जिससे नदियों में जल-प्रवाह अधिक होता है !

भारी वर्षा का भूमि में प्रभाव कम होने से पर्वतीय क्षेत्र में भूस्खलन कम होते हैं !नदियों में लकड़ी मिटटी पत्थर सहित प्रचंड रूप धारण करने की प्रविर्ती कम हो जाती है ! उनके मार्गों का परिवर्तन कम होता है ! अथ वनों से बाढ़ पर नियंत्रण बना रहता है !

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३-मनुष्यों के लिए भोजन तथा पशुओं के लिए चारा


हिमालय की धरती ने भारतीय ऋषि मुनियों को वेदों,उपनिषदों तथा पूराणों की रचना करने की शक्ति व ज्ञान,अपने वनों के कंद-मूल फल  तथा जड़ी -बूटियों के माध्यम  से दिया है !वनों में मनुष्यों के भोजन के लिए कई प्रकार के पदार्थ हैं !जैसे लेकुंडा,आडू ,कपासी,ब्योडू,घिंघारू,काली हिंसर,लाल हिंसर,पिली

हिंसर,किल्मोड़ी,अंयार,बुरांस,साकिना,क्विराल,तिमला,भेन्कुल,मेहल,आदि है ! पशुओं के चारे के लिए अनेक प्रकार की घासें वन-विर्क्ष तथा झाड़ियाँ उपलब्ध है !

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४-किर्शी उपकरण व उपज का आधार


पर्वतीय प्रदेश की किर्शी -उपज का आधार एकमात्र इन क्षेत्रों में गोबर की खाद बनाने के लिए चीड,बांज,बुरांस मोरू,सोरु,अंयार आदि विभिन्न प्रकार के विर्क्षों की सूखी व हरी दोनों प्रकार की पत्तियां प्रयोग में लाइ जाती हैं! यदि विर्क्षों से आच्छादित वन न हों तो पर्वतीय क्षेत्रों में किर्शी -उपज  के लिए उर्वरा शक्ति बनाये रखना संभव नहीं होगा !

किर्शी यंत्रों के निर्माण के लिए बांज,तिलंज,अंगू,सांदन,मेलु,साल,शीशम आदि विर्क्षों की लकड़ी उपलब्ध होती है !किर्शी उत्पादन का एकमात्र आधार चारा,पशु-शक्ति को बनाये रखने हेतु इन्हीं वनों से मिलता है !

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५-वनों से औद्यौगिक कच्चे माल की उपलब्धि


वनों से स्थानीय तथा बहारी उद्योगों को संचालित करने हेतु कच्चा माल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता है !इन वनों से रिंगाल,चीड,बांज,बुरांस,अंगू,पापडी,साल,शीशम,तुन आदि की लकड़ी,डली,टोकरी,कंडी,चटाई,ठेकी,परोठा,परयु,आदि कई घरेलू उपयोग की वश्तुयें बनाने के काम आती है !

भवन निर्माण तथा बार्ह उद्योग के लिए चीड,देवदार,अंगू,शीशम,पापड़ी ,हल्दू,अखरोट पांगर आदि की लकड़ी,रंग वेर्निश व टरपेनटाइन उद्योग के लिए लिसा तथा रेजिन कागज़ उद्योग के लिए रिंगाल,बांस एवं चीड तथा भारतीय रेलों की पटरियों के लिए स्लीपर आदि इन्हीं ही वनों से उपलब्ध होते हैं !

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६-जड़ी-बोटियों के भण्डार

हिमालय के वनों में आदिकाल से विभिन्न प्रकार की जड़ी-बूटियों का भण्डार है! उदाहरण के लिए कुटगी,अतीस,ब्ज्रदंती,गुल्बंफ्सा,मासी,जटामासी,चिरयता,दालचीनी,हरड,बहेडा,आंवला,मिर्त संजीवनी आदि वनौषधियाँ इन्हीं वनों से प्राप्त होती है !