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Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti



कुणिंद / कुलिंद अवसान काल याने प्रभावकारी पर्यटन काल


(  कुणिंद / कुलिंद अवसान काल में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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(Uttarakhand Tourism in End  Kunind/ Kulind  Period

उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -29

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   Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )     -  29                 

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--134 )   
      उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 134 


    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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  कुणिंद /कुलिंद व सबंधी राजाओं का अवसान काल 206 -350 ईश्वी व 400 तक भी  ठहराया जाता है (डबराल उत्तराखंड का इतिहास -भाग 3 ) जिसमे वासुदेव , छत्रेश्वर , भानु , रावण अश्वमेध यज्ञ कर्ता -शिव भवानी , पोण वंशज व शील वर्मन हुए।  गोविषाण (उधम सिंह नगर इलाका ) में मित्र वंश (50 -250 ईश्वी ) राज्य भी था।
     जौनसार भाभर में जयदास व उनके वंशजों का समृद्ध राज 350 -460 तक माना जाता है।

                    भाभर क्षेत्र में दुर्ग , स्तूप निर्माण

   डा डबराल ने उपरोक्त पुस्तक में कई पुरातत्व अन्वेषणों का संदर्भ देते हुए लिख कि सहारनपुर से उधम सिंह नगर तक इस काल में कई दुर्ग निर्मित हुए।  दुर्ग याने सुरक्षा की नई तकनीक उपयोग व प्रयोग. नई तकनीक व दुर्ग निर्माण से साफ़ जाहिर है कि दक्षिण उत्तररखण्ड में पर्यटन उस काल में विकसित स्थिति की और चल रहा था।  जब भी दुर्ग जैसा कोई स्थाप्य इमारत बनती है तो वाणिज्य व तकनीक का आदान प्रदान होता है जो बिना पर्यटन उद्यम विकसित हुए संभव नहीं है।  इस काल में दक्षिण उत्तरखंड में संगठित (Organized ) पर्यटन के सभी प्रमाण मौजूद मिलते हैं। उधम सिंह नगर में स्तूप निर्माण भी पर्यटन वृद्धिकारक घटक ही है।  बौद्ध धर्मियों हेतु उधम सिंह नगर एक पवित्र धर्म स्थल बनने से पर्यटन विकसित ही हुआ।
     पांडुवाला (गढ़वाल भाभर -हरिद्वार रोड ) में भी स्तूप निर्माण इसी काल में हुआ।  पांडुवाला स्तूप ने भी पर्यटन को ऊंचाई दी।  स्तूपों में विद्वानों के आने जाने से कई ज्ञानों का आदान प्रदान से भी पर्यटन को नया मार्ग मिलता है।

           भाभर क्षेत्र (सहारनपुर से लेकर उधम सिंह नगर व बिजनौर तक ) में मंदिर निर्माण

     कुणिंद / कुलिंद अवसान युग में कई मंदिरों का निर्माण भी हुआ।
गोविषाण में द्रोण  सागर निर्माण , कई मंदिरों  का निर्माण भी द्रोण सागर के पास वहां हुआ। वहीं दुर्ग में भीम गदा नाम से प्रसिद्ध स्थान में विशाल मंदिर भी निर्मित हुआ।  जागेश्वर मंदिर के निकट स्तूप व मंदिर भी निर्मित हुए।
   लाखामंडल में कई मंदिर व  इस काल में निर्मित हुए। मंदिर बनाने हेतु भी तकनीक ज्ञान के लिए भी कई प्रकार के पर्यटन बढ़े होंगे। 
     इस काल में मंदिर , मूर्तियां व स्तूप निर्माण ने आंतरिक व वाह्य दोनों प्रकार के टूरिज्म को विकसित किया।
       
                   युगशैल राजाओं द्वारा अश्वमेध यज्ञ
 
          जौनसार भाभर -देहरादून में इस काल में युगशैल राजाओं का राज भी रहा  (301 -400 ईश्वी  )  युगशैल के राजाओं में से शिव भवानी ने एक , शीलवर्मन ने चार अश्वमेध यज्ञ किये।  यज्ञ इस बात के द्योतक हैं कि क्षेत्र में व्यापार (निर्यात ) से प्रचुर लाभ हुआ।  व्यापार अपने आप में पर्यटन कारी घटक है।
        अश्वमेध यज्ञ तो पर्यटन विकास की ही कहानी के प्रमाण हैं।  यज्ञ दर्शन व प्रवचन सुनने बाह्य प्रदेशों से गण मान्य व्यक्ति व पंडित आये होंगे तो पर्यटन को नया आयाम ही मिला होगा। अश्वमेध यज्ञ से क्षेत्र को प्रचुर प्रचार मिला ही होगा।

                  मुद्रा विनियम विकास  काल

            कुणिंद अवसान काल की  मुद्राएं बेहट , देहरादून , गढ़वाल   ( कालाओं के गाँव सुमाड़ी व भैड़ गाँव (डाडामंडी ) में सबसे अधिक मिलीं ), काली गंगा आदि स्थानों में मिली हैं।  मुद्राएं ताम्र व रजत मुद्राओं के मिलने व   हर काल में मुद्रा निर्माण में विकास झलकता है।
       मुद्रा निर्माण से साफ़ प्रमाण मिलता है कि उत्तराखंड में व्यापार विकसित था और आधुनिक विनियम हेतु मुद्राएं आवश्यक हो गयीं थीं।   आधुनिक विनियम माध्यम निर्यात व आयत वृद्धि द्योतक होते हैं । 
       
  निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि कुणिंद / कुलिंद अवसान काल   (206 -350 -400 ) में धार्मिक , व्यापारिक,  भवन निर्माण , मुद्रा निर्माण , शिला कोरने , मूर्ति निर्माण आदि घटकों के कारण उत्तराखंड में पर्यटन विशेषतः भाभर क्षेत्र में भूतकाल से अधिक विकसित हुआ।   


Copyright @ Bhishma Kukreti   2/3 //2018 



Tourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी ...

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास -part -3
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  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;


Bhishma Kukreti




अमाल्डू के स्व. जयराम उनियाल और IAS होने के लिए समाज का सकारात्मक योगदान

( गढवाल भ्रातृ मंडल (स्थापना -1928 ) , मुंबई  की मुहिम  –हर उत्तराखंडी  IAS बन सकता है )

IAS/IRS/IFS/IPS  कैसे बन सकते हैं श्रृंखला  -53

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गढ़वाल भ्रातृ मण्डल हेतु प्रस्तुति - भीष्म कुकरेती

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    किसी भी समाज में आईएस बनने के लिए समाज ही अधिक उत्तरदायी होता है , समाज  सर्वाधिक भूमिका निभाता  है और समाज ही पथदर्शक  भी होता है।  उत्तराखंडी अधिक से अधिक आईएएस बने तो इस कामना पूर्ति हेतु उत्तराखंडी समाज को ही एक अहम भूमिका निभानी होगी।

    समाज कैसे सकारात्मक भूमिका निभा सकता है पर मैं अपने अनुभव सांझा करना चाहूंगा।

    मेरी माँ के फूफा जी का नाम था स्व जयराम उनियाल त्रिकालदर्शी।  स्व उनियाल जी ज्योतिष के प्रखर विद्वान् थे , अमाल्डू डबराल स्यूं के रहने वाले थे व उनका कार्यालय झंडा मुहल्ला देहरादून में था।  उनके मेरे गाँव जसपुर में उनके पुस्तैनी जजमान बहुगुणा थे तो पंडिताई हेतु उन्हें जसपुर साल में दो तीन बार आना ही होता था।  जब भी जसपुर आएं तो मेरे ताऊ जी के साथ बैठना होना लाजमी था।  मैं तब छोटा था तो उनकी एक हास्य कविता ही याद है मुझे --मूंगफली में दाना नहीं मैं भी तेरा नाना नहीं। 

  जब मैं पांच या छः दर्जे में गया हूँगा तो उनका आना बंद हो गया। शायद देहरादून शिफ्ट हो गए थे।

   किन्तु हर महीने एक या दो बार मेरे ताऊ जी स्व बलदेव प्रसाद मास्टर जी उनको याद कर ही लेते थे।  जब भी मैं छुट्टियों में घर आऊं तो ताऊ जी स्व जयराम जी के कथन को दुहराना नहीं भूलते थे।  स्व जयराम जी कहा करते थे कि "दुनिया में सबसे बड़ी पढ़ाई गणित में M. SC.  की होती है "।  मेरे ताऊ जी चाहते थे कि मैं आधुनिक गणित विशेषज्ञ रामानुज बनूं तो हर बार अवसर आने पर ताऊ जी स्व उनियाल जी का कथन "दुनिया में सबसे बड़ी पढ़ाई गणित में M. Sc .  की होती है " दोहराते थे।  स्व जयराम जी के तीनों पुत्रों ने गणित या भौतिक विज्ञान में MSc किया था।

      मेरे दिमाग में घर कर गया कि मुझे M . Sc . करना है।  मेरा  रुझान स्वयमेव ही विज्ञान की ओर होता गया।  मेरी पढ़ाई का उद्देश्य MSc हो गया था।  किन्ही कारणों से मैंने गणित से MSc नहीं किया पर MSc अवश्य किया।  मेरे MSc करने के पीछे मेरे ताऊ जी का सर्वाधिक हाथ रहा है व कई अन्य लोगों का भी सहयोग रहा है।  किन्तु MSc ही करना है के पीछे मेरे ताऊ जी व स्व उनियाल जी द्वारा मेरे ताऊ जी को मंत्र बतलाना भी रहा है।  मनुष्य बचपन में लिया गया उद्देश्य पूरा करता ही है। उद्देश्य को मन में बसाना और उद्देश्य पूर्ती हेतु अन्य कार्य आवश्यक हैं किन्तु 'उद्देश्य ' निश्चित करना सबसे पहला कार्य है।

      उत्तराखंड में स्वौ निवेदिता कुकरेती IPS अधिकारी हैं और अपने कर्मठता हेतु जानी जाती हैं।  निवेदिता IPS बनी उसके पीछे उसके माँ पिताजी , चाचा-चाची  जी का तो हाथ है ही साथ में सुन्दर श्याम भाइयों के एक मित्र का भी हाथ है जो बचपन में ही कहा करते थे कि निवेदिता IAS अधिकारी अवश्य बनेगी। मच पाने के लिए मन में उद्देश्य घर करना आवश्यक है।

          समाज को विद्यार्थियों को उत्साहित करना आवश्यक है !

      यदि उत्तराखंडी चाहते हैं कि अधिक  से अधिक IAS बने तो यह आवश्यक है कि वे बच्चों के मन में IAS बनने की महत्वाकांक्षा भरते जायँ।  या जिस विषय में विद्यार्थी पारंगत होना चाहता है उस विषय में विद्यार्थी को निरंतर उत्साहित किया जाय।  विद्यार्थी के सामने दो शब्द " तुम IAS बनने के लायक हो  ' ही काफी हैं। 


   



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शेष IAS/IPS/IFS/IRS कैसे बन सकते हैं श्रृंखला -  में..... 54
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कृपया इस लेख व "

हर उत्तराखंडी IAS बन सकता है"
आशय को  7  लोगों तक पँहुचाइये प्लीज !
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Sitting on other exams ,
Should IAS Aspirant take other employment while preparing for exams?, Balancing with College  Study ,
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Bhishma Kukreti


कालिदास साहित्य में उत्तराखंड पर्यटन

Uttarakhand Tourism in Kalidas Literature
(  कालिदास साहित्य में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  30

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   Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )     -  30                 

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--135 )   
      उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 135 


    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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    कालिदास साहित्य गुप्त काल (275 -495 ई . ) में रचा गया।  शिव प्रसाद डबराल अनुसार उत्तराखंड में तब कर्तृपुर के खसाधिपति वंशजों का राज (350 -380 ) था व फिर उत्तराखंड गुप्तों के अधीन रहा (380 -470 ) इसके उपरांत सर्वनाग वंश (465 -485 ) व फिर नागवंशी  नरेशों (485 -576 ) का राज रहा।
         कालिदास व उसके जन्म स्थल पर विद्वानों में एक राय नहीं है।  नेपाल , कुमाऊं , गढ़वाल , हिमाचल  प्रदेश व कश्मीर विद्वान् कालिदास को अपने क्षेत्र का प्रवासी सिद्ध करते रहते हैं।  कई अन्य गैर पहाड़ी क्षेत्र वाले भी कालिदास को अपने क्षेत्र का जनमवासी सिद्ध करते हैं।  इस लेखक ने भी सिद्ध करने का प्रयत्न किया कि कालिदास उत्तराखंडी प्रवासी था।
         कालिदास गढ़वाल का था या नहीं किन्तु कालिदास साहित्य में  उत्तराखंड ही मिलता है।  महाभारत , पुराणों के बाद कालिदास साहित्य में उत्तराखंड का सर्वाधिक वर्णन मिलता है।  शायद उसके बाद आज तक किसी अन्य साहित्य में उत्तराखंड वर्णन इतना  अधिक नहीं मिलता है।

                  कालिदास रचित रघुवंश में उत्तराखंड वर्णन
 

उत्तराखंड में वशिष्ठ आश्रम - रघुवंश के प्रथम सर्ग में महारज दिलीप अपने कुलगुरु वशिष्ठ के आश्रम में पुत्र प्राप्ति आशीर्वाद हेतु उत्तराखंड जाता  हैं। वशिष्ठ आश्रम गंगा तट पर गौरीगुरु (पार्वती के पिता ) पर था।  आश्रम के निकट वन में देवदारु वृक्ष थे जहां दिलीप नंदनी चराता है। (रघुवंश , 1 /48 )


वशिष्ठ आश्रम की घटनाएं -  कालिदास कृत रघुवंश के प्रथम सर्ग के अंतिम 48 श्लोकों व द्वितीय सर्ग के प्राथमिक 71 श्लोकों में सभी घटनाएं वशिष्ठ आश्रम में हुईं और उत्तराखंड संबंधी कई सूचनाएं देने में समर्थ हैं। ( रव 2 )


दिलीप का उत्तराखंड पर आक्रमण -  कालिदास रचित रघुवंश के चतुर्थ सर्ग में दिग्विजय हेतु महाराज दिलीप काम्बोज जीतकर 'गौरीगुरु पर्वत पर आक्रमण करता है।  दिलीप की सेना पर्वतीय गणों के नाराचों से जूझती है। पर्वतीय वीर शिलाखंड फेंक कर दिलीप के सेना का सामना करते हैं (रघुवंश 4 /71 व 4 /77 )


पर्वतीय गणों द्वारा भेंट - रघुवंश के 4 सर्ग के 71 -7 9 श्लोकों में घोर युद्ध वर्णन है और किसी की भी जीत या हार नहीं हुयी।  रघु को विदा करते समय पर्वतीय गण दिलीप को भेंट देते हैं।  इन भेंटों में उत्तराखंड की कई वस्तुओं का वर्णन है।  हिमालय वासियों को मैदानी सेना चातुर्य व दिलीप को पाख पख्यड़ में पारम्परिक रणनीति से लड़ने की युद्ध समस्या का ज्ञान होता है।



Copyright Bhishma Kukreti   3/3 //2018 



Tourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी ...

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास -part -3
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  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;


Bhishma Kukreti



कुमारसम्भव में उत्तराखंड

Uttarakhand in Kumarsambhav by Kalidas
(  कालिदास साहित्य में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -31

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )     -  31               

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--136 )   
      उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 136 


    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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ऐसा लगता है कुमारसम्भव महाकाव्य अधूरा छूट गया था ।  कुमारसम्भव वास्तव में  कुमार (कार्तिकेय ) जन्म कथा होनी चाहिए किन्तु शिव पार्वती विवाह तक सीमित रह गया है (अमितेश कुमार ) .यद्यपि 17 सर्गों में कुमार सम्भव मिलता है किन्तु विद्वानों का मत है कालिदास  8 सर्ग तक ही रच सके थे।
   कुमारसम्भव के प्रथम सर्ग के 14 श्लोकों में हिमालय प्रकृति वर्णन व हिमालय संबंधी कई पौराणिक वर्णन मिलते हैं।
     कुमारसम्भव के प्रथम सर्ग के 15 वें सर्ग से भगीरथी -गंगा स्थलों व देवदारु वाले क्षेत्रों का वर्णन है।
    कुमारसम्भव के तीसरे सर्ग में गंधमादन के निकटस्त क्षेत्र का वर्णन मिलता है।  इस सर्ग में प्राकृतिक छटा का कम वर्णन मिलता है।
   कुमारसम्भव के छटे सर्ग में हिमालय का जंगम महामानव रूप में सुंदर वर्णन है। प्रकृति का जैसे देवदारु , गेरू शिलायें,  पटाळ , शिलायें , अदि मानवीकृत रूप में वर्णन है।
    कुमारसम्भव के सातवें , आठवें सर्ग में घटनाएँ औषधिप्रस्थ और निकट के स्थान मन्दराचल , गन्धमादन में घटित होती  हैं।  हिमालय प्रकृति छटा वर्णन यदा कदा मिलता है।
   वाचस्पति मैठाणी  (गढवाल हिमालय की देव संस्कृति , 2004) ने कुमारसम्भव में उत्तराखंड वर्णन का विश्लेषण किया है।  कुंवर सिंह नेगी ने (महाकवि कालिदास की जन्मस्थली की खोज) में कालिदास जन्म गढ़वाल में सिद्ध करने हेतु कुमारसम्भव के इन सर्गों का भी संदर्भ दिया है जो कालिदास ने रचे ही नहीं।
   औषधिप्रस्थ वास्तव में एक सर्वथा काल्पनिक नगर है जहां जड़ी बूटियों की चमक से रात्रि जगमगाया करती थीं। इस नगर की पहचान आज के संदर्भ में अनिश्चित है। 



Copyright @ Bhishma Kukreti  4 /3 //2018 



Tourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी ...

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास -part -3
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  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;


Bhishma Kukreti


उत्तराखंड  में   जम्बू फरण   मसाला , औषधि उपयोग  इतिहास

   History, Origin, Introduction,  Uses  of Small Alpine Onion   as   Spices ,  in Uttarakhand
उत्तराखंड  परिपेक्ष में वन वनस्पति  मसाले , औषधि  व अन्य   उपयोग और   इतिहास - 10                                             
  History, Origin, Introduction Uses  of    Wild Plant  Spices ,  Uttarakhand - 10                       
उत्तराखंड में कृषि, मसाला ,  खान -पान -भोजन का इतिहास -- 99
History of Agriculture , spices ,  Culinary , Gastronomy, Food, Recipes  in Uttarakhand -99

आलेख -भीष्म कुकरेती (वनस्पति व संस्कृति शास्त्री )
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वनस्पति शास्त्रीय नाम - Allium humile
सामन्य अंग्रेजी नाम - Small Alpine Onion

हिंदी नाम - हिमालयी वन प्याज
उत्तराखंडी नाम - जम्बू फरण
   यह वन प्याज अफगानिस्तान से भूटान व चीनी हिमालय में 3000 -4000  की ऊंचाई पर पाया जाता है।  इसकी पत्तियों से व्ही सुगंध आदि है जो लहसुन की पत्तियों में आती है .
मुख्यतया यह पौधा औषधि के काम आता है
इसके सूखे फूल छौंके में उपयोग होते है। पत्तियां या सुखी पत्तियां पीसकर साग दाल में डालकर स्वाद वर्धन हेतु उपयोग होता है .
   जम्बू जंगलों में भी होता है और खेती  भी होती है।




Copyright@Bhishma Kukreti Mumbai 2018

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( उत्तराखंड में कृषि,  मसाला ,  व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )


Bhishma Kukreti


मेघदूत , अभिज्ञानशाकुंतलम , विक्रमोर्वशीयम में उत्तराखंड

Uttarakhand in Meghdoot , Abhigyanshakuntalam, Vikramorvarshiyam  by Kalidas
(  कालिदास साहित्य में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -32

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )     -  32                 

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--137 )   
      उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 137 


    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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  कालिदास साहित्य आज भी उत्तराखंड पर्यटन ब्रिंग में एक सहयोगी घटक है , दुनिया भर के छात्र, अन्वेषक  व विद्वान् कालिदास साहित्य अध्ययन करते हैं और कालिदास साहित्य में वर्णित उत्तराखंड अथवा हिमालय के प्रति आकर्षित होते रहते हैं।
            कालिदास कृत मेघदूत में उत्तराखंड
   कालिदास कृत पूर्वमेघ में यक्ष मेघ से कुरुक्षेत्र से कनखल तक जाने की प्रार्थना करता है (पूर्व मेदू 53 ) . आगे कनखल से गंगास्रोत्र यात्रा की कथा है और गंगा स्रोत्र में शिलाओं में कस्तूरमृग बैठे दिखाए हैं (पूर्व मेदू 56  )
मेघदूत पूर्व के 57 से 67 श्लोकों में गंगा जी से कैलास , अलकापुरी वर्णन है।
     उत्तरमेघ में अलकापुरी वर्णन है

      कालिदास कृत नाटक अभिज्ञानशाकुंतलम में उत्तराखंड

     अभिज्ञानशाकुंतलम के प्रथम अंक में गंगा की सहायक नदी मालनी तट का वर्णन मिलता है।
    द्वितीय से चतुर्थ अंक में सभी घटनाएं कण्वाश्रम में घटित होती हैं और उत्तराखंड की सामाजिक , सांस्कृतिक व्यवस्थाओं का ज्ञान मिलता है।
   सातवें अंक की घटनाये कश्यप आश्रम -मंदाकिनी घाटी में स्थित हेमकूट की हैं।

         कालिदास कृत नाटक विक्रमोर्वशीयम में उत्तराखंड
 
   विक्रमोर्वशीयम के प्रथम अंक की घटना हेमकूट में घटित होती हैं तो चौथे अंक की घटनाएं मंदाकिनी तट गंधमादन  में घटित होती हैं।
    पुरुरवा द्वारा उर्वशी खोज में हिमालय वर्णन है।



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उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी ...

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास -part -3
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  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;


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उत्तराखंड  में टिमुर     मसाला , औषधि उपयोग  इतिहास

   History, Origin, Introduction,  Uses  of  Sichuan pepper, Timur    as   Spices ,  in Uttarakhand
उत्तराखंड  परिपेक्ष में वन वनस्पति  मसाले , औषधि  व अन्य   उपयोग और   इतिहास -  11                                             
  History, Origin, Introduction Uses  of    Wild Plant  Spices ,  Uttarakhand - 11                       
उत्तराखंड में कृषि, मसाला ,  खान -पान -भोजन का इतिहास --100 
History of Agriculture , spices ,  Culinary , Gastronomy, Food, Recipes  in Uttarakhand -100

आलेख -भीष्म कुकरेती (वनस्पति व संस्कृति शास्त्री )
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वनस्पति शास्त्रीय नाम - Xanthoxylum armatum
सामन्य अंग्रेजी नाम - Prickly Ash, Sichuan pepper or Toothache Tree
संस्कृत नाम -आयुर्वेद नाम -तेजोह्वा , तुम्बुरु:
हिंदी नाम -टिमुर , तेजबल
नेपाली नाम - टिमुर
उत्तराखंडी नाम -टिमुर
टिमुर के की कंटीली झाड़ियां उत्तराखंड में 1000 मीटर से लेकर 2250  मीटर की ऊंचाइयों पर मिलती हैं। 
             जन्मस्थल संबंधी सूचना -
  टिमुर का जन्मस्थल हिमालय ही है .
संदर्भ पुस्तकों में वर्णन - उत्तराखंड का टिमुर काल में भी प्रसिद्ध था और पाणनि साहित्य में लिखा है कि उत्तराखंड से अशोक व् अन्य राजाओं हेतु टिमुर निर्यात होता था।  (डा शिव प्रसाद डबराल , उखण्ड का इतिहास -2 )
डा कला लिखते हैं कि सदियों से भोटिया समाज टिमुर ( Xanthoxylum की चार प्रजाति ) उपयोग विनियम माध्यम (Exchange Medium )  करते हैं। 
भावप्रकास निघण्टु (डा डी  एस पांडे संपादित व हिंदी टीका 1998  ) के 113 -115 श्लोक में टिमुर  पर प्रकाश डाला गया है। नेपाली निघण्टु में भी टिमुर पर प्रकाश डाला गया है। डा अनघा रानाडे व आचार्य सूचित करते हैं कि टिमुर का उल्लेख धनवंतरी निघण्टु (ग्यारवीं सदी के लगभग ) में भी हुआ है । मदनपाल निघण्टु  में टिमुर  उल्लेख है।

   धार्मिक उपयोग
नरसिंग आदि ली सोटी , यज्ञोपवीत में आवश्यक लाठी के रूप में प्रयोग होता है। साधू टिमुर की लाठी को पवित्र मानते हैं
   दांतुन
टिमुर से दांतुन किया जाता है। चार धामों में अभी भी भोटिया टिमुर के दांतुन बेचते हैं (डा सी पी काला )

    औषधीय उपयोग
टिमुर के विभिन्न भाग पेट दर्द , एसिडिटी , अल्सर , आंत की कृमि , त्वचा रोग , दांत दर्द निवारण हेतु प्रयोग करते हैं।  जाड़ों में भोटिया समाज बीजों को भूनकर चबाते हैं जिससे ठंड का असर न पड़े। आयुर्वेद में कफ व वात निर्मूल हेतु उपयोग होता है।

  मसाले व भोजन में उपयोग

  टिमुर का सबसे अधिक उपयोग भोटिया समाज करता आया है।  भोटिया टिमुर को सूप में उपयोग तो करते ही हैं साथ ही बीजों व बीजों के भूसे का मसाले में उपयोग होता है। भोटिया डुंगचा नामक चटनी बनाने हेतु भी टिमुर का यपयोग करते हैं।




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Notes on History of Culinary, Gastronomy, Spices  in Uttarakhand; History Culinary,Gastronomy , Spices in Pithoragarh Uttarakhand; History Culinary,Gastronomy,  Spices in Doti Uttarakhand; History Culinary,Gastronomy ,  Spices in Dwarhat, Uttarakhand; History Culinary,Gastronomy,  Spices in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy ,  Spices in Champawat Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy ,  Spices in Nainital Uttarakhand;History of Culinary,Gastronomy ,  Spices in Almora, Uttarakhand; History Culinary,Gastronomy in Bageshwar Uttarakhand; History  Culinary,Gastronomy ,  Spices in Udham Singh Nagar Uttarakhand; History  Culinary,Gastronomy in Chamoli Garhwal Uttarakhand; History  Culinary,Gastronomy, Spices  in Rudraprayag, Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pauri Garhwal, Uttarakhand; History Culinary,Gastronomy in Dehradun Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy ,  Spices   in Tehri Garhwal  Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy,  Spices in Uttarakhand Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy ,  Spices in Haridwar Uttarakhand;

( उत्तराखंड में कृषि,  मसाला ,  व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )


Bhishma Kukreti


कालिदास साहित्य में  उत्तराखंड टूरिज्म के मुख्य तत्त्व

Factors for  Tourism in Kalidas Literature
(  कालिदास साहित्य में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -33

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )     -  33                 

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--138 )   
      उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 138 


    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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  कालिदास साहित्य में मध्य हिमालय का वर्णन अधिक आया है विशेषतया गंगा घाटी का।  कालिदास साहित्य में निम्न  वर्णन उत्तराखंड सबंधी हैं  (डबराल )-
               
पर्वत --कालिदास साहित्य कैलास , क्रीड़ाशैल,कौन्चरन्ध्र, गौरीगुरुपर्वत , गंधमादन , अचल , सिकितपर्वत , सुमेरु ,सुरभिकंदर, हेमकूट
नदियां - गंगा , मंदाकिनी , महाकोशी , मालनी
सरोवर -मानसरोवर व अन्य ताल
जलवायु - षटऋतु आदि
वनस्पति -नवमल्लिका , नवमालती , नलनी , कुमुदनी , माधवी , बासंती ,कन्दली , जूही , कमल , मौलिश्री फूल।  बृक्षों में आम , सप्तवर्ण वृक्ष , शिरीष , कुरबक , कर्कन्धु , निचुल , जम्बू , कदम्ब , रक्तकदंब , बेंत , मंदार , कल्पवृक्ष , अशोक , कीच वेणु (रिंगाळ ), देवदारु , भुर्ज  , सरल, थुनेर  , लोध्र , सिरस आदि
पशु   -सारंग , मृग , कोल -बराह , शार्दुल , रीछ , महिष , शूकर , हाथी , चमरी , कस्तूरी मृग , शरभ , सिंह , उत्तम जाति  के घोड़े
पक्षी -मोर , चकवा , कोकिल , राजहंस , हंस , सारिका
कीट -बीरबहूटी , भौंरे

                 निवासी

किन्नर , किरात , यक्ष ,विद्याधर , सिद्ध , अप्सरा , उतसवसंकेत ,

          वस्तियां

अलका में बहुमंजिले महल , औषधिप्रस्त , कनखल , कण्वाश्रम , वशिष्ठ आश्रम ,शक्रावतार , हेमकूट

    स्थान दूरी
कालिदास साहित्य में एक स्थान से दूसरे स्थान की दूरी परोक्ष या अपरोक्ष रूप से बतलाया गया है।

        जीवन
विभिन्न ऊंचाई पर रहने वाले मनुष्यों की जीवन शैली -मकान , आदि

      वेश भूषा
स्टेटस व पद , जाति के अनुसार बेष -भूषा वर्णन मिलत है

        भाषा
सामान्य जन स्थानीय (प्राकृत ) बोली बोलते थे तो सभ्रांत विद्वान् संस्कृत

   धार्मिक मान्यताएं
विभिन्न पद , जाति अनुसार धार्मिक मान्यताओं का वर्णन मिलता है , पारिवारिक जीवन भी पद व जाति अनुसार दिखाया गया है।

     स्वभाव
सत्यवादी , धर्म निष्ठ , प्राचीन मान्यताओं के मानने वाले छल कपट रहित किन्तु बुद्धिमान व मैदानी से छले जाने वाले जैसे शकुंतला

श्रृंगार
स्त्रियों के श्रृंगार वर्णन कालिदास साहित्य में खूब मिलता है

   मनोरंजन के साधन

पुरुष व स्त्री चित्रकला सीखते थे।  चित्र भोजपत्र , कागज या शिलाओं पर बनाये जाते थे।
मेनका -उर्वशी तो नाच गाने के प्रतीक थे ही
संगीत खूब प्रचलित था।  मृदंग वीणा साथ साथ बजाया जाता था।
ताली बजाकर मोरोन को नचाना द्योतक है कि ताली एक अहम कारक थी।
गप मारने से भी मनोरंजन किया जाता था।
बालू से मूर्ति बनाकर मनोरंजन होता था।
धातु , लकड़ी व मिटटी , पत्थर से गुड़िया आदि भी बनाई जाती थीं।
मदिरालयों से भी मनोरंजन होता था।

   परिहवन
मैदान में रथ का वर्णन मिलता है और पहाड़ों में घोड़ों का वर्णन मिलता है। 

      कालिदास साहित्य में औषधि व रोग निवारण वर्णन

कालिदास साहित्य में  उत्तराखंड में औषधि व रोग निरोधक तत्वों का भी वर्णन मिलता है।
  अभिज्ञान शाकुंतलम में हेमकूट में अपपराजिता महाऔषधि का रोचक वर्णन किया है।
भाभर में इंगुदी होती थी जिसे आश्रमवासी सर पर मलते थे व घावों पर मलते थे (अभिज्ञान शाकुंतलम 4 /16 )
पोखरों में मुस्ता होती थी (शाकुंतलम 2 /6 )
खस लेप  ताप शान्ति हेतु प्रयोग होता था (शकुंतलम अंक 3 )।
कालिदास ने बहुत सी वनस्पतियों का वर्णन किया जिन्हे उस काल में भी औषधि हेतु प्रयोग होता था।
  मेघदूत उत्तर ( 2 ) में बताया गया है कि अलका नगरी की स्त्रियां मुख पर लोध्र पुष्प के पराग  मलकर मुख को आकर्षक बनाती थीं।

       औषधिप्रष्थ

कुमार सम्भव में हिमालय की राजधानी औषधिप्रष्थ  थी जहां निवासी आजीवन युवा रहते थे (कुमारसम्भव 6 /46 ).
  यह पर्वतीय स्थान रात में जड़ी बूटियों से चमकता था (कुमारसम्भव 6 /38 )।  अवश्य ही यह बुर्या घास आदि की ओर संकेत करता है।   


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उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी ...

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास -part -3 पृष्ठ 312 -336
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  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;


Bhishma Kukreti


उत्तराखंड  में  दालचीनी /तेजपात     मसाला , औषधि उपयोग  इतिहास

   History, Origin, Introduction,  Uses  of  Cinnamon, Indian cassia  as   Spices ,  in Uttarakhand
उत्तराखंड  परिपेक्ष में वन वनस्पति  मसाले , औषधि  व अन्य   उपयोग और   इतिहास - 12                                             
  History, Origin, Introduction Uses  of    Wild Plant  Spices ,  Uttarakhand - 12                       
उत्तराखंड में कृषि, मसाला ,  खान -पान -भोजन का इतिहास --  102
History of Agriculture , spices ,  Culinary , Gastronomy, Food, Recipes  in Uttarakhand -101

आलेख -भीष्म कुकरेती (वनस्पति व संस्कृति शास्त्री )
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वनस्पति शास्त्रीय नाम -Cinamomum tamala
सामन्य अंग्रेजी नाम -Cinnamon, Indian cassia , Tejpat
संस्कृत नाम - दारुसिता , वरांगा
हिंदी नाम - दालचीनी
उत्तराखंडी नाम - दालचीनी , तेजपात

जन्मस्थल संबंधी सूचना - Cinamomum genus  की करीब 250 स्पेसीज हैं  तेजपत्ता प्राचीनतम मसालों में से एक है।  बाइबल , अरबी साहित्य में तेजपात का जिक्र मिलता है।
Cinamomum tamala का जन्म हिमालय माना जाता है क्योंकि यह पेड़ पश्चिम हिमालय व पूर्वी हिमालय में 900 -2500 मीटर ऊँचे स्थानों में पाया जाता है।  उत्तराखंड में दालचीनी का उपयोग गरम् मसाले व चाय के साथ होता है। केरल में ब्रिटिश व श्रीलंका में हॉलैंड वासियों ने बागवानी शुरू की।  उत्तराखंड में चाय बगान की असफलता से ब्रिटिश या यूरोपीय लोगों ने उत्तराखंड  नहीं दिया।
संदर्भ पुस्तकों में वर्णन - चूँकि दालचीनी के कई औषधीय उपयोग होते हैं तो धन्वन्तरी निघण्टु (52 ); कै.  निघण्टु  (1337 , 38 ) ;शै . निघण्टु (287 ); भाव् प्र निघण्टु (56 )  निघण्टु ( 172 ) में मिलता है।
  मसाला उपयोग
  दालचीनी के अंदरूनी खाल के मसाले में उपयोग होता है व तेल से कई दवाइयां बनती हैं।
उत्तराखंड में दालचीनी का वार्षिक मार्किट 1470 टन का बताया जाता है ( हेमा लोहानी व अन्य ,जॉर्नल ऑफ केमिकल ऐंड फार्मेस्युटिकल रिसर्च , 2015 )


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Bhishma Kukreti




हुयेन सांग /युअन च्वांग द्वारा उत्तराखंड छवि वृद्धि
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Contribution by Hiuen Tsang for Uttarakhand Branding
( हर्षवर्धन काल में में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -34

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )     -  34                 

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--139 )   
      उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 139 


    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री  प्रबंधन विशेषज्ञ )
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    गुप्त  काल से हर्षकाल  तक कुछ महत्वपूर्ण छवि वर्धन प्रतीक
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       गुप्तकाल से हर्षवर्धन काल  (450 से 606 ईश्वी ) के मध्य उत्तराखंड में हूण आक्रमण , नाग वंश , यादव वंश , मौखरि राज रहा है।
  इस समय उत्तरी गढ़वाल में गोपेश्वर व बड़ाहाट में त्रिशूल अभिलेख , सिराली अभिलेख महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रतीक हैं।
लाखामंडल के मंदिरों में ५ शिलालेख प्रशस्ति विशेषकर ईश्वरा प्रशस्ति से पता चलता है कि लाखामंडल क्षेत्र पर्यटन आकर्षीय क्षेत्र था।  लाखामंडल व उत्तरी  उत्तराखंड शैव  मतावलम्बियों हेतु पुण्य पर्यटक क्षेत्र बन चुके  था।
       बुद्ध धर्मावलम्बी दक्षिण उत्तराखंड की यात्रा करते रहते थे।
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        हुयेन सांग /युअन च्वांग  द्वारा उत्तराखंड वर्णन

      हर्षकाल में चीनी बौद्ध धर्म अन्वेषक /यात्री हुयेन सांग /युअन च्वांग भारत पंहुचा था और भारत यात्रा दौरान हुयेन सांग /युअन च्वांग  ने उत्तराखंड यात्रा भी की थी।   हुयेन सांग /युअन च्वांग  ने अपनी भारत यात्रा (629 -645 ) वर्णन लिखा जो आज तक प्रसारित होता रहता है।   हुयेन सांग /युअन च्वांग का यात्रा वर्णन 'भारतीय बौद्ध मत पर प्रकाश डालने वाले तीन दर्पणों में से एक दर्पण है।
         हुयेन सांग /युअन च्वांग के उत्तराखंड यात्रा विवरण पर कई इतिहासकार जैसे त्रिपाठी , वाटर्स , कनिंघम , चटर्जी व डा डबराल ने विस्तार  से विश्लेषण किया है।

        उपरोक्त विद्वानों के विश्लेषण से निम्न महत्वपूर्ण सामग्री सामने आती है -

श्रुघ्न ( Su -lu -kle ) --- 1000 मील के इस प्रदेश /राज  के मध्य में यमुना बहती थी तो पूर्व में गंगा और उत्तर में महान पर्वत (हिमालय )  खड़ा था।
ब्रह्मपुर जनपद - इतिहासकारों की राय में यह क्षेत्र  गढवाल प्रदेश का क्षेत्र होना चाहिए।
गोविषाण जनपद - कुमाऊं का भाभर -तराई क्षेत्र
    हुयेन सांग /युअन च्वांग  ने श्रुघन नगर , मयूर नगर (हरिद्वार अथवा पूर्व हरिद्वार का निकटवर्ती नगर ) , ब्रह्मपुर नगर (विद्वानों में इस नगर की स्थिति बारे में मतभेद है ); गोविषाण नगर (काशीपुर ) नगरों का वर्णन मिलता है।
   हुयेन सांग /युअन च्वांग ने विभिन्न क्षेत्रों में जलवायु भेद का उल्लेख भी किया है।
   हुयेन सांग /युअन च्वांग ने उपजों , निर्यात हेतु वस्तुओं , हिम निर्यात , जन व्यवहार आदि का वर्णन भी किया है।  कहां कहाँ बौद्ध धर्मी थे उसका वर्णन भी हुयेन सांग /युअन च्वांग यात्रा वर्णन में मिलता है।
       
   उत्तराखंड पर्यटन का जब भी इतिहस विवेचन होगा तो हुयेन सांग /युअन च्वांग का नाम सदा स्मरणीय होगा और हुयेन सांग /युअन च्वांग यात्रा वर्णन हमेशा एक महत्वपूर्ण सूचना स्रोत्र मना जायेगा।
   हुयेन सांग /युअन च्वांग यात्रा वर्णन से पता चलता है कि उत्तराखंड के पर्यटन ब्रैंड था जो पर्यटकों को आकर्षित करता था।
 
  हुयेन सांग /युअन च्वांग ने भारत भ्रमण मध्य उत्तराखंड यात्रा की या लोगों ने उसे यात्रा करने प्रेरित किया तो उसके पीछे उत्तराखंड ब्रैंडिंग का तागतवर ब्रैंड होना ही था।



 


Copyright @ Bhishma Kukreti  7 /3 //2018 



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उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी ...

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास -part -3
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