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Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti





  हरिद्वार , सहारनपुर व बिजनौर में कुषाण व कुणिंद राज्य  अवसान

(कुषाण युग में हरिद्वार , बिजनौर, सहारनपुर, Haridwar ,Bijnor , Saharanpur in  Kushan  Era
   )

    History of Kunind Era in Haridwar , Saharanpur  and  Bijnor
       
  Ending of , Kushan &  Kunind /Kulind era : Ending of Kuninda /Kulinda Era and Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  192
                   
                         
                     हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग - 192               


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती

               कुषाण  अवसान
        मुद्राओं से सिद्ध होता है कि कुषाण  अवसान पश्चात पर्वतीय उत्तराखंड , हरिद्वार , सहारनपुर व बिजनौर के कुणिंद राजा स्वतंत्र हो गए।  गोविषाण मुद्रा से सिद्ध होता है कि कुषाण नरेश वासुदेव की मृत्यु के बाद किसी कुषाण क्षत्रप एधुराया अधुजा  का दक्षिण उत्तराखंड के मैदानी भाग पर सत्ता थी।
     
   अनुमान लगाया जाता है कि 250  ईश्वी तक (जायसवाल , गुप्त एज ) कि सतलज पपूर्व , उत्तराखंड की दक्षिण सीमा भाग व मध्य देस में कुषाण साम्राज्य समाप्त हो चुका थ।  कुषाण साम्राज्य अवसान पर इतिहासकारों मध्य एकमत नहीं है।
यौधेय मुद्राओं की विशेषताएं
यौयेध गण मुद्राओं के लेख निम्न प्रकार हैं  (डबराल - व कके दी बाजपाई ,इंडियन न्यूमिस्मैटिक स्टडीज पृ  26, कनिंघम क्वाइनेज ऑफ ऐन्शिएंट इण्डिया पृ 77 )
१- यौधेयना , यौधेयनि या यधे यनि
२- यौधेय गणस्य जय (जय:) , वि , त्रि
३- भागवत स्वामिन ब्राह्मण यौधेय
३- भागवत स्वामिन ब्राह्मण देवस्य
४- ब्रह्मण देवस्य भागवत
५- स्वामी भागवत
६- भागवत: यधेयन:
७- कुमारस  (कुमारस्य )
८- महाराजस
९- बहुधानेक
१०-भागवत स्वामीनो ब्राह्मण्य देवस्य कुमारस्य यौधेय गणस्य जयः
११- यौधेयाना बहुधानेक
इतिहासकार जैसे अल्लन मानते हैं कि कुमार कोई नाम न होकर कार्तिकेय का नाम है और बहुधानेक यौधेय गणों का मूल स्थान है।
पूर्वोक्त  यौयेध  मुद्राओं में निम्न चिकतराकंन मिलते हैं -
१- वेष्ठनीयुक्त बोधिबृक्ष की ओर जाता हुआ नंदी
२- बांये हाथ से कमर पकड़े , दाहिने हाथ में शूल लिए खड़ा वीर व मध्य में मयूर
३- बांये हाथ से कमर पकड़े , दाहिने हाथ  आगे की ओर बढ़ाता खड़ा वीर
४- दाहिने हाथ में शूल लिए खड़ा षडानन कार्तिकेय व कंधे के ऊपर रिक्त स्थान में एक छोटा पक्षी (संभवतः मयूर )
५- दाहिने हाथ में शूल युक्त षडानन कार्तिकेय
६- हस्ती व नणदीपाद
७- अग्रभाग में हाथ में शूल लिए षडानन कार्तिकेय ,   बाम भाग मयूर , पृष्ठ भाग में कुणिंद सम्राटों की मुद्राओं में अंकित मिहिर सामान देवमूर्ति
८- ८-उपरोक्त गणराज्य की मुद्राएं हैं
योयेध  वीर नाम से प्रसिद्ध था
वीर मुद्रा में किसी शासक का नाम नहीं है


                   यौधेयगण उत्थान
     एक मतानुसार  (वकाटका , 2006 गुप्त एज ) कुषाण साम्राज्य पर सर्व प्रथम यौधेयगण ने आक्रमण किया। किन्तु बहुत से इतिहासकार इस मत को नहीं मानते हैं। वास्तव में कुषाण अवसान के कई कारण थे।

                 कुणिंद व यौधेय सहयोग
        इन दिनों जो भी मुद्राएं मिलीं है वे इस युग पर रोचक प्रकाश डालती हैं। मुद्राएं यौधेय -कुणिंद की सहयोग कथा कहतीं हैं।  महाभारत में भी कुणिंद व यौधेयों के आपस में सहयोगी संबंध उल्लेख हैं।
          मुद्राएं
कुणिंद -यौधेय सहयोग मुद्राएं 250 ईश्वी याने कुषाण अवसान से लेकर 457 ई गुप्त काल अभ्युदय की हैं वकाटका )।  ये मुद्राएं सुनेत लुधियाना , बेहट सहारनपुर ,स्रुघ्न , बिजनौर देहरादून , भाभर के निकट भैड़ गाँव गढ़वाल , अल्मोड़ा में मिली हैं (डबराल पृष्ठ 252 ) । लगता है यौधेय -कुणिंद संघ था और उनका राज्य पूर्वी हिमाचल से लेकर स्रुघ्न , सहरानपुर , हरिद्वार , भाभर की संकरी पट्टी से होते हुए काशीपुर अल्मोड़ा तक था।
        यौधेय -कुणिंद मुद्राओं की विशेषताएं
   यौधेय -कुणिंद सहयोग की मुद्राएं कुषाण अवसान से गुप्त काल उद्भव तक प्रसारित की गयीं। अल्लन अनुसार कुणिंद मुद्राएं दो प्रकार की मुद्राएं हैं प्रथम पहली सदी से पहले की व दूसरी सदी के बाद की मुद्राएं रजत मुद्राएं हैं अपने समय की सुंदर मुद्राओं में गिनी जाती हैं

         
यौधेय मुद्राओं की विशेषताएं
यौयेध गण मुद्राओं के लेख निम्न प्रकार हैं  (डबराल - व कके दी बाजपाई ,इंडियन न्यूमिस्मैटिक स्टडीज पृ  26, कनिंघम क्वाइनेज ऑफ ऐन्शिएंट इण्डिया पृ 77 )
१- यौधेयना , यौधेयनि या यधे यनि
२- यौधेय गणस्य जय (जय:) , वि , त्रि
३- भागवत स्वामिन ब्राह्मण यौधेय
३- भागवत स्वामिन ब्राह्मण देवस्य
४- ब्रह्मण देवस्य भागवत
५- स्वामी भागवत
६- भागवत: यधेयन:
७- कुमारस  (कुमारस्य )
८- महाराजस
९- बहुधानेक
१०-भागवत स्वामीनो ब्राह्मण्य देवस्य कुमारस्य यौधेय गणस्य जयः
११- यौधेयाना बहुधानेक
इतिहासकार जैसे अल्लन मानते हैं कि कुमार कोई नाम न होकर कार्तिकेय का नाम है और बहुधानेक यौधेय गणों का मूल स्थान है।
पूर्वोक्त  यौयेध  मुद्राओं में निम्न चिकतराकंन मिलते हैं -
१- वेष्ठनीयुक्त बोधिबृक्ष की ओर जाता हुआ नंदी
२- बांये हाथ से कमर पकड़े , दाहिने हाथ में शूल लिए खड़ा वीर व मध्य में मयूर
३- बांये हाथ से कमर पकड़े , दाहिने हाथ  आगे की ओर बढ़ाता खड़ा वीर
४- दाहिने हाथ में शूल लिए खड़ा षडानन कार्तिकेय व कंधे के ऊपर रिक्त स्थान में एक छोटा पक्षी (संभवतः मयूर )
५- दाहिने हाथ में शूल युक्त षडानन कार्तिकेय
६- हस्ती व नणदीपाद
७- अग्रभाग में हाथ में शूल लिए षडानन कार्तिकेय ,   बाम भाग मयूर , पृष्ठ भाग में कुणिंद सम्राटों की मुद्राओं में अंकित मिहिर सामान देवमूर्ति
८- ८-उपरोक्त गणराज्य की मुद्राएं हैं
योयेध  वीर नाम से प्रसिद्ध था
वीर मुद्रा में किसी शासक का नाम नहीं है

प्राचीन मुद्राओं  (43-57 इश्वी में यौधेय गणकी आर्थिक दरिद्रता झलकती है.
158से 257इश्वी में भी यौधेय दरिद्रता झलकती है
ताम्र मुद्राएँ जिन पर कुषाण प्रभाव है उनकी भाषा प्राकृत संस्कृत से प्रभावित है।
257 से 457 तक की मुद्राओं में यौधेय गणस्य जय: अंकित है। कुनिंद मुद्राएँ 250ई के पश्चात नही मिलते हैं।
कुणिंद   मुद्राओं में निम्न लेख मिलते हैं  (डबराल पृ -248 )
१- कदास (कादस्य )
२- कुणिंद
अगरजस (अग्रराजस्य )
२-राज्ञ बलभुतिस
३- राज्ञ कुणिंदस अमोघभूतिस  (अमोघभूति स्य )
४- शिवदतस
५-हरी द तस
६- शिवपलितस
७- मगभतस
८- भगवतो छत्रेश्वर महात्मन
९- भानवर्मन
१०- रावण -रावणस्य , वणस्य

     कुणिंद मुद्राओं में चित्रांकन
कुणिंद  मुद्राएं भारतीय  प्राचीन मुद्राओं में चित्रांकन में श्रेष्ठ मानी जाती हैं मुद्राओं में निम्न चित्रांकन मिलते हैं -

कुणिंद मुद्राओं में   चित्रांकन  अगले भाग में
   

( कुछ संदर्भ परमानंद गुप्ता , जियोग्राफी फ्रॉम एन्सिएंट इण्डिया पृ 32 से लिए गए हैं )
१- अग्रभाग में बौद्ध वेष्ठनी युक्त


       





Copyright@ Bhishma Kukreti  Mumbai, India  2018

   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --

हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -


        Ending of Kunind /Kulind era , Yauyedh -Kuninda  Coinage : Ending of Kuninda /Kulinda Era and Ancient History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ;     Ending of Kunind /Kulind era : Ending of Kuninda /Kulinda Era and Ancient History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ;     Ending of Kunind /Kulind era : Ending of Kuninda /Kulinda Era and Ancient History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Telpura Haridwar, Uttarakhand  ;   Ancient  History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ;   Yauyedh -Kuninda  Coinage Ancient  History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient   History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand  ;  Ancient  History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand  ;   Ancient History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ;   Yauyedh -Kuninda  Coinage ,    Ancient History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ;     Ancient  History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ;  Yauyedh -Kuninda  Coinage    Ancient History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar;      History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;      Ending of Kunind /Kulind era : Ending of Kuninda /Kulinda Era and Ancient History of Bijnor;      Ending of Kunind /Kulind era : Yauyedh -Kuninda  Coinage ,  Ending of Kuninda /Kulinda Era and Ancient  History of Nazibabad Bijnor ;     Ending of Kunind /Kulind era : Ending of Kuninda /Kulinda Era and     Ending of Kunind /Kulind era : Ending of Kuninda /Kulinda Era and Ancient History of Saharanpur;    Ending of Kunind /Kulind era : Ending of Kuninda /Kulinda Era and   Ancient  History of Nakur , Saharanpur;    Ancient   History of Deoband, Saharanpur;     Ending of Kunind /Kulind era Yauyedh -Kuninda  Coinage ,  : Ending of Kuninda /Kulinda Era and    Ancient  History of Badhsharbaugh ,   Ending of Kunind /Kulid era : Yauyedh -Kuninda  Coinage ,  Ending of Kuninda /Kulinda Era and Saharanpur; Yauyedh -Kuninda  Coinage    Ancient Saharanpur History,       Ending of Kunind /Kulind era : Ending of Kuninda /Kulinda Era and Ancient Bijnor History;
कुणिंद मुद्राएं व यौयेध  मुद्राएं व कनखल , कुणिंद मुद्राएं व यौयेध  मुद्राएं व हरिद्वार  इतिहास ; तेलपुरा , कुणिंद मुद्राएं व यौयेध  मुद्राएं व हरिद्वार  इतिहास ; सकरौदा ,  कुणिंद मुद्राएं व यौयेध  मुद्राएं व हरिद्वार  इतिहास ; भगवानपुर , हरिद्वार  इतिहास ;रुड़की ,हरिद्वार इतिहास ; कुणिंद मुद्राएं व यौयेध  मुद्राएं व झाब्रेरा हरिद्वार  इतिहास ; मंगलौर हरिद्वार  इतिहास ; कुणिंद मुद्राएं व यौयेध  मुद्राएं व लक्सर हरिद्वार  इतिहास ;सुल्तानपुर ,हरिद्वार  इतिहास ;पाथरी , हरिद्वार  इतिहास ; बहदराबाद , हरिद्वार  इतिहास ; लंढौर , कुणिंद मुद्राएं व यौयेध  मुद्राएं व हरिद्वार  इतिहास ;बिजनौर इतिहास; नगीना ,  कुणिंद मुद्राएं व यौयेध  मुद्राएं व बिजनौर इतिहास; नजीबाबाद , नूरपुर , बिजनौर इतिहास;सहारनपुर इतिहास; कुणिंद मुद्राएं व यौयेध  मुद्राएं व देवबंद सहारनपुर इतिहास , कुणिंद मुद्राएं व यौयेध  मुद्राएं व बेहट  सहारनपुर इतिहास , कुणिंद मुद्राएं व यौयेध  मुद्राएं व नकुर सहरानपुर इतिहास Haridwar Itihas, Bijnor Itihas, Saharanpur Itihas


Bhishma Kukreti



ब्रिटिश काल में कृषि कृषि भूमि विस्तार से आंतरिक समृद्धि

Uttrakhand Turism in British Era
( ब्रिटिश युग में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म -2)

  -

उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -58

-

  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -  58                 

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--164)   
    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 16 4


    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
--
   किसी भी क्षेत्र में आंतरिक समृद्धि पर्यटन हेतु आवश्यक है।  अफ़्रीकी देशों में आंतरिक समृद्धि न होने से वहां बहुत सी विभीषिकाएँ उतपन्न हो गयी हैं।  ब्रिटिश अधिकारियों ने सर्वपर्थम गढ़वाल-कुमाओं  में आंतरिक समृद्धि  ओर ध्यान दिया। 
  इतिहासकार विशेषकर किसी राजनैतिक मत से बंधे इतिहासकारों को ब्रिटिश काल का विश्लेषण एक कोण से देखना चाहिए कि  ब्रिटिश भारत में सेवा करने नहीं अपितु व्यापार करने आये थे।  इतिहासकारों को देखना चाहिए कि क्या ब्रिटिश व्यापार वृद्धि में सफल हुए कि नहीं।
     कुमाऊं गढ़वाल पर भी ब्रिटिश ने व्यापारिक हित हेतु अधिकार किया था।  व्यापार उनका मुख्य उद्देश्य था।  ब्रिटिश शासन काल में ब्रिटिश प्रशाषकों ने बहुत से पग अपने व्यापार लाभ हेतु उठाये किन्तु वे पग जनहिकारी साबित हुए -
कृषि भूमि विस्तार -कुमाऊं -गढ़वाल पर अधिकार प्रारम्भिक काल में कि ब्रिटिश अधिकारियों ने पाया चूँकि जनता कृषि भूमि होते हुए भी खेती नहीं करते तो अनाज पैदा नहीं होता जिससे कर की आमद नगण्य ही थी।  ब्रिटिश अधिकारियों ने विभिन्न भूव्यवस्थाओं के बल पर जनता को जंगल काटकर कृषि क्षेत्र वृद्धि हेतु प्रोत्साहन दिया। गोरखा काल व दैवी प्रकोप के कारण जनसंख्या कम हो गयी थी।  ब्रिटिश अधिकारियों ने कृषि भूमि में बढ़ोतरी करवाई और कृषकों की आमदनी वृद्धि हेतु कई कदम उठाये -
गढ़वाल में कृषि भूमि विस्तार निम्न प्रकार हुआ

(One acre = twenty nali or बीसी beesee)

Pargana--------------Nos. villages ----land in acres (1866)--------- land in 1896 acres/beesee

Barasyun---------------799---------------------25386--------------------50806

Chandkot----------------323---------------------10598--------------------21658

Mallasalan---------------566----------------------14088------------------29234

Tallasalan-----------------642---------------------14204------------------36864

Gangasalan----------------572--------------------20793-------------------54478

Devalgarh------------------478--------------------9386--------------------20734

Chandpur------------------538-----------------------12562------------------25834

Nagpur----------------------285-----------------------6066-------------------11899(only measured ones)

Badhan----------------------264-----------------------3761---------------------8179(only measured ones)
(डबराल उखण्ड का इतिहास -6 )
कृषि भूमि वृद्धि व चिकित्सा सुविधाओं से जनसंख्या वृद्धि इस प्रकार हई

          The population increase was as under (Census Handbook of Garhwal, 1951) –

Pargana------1865----------1812--------1881---------1891----1896--------1921

Badhan-------16618---------21454------25692-------30732----30732-----37354

Barasyun------37463---------40707----54089----------63229----56465----65479

Chandpur------23460--------31381------34214-------40706------42046-----47394

Dashauli--------7117-----------12523----10043---------13775-----12135----15682

Nagpur----------29133---------31058----41537--------50907----48943----64904

Painkhanda-----5592---------6383-------8276---------5804-------9017-----8103

Chaundkot----17646------------22060----23403------26573-------26573----29205

Gangasalan-----32955----------40877----42318------47510-------49423------50464

Mallasalan--------32533--------38618---41126--------47594-------49423-----57725

Tallasaln----------275896---------36165---40238------51093-------35606-----44800

Bhabhar -----------------------------------------------------------------------300-----446

Others ----------------------------------------------------------------------------------20443

Total-------------248741-----------310282-----345629---407818-------398650—485186

Gender wise Population statics is as under

Gender-------------1858-----------1872-----------1881---------1901-----------1911-------1921

Males --------------66170---------155745---------170755----211351---------235554---232863

Females -----------113299-----154530----------174874-------218079--------244087---252323

Children----------53851





Copyright @ Bhishma Kukreti  2/4 //2018

ourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी ...

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -4
-


  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;


Bhishma Kukreti


ब्रिटिश काल में तीर्थ यात्रियों की सुविधाओं में सुधार और वर्तमान में श्रीनगर कोटद्वार मार्ग को राष्ट्रीय स्तर का पयटन मार्ग बनाने की आवश्यकता

Improvement in Tourist Facilities in British Uttarakhand
( ब्रिटिश युग में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म-4 )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -59

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -  59                 

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--165)   
    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 16 5


    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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गढ़वाली  राजाओं व गोरखा शासन में मंदिरों को कर मुक्त मुवाफ़ी गाँव दिए गए थे।  गूंठ भूमि राजस्व से मंदिरों में पूजा व कर्मचारियों का वेतन प्रबंध होता था। इसके अतिरिक्त सदाव्रत गाँव भी थे जिनकी आय से श्रीनगर , जोशीमठ में यात्रियों हेतु मुफ्त भोजन व्यवस्था भी होती थी। 1816 में गढ़वाल के सहायक कमिश्नर ने सलाह दी थी कि गूंठ  या मंदिर गाँवों की आय का कुछ भाग यात्रियों की सुविधाओं हेतु प्रयोग होना चाहिए।
  केदारनाथ के रावल द्वारा अमानत में खयानत से अधिकारियों ने रावलों या पुजारियों से सदाव्रत गाँवों से आय व उपयोग का अधिकार छीनकर स्वंतंत्र कमेटी 'लोकल एजेंसी 'बना दी।  सदाव्रत गाँवों की आय से हरिद्वार -बद्रीनाथ यात्रा मार्ग चौड़ा किया गया।  सदाव्रत गाँवों के राजस्व से यात्रिओं को मुफ्त भोजन व्यवस्था , यात्री चिकित्सा,  मरोम्मत कार्य में तेजी लायी गयी। मार्ग मरमत कार्य अब नियमित व सुचारु रूप से होने लगा था.
  ट्रेल के उत्तराधिकारियों द्वारा सदाव्रत पट्टियों  की आय से निम्न मार्ग निर्मित हुए या उनका पुनर्निर्माण हुआ
जोशीमठ -नीती
अल्मोड़ा से लाभा -गढ़वाल
श्रीनगर से नजीबाबाद मार्ग
   1927 -28 में ट्रेल ने गाँव वालों से बेगार लेकर (मुफ्त मजदूरी ) हरिद्वार -बद्रीनाथ मार्ग निर्माण कार्य करवाया।  वह स्वयं भी मार्ग निर्माण निरीक्षण करता था।  1855 तक निम्न यात्रा मार्ग भी निर्मित हो चुके थे -
रुद्रप्रयाग से -केदारनाथ
उखीमठ से चमोली
कर्णप्रयाग से चांदपुर
बेकेटभूव्यवस्था में गूंठ व सदाव्रत भूमि की विधिवत व्यवस्था की गयी थी।  डा डबराल ने लिखा है कि मंदिरों के साथ अन्याय भी हुआ।  कुछ मंदिरों की भूमि भी छीन ली गयी थी।
     सदाव्रत गाँवों से बेकेट भूव्यवस्था में  वार्षिक राजस्व 100013 रुपयाथा।  सदाव्रत व गूंठ गाँव की संख्या 535 थी व 1863 में इन गाँवों का क्षेत्रफल 8074 बीसी नाली थ


   स्ट्रेचों की रिपोर्ट सलाह मानते हुए ब्रिटिश शासन ने सदाव्रती पट्टियों के सदाव्रत भूमि राजस्व  का उपयोग तीर्थयात्री मार्ग निर्माण , पुनर्णिर्माण  , तीर्थ यात्रियों हेतु औषधालय निर्माण , औषधि वितरण , पर होने लगा।  इन तीर्थ यात्री सुविधाओं से भारत के अन्य भागों में अपने आप उत्तराखंड छवि वृद्धि हुयी और तीर्थ यात्रियों की संख्या में वृद्धि होने लगी।

         गाँवों में श्रमदान से मार्ग निर्माण में तेजी
       तीर्थ यात्रा मार्गों में सुधार से प्रेरित हो गढ़वाल के अन्य क्षेत्रों में श्रमदान से ग्रामवासी मार्ग निर्माण करने लगे। ग्रामवासी अपने गाँव को लघु मार्गों द्वारा मुख्य यात्रा मार्ग से स्वयं जोड़ने लगे।


    पौड़ी गढ़वाल पर्यटन में पिछड़ा जनपद है
  पौड़ी गढ़वाल में स्वर्गाश्रम , लक्ष्मण झूला व श्रीनगर को छोड़ दें तो पौड़ी में धार्मिक पर्यटन नगण्य हैं।  यदि उत्तराखंड पर्यटन वृशि करनी है तो पिथौरागढ़ व पौड़ी जनपदों को को राष्ट्रीय स्तर का पर्यटन जनपद विकसित करने ही होंगे।  इसके लिए श्रीनगर -कोटद्वार मार्ग को प्रसिद्धि आवश्यक है।
      श्रीनगर -कोटद्वार रुट हेतु प्रवासियों का योगदान ही विकल्प है
यदि श्रीनगर -कोटद्वार मार्ग को राट्रीय स्तर का पर्यटन मार्ग बनाना है तो श्रीनगर -कोटद्वार मार्ग के गाँवों को विशिष्ठ पर्यटक क्षेत्र निर्मित करना होगा जिसमे प्रवासियों की भूमिका के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है।  प्रवासी निम्न स्तर पर अपना योगदान दे सकते हैं
१- वैचारिक स्तर पर अपने गाँव में विशिष्ठ पर्यटन आकर्षी प्रोडक्ट निर्माण
२- ग्रामवासियों को तैयार करना - आजकल एक बीमारी फैली है कि हर भारतीय शासन से सब कुछ चाहता है किन्तु अपने योगदान के बारे मबौग सार देता है। प्रवासी यह जड़ता तोड़ सकते हैं
3 -पर्यटन प्रोडक्ट निर्माण में निवेश कर प्रवासी अपनी भूमिका निर्धारित कर सके हैं। प्रवासी श्रीनगर -कोटद्वार मार्ग पर रिजॉर्ट , म्यूजियम , बाल क्रीड़ा केंद्र , हनी मून हाऊसेज , हॉस्पिटल आदि खोल सकते हैं।


Copyright @ Bhishma Kukreti  3/4 //2018

ourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी ...

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -4
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Bhishma Kukreti


  कुणिंद यौयेध कालीन राजा छत्रेश्वर
Chhatreshwar King Rule  over Haridwar,  Bijnor,   Saharanpur

Kuninda Yauyedh Rules over Haridwar,  Bijnor,   Saharanpur

       
Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  - 194
                   
                         
                     हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग - 194               


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती


            कुणिंद मुद्राओं से छत्रेश्वर , रावण व भानु शासकों की सूचना मिलती है।  इन शासकों का कोई अभिलेख व शिलालेख न मिलने से उनके अस्तित्व के बारे में अधिक जानकारी नहीं मिलती है।
छत्रेश्वर आदि शासकों का अन्य कुणिंद व स्रुघ्न से संबंध भी कठिन है।  इन मुद्राओं से कुणिंद राजवंश का काल भी पता नहीं चलता है।
    छत्रेश्वर अन्य नरेशों के पूर्वर्ती नरेश है।  छत्रेश्वर की ताम्र मुद्राएं मिलीं हैं जिनका निर्माण कुषाण ताम्रमुद्राओं के मानदंड अनुसार हुआ है।
                    छत्रेश्वर मुद्रा में मुद्रालेख
छत्रेश्वर मुद्रा में शिव चित्रांकन हुआ है। शिव दाहिने हाथ में त्रिशूल व युद्ध परशु लिए खड़े हैं।  बायां हाथ कमर पर है।  पृष्ठ भाग में दाहनी ओर मृग खड़ा है। दाहनी ओर निकट ही चैत्य व त्रिभुजाकार Y आकृति के नीचे नाग है।  एक चिन्ह उनके नीचे व एक अस्पस्ट चिन्ह ऊपर बना है (स्मिथ, क्वाइन्स इन इंडियन म्यूजियम कोलकत्ता, भाग -1 , पृष्ठ 170 )
  कनिंघम आदि ने ब्राह्मी मुद्रा लेख को 'भगवतः चतरेश्वर पमहात्मन्य:'  पढ़ा ह।
ऐलन के अनुसार संभवतः परवर्ती कुणिंद नरेशों की राजधानी छत्र या चत्र रही होगी।
बंदोपध्याय (प्राचीन मुद्रा ) अनुसार छत्रेश्वर का अर्थ शिव है जो कुणिंदों के कुलदेवता थे।
   कनिंघम ऐलन और बंदोपाध्याय के कथन को नहीं मानता है। कनिंघम अनुसार भगवतः चतरेश्वर शिव का नाम नहीं अपितु शासक का ही नाम है।

          कुणिंद शासन क्षेत्र

छत्रेश्वर की मुद्राएं यमुना पश्चिम में अधिक मिली हैं जिससे अनुमान लगता है कि छत्रेश्वर का कुणिंद क्षेत्र हिमाचल दक्षिण पूर्व से लेकर पश्चिम उत्तराखंड के यमुना निकट रहा होगा। कुणिंद जनपद के या उत्तराखंड के धुर दक्षिण पूर्व में बाद गोविषाण में मित्र वंशी शासकों का अधिकार हो गया था। ऐसा लगता है कुणिंद काल में भी गोविषाण अथवा कुमाऊं तराई में अथवा बिजनौर पूर्व में कुषाण राजा राज्य करता था (डबराल ुखंड इतिहास भाग ३, पृष्ठ 156 )
                  राज्यावधि
  छत्रेश्वर ने ताम्र मुद्राएं ढालने हेतु कुषाण मुद्राओं के अनुकरण किया है।  एक कथनानुसार (न्यूमेसमेटिक सोसाइटी, vol 15 , जून 1953 , पृष्ठ 180 ) गोविषाण व पूर्वी पंचनद पर कुषाण सामंत का शासन रहा होगा ।  डबराल अनुसार यदि इस कल्पना में सत्यता है तो छत्रेश्वर ने संभवतः कुषाण शासक अथवा सामंत वासुदेव से भूमि स्वतंत्र की थी।  (डबराल वही पृष्ठ 257 )
डबराल अनुसार छत्रेश्वर का शासन काल 243 से 250 इश्वी तक आंका जा सकता है।



Copyright@ Bhishma Kukreti  Mumbai, India  2018

   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --

हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -


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                     :=============  स्वच्छ भारत !  स्वच्छ भारत ! बुद्धिमान उत्तराखंड  =============:


Bhishma Kukreti


ब्रिटिश काल में परिवहन योजनाएं और वर्तमान में वोट और विभाग अहम प्रेरित परिहवन योजनाएं
Transportation improvement in British Period in Uttarakhand

Temple Management in British  Era
( ब्रिटिश युग में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -60

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  - 60                 

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--166)   
    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 166


    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )

   गढ़वाल कुमाऊं में बार बार अन्नकाल पड़ते थे।  ऐसे समय में निर्यातित अनाज को सदूर गाँवों में पंहुचना टेढ़ी खीर थी। पहाड़ों में बैलगाड़ी जाना आज भी संभव नहीं है।  तो घोड़ों व खच्चरों से लदान संभव था या है। किन्तु गढ़वाल राजाओं व क्रूर गोरखाओं ने कर लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी किन्तु सड़कें नहीं बनवायीं।  ब्रिटिश शासन ने आंतरिक परिवहन को सुदृढ़ करने हेतु कुछ कदम उठाये।
1948 में कुमाऊं में अल्मोड़ा में 180 मील , नैनीताल में 80 मील लम्बी सड़कें निर्माण का काम हाथ में लिया गया। सर्वपर्थम कोटद्वार -फतेहपुर सड़क पर ध्यान दिया गया।  लैंसडाउन छा वनी बनने से भी दक्षिण गढ़वाल में परिहवन सुलभ हुआ। 

    In Garhwal, there was no plan for road construction till 1828.

       Trail started road construction from Haridwar to Badrinath in 1827-1828. Trail did not take help from any engineer for planning. Trail himself used to supervise the works. it is said that Trail used to cut or dig stone when there was steep stone hurdle. He used to go for marking on steep hill with the help of roped basket. Trail used to sit in roped  basket and helpers used to take rope and he used to jump here and there for marking. Trail travelled from Badrinath to Kedarnath for road survey.

    Trail also discovered a road from Kumaon to Mansarovar. Church officials criticized Trail for that he was promoting idol worshipping.

   By 1834, Haridwar –Badrinath road was completed. Animals and men could cross each other on that road. By 1835, government constructed roads from Rudraprayag to Kedarnath, Ukhimath to Chamoli, Chandpur to Kumaon via Lobha. Kumaon was connected to Ruhelkhand. So Ruhelkhand was connected to Badrinath via Kumaon. The length of such roads was 300 miles and cost was Rs. 25000.Sadavrat tax was used on road construction.

    The successors of Trail kept road construction works alive. Workers completed road construction from Joshimath to Neeti in 1840. There was road from Shrinagar to Almora and Shrinagar to Kotdwara to Nazibabad by 1841.

कोटद्वारा , हल्द्वानी , ऋषिकेश व देहरादून, हरिद्वार  को रेल से जोड़ने का जो कार्य ब्रिटिश शासन ने किया था उसमे भारत सरकार ने एक इंच भी वृद्धि नहीं क।  रेल मार्ग ने तो पर्यटन उद्यम त्र में क्रान्ति ला दी थी
ऋषिकेश -देवप्रयाग मोटर मार्ग ने भी उत्तराखंड पर्यटन की काया पलट ही कर दी।  प्राचीन काल से चलने वाला ऋषिकेश -बद्रीनाथ मार्ग तो बंद ही हो गया।
    गढ़वाल में 1948 में डिस्ट्रिक्ट बोर्ड की मुख्य सड़कें इस प्रकार थीं -
तपोवन घाट -नारायण बगड़ -लोहाबा -बुंगीधार -44 मील
बुवाखाल -कैन्यूर -44 मील
रामणी बाण -देवाल -ग्वालदम -38 मील
दनगल -पोखड़ा -बैजरों --२६ मील
नंद प्रयाग -बाट मार्ग -12 मील
दोगड्डा -द्वारीखाल -पौखाल -डाडामंडी पैदल मार्ग भी ब्रिटिश देन है. व्यासचट्टी , महादेव चट्टी जैसे घाटों को अच्छी सड़कों (घोडा सड़क ) गाँवों से जोड़ने का प्रशंसनीय कार्य भी ब्रिटिश काल में शुरू हुए।
इन सड़कों के निर्माण ने आंतरिक पर्यटन व वाह्य पर्यटन विकास की आधार शिला रखी। इन सड़कों पर ऐसे पल बने हैं जो अभी भी सही सलामत हैं।
    गंगा व सहयोगी नदियों पर पल भी ब्रिटिश काल में बने जिन पुलों ने पर्यटन को नई दशा व दिशा दीं।  श्रीनगर गुमखाल मोटर मार्ग भी ब्रिटिश काल देन है।
ऋषिकेश कोटद्वार मार्ग भी ब्रिटिश काल में निर्मित हुआ।
     वन सड़कें - ब्रिटिश काल में वनों के अंदर आवागमन हेतु कई सड़कें बनीं।  अब तो सार्वजनिक विभाग व वन विभग्ग की खींचातानी में चलते मार्ग भी अवरुद्ध किये जा रहे हैं हरिद्वार -कोटद्वार मोटर मार्ग का इतिहास यही कहानी बयान करता है।
   ब्रिटिश अधिकारियों पर बहुत से अभियोग लगते हैं किन्तु यह अभियोग नहीं लगता कि उन्होंने अपने व्यक्तिगत स्वार्थ हेतु सड़क योजनाएं बनायीं।  आज तो हर सड़क की योजना वोट निश्चित करने हेतु बन रही हैं।  वोट बैंक सामने आ गया है और पर्यटन नेपथ्य में चला गया है।  सड़क व पुलों का शुभारम्भ भी नेताओं की फोटोजनी हेतु होते हैं समाजहित नेपथ्य में चला जाता है। 

Copyright @ Bhishma Kukreti  4 /4 //2018

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -6
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Bhishma Kukreti


  कुणिंद कालीन शासक भानु व   हरिद्वार  ,  बिजनौर   , सहारनपुर   इतिहास
Unknown King of Kuninda Period of Haridwar,  Bijnor,   Saharanpu

        Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -
                   
                         
                     हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -                 


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती


       
     शिव प्रसाद डबराल अनुसार भैड़गाँव , डाडामंडी शीला पट्टी , पौड़ी गढ़वाल में मिलीं हैं जिनपर मुद्रालेख नहीं हैं ( डबराल भाग ३ , पृष्ठ 257 ) . डबराल प्रदत्त भैड़गाँव से प्राप्त कुणिंद मुद्राओं का विवरण इस प्रकार है -
१- भैड़गाँव से प्राप्त मुद्रा पर अगर भाग में दाहिने हाथ में शुलयुक्त षडानन कार्तिकेय है। कार्तिकेय का बांया हाथ कमर पर है। पृष्ठ भाग में देतीन सिर वाली देवी दाहिना हाथ उठाये तथा बायां हाथ कमर पर लगाए खड़ी है। परिधि को बिंदुओं से सजाया गया है। दाहनी ओर ब्राह्मी लिपि में 'वि ' अंकित है
२- जिन मुद्राओं में  पूर्ववर्ती कुनिन्फ मुद्राओं सामान मृग चित्रण है उन भैड़गाँव की मुद्राओं में मृग चित्रण में विविधता लाने का प्रयत्न किया गया है। डा काला द्वारा प्रकाशित चित्रों में तीन मुद्राओं में मृग मुख दाहनी ओर और पांच मुद्राओं में मृग मुख बायीं ओर है।
३- भैड़गाँव निधि मुद्राओं में जिनमे पूर्ववर्ती मुद्राओं जैसे चित्रांकन हैं उनमे विविधता लाने की कोशिश की गयी है।
     भानु -
भानु के बारे में अधिक जानकारी नहीं है। भानु ने किस क्षेत्र में  शासन किया भी अविदित है।
  भैड़गाँव में लोगों ने मुद्राएं भूत भी से घाटियों में गिरा दिए थे। कनिघम व ऐलन ने भानु की एक मुद्रा प्रकाशित की है। भैड़गाँव निधि में 25 मुद्राएं भानु की हैं।
  भानु मुद्रा मिलने के क्षेत्र
भानु मुद्राएं बेहट , देहरादून ,और भैड़गाँव में मिली हैं। यमुना पूर्व में भानु शासन था सिद्ध होता है किन्तु पहाड़ी उत्तराखंड , हरिद्वार , बिजनौर का कितना क्षेत्र भानु शासन अंतर्गत था बताना कठिन है। कनिंघम ने इस भानु को आडमब्र नरेश सिद्ध करने का प्रयास किया परन्तु काल, पीरियड  टाइम अनुसार यह सिद्धांत सही नहीं बैठता है।
    कनिंघम , ऐलन और डा सतीश काला ने जिन भानु मुद्राओं के चित्रांकन व् लेखों अध्ध्य्यन किया है उनका विवरण इस प्रकार है -
1 - अग्रभाग में नाग तथा ब्राह्मी लेख भानु वर्मा  पृष्ठभाग में हिस्सा त्रिशूल ही दिखता है।
२- अग्रभाग में भानव , पृष्ठ भाग में त्रिशूल व ध्वज
३-अग्रभाग में ब्राह्मी में 'रांयन् भानव ' पृष्ठभाग में षडानन कार्तिकेय व त्रिशूलधारी शिव
४- अग्रभाग में ब्राह्मी में भानवस्य व पृष्ठभाग में अस्पस्ट चित्रण

      भानु शसन काल
कनिंघम आदि अनुसार भानु मुद्राओं पर कुषाण प्रभाव पाया गया है। इसका अर्थ है भानु छत्रेश्वर का समकालीन न था. इसमें संदेह नहीं कि भानु रावण से पूर्ववर्ती था व वासुदेव कुषाण

   




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   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --

हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -


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Bhishma Kukreti



ब्रिटिश काल में प्रमुख रोग और  समयगत मृत्यु आंकड़े

Diseases and Treatments Uttarakhand  in British  Era
( ब्रिटिश युग में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  61

उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म -61                   

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--167)   
    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 167


    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )

ब्रिटिश काल में उत्तराखंड में प्रमुख रोगों में प्लेग (महामारी ), हज्या , चेचक , भाभर में मलेरिय, विभिन्न बुखार , चेचक , दस्त , व प्रसव समय जच्चा -बच्चा मृत्यु प्रमुख व्याधियां थीं।
  महामारी या अन्य बीमारियों जैसे बुखार के कारण भोटिया व्यापारी श्रीनगर तक ही पंहुच पाते थे व तिब्बत सरकार भी कभी कभी भोटिया व्यापारियों पर तिब्बत प्रवेश पर रोक लगा देती थी।  1823 में प्लेग पंजाब से फैलता फैलता कुमाऊं तक फ़ैल गया था।  हजारों उत्तराखंडी मृत्युलोक चले गए थे।
प्लेग , हैजा कुम्भ व हरिद्वार में बैशाखी मेले से यात्रियों द्वारा प्रसारित हो गढ़वाल में फ़ैल जाता था।
ब्रिटिश शासन ने रोग प्रसारण न हो हेतु कई प्रशंसनीय कदम उठाये।  गाँवों में सफाई पर जोर देने जैसे चौक में कूड़े के ढेर , मकान के पास भांग न बोना , गौशालाएं गांव से बाहर निर्माण करने जैसे कई जन जागरण के कार्य किये।  प्लेग फैलने पर भी जन जागरण के कई कार्य किये गए।  1852 में एक कमेटी बनवायी गयी जिसके सलाहों पर कार्य किये गए व कई कदम उठाये गए।  टीकाकरण पर जोर दिया गया। डा पियरसन की रिपोर्ट ग्रामीण व्याधि निदान हेतु आज भी औचित्यपूर्ण रिपोर्ट है।
  विभिन्न रोगों से मृत्यु आंकड़े  इस प्रकार हैं  (बेकेट गढ़वाल सेटलमेंट)-

   There is following Government report on year wise disease wise deaths in Garhwal from 1867-1906 (Garhwal gazetteer)-



Year-----Cholera -----S. pox--------Fever------Indigestion-----Injury—Misc.----Total

-

1867-------351-------------47------------1722----------------------------------2038-------4138

68-----------20--------------8-------------1650-----------------------------------2915--------4602

69----------------------------2--------------1992---------1237-------------------1282------4513

70------------6--------------1---------------2134---------------------------------2673-------4820

71----------------------------6---------------255----------2071--------208-------563-------5414

72--------------------------74---------------2356--------2576---------288------563--------5856

73------------27------------28--------------2865--------2207--------------------713-------6201

74----------------------------31--------------3069-------2027----------393-----580-------6070

75------------587----------167--------------2269-------2376-----------262------639------6640

76--------------------------------------------3246--------2500-----------257------560------6513

77--------------------------------------------2719---------2042----------248-------753---->5000

78----------17----------------14-------------3214--------3143----------296--------403--->-7000

79-----------3473------------6---------------2743-------1712----------225--------342--- > 8000

80----------------------------------------------3935--------2384-------344---------247------ >6900

81--------------659------------2---------------3474--------2796-------244--------350---------7525

82------------------------------2----------------4046--------3331-----238---------294---------7921

83-----------------------------9---------------3683----------3824------243---------370---------8129

84---------------------------11----------------3722----------3118-------210-------165--------7226

85-------------33----------5------------------4100-----------3611--------219-----186--------8254

86---------------------------1------------------3835-----------2991--------232-----136-------7195

87------------567----------2------------------4759-----------3925--------200------219-------9211

88-------------3-------------17---------------4779-----------3982----------227-----203-------9211

89-------------109----------1-----------------4656-----------3610---------229------175------8780

90---------------620--------1-----------------6123------------3276---------224-----175------10419

91--------------66-----------13---------------6977------------3232--------236--------189----10713

92------------5943-----------3---------------8966-------------3108--------242-------224-----18481

93------------1525----------13--------------5447--------------3099--------203-------213-----10500

94-------------10-----------124--------------7691--------------4119-------242--------328-----12514

95----------------------------13----------------8845------------3970--------240--------309----13377

96--------------1033----------------------------9987-----------3632

97-------------------------------------------------9687-----------3632

98-------------40-----------------------------------6821---------------2824

99------------659------------------------------------6636-------------3587

1900----------107-----------------------------------5603---------------3132

01-------------129-----------------------------------6012---------------3034

02--------------806-----------------------------------6294---------------3494

03-------------4017------------------------------------7264--------------4309

04---------------188-----------------------------------7194---------------3458

05-------------------------------------------------------8184---------------4897

06-----------------3429---------------------------------6648----------------3941

07------------------2--------------------------------------7382--------------4064

08------------------2924---------------------------------9625---------------3601

09--------------------1736---------------------------------7259--------------2963







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1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -6
-


  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;



Bhishma Kukreti




ब्रिटिश काल में उत्तराखंड में चिकित्सा व चिकित्सालय -- -

Hospitals in British  Era in Uttarakhand
( ब्रिटिश युग में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

  -

उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )

-

  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -  63               

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--168)   
    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 168


    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )

  सदाव्रत व सरकारी चिकित्सालयों को छोड़कर ग्रामीण उत्तराखंड में कर्मकांडी ब्राह्मण ही आयुर्वेद चिकित्सा स्रोत्र थे।  ये ब्राह्मण अपने बच्चों को ज्योतिष , कर्मकांड के अतिरिक्त आयुर्वेद शिक्षा भी देते थे।  ब्राह्मण का गृह ही चिकित्सा शिक्षण संस्थान भी थे।  ये पारम्परिक वैद ही गाँव गाँव जाकर रोग निदान करते थे या लोग इनके पास आकर औषधि ले जाते थे।  चलण स्यूं में झाला गाँव इस क्षेत्र में वैदकी के लिए प्रसिद्ध था।
  ढांगू उदयपुर में निम्न गाँव वैदकी हेतु प्रसिद्ध थे
   झैड़
नौड -वरगडी
कठूड़
ठंठोली
गडमोला
तैड़ी
घट्टूगाड
किमसार
कांडाखाल
बरसुड़ी
डाबर
अमालडू

कंडवाल स्यूं में बागी
    इन वैद्यों की सबसे बड़ी समस्या साहित्य उपलब्धि की थी।
                        हरिद्वार  यात्रा मार्ग पर बाबा कमली वालों के धर्मार्थ चिकित्सालय भी थे
      मिशन हॉस्पिटल चोपड़ा
पादरी मेसमोर ने 1903 के आसपास चोपड़ा में एक धर्मार्थ चिकित्सालय खोला।  इस चिकित्सालय ने पौड़ी की बड़ी सेवा की और मिसनरी वाले वास्तव में बड़े जुझारू थे।
   सरकारी चिकत्सालय
कमिश्नर ट्रेल ने सदाव्रत फंड से सरकारी स्तर पर चिकित्सालय स्थापना करना शुरू किया।  सदाव्रत से 1907 तक सात चिकित्सालय श्रीनगर , उखीमठ , बद्रीनाथ , चमोली , जोशीमठ , कर्णप्रयाग में हरिद्वार -बद्रीनाथ यात्रा मार्ग पर खुल चुके थे -1907 में कांडी (बिछला  ढांगू ) में चिकित्सालय खुला।
1890 से 1909 तक डिस्ट्रिक्ट बोर्ड ने चिकित्सा पर निम्न राशियां खर्च किये -

                         Expenses on Health Care from 1890-1909

  The government spent on health care following money(in Rs.) from 1890-1909-



Year -------Rs.------------Year -----------------Rs.--------------------Year -----------Rs.

1890- 91- 1176-----------1891-92------------1121--------------------1892-93------2990

1893-94----2939-----------1892-93-----------2516---------------------95-96--------2716

96-97--------2721------------97-98------------4385---------------------98-99---------3145

99-1990------3391---------1900-01-----------3413----------------------01-02---------3645

02—03-------4191---------03-04--------------4345---------------------04-05-----------3923

05-06-----------5362---------06-07------------9760---------------------07-08----------11615

08-09-----------12565
  यात्रा मार्ग में चिकित्सालयों में यात्रिओं को निम्न व्याधियों हेतु औषधि दी गयीं या चिकित्सा की गयीं  (आदम , रिपोर्ट ऑन दि पिलग्रिम्स पृष्ठ 41 )

Nos of patients Treated in Pilgrim road Government Hospitals from 1903-1912



      The pilgrims used to face indigestion, malaria and diarrhea besides choler. Local people took also advantages of hospitals opened on pilgrims road.  Following data are available for patients treated in different hospitals on pilgrim roads from 1903-1912-

-

Year ---Shrinagar—Ukhimath-----Joshimath-----Chamoli-----Karnaprayag—Galai---Kandi

1903

Malaria----2400---------480-------------385------------848----------729------------559

Indigestion- 191---------39--------------77--------------102---------94---------------65

Diarrhea-----488---------57--------------39---------------88----------151--------------39

1904

Malaria -----3393--------648------------521-------------521----------630-------------558

Indigestion—582---------81-------------149-------------111----------128-------------88

Diarrhea------363----------46--------------64--------------94-------------54------------22

1905

Malaria ----- 3250---------482-------------392------------323-----------602------------635

Indigestion----648-----------93-------------129--------------42------------69-------------82

Diarrhea--------459----------53--------------59-------------33---------------88-----------79

1906

Malaria ------3787------------464-------------333-----------458-----------707------------438

Indigestion---642---------------77----------------63-----------95-----------83--------------86

Diarrhea------797---------------68---------------53------------29------------112-----------52

1907

Malaria ------2886-------------565------------440------------473-----------252----------493-----238

Indigestion-- 507---------------88-------------82--------------136----------37------------126-------38

Diarrhea------567---------------46-------------46-------------65------------116------------44------50

1908

Malaria ------3938-------------812-------------345-----------751-----------901-----------790----481

Indigestion- -655---------------33----------------82------------49------------32------------44------11

Diarrhea-------87----------------55----------------59---------187-------------14------------90-----66

1909

Malaria ------3149--------------760------------582----------834------------765-----------537-----330

Indigestion- ---793--------------187------------84-----------266------------98------------291-----82

Diarrhea------505---------------57-------------97-------------218----------144------------58---------30

1910

Malaria -----3623--------------801----------497-------------995----------817------------588-------327

Indigestion---840---------------70------------80-------------741----------205-------------330------78

Diarrhea-------889--------------66------------34-------------136----------166-------------90---------52

1911

Malaria -----2542----------------856----------582------------760----------715------------544-------408

Indigestion- 779-----------------70------------110------------568----------274-----------113---------64

Diarrhea------975----------------86------------82--------------93-----------148------------67---------53

1912



Malaria -----1608--------------1041----------375-------------976----------803-----------740--------333

Indigestion- -156----------------81-----------157-------------380-----------92------------229--------61

Diarrhea------437----------------118----------70--------------69------------110-----------118--------95



    बद्री दत्त पांडे ने यात्रा मार्ग (कुमाऊं से बद्रीनाथ ) के निम्न चिकित्सालयों का उल्लेख किया है ( कुमाऊं क इतिहस १९२३, पृष्ठ 143 -144 )-

अल्मोड़ा अस्पताल

अल्मोड़ा सदर अस्पताल

अल्मोड़ा जनाना अस्पताल

पि थौरागढ़

लोहाघाट

भीकियासैण - विशेषतः यात्रा मार्ग हेतु

गणाई - यात्रा हेतु

बैजनाथ जो चाय बगान हेतु शुरू हुआ था

बागेश्वर

  इसी तरह बैजनाथ , नैनीनाग , द्वारहाट , झूलाघाट , धारचूला , कपकोड , मनीला , जैंती , लमगड़ा , खेतीखान , देवलथल , मांसी , नैनीताल में भी अस्पताल खुल गए थे

  भंवासी  में क्षय चिकित्सालय खुल गया था यहां 150 रोगी रह सकते थे। तिबरी में जनाना सेनोटेरियम भी था।




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1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -6
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  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;


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   कुणिंद  अवसान ( हरिद्वार  ,  बिजनौर  , सहारनपुर   इतिहास )
End of Kuninda rule from haridwar, saharanpur , Bijnor
       
      Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  197
                   
                         
                     हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग - 197               


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती

      प्रारम्भिक काल में कुणिंद शासन यमुना (कालिंदी ) के पूर्व बिजनौर व उत्तर में तिब्बत सीमा तक रहा ततपश्चात कुणिंद गण  .यमुना से पश्चिम में बढ़े और सतलज तक कुनिंद गण राज्य रहा।  (डबराल  ) . महाभारत व पुरानों अनुसार पूर्व कुणिंद काल 1400 Bc से 1000 तक रहा (प्रिंसेप , इंडियन ऐन्टिक्विटिज पृष्ठ 85 )।  यद्यपि कोई पुरात्ववेति प्रमाण नहीं मिलते हैं।  पाणनि के अष्टाध्यायी से स्पष्ट है कि कुणिंद जनपद पांचवीं सदी तक अवश्य थे। चौथी सदी के प्रथम काल में  रावण या उसके उत्तराधिकारियों का राज बिखरने लगा था।
इस प्रकार पर्वतीय उत्तराखंड , बिजनौर , हरिद्वार व सहारनपुर क्षेत्र में 950 BC से 350 AD तक कुणिंद शासन रहा।
कहा जाता है कि नंद वंश की स्थापना भी किसी कुणिंद शाखा ने की थी। मौर्य वंश का भी प्रभाव कुणिंन्द जनपद पर था।
    यवनों दासता मुक्ति हेतु कुणिंदों ने शुंग की आधीनता स्वीकार की व पश्चिम में पड़ोसियों की रक्षा हेतु कार्य भी किये। अमोधभूति ने सारे जनपद को संगठित करने हेतु संघर्ष किया।  अमोधभूति के वंशज कुषाण बासुदेव आदि से कुणिंद भूमि स्वतंत्र करने में सफल अवश्य हुए किन्तु अधिक दिन तक क्षुण न रख सके। अंत में विशाल कुणिंद जनपद छोटे छोटे राज्यों में बंट गया गणसत्ता के स्थान पर अश्वमेध यज्ञ करने वाले नरेश के हाथों एकछत्रीय राजाओं के पास सत्ता ा गयी।
    कुणिंद गगनराज समाप्ति के साथ भी अन्य गणराज जैसे यौयेध , त्रिगर्त , कुलूत भी लुप्त हो गए।
कुणिंद एक विशाल गणराज्य का समाप्त होना एक हानिप्रद घटनाएं सिद्ध हुईं।

       





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   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --

हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -


      Ancient History of Kunind  Rule on Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Kunind  Rule on Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Kunind  Rule on   Telpura Haridwar, Uttarakhand  ;   Ancient  History of  Kunind  Rule on Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient   History of Kunind  Rule on Roorkee, Haridwar, Uttarakhand  ;  Ancient  History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand  ;   Ancient History of Kunind  Rule on Manglaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ;     Ancient History of Kunind  Rule on Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ;     Ancient  History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ;    Ancient History of Kunind  Rule on Landhaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Kunind  Rule on Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar;      History of Kunind  Rule on Narsan Haridwar, Uttarakhand ;    Ancient History of Kunind  Rule on Bijnor;    Ancient  History of N Kunind  Rule on azibabad Bijnor ;    Ancient History of Kunind  Rule on Saharanpur;   Ancient  History of Nakur , Saharanpur;    Ancient   History of Deoband, Saharanpur;     Ancient  History of Badhsharbaugh , Saharanpur;   Ancient Kunind  Rule on Saharanpur History,     Ancient Kunind  Rule on Bijnor History;
कनखल , हरिद्वार पर कुणिंद शासन इतिहास ; तेलपुरा , हरिद्वार  पर कुणिंद शासन इतिहास ; सकरौदा ,  हरिद्वार  पर कुणिंद शासन इतिहास ; भगवानपुर , हरिद्वार  पर कुणिंद शासन इतिहास ;रुड़की ,हरिद्वार इतिहास ; झाब्रेरा हरिद्वार  इतिहास ; मंगलौर हरिद्वार  इतिहास ;लक्सर हरिद्वार  इतिहास ;सुल्तानपुर ,हरिद्वार  इतिहास ;पाथरी , हरिद्वार  इतिहास ; बहदराबाद , हरिद्वार  पर कुणिंद शासन इतिहास ; लंढौर , हरिद्वार  पर कुणिंद शासन इतिहास ;बिजनौर पर कुणिंद शासन इतिहास; नगीना ,  बिजनौर पर कुणिंद शासन इतिहास; नजीबाबाद , नूरपुर , बिजनौर पर कुणिंद शासन इतिहास;सहारनपुर इतिहास; देवबंद सहारनपुर पर कुणिंद शासन इतिहास , बेहत सहारनपुर पर कुणिंद शासन इतिहास , नकुर सहरानपुर पर कुणिंद शासन इतिहास Haridwar Itihas, Bijnor Itihas, Saharanpur Itihas