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Pilgrimages In Uttarakhand - उत्तराखंड के देवी देवता एव प्रसिद्ध तीर्थस्थल

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 21, 2007, 01:17:11 PM

हेम पन्त

HARIDWAR, 11 May: The Janmotsav of the River Ganga, also known as Ganga Saptami, was celebrated with religious fervour and gaiety in the pilgrimage city. Devotees conducted worship on the banks of the Ganga and a Shobha Yatra was taken out through the city. Priests also conducted special Puja on the occasion. According to Hindu beliefs, the Ganga originated on Shukl Paksh of Baisakh. On this day, lakhs of pilgrims from all parts of India bathe in the river. Special Puja was also held at the Makar Vahini Ma Ganga Mandir at Birla Ghat. Adequate policem force had been requisitioned on this occasion.


kamleshp



हेम पन्त

चंबा (उत्तरकाशी)। गंगा दशहरे के अवसर पर प्रसिद्ध सिद्धपीठ सुरकंडा मंदिर में श्रद्धालुओं को हुजूम उमड़ पड़ा। बारिश के बावजूद माता के दर्शन के लिए सुबह से ही मंदिर में लोगों की लंबी कतार लगनी शुरू हो गई थी।

गंगा दशहरे के साथ ही यहां एक सप्ताह तक चलने वाला मेला भी शुरू हो गया है। माता के दर्शनों के लिए बाहर से भी काफी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। गत रात्रि को मंदिर में रातभर जागरण कार्यक्रम चलता रहा। प्रसिद्ध लोक गायक प्रीतम भरत्वाण ने भगवती जागरण के माध्यम से श्रद्धालुओं का मनोरंजन किया। इसके अलावा कल्पना चौहान, संगीता ढौंडियाल, वीरेंद्र पंवार, मास्टर रोहित चौहान ने भी सुंदर प्रस्तुति दी। यह कार्यक्रम नमस्कार देवभूमि सेवा संघ दिल्ली ने गत वर्षो की भांति किया। इस अवसर पर मंदिर में एक शादी भी हुई। मंदिर प्रबंध समिति के सदस्यों ने प्रशासन की ओर से सहयोग न मिलने पर नाराजगी जताई। समिति के सचिव दर्मियान चंद रमोला ने बताया कि पूर्व में यात्रियों की स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों के समाधान के लिए स्वास्थ्य विभाग प्राथमिक चिकित्सा कैंप लगाता था लेकिन इस बार नहीं लगाया गया। सबसे अधिक परेशानी यातायात सुविधा को लेकर है। हर वर्ष दो मेला बसें लगाईं जातीं थी लेकिन इस बार एक भी बस नहीं है। समिति के अध्यक्ष शिव सिंह जड़धारी ने कहा कि समिति यात्रियों की सुविधा के लिए पूरी तरह समर्पित है। चंबा में गंगा दशहरे के पर्व पर सामाजिक संख्या सुरकंडा सांस्कृतिक लोक कला मंच सकलाना ने कद्दूखाल में सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया। इस अवसर पर स्थानीय लोक कलाकारों ने सामाजिक कुरीतियों पर नाटक भी प्रस्तुत किए।

हेम पन्त

भवाली (नैनीताल)। बाबा नीम करौली महाराज की सिद्धि का प्रतीक माने जाने वाले कैंची धाम में प्रतिष्ठा दिवस के अवसर पर रविवार को मूसलाधार वर्षा के बीच भी भारी संख्या में श्रद्धालु उमड़ पड़े। इससे यह बात चरितार्थ हो गई कि कैंची धाम श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र बन चुका है। यहां देर सायं तक श्रद्धालुओं का वर्षा के बावजूद भी आना जारी था। एक अनुमान के मुताबिक सायं 7 बजे तक 80 हजार से अधिक श्रद्धालु मंदिर पहुंच कर मालपुए का प्रसाद ग्रहण कर चुके थे।

शांति एवं यातायात व्यवस्था बनाए रखने के लिए भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया था। प्रात:काल से ही वर्षा के बीच कैंची धाम में श्रद्धालुओं का आना प्रारंभ हुआ, लगभग 11 बजे से देर सायं 7 बजे तक मंदिर में दर्शन व प्रसाद ग्रहण करने को श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। मेले के दौरान अल्मोड़ा-भवाली मार्ग में कई बार रुक-रुक कर वन-वे ट्रैफिक व्यवस्था अमल में लानी पड़ी। इसके बावजूद भी दोपहर 12 बजे से सायं 5 बजे तक भवाली-अल्मोड़ा, नैनीताल-भवाली व भवाली-भीमताल मार्ग में जाम लगा रहा। इधर भीमताल-हल्द्वानी मार्ग स्थित सलड़ी में दोपहर एक बजे से मलवा आ जाने से हल्द्वानी मार्ग में भी 2 घंटे तक जाम की स्थिति रही। सायं 4 बजे तक श्रद्धालुओं की संख्या में भारी वृद्धि हो गई जो सायं 7 बजे तक जारी थी। एलआईयू की रिपोर्ट के अनुसार सायं 6 बजे तक लगभग 80 हजार श्रद्धालु मंदिर में दर्शन कर भंडारे का प्रसाद ग्रहण कर चुके थे। सायं को वर्षा रुकने से भारी संख्या में श्रद्धालुओं का उमड़ना शुरू हो गया जो देर सायं तक जारी था। कैंची धाम मंदिर ट्रस्ट के पदाधिकारी व दर्जनों श्रद्धालु स्वयं सेवक महाभंडारे व मेले की व्यवस्थाओं में बीते 3 सप्ताह से जुटे थे। पिछले दो दिनों से दिन-रात लगातार मालपुए बनाने के कार्य में श्रद्धालु लगे हुए थे। कैंची धाम में रविवार को ब्रह्ममुर्हूत में विशेष पूजा अर्चना व शंखनाद के बीच बाबा नीम करौली की जयकार तथा मंदिर में स्थापित देवी-देवताओं की मूर्ति को भोग लगाने के बाद प्रात: साढ़े आठ बजे से भंडारा प्रारंभ किया गया।

upadhaya manu

Namskar all member of this forum
dajew i want to know about pandokholi and pandwakhal what is the relation between about this two temple may both are belong to period of  mahabhartha kal.   pandokholi temple it is situated somewhere in dunagiri temple that is 18km far from the dwarahat Distt-Almora. if you have any detail of this temples plz provide me all the detail.

हेम पन्त

श्रोत- http://in.jagran.yahoo.com/news/travel/general/16_36_325/

समुद्रतल से 2290 मीटर की ऊंचाई पर स्थित रुद्रनाथ मंदिर भव्य प्राकृतिक छटा से परिपूर्ण है। रुद्रनाथ मंदिर में भगवान शंकर के एकानन यानि मुख की पूजा की जाती है, रुद्रनाथ मंदिर के सामने से दिखाई देती नंदा देवी और त्रिशूल की हिमाच्छादित चोटियां यहां का आकर्षण बढाती हैं। इस स्थान की यात्रा के लिए सबसे पहले गोपेश्वर पहुंचना होता है जो कि चमोली जिले का मुख्यालय है। गोपेश्वर एक आकर्षक हिल स्टेशन है जहां पर ऐतिहासिक गोपीनाथ मंदिर है। इस मंदिर का ऐतिहासिक लौह त्रिशूल भी आकर्षण का केंद्र है। गोपेश्वर पहुंचने वाले यात्री गोपीनाथ मंदिर और लौह त्रिशूल के दर्शन करना नहीं भूलते। गोपेश्वर से करीब पांच किलोमीटर दूर है सगर गांव। बस द्वारा रुद्रनाथ यात्रा का यही अंतिम पडाव है। इसके बाद जिस दुरूह चढाई से यात्रियों और सैलानियों का सामना होता है वो अकल्पनीय है। सगर गांव से करीब चार किलोमीटर चढने के बाद यात्री पहुंचता है पुंग बुग्याल। यह लंबा चौडा घास का मैदान है जिसके ठीक सामने पहाडों की ऊंची चोटियों को देखने पर सर पर रखी टोपी गिर जाती है। गर्मियों में अपने पशुओं के साथ आस-पास के गांव के लोग यहां डेरा डालते हैं, जिन्हें पालसी कहा जाता है। अपनी थकान मिटाने के लिए थोडी देर यात्री यहां विश्राम करते हैं। ये पालसी थके हारे यात्रियों को चाय आदि उपलब्ध कराते हैं। आगे की कठिन चढाई में जगह-जगह मिलने वाली चाय की यही चुस्की अमृत का काम करती है। पुंग बुग्याल में कुछ देर आराम करने के बाद कलचात बुग्याल और फिर चक्रघनी की आठ किलोमीटर की खडी चढाई ही असली परीक्षा होती है। चक्रघनी जैसे कि नाम से प्रतीत होता है कि चक्र के सामान गोल। इस दुरूह चढाई को चढते-चढते यात्रियों का दम निकलने लगता है। चढते हुए मार्ग पर बांज, बुरांश, खर्सू, मोरु, फायनिट और थुनार के दुर्लभ वृक्षों की घनी छाया यात्रियों को राहत देती रहती है। रास्ते में कहीं कहीं पर मिलने वाले मीठे पानी की जलधाराएं यात्रियों के गले को तर करती हैं। इस घुमावदार चढाई के बाद थका-हारा यात्री ल्वीटी बुग्याल पहुंचता है जो समुद्र तल से करीब 3000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। ल्वीटी बुग्याल से गापेश्वर और सगर का दृश्य तो देखने लायक है ही, साथ ही रात में दिखाई देती दूर पौडी नगर की टिमटिमाती लाइटों का आकर्षण भी कमतर नहीं। ल्वीटी बुग्याल में सगर और आसपास के गांव के लोग अपनी भेड-बकरियों के साथ छह महीने तक डेरा डालते हैं। अगर पूरी चढाई एक दिन में चढना कठिन लगे तो यहां इन पालसियों के साथ एक रात गुजारी जा सकती है। यहां की चट्टानों पर उगी घास और उस पर चरती बकरियों का दृश्य पर्यटकों को अलग ही दुनिया का अहसास कराता है। यहां पर कई दुर्लभ जडी-बूटियां भी मिलती हैं। ल्वीटी बुग्याल के बाद करीब तीन किलोमीटर की चढाई के बाद आता है पनार बुग्याल। दस हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित पनार रुद्रनाथ यात्रा मार्ग का मध्य द्वार है जहां से रुद्रनाथ की दूरी करीब ग्यारह किलोमीटर रह जाती है। यह ऐसा स्थान है जहां पर वृक्ष रेखा समाप्त हो जाती है और मखमली घास के मैदान यकायक सारे दृश्य को परिवर्तित कर देते हैं। अलग-अलग किस्म की घास और फूलों से लकदक घाटियों के नजारे यात्रियों को मोहपाश में बांधते चले जाते हैं। जैसे-जैसे यात्री ऊपर चढता रहता है प्रकृति का उतना ही खिला रूप उसे देखने को मिलता है। इतनी ऊंचाई पर इस सौंदर्य को देखकर हर कोई आश्चर्यचकित रह जाता है। पनार में डुमुक और कठगोट गांव के लोग अपने पशुओं के साथ डेरा डाले रहते हैं। यहां पर ये लोग यात्रियों को चाय आदि उपलब्ध कराते हैं। पनार से हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों का जो विस्मयकारी दृश्य दिखाई देता है वो दूसरी जगह से शायद ही दिखाई दे। नंदादेवी, कामेट, त्रिशूली, नंदाघुंटी आदि शिखरों का यहां बडा नजदीकी नजारा होता है। पनार के आगे पित्रधार नामक स्थान है पित्रधार में शिव, पार्वती और नारायण मंदिर हैं। यहां पर यात्री अपने पितरों के नाम के पत्थर रखते हैं। यहां पर वन देवी के मंदिर भी हैं जहां पर यात्री श्रृंगार सामग्री के रूप में चूडी, बिंदी और चुनरी चढाते हैं। रुद्रनाथ की चढाई पित्रधार में खत्म हो जाती है और यहां से हल्की उतराई शुरू हो जाती है। रास्ते में तरह-तरह के फूलों की खुशबू यात्री को मदहोश करती रहती है। यह भी फूलों की घाटी सा आभास देती है। पनार से पित्रधार होते हुए करीब दस-ग्यारह किलोमीटर के सफर के बाद यात्री पहुंचता है पंचकेदारों में चौथे केदार रुद्रनाथ, यहां विशाल प्राकृतिक गुफा में बने मंदिर में शिव की दुर्लभ पाषाण मूर्ति है। यहां शिवजी गर्दन टेढे किए हुए हैं। माना जाता है कि शिवजी की यह दुर्लभ मूर्ति स्वयंभू है यानी अपने आप प्रकट हुई है। इसकी गहराई का भी पता नहीं है। मंदिर के पास वैतरणी कुंड में शक्ति के रूप में पूजी जाने वाली शेषशायी विष्णु जी की मूर्ति भी है। मंदिर के एक ओर पांच पांडव, कुंती, द्रौपदी के साथ ही छोटे-छोटे मंदिर मौजूद हैं। मंदिर में प्रवेश करने से पहले नारद कुंड है जिसमें यात्री स्नान करके अपनी थकान मिटाता है और उसी के बाद मंदिर के दर्शन करने पहुंचता है। रुद्रनाथ का समूचा परिवेश इतना अलौकिक है कि यहां के सौदर्य को शब्दों में नहीं बांधा जा सकता। शायद ही ऐसी कोई जगह हो जहां हरियाली न हो, फूल न खिले हों। रास्ते में हिमालयी मोर, मोनाल से लेकर थार, थुनार और मृग जैसे जंगली जानवरों के दर्शन तो होते ही हैं, बिना पूंछ वाले शाकाहारी चूहे भी आपको रास्ते में फुदकते मिल जाएंगे। भोज पत्र के वृक्षों के अलावा ब्रह्मकमल भी यहां की ऊंचाइयों में बहुतायत में मिलते हैं। यूं तो मंदिर समिति के पुजारी यात्रियों की हर संभव मदद की कोशिश करते हैं। लेकिन यहां खाने-पीने और रहने की व्यवस्था स्वयं करनी पडती है। जैसे कि रात में रुकने के लिए टेंट हो और खाने के लिए डिब्बाबंद भोजन या अन्य चीजें। रुद्रनाथ के कपाट परंपरा के अनुसार खुलते-बंद होते हैं। शीतकाल में छह माह के लिए रुद्रनाथ की गद्दी गोपेश्वर के गोपीनाथ मंदिर में लाई जाती है जहां पर शीतकाल के दौरान रुद्रनाथ की पूजा होती है। आप जिस हद तक प्रकृति की खूबसूरती का अंदाजा लगा सकते है, यकीन मानिए यह जगह उससे ज्यादा खूबसूरत है।


:ninja:

Naag-Mandir/Serpent-Temple

Uttaraknadis also practices serpent-worship. And Snake or Serpent worship refers to the high status of snakes in Hindu mythology.Pithoragah District has many high mouthains peaks named after different snake-god.And each peak represents a different naag/serpent such as Kali Naag, Sundri Naag, Dhauli Naag, Berinag, and Feni Naag etc.I'm sure there are more Naag-temples in our Uttarakhand.

P.S.Women are not allowed to enter in a Naag-temple.


Risky Pathak

Agree With You.
These Naag Temples are peaks in Pithoragarh and bageshwar district.
Kalinag and Dhaulnag are near my Village. From Chaukari You can clearly see these two peaks.

Women are not allowed in these temple.

These Naag Temples in Uttrakhand shows Rule Of Naag Dynasty in Uttrakahnd in 2-3rd Century
Quote from: highlander23235 on July 31, 2008, 07:54:28 PM
Naag-Mandir/Serpent-Temple

Uttaraknadis also practices serpent-worship. And Snake or Serpent worship refers to the high status of snakes in Hindu mythology.Pithoragah District has many high mouthains peaks named after different snake-god.And each peak represents a different naag/serpent such as Kali Naag, Sundri Naag, Dhauli Naag, Berinag, and Feni Naag etc.I'm sure there are more Naag-temples in our Uttarakhand.

P.S.Women are not allowed to enter in a Naag-temple.