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Pilgrimages In Uttarakhand - उत्तराखंड के देवी देवता एव प्रसिद्ध तीर्थस्थल

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 21, 2007, 01:17:11 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


     

नारायणी शिला पर पितरों की मुक्ति का अनुष्ठान
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हरिद्वार आने वाले शायद दो-चार प्रतिशत तीर्थयात्री और सैलानी ही जानते होंगे कि यहां ' नारायणी शिला ' नामक कोई ऐसा मंदिर भी है , जहां लोगों द्वारा प्रेतबाधाओं से अपनी या प्रेत योनि से अपने पितरों की मुक्ति का अनुष्ठान किया जाता है। सामान्यतया उत्तराखंड के तीर्थ हरिद्वार में होने वाले हर मेले का केंद्र यहां की पुराण प्रसिद्ध हरकी पौड़ी ही होती है। हर बारहवें साल महाकुंभ तक का मुख्य स्नान भी इसी हरकी पौड़ी पर संपन्न होता है। पर शारदीय नवरात्रों से पहले कभी आप पितृपक्ष की चतुर्दशी के दिन हरिद्वार आएं , तो पाएंगे कि उस दिन हरकी पौड़ी पर भी उतना बड़ा मेला नहीं लगता , जितना इस अल्पज्ञात मंदिर नारायणी शिला पर लगता है। मरणोत्तर अवस्था की कुशलता के लिए मेला! पूरे साल इस मंदिर में देश-विदेश से सभी जातियों-वर्णों के वे लोग आकर अनुष्ठान कराते हैं , जिन्हें कोई प्रेत बाधा है या जिनके पितरों की प्रेत योनि से मुक्ति नहीं हुई है।

नारायणी शिला मंदिर के भीतर कमल के आकार वाली एक अर्धशिला है। वहीं भगवान नारायण की भी प्रतिमा स्थापित है। मंदिर के बाहर भी एक शिला है , जिसे प्रेतशिला कहते हैं। मंदिर के चारों ओर लोगों ने छोटे-छोटे सैकड़ों स्मृति स्थल अपने पितृपुरुषों की सद्गति और प्रसन्नता के लिए बनवाए हैं , जिनसे प्राय: पूरा मंदिर परिसर अटा पड़ा है।

मेले के दिन आस-पास के गांव-देहात से हजारों की संख्या में स्त्री-पुरुष अपने बड़े-बुजुर्गों और बाल-बच्चों सहित नारायणी शिला पर पहुंचते हैं। चारों तरफ उत्सव का माहौल होता है। चाट-पकौड़ी के खोमचे , चाय और पूरी-कचौडि़यों की ठेलियां , टिकुली-बिंदी , कंघी , शीशा , चोटी-रिबन आदि की अस्थायी दूकानें , बच्चों को लुभाते खिलौने और रंगबिरंगे गुब्बारे- उस दिन सब कुछ होता है हरिद्वार के इस इलाके में , जो असल में नियमित तीर्थ यात्रियों की गहमागहमी से दूर प्राय: सुनसान रहने वाला दफ्तरी और अधिकारियों का आवासीय क्षेत्र है।

पितृपक्ष की चतुर्दशी और सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्रद्धालुओं की आस्था उन्हें नारायणी शिला पर शीश झुकाने ले आती है। चटख रंगों के कपड़े पहने , सिर ढके या घूंघट काढ़े स्त्रियां गोद में बच्चे और हाथों में पूजा की छड़ी और थाल सजाकर , दान के लिए भोजन-वस्त्रादि लिए गांव-टोले के पारंपरिक गीत गाती हुई जब नारायणी शिला के परिसर में पहुंचती हैं , तो मानो उनका अगला जन्म भी संवर जाता है। वे वहां एक बड़ी गोल कमलाकार शिला के मंदिर में स्थापित आधे हिस्से के आगे मत्था टेककर पुरखों से आशीष मांगती हैं। मानों स्वर्ग-अपवर्ग सभी लोकों में रहने वाले पुरखे इस स्तवन से प्रसन्न होकर उन्हें बार-बार आशीष देते हैं।

आस्तिक धारा वाली हिंदू परंपरा इहलोक के साथ- साथ परलोक में भी विश्वास रखती है। मृत्यु के पश्चात अपनी-अपनी करनी के अनुसार परलोक में निवास की मान्यता भी पुनर्जन्म के सिद्धांतों के चलते खूब चली है। परलोक से तात्पर्य इस धरती , इस मृत्युलोक के अलावा अन्य लोकों से है। चौरासी लाख योनियों की चर्चा में प्रेत योनि की भी चर्चा है। माना गया है कि जो जीव वासनाओं के वशीभूत रहते हैं , वे मृत्यु के बाद भी कुछ काल तक प्रेतलोक में निवास करते हैं। प्रेतों को वायुरूप कहा गया है। भूत , पिशाच , ब्रह्माराक्षस , ब्रह्मासमंध , जिन्न या जिन्द , वेताल आदि प्रेत योनियां ही हैं। मान्यता है कि अंत्येष्टि , श्राद्ध , पिण्डदान , नारायण-नागबलि आदि विधियों से प्रेत योनि या प्रेत बाधा से उद्धार होता है। इसके लिए गया में विष्णुपद मंदिर , बदीनाथ में ब्रह्मा कपाली और हरिद्वार में नारायणी शिला पर श्राद्ध-अनुष्ठान की परंपरा है।

स्कंद पुराण में एक कथा है कि महाराक्षस गयासुर पर नारायण ने जब गदा का प्रहार किया , तो गयासुर ने उसे कमलासन पर रोका। परिणाम स्वरूप उसका शिरोभाग ब्रह्माकपाली में , मध्यभाग हरिद्वार में तथा अधोभाग गया में जा गिरा। बाद में हारे हुए गयासुर को प्रभु ने वरदान दिया कि जो व्यक्ति मुक्ति की कामना से कमलासन के इन तीनों टुकड़ों के सम्मुख जाकर अर्चना , वंदना प्रार्थना करेगा , उसकी मुक्ति अवश्य होगी।


SOURCE : http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/3129037.cms

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भगवती मंदिर,

तेवाखारक - चमोली, गैरसैन के नजदीक

यहाँ पर माता भगवती का बहुत प्राचीन मंदिर! विभिन्न गावो से लोग यहाँ पर पूजा करने के लिए आते है ! यहाँ पर लोग अपने मन्नत मागने आते है ! जब गाव में किसी प्रकार की बीमारी का प्रकोप हो या वारिश ना हो रही हो तो लोग यहाँ पर पूजा करते है !


पंकज सिंह महर

पौड़ी से करीब 14 किमी दूर कोट ब्लाक के देवल गांव में स्थित द्वादश मंदिरों का समूह धार्मिक के साथ ही कलाओं का भी बेजोड़ नमूना है। इस मंदिर समूह को लक्ष्मण मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक आस्था से जुड़ा यह मंदिर समूह पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है, पर यह पर्यटन विकास तथा मंदिर समूह का प्रचार-प्रसार न होने से यह उपेक्षित है।

11वीं से 15 वीं शताब्दी के बीच निर्मित इस मंदिर समूह में कला का अद्भुत नमूना देखने को मिलता है। ब्लाक मुख्यालय कोट के नजदीकी गांव देवल में स्थित इस मंदिर समूह में कुल बारह मंदिर हैं। क्षेत्रीय पुरातत्व विभाग के अभिलेखों के अनुसार पहला मंदिर सर्वाधिक ऊंचा है, यह मंदिर अ‌र्द्धमंडप द्वादश कोणीय दो प्रस्तर स्तंभों पर खड़ा है। मंदिर के उत्तरंग के ललाट विम्ब में चतुर्भुज गणेश निरूपित हैं। मंदिर में गज, सिंह, नाग एवं गजारोही के दृश्य अंकित हैं। दूसरे मंदिर में ऊ‌र्ध्वछंद योजना में जगती बेदीबंध, जंघा और शिखर अवलोकनीय है। तीसरा मंदिर पुनर्निर्मित है। दक्षिणाभिमुख इस मंदिर के वेदीबंध को खुर, कुंभ, कलश तथा कपोत गढ़नों से अलंकृत किया है। चौथे मंदिर के प्रवेश द्वार को पुष्प शाखा से सुशोभित किया है। इसी तरह अन्य मंदिरों में भी कला के बेजोड़ नमूने देखने को मिलते हैं। मंदिर समूह में विष्णु की तीन प्रतिमाएं, लक्ष्मी- नारायण की एक प्रतिमा स्थापित है। स्थापित की गई ब्रह्मा की प्रतिमा को हंस पर आरुढ़ दर्शाया है। इस मंदिर समूह का आकर्षण किसी को भी अपनी ओर खींचने की क्षमता रखता है। हालांकि इसको अभी प्रचार की दरकार है। क्षेत्रीय पुरातत्व विभाग की ओर से मंदिर का संरक्षण किया जाता है। आस्था का प्रतीक यह मंदिर बहुत भव्य है, पर यहां सीमित संख्या में ही श्रद्धालु पहुंचते हैं। देवल गांव निवासी नितिन उप्रेती बताते हैं मंदिर में बैकुंठ चतुर्दशी के पहले दिन मेला आयोजित किया जाता है। इसी दिन फलस्वाड़ी गांव में मनसार मेला होता है। उन्होंने बताया कि 14 अपै्रल को देवल मंदिर में जगौर मेले का आयोजन होता है। इन दोनों मेलों में सितोनस्यूं पट्टी के दर्जनभर से अधिक गांवों के हजारों ग्रामीण भाग लेते हैं। इन मेलों का प्रचार करने से भी यहां पर्यटकों का रुझान बढ़ सकता है।

जिला पर्यटन अधिकारी का प्रभार देख रहे हीरा लाल का कहना है कि इस मंदिर के पर्यटन विकास से संबंधित न तो कोई प्रस्ताव आया है और नहीं विभाग के पास मंदिर के बारे में कोई जानकारी है। उन्होंने कहा कि वह स्वयं भी मंदिर समूह स्थल का निरीक्षण करेंगे और विभाग द्वारा जो इसके विकास को हर संभव कार्य किया जाएगा।

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Indrasani Mansa Devi Temple : RUDRAPRAYG DISTRICT, UTTARAKHAND.
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Indrasani Mansa Devi Temple is an ancient shrine situated in the village of Kandali Patti, 14 km from Rudraprayag, in Uttaranchal. The temple, which dates back to the age of Adi Shankaracharya, is built in a unique architecture, surrounded by the temples of Jalkedareshwar, Khetrapal and Jakh Devta.

The origin of Indrasani Mansa Devi has been described in Skandpurana, Devibhagvata and Kedarkhand. It is said that Indrasani Devi was a Mansi Kanya of Kashyapa and was known as Vaishnavi, Shavi and Vishari. Local populace believes that the Devi can save people from snakebites.


Devbhoomi,Uttarakhand

मंदिर के विकास के लिए पहली बार एकजुट हुए लोग

जैंती (अल्मोड़ा): लमगड़ा के निकट ऐड़ी मंदिर छड़ौजा में प्रथम बार मंदिर कमेटी का गठन किया गया। नवनिर्वाचित अध्यक्ष जीवन चन्द्र पांडे ने मंदिर के विकास के लिए सभी से सहयोग की अपील की।

श्री पांडे ने कहा कि प्राकृतिक रूप से सुरम्य स्थल पर स्थित यह स्थान धार्मिक पर्यटन के रूप में विकसित हो सकता है। बैठक में गोपाल दत्त तिवारी को उपाध्यक्ष, भुवन चन्द्र पांडे सचिव चुने गए।
इसके अलावा विशन सिंह कोषाध्यक्ष, सुंदर सिंह बगडवाल उप कोषाध्यक्ष, मदन सिंह रावत उपसचिव, मुकेश पांडे व्यवस्थापक, अमर ंिसह रावत उप व्यवस्थापक, रमेश बिष्ट संयोजक व हरेन्द्र बिष्ट को उप संयोजक चुना गया। आडिटर पद पर ललित पांडे, सम्प्रेक्षक आनंद नगरकोटी को चुना गया।
इधर 22 गांवों की आस्था से जुड़े छड़ौजा मंदिर में कमेटी गठन पर क्षेत्र को श्रद्धालुओं ने खुशी जाहिर की है।



एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Kal Bhairav Temple - Haridwar
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Situated in Nirmal Bagh near Kankhal, Kal Bhairav Temple is an attractive temple of Lord Kal Bhairav. It is believed that Kal Bhairav had taken rest at this place when Lord Shiva  sent him to save Sati. The temple is surrounded by a beautiful garden. On its east there is an ancient door. There are two more temples and a unique statue of Goddess Kali in its vicinity.

Kankhal is a small town situated at the outskirts of Haridwar. It can be reached by road from Haridwar.

विनोद सिंह गढ़िया


भगवती माता मन्दिर पोथिंग (कपकोट) बागेश्वर
                              उत्तराखंड