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Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti



शाह शासन  (1600-1700 में उत्तराखंड पर्यटन -2

Medical Tourism from 100-1700
(  1600-1700 मध्य  उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -47

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )     -  47                 

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--152 )   
    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 152


    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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मान शाह (1591 -1611 ) के पश्चात श्याम शाह (1611 -1631  ) ने गढ़वाल पर शासन किया। पर्यटन संबंधी मुख्य घटनाएं इस प्रकार हैं -
 

     पंजाब में महामारी
    जहांगीर काल में 1616 में पंजाब में महामारी /प्लेग शुरू हुआ।  महामारी में हजारों मनुष्य मरे।  उत्तरी भारत में दोआब व दिल्ली समेत महामारी फैली और आठ साल तक महामारी का प्रकोप बना रहा  (मुतामद खान , जहांगीर नामा )।  हिन्दू अधिक मरे।  कश्मीर में इस बीमारी से भीषण प्रकोप हुआ। फजल अनुसार गौड़ देस में भी 1575  में प्लेग फैला था।
      गढ़वाल कुमाऊं में महामारी की सूचना नहीं मिलतीं हैं  किन्तु संभवतया उत्तराखंड इस महामारी से नहीं बच सका होगा।  ब्रिटिश काल तक महामारी , हैजा आदि छूत की बीमारियां यात्रियों द्वारा उत्तराखंड आती रही हैं और बिनाश करती रही हैं।
       
श्यामशाह का जहांगीर राज्यसभा  में उपस्थिति

   श्याम शाह और राजकवि भरत के मुगल बादशाह जहांगीर ( 1605 -1627 ) से अच्छे सबंध थे।  सन 1621 में श्यामशाह आगरा में जहांगीर की राज्यसभा में उपस्थित हुआ था। जहांगीरनामा (पृष्ठ 713 ) में उल्लेख है कि  बादशाह ने श्रीनगर के जमींदार राजा श्याम सिंह को एक घोड़ा व हाथी उपहार स्वरूप दिया।  श्याम शाह क्या उपहार ले गए थे का विवरण खिन नहीं मिलता है।  बहुगुणा वंशावली में भरत  बहुगुणा द्वारा 'शाह' पदवी लाना वाला कथन वस्तव में जहांगीरनामा के इस उल्लेख से गलत ही साबित होती ही।
   
          जहांगीर का हरिद्वार आगमन
   जहांगीर ग्रीष्म ऋतू में हरिद्वार में ग्रीष्म निवास गृह बनवाने की इच्छा से 1621 में हरिद्वार आया।  वहां जहांगीर ने साधू संतों को भेंट आदि दीं। और सही जलवायु न पाने से जहांगीर कांगड़ा ओर चला गया।

    पादरियों का उत्तराखंड पर्यटन
    पुर्तगाली जेसुइट पादरी अंतोनियो तिबत जाने के लिए 1600 ई में गोवा भारत आया था।  उन्हें गुमान था कि तिब्बत में ईसाई धर्मी बिधर्मी हो गए हैं उन्हें सुधारने हेतु 1624 में अंतोनियो , फादर मैनुअल  मार्क्स व अन्य साथी आगरा के लिए चल पड़े।  आगरा से 30 मार्च 1624 उत्तराखंड के लिए धार्मिक यात्रियों के साथ चल पड़े।  हरिद्वार में मुगल सुरक्षा कर्मी भगोड़ा समझ उन्हें हरिद्वार से बाहर नहीं  जाने दे रहे थे तो गढ़वाली सैनिक मुगल जासूस समझ गढ़वाल सीमा में प्रवेश से रोक रहे थे।  जब आगरा से स्वीकृति मिली तो वे 1624 में श्रीनगर पंहुचे व श्रीनगर में कई प्रश्नों के उत्तर के बाद माणा जाने की स्वीकृति मिली।  वहां बर्फ न पिघलने से माणा  में रुकना पड़ा।  गढ़वाल सेना उन्हें तिब्बत नहीं जाने दे रहे थे। अंतोनियो अपने साथियों को छोड़ चुपके से किसी भोटिया पथप्रदर्शक के साथ तिब्बत की और चल पड़ा। अगस्त में अंतोनियो व कुछ अन्य ईसाई भक्तों के साथ दाबा मंडी तिब्बत पंहुच जहां बाद में मार्क्स भी मिल गया।
       रास्ते में सत्तू पीकर व रात में गुफाओं , खले अकास में कंबल बिछाकर दो कंबल ओढ़कर उन्होंने कष्टकारी यात्रा पूरी की। एक महीने बाद अंतोनियो श्रीनगर  होते हुए सरहिंद पंहुचा। श्याम शाह तब्ब्त युद्ध में व्यस्त था।
  अगले वर्ष 1625 में राज आज्ञा पत्र लेकर हरिद्वार , श्रीनगर , माणा होते पादरी अंतोनियो , मार्क्स व अन्य  के साथ छपराङ्ग मंडी, तिब्बत  पंहुचा।  वहां उसने चर्च स्थापित किया।
      आते समय श्याम शाह अंतोनियो से मित्रता पूर्वक मिला व उसे अपने महल में ठहराया।
      सन 1631 /30 में अंतोनियो ने मार्क्स व अन्य पादियों को फिर से छपराङ्ग भेजा।  मार्क्स जब श्रीनगर पंहुचा तो श्याम शाह क अंतिम संस्कार हो रहा था।  इस दौरान व बाद में भी ईसाई मिसनरी कार्यकर्ता कई बार छपराङ्ग हरिद्वार , श्रीनगर , माणा होते छपराङ्ग पंहुचे।  लक्ष्मण झूला से बद्रीनाथ का प्राचीन पथ ही उनका पथ था।

        हरिद्वार कुम्भ मेला 1928

एसियाटिक रिसर्च खंड 16 अनुसार 1630 मेंहरिद्वार  कुम्भ मेले के बाद 8000 नागा अस्त्र शस्त्र लेकर बद्रीनाथ यात्रा हेतु हरिद्वार से श्रीनगर पंहुचे थे जब कि मोहसिन फनी के दाबेस्तान -ए -मजहब अनुसार 1640 में कुम्भ मेला लगा था।  2010 में हरिद्वार में कुम्भ मेला लगा था।  विश्लेषण से स्पस्ट है कि 1628 व 1640 में कुम्भ मेले लगे होंगे।
     एसियाटिक रिसर्च अनुसार कुम्भ मेले के बाद नागा साधू अस्त्र शस्त्र सहित बद्रीनाथ यात्रा हेतु हरिद्वार से श्रीनगर पंहुचे।  राजा श्याम शाह  को पाखंड से अति चिढ थी।  राजा श्यामशाह ने  संदेश भेजा कि यदि बद्रीनाथ यात्रा प् जाना है तो अस्त्र शस्त्र छोड़कर ही जाना पड़ेगा।  राजा ने धमकी दी अन्यथा नागाओं से उसकी सेना निपटेगी।  नागाओं ने अस्त्र शस्त्र श्रीनगर  में छोड़े और बद्रीनाथ यात्रा की।  यदि 8000  नागाओं ने उस वर्ष यात्रा की होगी तो अन्य यात्रियों की संख्या बहुत अधिक रही होगी।
       
     मुसलमान वैश्याओं का आगमन

  श्याम शाह की सबसे बड़ी कमजोरी स्त्री थी।  उसके अंतःपुर  में सुंदर स्त्रियां थीं। अंतःपुर के बाहर बहुत सी रखैलन थीं , साथ ही वह वैश्याग्रहों में गणिकाओं से भी आमोद प्रमोद करता था।  इनसे भी जी न भरे तो उसने  बजारी वैश्या तुर्कानिन तेलिन से संबंध गाँठ लिए।  दिन में वह तेलिन के यहां कबाब के साथ मदिरा पान  कर संगीत सुनता था। श्याम शाह को कई राग रागनियों का ज्ञान था।

     कबाब का आगमन
यद्यपि महाभारत में भुने  मांश का संदर्भ आता है और उत्तराखंड में तो इसे कछबोळी बोलते हैं किन्तु कबाब शब्द इस लेखक ने देहरादून में 1974  में भी कम ही सुना था जब कि मौलराम ने गढ़ काव्य वंश (पर्ण 10 अ ) में कबाब प्रयोग किया है।  क्या 1600 सन  तक कबाब के साथ अन्य मुगल भोज्य पदार्थों ने भी गढ़वाल में प्रवेश कर लिया था पर खोज की आवश्यकता है।

     फरिस्ता का इतिहास
फरिस्ता (1623 )  इतिहास में जिस जमुना -गंगा के बिच खंड का वर्णन किया गया है उसे उसने  नाम दिया है।  जबकि गंगा जमुना खंड गढ़वाल होता है।  इस इतिहास में इस प्रदेश की समृद्धि वर्णन है।


    शाह व चंद नरेशों  द्वारा गणिकाएं , कबाब , मिरजई आयात करना  किन्तु जहांगीर से चिकित्सा प्रबंध न सीखना


     मुगल बादशाह अकबर ने व बाद में जहांगीर ने सार्वजनिक चिकित्सा पर ध्यान दिया। जहांगीर ने 12 आदेशों में से एक आदेश दिया था जिसमे सार्वजनिक दवाखाने खोलने व उनमे हकीमों की भर्ती का।  राज्य को व्यय बहन करना था।  जहांगीर भी औषधि व बीमारियों पर प्रयोग करता था।  चूहों से प्लेग फैलता है उसे के राज में पता चला।  जहांगीर ने दवाइयों विकास हेतु कई आदेश दिए थे।

       जहांगीर की  राजसभा में हकीम हमाम, हकीम अब्दुल फतह , हाकिम मोमिन शिराजी (जो 1622 में भारत आया ) ;हकीम सद्रा , हकीम रुकना , हकीम रूहुल्लाह ; हकीम गिलानी ; हकीम अब्दुल कासिम आदि प्रसिद्ध चिकित्सक थे।  अधिकतर ईरान से प्रशिक्षित हकीम थे।

               गढ़वाल नरेशों व चंद नरेशों ने  कई मुगल संस्कृति का आयात किया किन्तु मुगलों से राजकीय चिकित्सा प्रबंधन कभी नहीं सीखी।  ब्रिटिश काल में जाकर चिकित्सा सार्वजनिक हिट का विचार (Concept ) बना।  मियादी बुखार , खज्जी , तपेदिक शब्द गढ़वाली में या तो मुगल काल में जुड़े या ब्रिटिश काल में खोज का विषय है।


     मुख्य मंदिरों को भूमि

इस काल में पूजा व्यवस्था  हेतु मंदिरों को सदाव्रत भूमि पहले की तरह ही रही। साधुओं , नागाओं व अन्य यात्रियों हेतु श्रीनगर , जोशीमठ जोशीमठ , बद्रीनाथ अदि स्थानों में सदाव्रत व्यवस्था से अन्न मिलता था। यात्रियों की चिकित्सा हेतु कोई जानकारी इस लेखक को न मिल सकी।


        बद्रीनाथ मंदिर तर्ज पर मंदिर बनाने की संस्कृति

राजस्थान राज्य में  गढ़बोर गाँव (राजसमंद जनपद के कुम्भलगढ़ तहसील ) में चतुर्भुज का मंदिर है जिसमे बड़ा मेला लगता है।  यह मंदिर 1444  ईश्वी में निर्मित हुआ।  मंदिर के अभिलेख में गाँव का नाम बदरी उल्लेख है (Rajasthan  (district Gazetteers: Rajsmand,2001 पृष्ट -296 ) व चतुर्भुज  को बद्रीनाथ का ही रूप माना गया  है। गढ़बोर नाम बाद में राजा बोर के बसने के बाद प्रचलित हुआ।      इस मंदिर को बद्रीनाथ ही मना जाता है।

   1444 में राजस्थान में मंदिर निर्माण होने से प्रमाणित होता है कि बद्रीनाथ धाम यात्रा प्रचलन में थी।



Copyright @ Bhishma Kukreti  20 /3 //2018

ourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी ...

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -4
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Bhishma Kukreti



महीपति  शाह व नकटीराणी काल (1630 -1640 ) में  उत्तराखंड  मेडिकल पर्यटन

Medical Tourism in Duleram Shah and Naktrani Period
( शाह काल में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -48

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -  48                 

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--153 )   
    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 15


    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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  मानशाह के बाद कुछ समय गढ़वाल पर दुले रामशाह का शासन रहा।  दुले  राम शाह वस्त्रप्रेमी व मनोरंजन प्रेमी था।  लगता है उसने बाहर से कुछ मुसलमान दर्जी श्रीनगर में बसाये होंगे।  श्रीनगर में तवायफों को भी आसरा दिया होगा।

महीपति शाह (1631 -1635 ) ने राज्य सीमावृधि में रूचि ली। बनारसी दस तुंवर, लोदी रिखोला, माधो सिंह भंडारी , दोस्तबेग मुगल जैसे सेनापति महीपति शाह की सेना में थे।

महीपति  ने तिब्बत (दाबा ) पर आक्रमण किया था।  इस  युद्ध में बर्त्वाल बंधु शहीद हुए थे। माधो सिंह भंडारी ने सीमारेखांकन हेतु तिबत सीमा पर चबूतरे निर्मित किये थे।

    लोदी रिखोला के नेतृत्व में सिरमौर युद्ध जीता और सीमारेखांकन हेतु चबूतरे निर्मित किये।

     माधो सिंह भंडारी के नेतृत्व में बशेर (उत्तरी हिमांचल ) पर आक्रमण हुआ जिसमे माधो सिंह भंडारी शहीद हुआ । मलेथा की कूल का निर्माण भी इसी काल में हुआ।


     महीपति शाह को चित्तभ्रान्ति


   कुम्भ मेला आने पर (संभवतः अर्ध कुम्भ या ) पर महीपति शाह भरत मंदिर ऋषिकेश पंहुचा और मन व्याकुल स्थिति में उसने भरत मूर्ति की आँखें निकलवा दी।  हरिद्वार पंहुचने पर महीपति शाह ने 500 अस्त्र -शस्त्र से सुसज्जित नागा साधुओं की हत्त्या  करवा दी। कहा जाता है कि महीपति शाह ने प्रायश्चित हेतु कुमाऊं पर आक्रमण किया था।

        बाह्य सैनिकों को आश्रय

महीपति शाह का सेनानाटक बनारसी दास तुंवर था व उसकी सेना में कई तुंवर सैनिक भी थे ।  महीपति शाह का चौथा सेनापति दोस्तबेग मुगल था। सेनानायक बनारसी दस तुंवर  व दोस्तबेग संकेत देते हैं कि गढ़वाली शासक बाह्य सैनिकों को महत्व देते थे और गढ़वाल सेना में या  थोकदारों के यहां मैदानों से सैनिक आजीविका पर्यटन हेतु गढ़वाल आते रहते थे।

         नकट्टी राणी  (1635 -1640 )

महीपति शाह की मृत्यु समय उसका पुत्र पृथ्वीपति शाह अवयस्क था। नाककट्टी राणी को कुछ समय तक शासन चलना पड़ा। शाहजहां के सेनापति ने दून भाभर पर आक्रमण कर दून क्षेत्र छीन लिया।  शाहजहां के सेनापति नजाबबत खान ने गढ़वाल पर पूर्वी गंगा से आक्रमण किया और ढांग गढ़ के जमींदार या राजा के आदमियों ने उसे हिंवल ही हिंवल नजीबाबाद भागने को मजबूर किया। फिर दून प्रदेश को पुनः प्राप्ति हुयी।

             नाथ गुरु

  शिलालेखों से ज्ञात होता है कि इस काल में हंसनाथ व प्रभात नाथ दो नाथ गुरु बड़े प्रभावशाली गुरु थे।  प्रभात नाथ ने सत्यनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था।


          हरिद्वार में कुम्भ मेला

मोहसिन खान ने दाबेस्तान -ए -मजहब में उल्लेख किया है कि हरिद्वार में नागाओं के मध्य 1640  ई में भयंकर लड़ाई हुयी थी। गणित अनुसार यह साल कुम्भ का बैठता है। कुम्भ के पश्चात यात्री बद्रीनाथ यात्रा पर निकलते ही थे।

            शाहजहां काल के यूनानी चिकित्सक


  शाहजहां युग यूनानी चिकत्सा का स्वर्ण युग था।  शाहजहां काल के मुख्य यूनानी चिकत्स्कों में हकीम मुहम्मद गिलानी ,हकीम अल दीन अहमद गिलानी , हकीम दाऊद तकरब खान ,हकीम मसीहा अल मुल्क शिराजी ,हकीम मुसामत सती अल मूसा , हकीम हार्दिक प्रसिद्ध थे।


शाहजहां काल में देश के कई शहरों में दवाखाने खोले गए थे।  हरिद्वार रुड़की क्षेत्र में में दवाखाना खुले थे या नहीं इस पर कोई रिकॉर्ड नहीं मिलते हैं।

   शाहजहां काल में चावड़ी बजार में सरकारी दवाखाना खोला गया जिसमे यात्रियों व विद्यार्थियों का उपचार व उन्हें औषधि दीं जाती थीं।

  शाहजहां ने गरीबों के लिए अहमदाबाद में दारु शैफ खोला था।

    शाहजहां व उससे पहले औषधि प्रशिक्षण का भी प्रबंध किया गया था जहां यूनानी चिकित्सा की शिक्षा दी जाती थी। शासकीय चिकित्स्क बनने से पहले परीक्षा ली जाती थी।


      यूनानी दवाओं का भारतीयकरण व भारतीय औषधि का यूनानी संस्करण

  अकबर से शाहजहां काल तक अधिकतर प्रमुख चिकित्स्क ईरान के प्रशिक्षित थे और उन्हें भारतीय आयुर्वेद का व भारत में उपलब्ध वनस्पति , खनिज व जीवों का ज्ञान नहीं था।  किन्तु हकीमों ने अध्ययन व प्रयोग कर यूनानी औषधि विज्ञान का भारतीयकरण किया।


        आयुर्वेद व यूनानी चिकित्सा  प्रतियोगिता

मुगल काल में यूनानी औषधि विज्ञान को राजकीय संरक्षण मिलने व प्रचार प्रसार  आयुर्वेद को झकझोर दिया। यूनानी चिकत्सा के साथ प्रतियोगिता ने आयुर्वेदाचार्यों को चहुं दिशा देखने की आवश्यकता पड़  गयी। योग , सिद्धों के योग व आयुर्वेद के मध्य संश्लेषण का काल भी सत्रहवीं सदी है। शैव्य सिद्ध योग ज्ञान से  आयुर्विज्ञान  में नाड़ी विज्ञान को नई दृष्टि मिली।  शैव्य योग विज्ञान व आयुर्वेद में संश्लेषण दक्षिण में प्रारम्भ हुआ जो बाद में उत्तर में आया। श्रीरंगधर संहिता , नाड़ी विज्ञान  व नाड़ी चक्र  ग्रंथ इसी काल की देन है।  यूनानी हकीमों से भी आयुर्वेदाचार्यों ने नाड़ी गिनने व निष्कर्ष निकालना सीखा व आयुर्वेद में जोड़ा। आयुर्वेद में खनिज जैसे  स्वर्णभष्म , रजतभष्म , पारा मिलना तो क्रांतिकारी सिद्ध हुए।  ( G.Jan Meulenbeld, 1999,2000, A History of Indian Medical Literature 5 volumes, कुल 4020 पृष्ठ )


      नए आयुर्वेद अविष्कारों का  उत्तराखंड पंहुचना

  मुगल काल में यद्यपि आयुर्वेद को शासकीय परिश्रय नहीं मिला किन्तु समाज में आयुर्वेद के प्रति जागरूकता व संस्कृत विद्वानों के बल पर आयुर्वेद कुछ ना कुछ प्रगति करत जा रहा था।  सलहवीं सत्तरहवीं सदी में औषधि निघंटुओं की रचना इस बात का द्योतक है कि आयुर्वेद विकसित हो रहा था।

  नए नए अविष्कार किस तरह से उत्तराखंड पंहुच रहे थे पर खोज बाकी है।  कुछ निम्न आकलन लग सकते हैं -

  बद्रीनाथ -केदारनाथ रवालों के साथ आयुर्वेद चिकित्सक अवश्य रहे होंगे उन्होंने गढ़वाल के चिकित्स्कों को ज्ञान आदान प्रदान किया होगा।

   देवप्रयाग में दक्षिण से पंडे बस रहे थे तो उनमे से कई औषधि ग्यानी भी रहे होंगे।

        शासकों के पास भेंट आदि के लिए विद्वान् पंहुचते रहते थे , उनमे कई ओषधि ग्यानी भी अवश्य रहे होंगे जिन्होंने उत्तराखंड में ज्ञान दिया होगा।

   भारत के अन्य भागों से हर समय ब्रह्मणों का पलायन हो रहा था  गढ़वाल -कुमाऊं में बस रहे थे।  उनमे से बहुत से वैद भी रहे होंगे जो कुछ न कुछ नया ज्ञान लेकर आये ही होंगे।

  कुमाऊं व गढ़वाल से अधिकारी बादशाहों से मिलने आगरा व दिल्ली आते जाते रहे थे तो औषधि ज्ञान भी लाये ही होंगे।

    कुमाऊं और गढ़वाल शासक बाह्य सैनिकों को महत्व देते थे तो वे सैनिक भी कई तरह के औषधि ज्ञान लाते ही रहे होंगे। 

        धार्मिक यात्रियों में जो औषधि ग्यानी रहे होंगे उनसे भी ज्ञान मिला होगा।

      धार्मिक अनुष्ठान हेतु हरिद्वार में विद्वानों का आना जाना लगा रहता था तो उत्तराखंड के विद्वानों को यहां भी नव ज्ञान प्राप्त हुआ होगा।

     बनारस आदि स्थानों में शिक्षा से नव ज्ञान प्राप्त भी हुआ होगा।

      नाथ , सिद्धों के भ्रमण से भी चिकत्सा ज्ञान आता रहा होगा।

     औषधि , वनस्पति विक्रेताओं द्वारा भी कई किस्म के  ज्ञान का आदान प्रदान हुआ होगा।



    आयुर्वेद ज्ञान का का अरबी व फ़ारसी में अनुवाद


आठवीं सदी से आयुर्वेद का ज्ञान पश्चिम में प्रसारित होने लगा था और कतिपय पश्चिम एशियाई औषधि साहित्य में कई आयुर्वेद औषधियों का वर्णन मिलता है (वर्मा इंडो अरब रिलेसन इन मेडिकल साइंस ). पैगंबर के समय भारत से अदरक निर्यात होता था।

फैब्रिजिओ  (2009 ) ने अपने लेख 'द सर्कुलेशन ऑफ आयुर्वेद नॉलेज इन इंडो पर्सियन लिटरेचर ' में आयुर्वेद का अरबी -फ़ारसी में अनुवाद का पूरा वृत्तांत दिया है।


Copyright @ Bhishma Kukreti   21/3 //2018

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उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी ...

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -4
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Bhishma Kukreti


पृथ्वीपति  कालीन (1640 -1660  )  संदर्भ में  रस शास्त्र  इतिहास विवेचना

Uttarakhand Medical Tourism in Garhwal Kingdom
(  शाह कालीन  उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -49

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -  49                 

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--154 )   
    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 154 


    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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पृथ्वीपतिशाह  का शासन काल शाहजहां व औरंगजेब काल भी है।  पृथ्वीपतिशाह कालीन पर्यटन से पहले माधो सिंह भंडारी मृत्यु प्रकरण जो मेडिकल साइंस पर भी प्रकाश डालता है पर विचार आवश्यक है ।

                      माधों सिंह की युद्ध में मृत्यु
   बशेर (हिमाचल ) पर आक्रमण के समय माधो सिंह भंडारी पर मरणांतक घाव लग गए।  माधो सिंह भंडारी ने अपने सहायक को आदेश दिया कि मेरी मृत्यु का समाचार अपनी सेना व शत्रु सेना को नहीं लग्न चाहिए।  मेरी मृत्यु गुप्त ही रखी जानी चाहिए।  मृत्यु उपरान्त माधो सिंह की सलाह अनुसार उसके शरीर को गरम तेल में भुने कपड़ों से लपेट कर बक्से में रखा गया था और जब तक गढ़वाली सेना हिमाचल से उत्तराखंड वापस नहीं आयी रब तक रहस्य गुप्त ही रहा।  बाद में माधो सिंह के मृत शरीर का हरिद्वार में दाह संस्कार किया गया। मृत शरीर को परिरक्षित /preserve  रखने का यह विधि शायद सदियों से चल रही होगी। बहुत से समय राजाओं व बादशाहों के मृत शरीर को कुछ दिनों बाद जलाया या दफनाया जाता था तो कोयले की धूल व तेल में भुने कपड़ा लपेट कर मृत शरीर पर संलेपन कर शरीर को परिरक्षित रखा जाता होगा।
  वामन सोमनारायण दलाल अपनी पुस्तक (A History of India : from earliest Times , Vol.1, page 96, 1914) उल्लेख करते हैं कि सूर्यवंशी निमि जब श्राप से मरा  तो उसके शरीर को परिरक्षित हेतु तेल व लाख से संलेपित किया गया। यह विधि माधो सिंह भंडारी  काल में भी सफल विधि थी।


           पृथ्वीपति शाह द्वारा पश्चिम क्षेत्र की रक्षा

       नकट्टी  राणी के समय शाहजहां की सेना ने दून प्रदेश व रवाईं पर अधिकार कर लिया था और फिर उसके सेनापति ने श्रीनगर की ओर कुछ किया था।  ढांगू गढ़ के निकट बंदर भेळ से उसे भागना पड़ा और नजीबाबाद भागना पड़ा।
          मुगलों ने तीन बार आक्रमण किया।  कुमाऊं व सिरमौर राजाओं व मुगलों  के सम्मलित छल कपट के सामने भी गढ़वाल देस सुरक्क्षित रहा। पश्चिम सीमा की रक्षा हेतु पृथ्वीपति शाह ने सिरमौर पर आक्रमण किया व जीता जो बाद में संगठित हिमाचली राजाओं ने वापस ली।  किन्तु इससे पश्चिम सीमा सुरक्षित हो गयी व शाहजहां या अन्य मुगल  शासक फिर कभी गढ़वाल पर आक्रमण का साहस न कर सके। राजनैयिक चतुराई से भाभर को भी वापस मुगलों  से लिया गया  ।
       मेदनी शाह  शाहजहां दरबार में
  इतिहासकार मानते हैं कि दारा शुकोह के आमंत्रण पर पृथ्वीपति पुत्र मेदनीशाह मुगलों से संधि हेतु दिल्ली दरबार में उपस्थित हुआ।  शाहजहां ने भेंट दीं और अपने दूत ऐधी  को श्रीनगर भेजा। शाहजहां ने सभी विजिट प्रदेश वापस गढ़वाल को दे दिए
ऐधी का श्रीनगर में स्वागत किया गया व उसे भेंट दी गयी।

        दारा पुत्र सुलेमान शुकोह का श्रीनगर में शरण
   शाहजहां के  बीमार पड़ने पर जब औरंगजेब ने अपने पिता शाहजहां को वाद में भाइयों को भी कैद कर लिया व दारा लाहौर को ओर भाग गया (1658 ) तो उस समय दारा पुत्र सुलेमान शिकोह इलाहाबाद में था।   उसके सलाहकार जय सिंह की सलाह पर उसने गढ़ राज में शरण ली।  14 जून 1658 सुलेमान शिकोह इलाहाबाद से नगीना पंहुचा व बाद में चंडीघाट पंहुचा जहां उसे गंगा पार करने  मिलीं।  कुछ दिन वह वहीं डेरा लगा कर रहा।  वहां से संभवतः उदयपुर पट्टी में आमसौड़ पंहुचा जहां उसे पृथ्वीपति शाह मिला।  पृथ्वीपति ने उससे सेना छोड़कर श्रीनगर आने की सलाह दी।  कुछ दिन वः नहीं गया किन्तु अंत में उसे निस्सहाय ही श्रीनगर जाना पड़ा। सुलेमान शिकोह अगस्त 1658 में श्रीनगर पंहुचा।
     मुगल सेना ने भाभर व दून के कुछ भागों पर अधिकार कर लिया व पड़ोसी राजाओं ने भी आक्रमण किये किन्तु पृथ्वीपति शाह ने शरणागत को वापस औरंगजेब को नहीं सौंपा।
       इस दौरान राजकुमार मेदनी शाह ने अपने पिता से शासन छीन लिया।  पृथिवीपति शाह की मृत्यु 1664 में हुयी।
         
         राजनैयिक पर्यटन

छिट  पुट  व बड़े आक्रमण से वास्तव में  राजनयिक पर्यटन भी बढ़ता है।  औरनंगजेब ने सुलेमान शिकोह को वापस लेने हेतु पृथ्वीपति शाह को समझाने बुझाने के लिए केवल आक्रमण का सहारा नहीं लिया अपितु राजनैयिक दूतों की भी सहायता ली याने डिप्लोमेटिक टूरिज्म भी चलता रहा।

                   युद्ध नई चिकत्सा विधि भी जन्मता है
    मनुष्य ने यदि कोई पाप किया है तो वः जघन्य पाप युद्ध।  है किन्तु यह एक आवश्यक बीमारी बन चुकी है।
     छोटी झड़प हो या वर्षों तक चलने वाले युद्ध सभी युद्ध चिकित्सा विधि विज्ञानं में निरंतरता वृद्धि करते हैं या कई नए आविष्कार करते हैं। गढ़वाल पर आक्रमण हुए या गढ़वाल ने आक्रमण किये दोनों स्थिति में चिकित्स्क भी साथ गए होंगे।  युद्ध में वीर रस  गीत गाने वाले भी मनोचिकित्स्क का काम करते थे। 

       आयुर्वेद व यूनानी औषधि तंत्र का आदान प्रदान
     
      दारा शिकोह द्वारा संस्कृत उपनिषदों का अरबी में अनुवाद का आठ है कि दारा शिकोह के पास संस्कृत व आयुर्वेद शास्त्री भी थे।  आयुर्वेद व यूनानी विचारों व विधयों का ादाम प्रदान भी दारा की बुद्धिजीवी सभाओं में अवश्य होता रहा होगा।
  1638 में हकीम अमनउल्लाह खान ने यूनानी हकीमों और आयुर्वेद वैद्यों द्वारा  चिकित्सा विधयों को संकलित किया था जो दो शास्त्रों के संश्लेषण हेतु महत्वपूर्ण कार्य माना गया था।

          दारा के सम्मान में चिकित्सा पुस्तक रचना

  शाहजहां के सभासद यूनानी चिकित्सा शास्त्री ने दारा शिकोह के सम्मान में 'तिब्ब -ए -दारा शिकोही' संकलित  किया जिसमे अकबर जहांगीर व शाहजहां काल में चिकित्सा शास्त्रियों की सफल चिकत्साों  का ब्यौरा है।

    कहा  जाता है गुरु हर राय ने दारा  शिकोह की चिकित्सा की थी जिसमे मोती पीसकर दवाई बनाई गयी थी।  तातपर्य है कि  चिकित्सा में खनिजों का उपयोग भी इस काल में खूब प्रचलित हुआ।


        रस शास्त्र परिचय  (रसायन शास्त्र )


  यद्यपि धातुओं का औषधियों में प्रयोग चरक संहिता आदि में भी है किन्तु आठवीं सदी के पश्चात रस शास्त्र के विकास में नवीं सदी में आदि गुरु शंकराचार्य के शिष्य गोविन्द भागवद पद ने 'रस हृदय तंत्र' की रचना कर धातुओं का आयुर्वेद में प्रयोग को शीघ्रता पूर्वक बढ़ाया।  रस हृदय तंत में पारे के प्रयोग का विवरण है। यूनानी चिकत्स्कों से मेल जॉल व यूनानी चिकित्सा से प्रतियोगिता ने  आयुर्वेद में धातु भष्मों के प्रयोग को बढ़ाया।

रस शास्त्र औषधि बनाने , उन्हें सुरक्षित रखने की कला भी निर्देशित करता है।

  रस बागभट्ट रचित  (तेरहवीं या सोलहवीं सदी ) 'रसरत्नसम्मुच्चय ' आयुर्वेद में धातु प्रयोग की क्रांतिकारी व उत्प्रेरक ग्रंथ है।

माधव उपाध्याय ने 16 -17 वीं सदी में रस चिकित्सा में जितना भी अधिप्रमाणित साहित्य उपलब्ध हो सकता था उस साहित्य को संकलित कर 'आयुर्वेद प्रकाश ' का संकलन व सम्पादन किया।  आश्चर्य है कि इस ग्रंथ केबाद  रसशास्त्र पर कोई क्रांतिकारी व बृहद नई पुस्तक नहीं संकलित हई।

    आयुर्वेद के साथ बड़ी दुर्घटना यही हुयी कि अशोक काल से ही शासकों ने आयुर्वेद शास्त्र की सर्वथा अवहेलना की और आयुर्वेद शास्त्र समाज व विद्वानों के बल पर आज भी जीवित है।  वर्तमन में बाबा रामदेव के कारण आयुर्वेद चर्चा में है तो उसका श्रेय शासन  अपितु एक संस्कृति को जाता है।


       रस शास्त्र और उत्तराखंड

     

गढ़वाल -कुमाऊं में स्वर्ण चूर्ण , ताम्र खानें , लौह खानें , गंधक होने से, बांस से सिलिकॉन , विष , लाख  आदि  भूतकाल से ही निर्यात होता रहा है साथ में तिब्तीय सुहागे का बिक्री केंद्र भी रहा है। इसका तातपर्य है कि खनिज कर्मियों व निर्यातकों को रस शास्त्र ( रसायन शास्त्र आदि ) का भरपूर ज्ञान था।  यह ज्ञान स्वयमेव पहाड़ों में भी फैला होगा।  सिद्ध व नाथ गुरुओं ने भी रस शास्त्र का उपयोग उत्तराखंड में किया होगा।

           केदारनाथ का शैव केंद्र होने से पारा रस विज्ञान विकास या ज्ञान प्रसारण  की संभावना को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है।


    हरिद्वार : रस शास्त्र विद्या आदान प्रदान केंद्र


   गंगा द्वार , मायापुरी या हरिद्वार (कनखल ), मयूरध्वज (वर्तमान बिजनौर ) प्राचीन काल से ही हिन्दू साधुओं , विद्वानों , नाथ व बुद्ध सिद्धों , जैन साधुओं का अध्ययन व पर्यटन केंद्र रहा है। आकलन कर सकते हैं कि सनातनी विद्या , बौद्ध विद्याएं व रस विज्ञान विद्या  का आदान प्रदान   हरिद्वार में प्रत्येक युग में होता रहा होगा। गढ़वाल कुमाऊं में भी रस सिद्धांत प्रसारण में हरिद्वार , मयूरध्वज का महत्वपूर्ण स्थान रहा ही होगा। 



Copyright @ Bhishma Kukreti   22/3 //2018



ourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी ...

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -4
-


  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;


Bhishma Kukreti



मेदनी शाह काल में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म के तंतु

Uttarakhand medical Tourism in Medanishah Period
(  में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -50

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -  50               

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--155 )   
    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 155


    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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इतिहास लेखकों के अनुसार मेदनीशाह का शासन काल 1660 -1684 माना जाता है और उसने अपने पिता से शासन छीना था।  क्या औरंगजेब जैसी नेथ उस समय पहाड़ में फ़ैल चुकी थी ? मेदनीशाह काल गढ़वाल में पर्यटन व यात्रा दृष्टि से हलचल भरा था।

         रामसिंह का श्रीनगर आगमन


    औरंगजेब ने अपने भतीजे सुलेमान शाह को लौटाने हेतु सभी छल , प्रभोलन, भय दाता कार्य किये। औरंगजेब ने देहरादून व भाभर छीन लिया था।  कई राजनैयिक वार्ताएं चलीं। तब जाकर मेदनीशाह सुलेमान शाह को सौंपने तैयार हुआ।  12 दिसंबर  1660  को औरंगजेब ने जय सिंह के पुत्र राम सिंह को भाभर से सुलेमान को पकड़ कर लाने का आदेश दिया।  रतूड़ी अनुसार रामसिंह श्रीनगर आया और  पृथ्वीपति शाह से भी मिला था।  राम सिंह -मेदनीशाह के षडयंत्र भांपकर सुलेमान ने तिब्बत भागने का भी प्रयत्न किया था।

   मुस्लिम गाथा लेखक व मौलाराम अनुसार श्रीनगर नहीं आया था।  उनके अनुसार सुलेमान को लेकर मेदनीशाह भाभर पंहुचा और 27 दिसंबर 1660  के दिन राम सिंह को सुलेमान शिकोह को सौंपा।  2 जनवरी 1661  को राम सिंह व अन्य मनसबदारों के साथ दिल्ली ंहुचा। कुछ गाथा लेखकों अनुसार मेदनी शाह भी दिल्ली पंहुचा था।

     वास्तव में औरंगजेव ने तुरंत दून प्रदेश वापस नहीं सौंपा था। औरंगजेव की आज्ञा अनुसार मेदनीशाह ने बुटोल गढ़ जीता और औरंगजेब को सौंपा। मेदनीशाह दिल्ली पंहुचा व तब औरंगजेब ने दून परदेह वापस किया।

      लोककथाओं  में पुरिया नैथानी का दिल्ली दरबार में दर्शन देने की बात कही जाती है किन्तु इतिहास में कोई साक्ष्य नहीं है।


       मेरी गंगा ह्वेलि मेरी पास आली


     एक बार कुम्भ में मेदनीशाह हरिद्वार गया।  प्रथा  अनुसार ब्रह्मकुंड में सर्व प्रथम स्नान गढ़ राजा करता था।  इस बार बहुत से राजाओं ने परिरोध किया और गढ़वाल राजा से पहले स्नान की योजना बनाई।  मेदनीशाह चंडीघाट में था।  उस रात मेदनीशाह ने कहा 'मेरी गंगा ह्वेलि मेरा पास आली ' .कहते हैं गंगा ब्रह्मघाट छोड़कर चंडीघाट की और बहने लगी।

     लगता है उस साल ऋषिकेश में कोई भयंकर भूस्खलन हुआ होगा जिससे  गंगा का रास्ता बदल गया होगा।  मेदनी शाह काल में हरिद्वार कुम्भ मेला  1664 , 1676 , 1688 में हुए होंगे। सुजन राय रचित 'खुलसत -उत   -तवारीख'' (1695 ) में उल्लेख है कि हर वर्ष बैसाखी में हजारों लोगों द्वारा आगरा सूबा के तहत हरिद्वार में स्नान व हर बढ़ साल में हरिद्वार कुम्भ मेला का वर्णन मिलता है जिसमे दूर दूर कोने कोने से लाखों तीर्थ यात्री भाग लेते थे।  हरिद्वार में पिंड दान , अस्थि विसर्जन का भी उल्लेख उपरोक्त ग्रंथ में है।

     

        गुरु रामराय का देहरादून आगमन


  गुरु राम राय को सिक्खों द्वारा गुरु पद न दिए जाने के कारण विद्रोह कर औरंगजेब से साथ मित्रता  करनी पड़ी व अंत में सन 1875 गढ़वाल के दून प्रदेश में खुड़बुड़ा गाँव में डेरा डालना पड़ा। 



Copyright @ Bhishma Kukreti  23 /3 //2018

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उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी ...

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -4
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  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;


Bhishma Kukreti



हरिद्वार  परिपक्ष्य में 1600 -1700 मध्य चिकत्सा वर्णन

Medical Tourism from 1600-1700 in context Haridwar
(  शाह काल में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -51

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -  51                 

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--156 )   
    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 156


    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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           बादशाह औरंगजेब के शासन में विशेष यूनानी चिकित्सक

बादशाह औरंगजेब के शासन काल में यूनानी औषधि तंत्र में विकास हुआ।  औरंगजेबी ने कई औषधालय , शरबतआलाय खुलवाए। औरंगजेब की राजसभा  में निम्न प्रमुख यूनानी चिकित्स्क थे -
हकीम अद -अल -रजक मशरब इस्फ़हान से औरंगजेब की सभा में आया था।
हकीम मुहमद अमिन शिराजी प्रसिद्ध हकीम था और उसका बड़ा  सम्मान था।
हकीम अलवाई खान का जन्म शिराज में हुआ था और 1700 ई में औरंगजेब की सभासद में सम्मलिता हुआ।
हकीम शेख शिराजी औरंगजेब के समय भारत में आया था और औरंगजेब पुत्र शाह आजम खान काल में प्रसिद्धि पायी।
हकीम दाऊद इस्फ़हान से औरंजेब काल में आया था व शाह अब्बास की राजसभा में प्रमुख सभासद व चिकित्स्क था।
फ़्रांसिसी चिकित्स्क जो पहले दारा सिकोह का व्यक्तिगत चिकित्स्क था बाद में औरंगजेब की सभा में चिकित्स्क रहा।

नरुल हक सिरहिंदी ने प्लेग विषय पर 'ऐनल हयात ' पोथी रची।

चिकित्स्क मुहम्मद अकबर अरजानी  (सत्रहवीं सदी अंत -अट्ठारहवीं सड़े प्रारंभिक काल ) ने तेरहवीं सदी की जुब्बुद्दीन समरकंदी की चिकत्सा पोथी का अनुवाद किया और कुनुन्चा की औषधि पुस्तक पर टीका लिखी। अरजानी ने कई अन्य पुस्तक भी लिखीं जैसे -तिब्ब -ए  -अकबर , मीजान -ए तिब्ब ,क़ुरबुद्दीन -ए -कादरी , मुफ़रीह -अल -क़ुतुब , मुजरब्बत -ए -अकबरी , हुदूद -ए -अमराज , तिब्ब -ए -हिंदी

काजी मुहम्मद आरिफ ने तिब्ब -ए -काजी आरिफ 'पोथी की रचना की।


         सत्रहवीं सदी में रचित आयुर्वेद निघण्टु


सत्रहवीं सदी में निम्न आयुर्वेदिक निघंटुओं  की रचना हुईं  -

लोलिम्बराज कृत -वैद्यवातम्सा अथवा वैद्य जीवन

केशव का कल्पद्रिकोष

त्रिमलभट्ट का द्रव्यगुण शतक व द्रव्य दीपिका

सूर्य कृत चूड़ामणि निघण्टु

माधवकारा  कृत पर्यायरत्नावली

हरिचरण सेन कृत पर्यायमुक्तावली जो पर्यायरत्नावली का परिमार्जित  ग्रंथ लगता है


भारत में अन्य भाषाओँ में आयुर्वेद पर गन्थ रचे जा रहे थे जैसे  पंद्रहवीं सदी में आचार्य बल्लभाचार्य ने तेलगु  भाषा व संस्कृत में वैद्यचिंतामणि गंथ की रचना की


Copyright @ Bhishma Kukreti   24/3 //2018

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                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -4
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Bhishma Kukreti




  मेरे सपनों का गैरसैण: मेडिकल टूरिज्म की अलकापुरी !


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स्वप्नदृष्टा - भीष्म कुकरेती  (विपणन आचार्य )
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   वर्तमान में पहाड़ी भळक (बाढ़ ) जैसे ही पर्वत में उत्तराखंड राजधानी हेतु आंदोलन में गति दिख रही है।  यद्यपि अधिकतर शहरी उड्यार वासी ही इस आंदलोन में दृष्टिगोचर  हैं जिनमे बहुत जन दशाब्दियों से अपने गाँव नहीं गए और उन्हें  ज्ञान भी नहीं उनका गाँव है कहाँ। उत्तराखंड प्रेम ही ऐसा है।
      मैंने जब कुछ राजधानी  अलखजगांदरों से पूछा कि  गैरसैण तो उचित है किन्तु राजधानी कैसी होनी चाहिए तो अधिसंख्य का गुन गुन भौण  में उत्तर था बल पहले घोषित तो हो जाय तत्पश्चात चिंता -चिंतन करेंगे।  जो कृषि को नहीं जानते वे ही ऐसा उत्तर देते हैं।

           राजधानी आजीविकादायी होती है
    संसार में व्ही राजधानी सर्वोचित राजधानी मानी जाती है जो रहवासियों को अराजकीय स्तर पर आजीविका दे सके।  गैरसैण आंदोलन के सैण -मैस -गोशी तो राजकीय आजीविका व राजकीय सहायता को ही विकास मानते हैं और बिसर जाते हैं बल पहाड़ी गाँवों में वाहनपथ , जल , विद्युत् पंहुच गया है किन्तु विकास नहीं क्योंकि राजकीय वित्तीय सहायता (सब्सिडी ) से विकास नहीं आता है।  यदि सब्सिडी से विकास संभव होता तो साम्यवादी देस निर्धन न होते और बंगाल , केरल निर्धन प्रदेश न होते।
      तातपर्य है कि नव राजधानी का औचित्य तभी है जब राजधानी अपनी शक्ति से आजीविका दे सके।  आजीविका हेतु कृषि , कल कारखाने या सेवा उद्यम ही साधन हैं।  इनमे से १० किलोमीटर के वृत्त में गैरसैण में कुछ नहीं हो सकता है।  अर्थात पर्यटन  व अन्य सेवायें ही आजीविका जनक हैं।

     अग्नि पर पूर्णबंदी
  गैरसैण में 10 किलोमीटर वृतीय क्षेत्र में किसी भी कार्य यहां तक कि भोजनार्थ अग्नि जलन , पेट्रोल चलित बाहनों पर बिलकुल रोक होनी चाहिए। सर्व कार्य सौर ऊर्जा या अन्य वैकल्पिक ऊर्जा प्रबंधन से होंगे।

         चिकत्सा पर्यटन सर्वहितकारी पर्यटन

इसमें दो राय नहीं हो सकती हैं बल गैरसैण को संसार प्रसिद्ध चिकित्सा स्थल निर्माण होने से ही सपनो की राजधानी सिद्ध होगी। इसके लिए अभी से निम्न कदम आवश्यक हैं
अराजकीय उच्चस्तरीय  ऐलोपैथी औषधि महाविद्यालय
अराजकीय उच्चस्तरीय  आयुर्वेद औषधि महाविद्यालय
अराजकीय उच्चस्तरीय  यूनानी  औषधि महाविद्यालय
अराजकीय उच्चस्तरीयीय   होमिओपैथी  औषधि महाविद्यालय
अराजकीय उच्चस्तरीय स्त्री चिकत्सा परिचारिका  प्रशिक्षण विद्यालय
अराजकीय उच्चस्तरीय नर चिकित्सा परिचारिका   प्रशिक्षण विद्यालय
अराजकीय उच्चस्तरीय चिकत्सालय यंत्र तंत्र   प्रशिक्षण विद्यालय
अराजकीय उच्चस्तरीय चिकत्सा कम्प्यूटर व सॉफ्टवेयर   प्रशिक्षण विद्यालय
उपरोक्त चिकित्सालयों के अतिरिक्त निम्न भी चिकत्सालय आवश्यक हैं -
अराजकीय उच्चस्तरीय   ऐलोपैथी चिकित्सालय
अराजकीय उच्चस्तरीय  आयुर्वेद चिकित्सालय
अराजकीय उच्चस्तरीय  यूनानी चिकित्सालय
अराजकीय उच्चस्तरीय  होमेओपेथी चिकित्सालय
विशेष पर्यटन आकर्षी चिकित्सालय जैसे हृदय ओप्रेसन चिकित्सालय
मनोरोगी चिकित्सालय
  कम से कम विश्व स्तरीय 100 नर्सिंग होम्स
    उपरोक्त को संबल देने हेतु निम्न अराजकीय संस्थान भी आवश्यक हैं -
1o योग केंद्र
2 विपासना केंद्र
10 स्पा होटल्स
कई विश्व स्तरीय होटल्स
परिहवन  सेवायें
उपरोक्त संस्थाओं हेतु मकान , शिक्षा , आधारभूत सुविधाओं का निर्माण व बाजार  निर्माण

उत्तराखंड सरकार में पृथक  मेडिकल पर्यटन मंत्रालय

      उत्तराखंड सरकार में पृथक  मेडिकल पर्यटन मंत्रालय भी आवश्यक है जो निम्न कार्य करे -

अराजकीय संस्थानों को संस्थान खोलने हेतु काय करे और प्रशासनिक झंझटों जुगाड़ , लालफीताशाही दूर करे
  एक  मेडिकल टूरिज्म बैंक की स्थापना कर चिकित्सा पर्यटन हेतु छोटे छोटे उद्यमों को वित्तीय प्रबंधन का प्रबंध करे
  हर जनपद में मेडिकल टूरिज्म ट्रेनिंग सेंटर्स खोले जायँ
   
      मेरे सपनों का गैरसैण: मेडिकल टूरिज्म की अलकापुरी ! श्रृंखला - ... 2

Dream Uttarakhand Capital Gairsain; Dream Uttarakhand (Himalaya )Capital Gairsain; Dream Uttarakhand  (North India) Capital Gairsain; Making Gairsain a Medical Tourist Destination ; Ayurveda Hospitals in Gairsain; Allopathic Hospitals in Gairsain; Homeopathy Hospitals in Gairsain;








Bhishma Kukreti

मेरे सपनों का गैरसैण:  हॉस्पिटलिटी मैनेजमेंट विश्वविद्यालय स्थापना   !

(Making Gairsain a world Famous Medical Tourist Destination)
मेरे सपनों का गैरसैण: मेडिकल टूरिज्म की अलकापुरी ! श्रृंखला - .. 2
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(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--157 )   
    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 157
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स्वप्नदृष्टा - भीष्म कुकरेती ( विपणन आचार्य )

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  किसी भी टूरिस्ट डेस्टिनेशन प्रसिद्धि हेतु केवल एक प्रोडक्ट या एक कॉन्सेप्ट की पर्याप्त  होता  अपितु अन्य प्रोडक्ट्स व विचारों की भी आवश्यकता पड़ती है। गैरसैण को यदि विश्वस्तरीय राजधानी बनाना है तो गैरसैण के 10 किलोमीटर वृत्त में कई अन्य टूरिस्ट प्रोडक्ट्स भी आवश्यक हैं.
   गैरसैण में एक विश्वस्तरीय हॉस्पिटलिटी मैनेजमेंट विश्वविद्यालय उतना ही आवश्यक है जितना उत्तराखंड को गैरसैण राजधानी की आवश्यकता है।
     विश्वस्तरीय आतिथ्य प्रबंधन विश्वविद्यालय में समाज शास्त्र , मनोविज्ञान , एप्लाइड साइंस , फ़ूड ऐंड  बिवरेज , होटल मैनेजमेंट , कृषि विक्री मैनेजमेंट , विभिन्न मैनेजमेंट विषय, मार्केटिंग  आदि विषय तो होंगे ही साथ  में अनुसंधान केंद्र भी आवश्यक है।
       विश्वस्तरीय आतिथ्य विश्वविद्यालय में उत्तराखंड के छात्र ही नहीं , देस व विदेशों से भी छात्र आने आवश्यक हैं।  कम से कम 50 % छात्र विदेशौं से आएं तभी इस विश्वविद्यालय का औचित्य है। विश्वस्तरीय हॉस्पिटलिटी मैनेजमेंट विश्वविद्यालय  का मुख्य उद्देश्य शिक्षा पर्यटन को विकसित कर उत्तराखंड को शिक्षा निर्यात का श्रेष्ठतम  केंद्र बनान  होगा।
   गैरसैण में विश्वस्तरीय हॉस्पिटलिटी मैनेजमेंट विश्वविद्यालय उत्तराखंड पृतन का ब्रैंड अम्बेसडर ही होगा।
    मेरी राय है कि स्विटजर लैंड के किसी सम्मानित विश्वस्तरीय हॉस्पिटलिटी मैनेजमेंट  संस्थान के साथ अन्य भारतीय वित्तीय निवेशक को साथ लेकर गैरसैण में विश्वस्तरीय हॉस्पिटलिटी मैनेजमेंट विश्वविद्यालय खोला जाना चाहिए। उत्तराखंड शासन को भूमि , जल आदि का प्रबंध करने के अतिरिक्त बाकी प्राइवेट संस्थानों को विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय खोलने का प्रबंध करना चाहिए।

   
     

Copyright@ Bhishma Kukreti
मेरे सपनों का गैरसैण: मेडिकल टूरिज्म की अलकापुरी ! श्रृंखला - ..
Dream Uttarakhand Capital Gairsain; Dream Uttarakhand (Himalaya )Capital Gairsain; Dream Uttarakhand  (North India) Capital Gairsain; Making Gairsain a Medical Tourist Destination ; Ayurveda Hospitals in Gairsain; Allopathic Hospitals in Gairsain; Homeopathy Hospitals in Gairsain; Ethnic Food Marketing Research Center, Gairsain

Bhishma Kukreti


फतेशाह -उपेंद्र शाह शाह काल (1684 -1750 ) में प्रभावी पर्यटन स्थलों की स्थापना

Uttarakhand Medical Tourism in Shah Period
(  फतेशाह काल में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -52

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -  52                 

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--159 )   
    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 159


    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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अधिकतर गढ़वाल शासक फतेशाह का काल (1684 -1749 ) व उपेंद्र शाह का काल 1749 -1750 माना जाता है। इस काल में कई घटनायें  उत्तराखंड पर्यटन को आज तक प्रभावित कर रही हैं।

जटाधर मिश्र कृत -फतेशाहप्रकाश '- जटाधर मिश्र ने फ्तशाहप्रकाश नामक ज्योतिष ग्रंथ रचा।

गुरु राम राय को भूमि दान - फतेशाह ने गुरु राम राय को खुड़बुड़ा , राजपुर , चामासारी गांव प्रदान किये और उसके पौत्र प्रदीपशाह ने धामावाला , धुरत वाला , मिंया वाला व पंडितवाड़ी ने ग्रामदान दिए। धामावाला से ही देहरादून शहर बसने की प्रक्रिया शुरू हुयी।

श्रीनगर में गुरु मंदिर -गुरु राम राय प्रायः श्रीनगर में निवास करते थे। फतेशाह ने श्रीनगर में गुरुमंदिर निर्माण किया था जो संभवतया बिहंगनी बाढ़ में बह गया था।

गुरु दरबार निर्माण -गुरु राम राय की विधवा माता पंजाब कौर ने गुरु शिष्य अवध दास व हरसेवक दास की सहायता से गुरु दरबार निर्माण किया।  गुरु दरबार जहांगीर मकबरे की नकल पर आधारित है। उत्तराखंड में मुगल शैली का पहला भव्य वास्तु उदाहरण है गुरु राम राय दरबार।  वर्तमान में गुरु राम दरबार देहरादून का प्रमुख पर्यटन केंद्र है।
गुरु गोबिंद सिंह के चेलों का आतंक - गुरु गोबिंद सिंह बिलासपुर में निवास करते थे। पश्चिम गढ़वाल पर गुरु गोबिंद सिंह के चेले हमेशा आतंकी हमला कर गढ़वाल की जनता को लूटा करते थे जो अग्रेजों के आगमन तक होता रहा।
फतेशाह पांवटा में - गुरु गोबिंद सिंह की मध्यस्ता में फतेशाह व सिरमौर नरेश
  फतेशाह  की पुत्री विवाह में गुरु गोबिंद सिंह के  अड़ंगे  ने आगे युद्ध की तयारी करवाई।
पर्वतीय राजाओं का गुरु गोबिंद सिंह के बिरुद्ध तीन युद्ध हुए जिसमे फतेशाह ने भी भाग लिया।  गुरु गोबिंद सिंह ने विचित्र नाटक में फतेशाह की मृत्यु का सरासर झूठा वर्णन किया है।
  फतेशाह कई सीमाओं से उलझा रहा और पड़ोसियों से युद्ध हुए।
गुरु गोबिंद सिंह के कथन कि उसने हेमकूट सप्तश्रृंग ,गढ़वाल में पिछले जन्म में तपस्या की थी तो उसके मरणोपरांत सिखों गुरुद्वारा की नींव रखी।  जो आज गढ़वाल का एक प्रसिद्ध पर्यटन क्षेत्र में बदल गया है।
   लोककथाओं में गढ़ मंत्री पुरिया नैथाणी दिल्ली दरबार में हाजिर हुआ था।  किन्तु कोई प्रमाण नहीं मिलते हैं।

   भूषण कवि का आगमन -भूषण कवि गढ़वाल राजधानी आया था और सीरी नगर राजा की प्रशसा में कवित्व किया था। (शिवराज भूषण चंद 249 )

कवि मतिराम का आगमन -   

कवि मतिराम ने अपने वृत्तकौमदी में फतेप्रकाश की प्रशंसा की है मतिराम ने यह ग्रंथ मौलराम के पिता मंगतराम को समर्पित किया था।

रतन कवि क्षेमराज का आगमन - रतन कवि क्षेमराज ने फतेप्रकाश की रचना श्रीनगर में की।

गोकुलनाथ जगन्नाथ मिश्र आगमन - संस्कृत विद्वान् कुछ दिन श्रीनगर में रहे।  उनके रचे ग्रंथ सेंट पीटरस्बर्ग पुस्तकालय में सुरक्षित हैं।


  राजसभा में नवरत्न - फतेशः की राजसभा में सुरेशा नंद बड़थ्वाल , रेवतराम धस्माना , रुद्रिदत्त किमोठी , हरी दत्त नौटियाल , बास्बा नंद बहुगुणा , शशिधर डंगवाल ,सहदेव चंदोला , कीर्तिराम कैंथोला तथा हरिदत्त थपलियाल विद्वान् थे।

फतेशाहयशोवर्णन - फतेशाह के राजकवि विद्वान् रामचंद्र कंडियाल ने 1665 में इस काव्य ग्रंथ की रचना की थी।

   चित्रकारों को प्रश्रय - फतेशाह ने कई चित्रकारों जैसे ंगतराम को राज प्रश्रय दिया था।  मौलारम मंगतराम का पुत्र था।

   संगीतप्रेमी -फतेशाह संगीत प्रेमी था अतः  अवश्य ही मुस्लिम संगीतकारों का श्रीनगर आना जाना रहा होगा।


          गढ़वाल की छवि वृद्धि


   उपरोक्त तथ्यों के विश्लेषण से सिद्ध है कि  फतेशाह काल में गढ़वाल की छवि प्रसारण दूर दूर तक हुआ व दो प्रसिद्ध धार्मिक पर्यटक स्थलों -गुरु राम राय दरबार और हेमकुंड साहिब (बाद में ही सही ) की स्थपना हई।  ये दोनों स्थल गढ़वाल को आज भी अंतर्राष्ट्रीय छवि दिलाते हैं।


  मुगल काल में  आयुर्वेद शिक्षा

     औरंगजेब काल में फ़्रांस का फ्रांकोइस बर्नियर भारत आया था।  बर्नियर दारा शिकोह का व्यक्तिगत चिकित्स्क रहा फिर औरंगजेब की सभा में चिकित्स्क रहा। बर्नियर ने अपने संस्मरण लिखे थे -जैसे न्यू डिवीजन ऑफ  अर्थ व ट्रैवेल्स इन द मुगल ऐम्पायर।

    बर्नियर ने मुगल काल में भारत में हिन्दुओं द्वारा शिक्षा पर भी प्रकाश डाला है।  बर्नियर अनुसार हिन्दू  विद्यालय मंदिरों में ही थे।  शिक्षा हेतु कोई आधारभूत नियम न थे। कोई प्रकाशित पुस्तकें न थीं।  पंडित पुराण आदि की शिक्षा देते थे।

    उच्च शिक्षा के विश्वविद्यालय सारे भारत में बिखरे थे।  मुख्य  शिक्षा केंद्र -बनारस , मथुरा ,नादिया , मिथिला , तिरहुत , पैठण , कराड , ठट्टे , मुल्तान थे।

    बनारस व नादिया की अधिक प्रसिद्धि थी।

    इन उच्च शिक्षा केंद्रों में भी औपचारिक शिक्षा व्यवस्था तो नहीं थी किन्तु व्यक्तिगत अध्यापक शिक्षा देते थे।

  इन शिक्षा केंद्रों में व्याकरण , दर्शन ,इतिहास , काव्य , खगोल विज्ञान , ज्योतिष , गणित , मानव आयुर्विज्ञान , जंतु आयुर्विज्ञान की शिक्षा दी जाती थी।

      चूँकि आयुर्विज्ञान हेतु कोई औपचारिक विशेष शिक्षा (Specialized ) व्यवस्था न थी उपनिषद व्यवस्था के तहत जिस विद्यार्थी को आयुर्विज्ञान रुचिकर था वह विद्यार्थी अपना आयुर्वेद का गुरु खोजकर उससे आयुर्वेद अध्ययन कर लेता था।  वैसे विद्यार्थी सभी विषयों की शिक्षा ग्रहण करते थे जिसमे मानव व जंतु आयुर्विज्ञान भी सम्मलित थे।  यही कारण है कि भारत में सन 1970  तक सर्वत्र कर्मकांडी ब्राह्मण ही आयुर्वेद चिकित्सक भी होता था।  कुछ कर्मकांडी ब्राह्मण आयुर्वेद में अधिक रूचि लेते थे  तो वे आयुर्वेद औषधि शोधन को मुख्य व्यवसाय बना लेते थे और वैद के नाम से प्रसिद्ध हो जाते  थे।  ग्रामीण व्यवस्था में कर्मकांडी ब्राह्मण अपने बालकों को घर में ही उपरोक्त सभी विद्याओं का ज्ञान कराते थे व इस तरह परम्परागत रूप से आयुर्वेद जीवित रहा व सदियों तक चलता रहा।

     मुगल शासन का प्रभाव अधिकतर शहरों में रहा।  हिन्दू ग्रामीण समाज तक यूनानी औषधियों का प्रचार प्रसार न होने से समाज ने अपनी व्यवस्था स्थापित  थी जिसमे समाज ब्राह्मणों और आयुर्वेद संबंधी शिल्पकारों के जीवन यापन का स्वतः प्रबंध कर लेता था जिससे आयुर्वेद बिना शासकीय संरक्षण के भी सैकड़ों साल तक जीवित रहा।


गढ़वाल कुमाऊं में आयुर्वेद

       मुगल काल में गढ़वाल कुमाऊं में ब्राह्मणों के बसने का सिलसिला चलता रहा तो ब्राह्मण के द्वारा आयुर्वेद गढ़वाल व कुमाऊं में ज़िंदा रहा।

     गढ़वाल -कुमाऊं में बाहर से कई संस्कृत विद्वान् राजसभाओं में व बद्रीनाथ व अन्य धार्मिक स्थल यात्रा पर आते जाते रहते थे जो स्थानीय विद्वानों को आयरूवेद की नई सूचना भी देते थे जिससे नए ज्ञान का भी आदान प्रदान होता था।  संभवतया इन विद्वानों द्वारा हिमालय की जड़ी बूटियों का ज्ञान मैदानों में प्रसारित होता था।

      जड़ी बूटियों का ज्ञान आयात -निर्यात व्यापारियों से भी प्रसारित होता था।


Copyright @ Bhishma Kukreti  25 /3 //2018

ourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी ...

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -4
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  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;




Bhishma Kukreti


प्रदीप शाह काल (1717 -1772) व ऋषिकेश =देवप्रयाग मार्ग पर चिकित्सा प्रबंध

Uttarakhand Medical Tourism in Shah Dynasty
(  शाह वंश काल में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -53

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -  53                 

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--160)   
    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 160


    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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   किसी भी शाह वंशी राजा ने इतने साल राज नहीं किया जितना प्रदीप शाह ने।  उसके काल को इतिहासकार दो भागों में बांटते है राणी राज और प्रदीप शाह राज।


            राणीराज

   बालक प्रदीप को राज सिंहासन पर बैठाकर उसकी माँ ने राज किया।

  दलबंदी - कुमाऊं की ही तरह जहां विभिन्न सभसद दलों मध्य दलबंदी थी गढ़वाल में भी मेदनीशाह काल से ही राजपूत दल (बाहर से ए राजपूत ) और खस दलों (आदि काल के सैनिक ) में भयंकर दलबंदी चलने लग गयी थी जिसने आगे जाकर गढ़वाल व कुमाऊं को दासता के गर्त में धकेला।  आज भारत में भी भारत को छोड़ स्वार्थ दलबंदी का युग दीख ही रहा है।

  कटोचगर्दी - राणी के शासन में  मेदनीशाह के समय हिमाचल से आये कटोचों की संतानों ने शासन अपने हाथ में ले रखा था और कई अत्त्याचार किये अन्य दल वालों की जघन्य हत्त्या करवाई।  इन्हे बाद में हत्त्या कर मार डाला गया था।

कठैत गर्दी -कटोचों के उत्पाटन के बाद कठैत शासन में दखलंदाजी करने लगे।  कठैतों के अत्त्याचार काल को कठैतगर्दी कहा जाता है

इस काल में कई नए कर लगे और कई करों में बृद्धि हुयी।

सदाव्रत - यात्रियों हेतु मंत्री शंकर डोभाल ने सदाव्रत खोले किन्तु बाद में मंत्री खंडूड़ी ने सदाव्रत बंद करवा दिए।


                प्रदीप शाह शासन

  प्रदीप शाह द्वारा शासन में शासन में चुस्ती  आयी , स्थिरता आयी।

कुमाऊं की सहायता - कुमाऊं पर रोहिला आक्रमण हुआ तो प्रदीप शाह ने कुमाऊं की भरपूर सहायता की और मैत्री संबंध सुदृढ़ किये किन्तु किन्तु कुमाऊं मंत्री शिव दत्त जोशी आदि के कारण दोनों देशों मध्य युद्ध हुआ  फिर मैत्री हुयी। गढ़वाली मंत्रियों ने घूस खाकर राजा के साथ विश्वासघात किया।

दून प्रदेश - 1757 के लगभग दून प्रदेश पर नजीबुददौला ने दून पर अधिकार कर लिया और पुनः 1770 में दून पर गढ़ववली शाशक ने अधिकार किया। नजीब्बुदौला के शासन में दून ने प्रगति की और दून में व्यापारिक मंडी खुली जो व्यापारिक पर्यटन हितकारी सिद्ध हुआ।

इस दौरान दक्षिण गढ़वाल पर रोहिलाओं के छापे निरंतर पड़ते रहे।

मराठों के आक्रमण - मराठे हरिद्वार , सहारनपुर तक पंहुच चुके थे और चंडीघाट -भाभर से होते हुए नजीबाबाद पर उन्होंने आक्रमण किया साथ ही साथ  प्रजा को लूटा। लूटने में किसी भी आक्रमणकारी ने कभी कमी नहीं की।


          स्वचलित।  समाज चलित व शासन चलित पर्यटन प्रबंध

                         

    इस दौरान व भूतकाल में भी गढ़वाल में धार्मिक पर्यटन स्वचलित , समाजचलित व शासन चलित प्रबंध से चलता था। चूँकि तब भारत में व्यापार को निम्न श्रेणी का कार्य समझा जाता था तो शासन का ध्यान यात्राओं से कमाई पर कम जाता था तो शासक जो भी कार्य यात्रियों की सुविधा हेतु करते थे वे धार्मिक व धर्म से फल पाने की इच्छा से करते थे।  मंदिरों की आर्थिक व्यवस्था भूमि दान से व दक्षिणाओं से चलती थी।  यात्रा पथ पर निकटवर्ती ग्रामीण वैद्यों से यात्रियों की चिकत्सा चलती थी।  किन्तु यदि हम सर्यूळ  ब्राह्मणों के इतिहास जो संभवतया आयुर्वेद में अधिक सम्पन थे तो  है कि ब्रिटिश शासन काल से पहले पौड़ी गढ़वाल के हजारों वर्षों से चलते पुराने ऋषिकेश - बद्रीनाथ मार्ग पर व्यासचट्टी या देवप्रयाग तक कोई तथाकथित उच्च वर्गीय ब्राह्मणों का कोई गाँव ही नहीं था।  झैड़ के मैठाणी , व खंड के बड़थ्वाल भी ब्रिटिश काल के बाद ही या कुछ समय पहले बसे होंगे।


                         ऋषिकेश -देव प्रयाग मार्ग में भट्ट या अन्य ब्राह्मण चिकित्स्क


  ऋषिकेश से देवप्रयाग मार्ग पर या आस पास कई गाँवों में ग्राम नाम से उपजी ब्राह्मण जातियां बसी हैं।  जिन्हे उच्च ब्राह्मणों का दर्जा हासिल नहीं था।  क्या ये ब्राह्मण यात्रा मार्ग पर यात्रियों की चिकित्सा करते थे ? ऋषिकेश से देवप्रयाग के मध्य अधिकतर गांव राजपूतों के गाँव हैं और यह भी एक कटु सत्य है कि इन गाँवों में अधिकतर कोई भी राजपूत जाति तथाकथित उच्च राजपूत जाति में नहीं गिनी जाती थी।  ब्रिटिश काल से पहले से ही यात्रा मार्ग पर चट्टी व्यवस्था थी।  यह भी एक अन्य कटु सत्य है कि चट्टी में दुकानदार ब्राह्मण कम ही होते थे अपितु राजपूत अधिक थे।  हाँ श्रीनगर से आगे काला जाति वाले चट्टियों में व्यापार करते थे।

       अब प्रश्न उठता है कि तथाकथित निम्न वर्गीय ब्राह्मण यदि आयुर्वेद जानते थे तो कैसे इन्हे ब्रह्मणों में उच्च पद नहीं मिला ? ब्रिटिश काल में एक प्रथा और चली कि जिस ब्राह्मण जाति के गुरु ब्राह्मण सर्यूळ वह बड़ा ब्राह्मण तो ब्रिटिश काल में सलाण में सर्यूळ बसाये गए जैसे जसपुर ढांगू में बहुगुणा व झैड़ में मैठाणी ,अमाल्डू डबरालस्यूं में उनियाल , उदयपुर में रतूड़ी , थपलियाल आदि। मल्ला ढांगू में नैल -रैंस में बिंजोला भी ब्रिटिश काल में ही बसे होंगे। यह आश्चर्य है कि ना तो बहुगुणा ना ही उनियाल या ना ही रतूड़ियों ने वैदगिरी की।  डबरालस्यूं में डबराल वैदगिरी करते थे।  बडोला, कंडवाल, कुकरेती,  भट्ट ब्राह्मण उदयपुर में वैदकी करते थे।

         यात्रा मार्ग के निकटवर्ती क्षेत्र में ब्रिटिश काल में मल्ला ढांगू में आयुर्वेद चिकित्सा पर किमसार से कुकरेतियों  द्वारा ठंठोली में बसाये गए कण्डवालों का एकछत्र राज रहा।  कंडवाल तल्ला ढांगू व उदयपुर तक चिकित्सा हेतु भ्रमण करते थे। व दूसरे भाग मल्ला ढांगू में बलूणियों का एक छत्र राज था ।  कठूड़ के कुकरेती भी तल्ला ढांगू में चिकत्सा करते थे।  तल्ला ढांगू में व पूर्व  बिछला ढांगू में झैड़ के मैठाणी वैदगिरी संभालते थे तो पश्चिम बिछला ढांगू में खंड गडमोला के बड़थ्वाल वैदकी संभालते थे। ऋषिकेश से शिवपुरी तक शायद भट्ट जाति (सभी जाति सम्मिलित ) वैद चिकित्सा संभालते थे।

     ब्रिटिश काल व बाद में भी व्यासचट्टी से देवप्रययग तक कंडवाल स्यूं पट्टी के  बागी गाँव के भट्ट व खोळा गाँव के भटकोटि जाति वैदगिरी संभालते थे। मैंने झैड़ के  मैठाणी  व खंड के बड़थ्वाल साथियों से सुना है कि चिकित्सा या अन्य सुविधा देने पर यात्री सुई -तागा या अन्य  वह वस्तु देते थे जो गढ़वाल में अप्राप्य थी।  वैसे ब्रिटिश काल में तैड़ी बिछला  ढांगू ) के रियाल भी वैदकी करते थे तो उन्होंने भी यात्रियों को चिकित्सा सहायता दी ही होगी।  हो सकता है बड़ेथ से खंड में बड़थ्वालों के बसने से पहले तैड़ी के रियाल ही बिछला ढांगू में चिकत्सा संभालते रहे होंगे। चूँकि गोरखा राज में बहुत उथल पुथल हुयी व ब्रिटिश राज में कई नए ग्रामों की बसाहट हुयी तो ऋषिकेश से देवप्रयाग तक चिकित्सा प्रबंध का क्रमगत इतिहास मिलना कठिन ही है।  इस लेखक ने कुछ को पूछा भी तो कोई सही तर्कसंगत उत्तर इस क्षेत्र के ब्राह्मणों से नहीं मिला।

ब्रिटिश काल में तो कांडी (बिछला ढांगू ) अस्पताल खुलने  से कई बदलाव आये।

     

 

       


Copyright @ Bhishma Kukreti   26/3 //2018

ourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी ...

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -4
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  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;


Bhishma Kukreti



ललित शाह काल ( 1172 -1781 ) : गढ़वाल -कुमाऊं अवसान के बीजांकुर काल

Uttarakhand Tourism in Lalit Shah Period
(  में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -54

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -  54                 

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--161 )   
    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 1561


    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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  गढ़वाल राजा ललित शाह काल अर्थात कुमाऊं व गढ़वाल देशों के अवसान के दिनों की आधारशिला।  कुमाऊं में मंत्रियों द्वारा विशेषकर जोशियों व राजपूत दलों मध्य  राजा के नाम परोक्ष रूप से राज करने की पर्तिस्पर्धा में ललित शाह फंस गया और दोनों देशों को भविष्य में खामियाजा भुगतना पड़ा।

   बदीनाथ मंदिर में रावल पुजारियों द्वारा पूजा व्यवस्था प्रारम्भ

  ललित शाह के समय बद्रीनाथ व ज्योतिर्मठ की व्यवस्था दंडी स्वामी संभालते थे।  1776 में ललित शाह जब बद्रीनाथ यात्रा पर थे तब दंडी स्वामी रामकृष्ण की मृत्यु हो गयी।  उस समय गोपालनम्बूरी नामक भोग पकाने वाले रसोईया को पुजारी बना दिया गया और उसे डिम्मर गाँव भूदान में दे दिया गया। तब से बद्रीनाथ में रवालों द्वारा पूजा अर्चना शुरू हुयी और ये रावल केरल से  नम्बूदरीपाद , चोली या मुकाणी जाति के ब्राह्मण होते हैं।


      जाबितखान का दून पर आक्रमण

1775 में मुगल बक्शी जाबितखान ने दून पर आक्रमण किया।


  सिखों के आक्रमण

  उसके बाद सिक्खों ने देहरादून को बेरहमी से दो तीन बार लूटा।

    गढ़वाली  सेना के आने से पहले सिख  भाग चुके थे।  गढ़वाली सेना ने सिरमौर  पर आक्रमण किया (1779 ) और पराजित हुयी।


     रुड़की के गुजर और राजपूतों की लूट

   रुड़की -हरिद्वार का डाकू सरदार (लंढौर राजा ) या राजा सदा की तरह देहरादून पर डाका डालता रहता था।


       कुमाऊं के जोशियों के फंदे में फंसना

  ललित शाह कुमउनके जोशियों के जाल में फंसा और उसने अपने पुत्र पद्युम्न शाह का प्रद्युम्न चंद के नाम से कुमाऊं राजा के रूप में श्रीनगर में राजतिलक करवाया /

   बाद में जोशियों के बहकावे में आकर ललित शाह कुमाऊं अभियान शुरू किया। और  ललित शाह ने जोशियों के बुरे बर्ताव सहते सहते दुलड़ी में प्राण त्यागे।



  सहारनपुर पर अफगानी  रोहिल्लाओं का शासन

   मुगल काल से ही सहारनपुर पर सूबेदारों का ही राज रहा जो मनमानी करते थे। शाहजहां काल में सय्यद परिवार सहारनपुर के सुब्दार रहे। 1739 में नादिरशाही के पश्चात रोहिलाओं ने 1757  तक शासन किया।  हरिद्वार रुड़की में गुजर , राजपूत भी राज करते थे याने रोहिलाओं के होते भी आधुनिक डॉन जैसे क्षत्रप थे।

    मुगल सूबेदार या रोहिला आदि हरिद्वार में धार्मिक पूजाओं पर बंधन नहीं लगाया करते थे। किन्तु उथल -पुथल होने से पर्यटन में कमजोरी तो रही  ही होगी।


         सहारनपुर क्षेत्र पर मराठा शासन

          सन 1748 से 1803 तक सहारनपुर , हरिद्वार व रुड़की पर मराठा शासन रहा।  मराठे सैनिक भी लूटने में कमी नहीं करते थे।


Copyright @ Bhishma Kukreti   27/3 //2018

ourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी ...

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -4
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