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Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti

Ek Dabal: Garhwali Poetry Collection of diverged Topics and different styles   
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(गढ़वाल, उत्तराखंड,हिमालय से गढ़वाली कविता  क्रमगत इतिहास  भाग -325 )
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(Critical and Chronological History of Garhwali Poetry, part -325)
(Review of Poetry Collection Ek Dabal'
  By: Bhishma Kukreti   
   Shanti Prakash Jigyasu is a prominent member of Dhad Local Language Movement. 'Ek Daball ' is his second Garhwal poetry collection after 'As'.
There are more than 44  poems, 63 four lines poems, 110 two liner poems in 'Ek dabal'. Every second poem is Chitga'(Splash , Spatter or small poems). There are various subjects in this volume as interpersonal relationship, environment, poverty,  Migration, nature and sharp satire through Chhitga.
  Shnti Prakash is master of Chhitga or small poems.
       In this volume, there are many poems about mother, sacrifice by mother, and treatments by mature sons towards parents as –
वै पर ठोकर लगि
माँन नई धोती किनरि फाड़ दे
माँ जब बीमार ह्वे
वैन रिश्तों से हाथ झाड़ दे.
or
जबरी वैका बच्यां रैनी
वैन ब्वे बुबे टौल नि के जरा
एक दिन कैथे समजाणु छौ
अपड़ी ब्वेबुबे खूब सेवा करा .
  Shanti Prakash uses relationship in illustrating the subject and many times, he uses relationship for creating sharp satire.
    The poem 'Ek Dabal Jhangryaal'  one of the finest poems in Garhwali illustrating pain of poverty –
जरा देर मा
क्वीनौनु र्वेर्वे से जालु
वै देखि हौर्युं बि नींद ऐ जाऊ
त ये बेळ भुक्की रैकी कटे जाऊ
अर य एक दबाळ झंगर्याळ
भोळ सुबेरौ काम ऐ जाऊ
This author rarely witnessed such pathos poem about hunger and poverty in Garhwali.
      Shanti Praksh Jigyasu is one the finest expert in using conventional symbols for creating right images .
   Lokesh Navani rightly pointed out in his forwarding note that Shanti Prakash is successful in using conventional or common symbols for attacking the faults as  – 'vodu', 'cheera', 'thatta', matai kisraan', 'tilwi daani' afkhau , or full poetry through symbols-
  राज चलणु अंगुळयूं मा
रेखड़ा उन्द उब्ब हूणा छन्न
कुछ रजणा छन ठाट से राज
बाकी लोग टपराणा छन
or
अफखौहोलू जु पैली बिटी
वैन कैका हक मा किले रांण
खयो नि खयो वैसे कुछ भी
लुटेरों भागौ सब छोड़ जाण
or  the following poem is completely symbolic in words and for reader's understanding too.
जु मजदूर भुयां म सेंदूव्
वु  सुपन्युं मा स्वरग देखदू
जू अमीर रुप्यों म सेंदू
वु सुप्न्य म नरक देखदु

   Garhwali novelist Harsh parvatiya rightly   pointed out another especial feature of poems by Shanti Prakash is really remarkable. Shanti Criticizes sharply the wrong customs, corruption, political misdoings but Shanti never uses leader 'neta'  word in his such poems. That clearly shows Shanti believes that it is not the political society that is responsible for wrongs but the society as such is responsible that offering opportunities for political misuses.
जौंका बान धुंवन आंखी फुट गैनी
वूंन अबी तक हमरा चश्मा नि बणऐन
  The above small poem is one of the finest examples of symbolism in Garhwali poems.
    There has been long discussion on 'Chitga' poems (small sharp satirical poems) and most of Critics as Virendra Panwar or Kukreti agreed that Shanti Prakash is one of masters in creating sharp satire through Chitga poems.
     The present volume of poetry collection by Shanti Prakash Jigyasu proves that Shanti Prakash Jigyasu is one of finest Chitga creators in Garhwali poetry world. Poetry critics Dr. Manju Dhoundiyal appreciates his uses of words creating wits and sharp criticism to wrong happenings in the society as –
भगवानन मनखी तैं जिन्दगी ज्यूणु दे
उखमा बि सुख दुःख खुजै
  Poetry expert Dr. Manju Dhoundiyal states that Shanti Prakash uses contradiction effectively in his small poems Chhitga-
यूँ आंख्युं म असदरी बारामास रै
छौंदी कुटुमदारी जिकुड़ी  तिसाळी रै
    Shanti Prakash Jigyasu uses universal Garhwali for creating Garhwali verses and  Garhwli readers from all corners would find his poems easily understandable. Critics will place Shanti on top in Garhwali poetry world for his best uses of symbols in creating small poems.

   




         
   



Ek Dbal (एक दबाळ)
By Shanti Prakash jigyasu
Year -2012, Total pages -120
Published by Dhad Prakashan Dehradun

Copyright@ Bhishma Kukreti, 2018
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चमोली गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत  इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत  इतिहास ; टिहरी गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत  इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत  इतिहास ; देहरादून गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत  इतिहास ; हरिद्वार गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत  इतिहास ;
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History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Uttarkashi Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Tehri Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Dehradun Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Chamoli Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Pauri Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History  Garhwali poems from Haridwar ;



Bhishma Kukreti



ब्रिटिश काल में यात्रा मार्ग पर चट्टी प्रबंध (काला लोगों द्वारा विशेष पर्यटन प्रबंधन )

Chatti management  in British  Era
( ब्रिटिश युग में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  65

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -  65               

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--169)   
    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 169


    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )

बद्रिकाश्रम व केदारेश्वर यात्रा माह्भारत संकलन -सम्पादन काल से भी शस्त्र वर्ष पहले से चली आ रही हैं। इतने सालों तक ऋषिकेश -देवप्रयाग मोटर मार्ग बनने से पहले ऋषिकेश से बद्रीनाथ जाने का एक ही पैदल मार्ग था और वह था पौड़ी गढ़वाल में गंगा  तट का।  मार्ग।   सहस्त्रों वर्षों तक यही मार्ग बना रहा।  सहस्त्रों  सालों में पर्यटक सुविधा हेतु एक व्यवस्था निर्मित हुयी जिसे चट्टी व्यवस्था कहते हैं।  चट्टी शब्द द्रविड़ शब्द से बना शब्द है जिसका अर्थ है दुकान अथवा दुकानदारी।  चट्टी के मालिक को चट्टीवाला कहा जाता था।
  चट्टियां ऋषिकेश -बद्रीनाथ के मध्य , कर्णप्रयाग से  से पुनवाखाल कुमाऊं की और जाने वाले मार्ग व रुद्रप्रयाग से गंगोत्री -यमनोत्री -वाले मार्ग पर चार या तीन से चार मील के अंतराल में बनी थी. इससे पहाड़ी प्रदेश से अनभिज्ञ मैदानी यात्रियों को सुविधा सुलभ हो जाती थीं।
                  छट्टियों में चट्टी भवन
यह एक आश्चर्य ही है कि अधिकतर चट्टियों में भवन या दुकाने एक जैसे ही बनाये जाते थे।  भवन चट्टी मालिक अपने धन से निर्मित करवाते थे।  भवन भूमि से दो फिट ऊँचे आधार पर बनवाये जाते थे। एक मंजिला भवन का बड़ा लम्बा कक्ष द्वार विहीन होता था जो मुख्य मार्ग की  ओर खुलता था। बरामदे के एक भाग में दुकान  कक्ष व दुकानदार हेतु शयन कक्ष होता था।  सर्दियों में भोजन पकाने हेतु एक चूल्हा भी होता था।  छतें या तो घासफूस या पत्थरों की होती थीं।  कुछ छतें पर चददरों की बनीं होते थे।
    दुकान से बाहर क्यारियां होती थीं। हर क्यारी के किनारे एक चौकी व चूल्हा होता था।  यात्री चट्टी दुकान से मन माफिक  खरीदकर अपना भोजन स्वयं बनाते थे।  चट्टी मालिक चूल्हों की आज लिपाई करता था। चट्टी  मालिक बर्तन ,शयन हेतु कपड़े , लकड़ी का प्रबंध करता था उसके लिए मूल्य निर्धारित थे।  मांश मदिरा सेवन चट्टियों में सर्वथा वर्जित था।  साधुओ के लिए भांग पीने की छूट थी।  चट्टी मालिक तम्बाकू का प्रबंध भी करता था।  हुक्के की छूट नहीं थी।  चट्टी मालिक चिलम रखते थे या पत्ती की चिलम बनाकर यात्रियों को देते थे। अनाज खरदने वाले यात्रियों से शयन व विस्तर मुफ्त था। शयन कीमत एक या दो आना प्रति रात था।
    यदि चट्टी गंगा किनारे हो तो मंदिर भी थे जैसे महादेव चट्टी , व्यासचट्टी आदि।  यदि कोई यात्री रुग्णावस्था में हो तो चट्टी मालिकपास के गाँवों से वैद्य  बुलाते थे।
      यदि किसी यात्री को   थी तो चट्टी मालिक डंडी , पिंस , डोला व घोड़ों की व्यवस्था भी करता था।
         बहुत से यात्री अपना सामान चट्टी में छोड़ आते थे व लौटते समय अपना सामान ले जाते थे।  गढ़वाली चट्टी मालिकों की ईमानदारी की कथाएं सारे भारत में प्रचलित थीं अतः यात्री गढ़वाल यात्रा में चोरी व डकैती से कभी भय नहीं खाते थे।  यात्री रात में भी बिना भी के यात्रा कर लेते थे। यात्रा मार्ग के आस पास के ग्रामीण भी यात्रियों का शोषण नहीं करते थे व समय पड़ने पर बिना शुल्क सहायता करते थे।
  ब्रिटिश शासन में कुछ अंतराल के बाद सरकार ने सफाई कर्मचारी नियुक्त किये जो चट्टियों में सफाई कार्य करते थे। 
ब्रिटिश काल में निम्न चट्टियां कार्यरत थी।

             Chattis on Lakshmanjhula –Badrinath Road

  SN.    Chatti -----Distance---Shops, Nos- SN.    Chatti -----Distance---Shops, Nos

1-Lakshmanjhula------0--------13---------------2------Khairari--------2----------0

3-Fulvari-----------------2---------10--------------4-------Ghattugad-----2---------6

5-Nai Mohan (Chatti)- 3----------3---------------6----Chhoti Bijni-----1----------8

7-Bari Bijni-------------1 ----------8---------------8- Kund---------------3-----------3

9-Banderbhel----------3-------------7--------------10—Mhadev ---------1.5--------18

11- Simwal------------3.5-----------8---------------12--Am-----------------0.25------1

13- Kandi--------------2.5-----------5----------------14-Vyasghat-----------4.5-------10

15-Chhaluri--------------3------------3--------------------16—Umrasu-------------3----2

17—Saur----------------3--------------2-------------------18---Vah (devPrayag)---1---21

19—Ranibag-------------7--------------5------------------20-Rampur------------4-------15

21-Vilvakedar-----------4--------------3-----------------22—Shrinagar-------3---------Big Bazar

23—Sukarta-------------5---------------3-----------------24—Devalgadan ---1.5------1

25-Bhattisera------------1.3--------------7------------------26- Chhantikhal ----1--------1

27- Khankara------------  1 -------------8--------------------28- Narkot------------3 ------4

29- Gulabrai --------------2.5-----------2---------------30- Punar (Rudraprayag)- 1---12

31- Shivanandi -----------7--------------4---------------------32 Kamera ------------4---1

33- Chatwapipal----------5---------------6 ----------------------34Karnaprayag ----4----20

35- Kald--------------------1---------------1-------------------------36 Umta---------------1-----1

37- Jaikandi -------------2------------------1-------------------38- Uttaraul ------------0.25-----1

39- Langasu---------------2----------------4----------------------40- Biroligadhera------2-----------2

41-Sonla--------------------3----------------6-----------------------42- Nandprayag-------3-------24

43-Pursari-----------------1-------------------1----------------------44- Maithana ---------2--------7

45-Kuher----------------- 2--------------------3------------------46- Bayar------------------ 0------1

47- Chamoli--------------2------------------13------------------48-Math-------------------2-------5

49- Mathgadan------------0------------------3-------------------50-Chhinka--------------1-------4

51- Baunla------------------1-----------------6---------------------52-Siyasain-----------2----------7

53-Dhobighat--------------1----------------5--------------------54-Pipalkoti -----------2-----------24

55-Gauriganga--------------3--------------4----------------------56-Tangani--------------2.25-----5

57-Patalganga---------------2--------------7----------------------58- Gulabkoti------------2---------4

59-Helang (Kumarchatti)-2.25----------15---------------------60-Khanoti--------------2.25--------9

61-Jharkuli----------------1----------------2-----------------------62-Singdhara----------2-----------3

63-Chunar (Joshimath)-1-----------------4------------------------64-Vishnuprayag------1------------4

65-Chaldua-------------------------------1-------------------------66-Ghat—4---------------10

67-Nandkeshwar-----------------------3-------------------------68-Pandukeshwar---2----12

69-Bamanganv------------------------3----------------5--------70-Hanumanchatti---2--------5

71- Badrinath --------------------4.25----------------5

Mana ?



  The following Chattis (Staying places for Pilgrims) on Rudraprayag to Kedarnath rout-

SN- Chatti---------Distance----Nos Shop------SN. Chatti-----------Distance ------Nos. Shop

72-Rudraprayag------------0----------4--------------73-Chhatoli---------6 ----------------7

74-Tilwara------------------0------------1-------------75-Math------------2------------------1

76- Rampur- ---------------2------------7------------77-Agustmuni ----3-------------------8

78-Sauri--------------------2--------------4------------79-Kunjgarh/Chandrapuri---2-------12

80-Bhiri------------------3----------------10-----------81-Kund-----------4-------------------5

82-Guptkashi-----------2-----------------10--------------83-Nala ---------1-------------------3

84-Bhet------------------1-----------------8------------------85—Kantva-----2-----------------7

86- Malla----------------0.2--------------2------------------87—Fata ---------3---------------16

88-Badasu--------------2-----------------4-------------------89- Badalpur-------1-------------6

90- Rampur------------2------------------16-----------------91- Trijugi-----------5-----------10

92-Gaurikund----------5-------------------15----------------93- Chirpatiya Bhairav—2--------4

94- Ramwara ------------2---------------- 15----------------95—Kedarnath --------4-----------10

                            *Distance in miles, mile=1.6 kilo meter



Pilgrims used to visit Badrinath from Kedarnath too through Guptakashi to Chamoli . The following Chattis were there from Guptakashi to Chamoli rout-

SN- Chatti---------Distance----Nos Shop------SN. Chatti-----------Distance ------Nos. Shop

96-Nala---------------0--------------3---------------97- Ukhimath----------2.5------------10

98-Kanath--------------3-------------10--------------99-Gwali Bagar----------2------------5

100-Gaira----------------1--------------3-------------101-Godh-------------------0------------1

102- Vyas-----------------0---------------2------------103-Pothivasa------------2-----------12

104-DogliBheent ----------1.5-----------1---------------105-Baniya Kund------0.5-------4

106-Chopta------------------1--------------7--------------107-Jhunkana------------3----------8

108-Bhinodiya--------------1---------------3---------------109-Pangarvasa---------4----------6

110-Mandal-----------------4-------------21 (?)--------------111-Bairagana------------2-----------1

112-Nirau------------------0.5-----------------2----------------113- Kholti-------------0.5----------3

114-Sentuna-----------------1------------------5-----------------115- Gopeshwar----------2----------5

116-Kotiyal Ganv --------2------------------2--------------------117- Chamoli -----------1----------14



     

Pilgrims used to go towards east (through Almora ) from Badrinath to Panuvakhal (last Chatti in Garhwal) via Karnaprayag . The following Chattis were there from  Karnaprayag to Panuvakhal  rout-

SN- Chatti---------Distance----Nos Shop------SN. Chatti-----------Distance ------Nos. Shop

118-Karnaprayag ------0-------------20-----------119- Puli -----------------------------1

120- Ram- --------------0---------------1----------121- Simali--------------4------------12

122-Siroli-----------------2--------------8-----------123-Bharoli------------2-------------7

124-Pipal--------------------------------1-------------125-Adibadari---------4-----------16

126-Kheti---------------9---------------5-------------127-Jangalchatti--------2------------11

128-Devali--------------2---------------4-------------129----Genthabanj------0.5----------2

130-Kalamati-----------1.25-----------2--------------131-Basiyagad---------0.25----------3

132-Gwargadan---------1.50-----------1---------------133- Chunarghat-------1.25---------10

133-Isai Chatti-----------1.25-----------3---------------135—Sainja---------------1--------2

135-Melgwar --------------0.25----------2-----------------137-Agarpanwar ki dukan –0.25—1

137- Mehalchaunri --------1.50----------5----------------139-Punavakhal----3-----------3

Punvakhal was last Chatti for entering into Kumaon .

In Kumaon, there were 42 Chattis between Punavakhal and Ramnagar.

कुमाऊं में 42 चट्टियां थीं
                      *Distance in miles, mile=1.6 kilo meter

            सुमाड़ी के कालाओं का विशेष प्रबंधन

  श्रीनगर के पास कालाओं का गाँव है सुमाड़ी।  कुणिंद शासन के कुणिंद मुद्राओं के सुमाड़ी व भैड़ गाँव (दोनों काला जाति गाँव ) में मिलने से अनुमान लगता है कि काला गढ़वाल में सातवीं आठवीं सदी में बस गए थे किन्तु उन्हें पंवार वंशी राजाओं के यहां कोई बड़ा पद नहीं मिला था।
               कला लोगों का  प्रबंधन में
   काला लोगों का चट्टी प्रबंधन अभिनव था।  उस समय चाय प्रचलन  हुआ था तो यात्रयों हेतु त्वरित ऊर्जा हेतु कोई पेय उपलब्ध न था।  चूँकि अधिकतर यात्रा ग्रीष्म ऋतू में होतीं थी तो दूध रखना संबंद्व न था।  जबकि दूध की बड़ी मांग थी।
          कला लोगों की श्रीनगर से नंद प्रयाग तक चट्टियां थीं।  सुमाड़ी के काला यात्रा सीजन शुरू होने से पहले दुधारू भैंस चट्टियों में ही ले जाते थे।  यात्रियों को ताजा दूध मिलने से श्रीनगर से नंद प्रयाग की चट्टियों का नाम भारत के कोने कोने में विशेष छवि बन गयी थी जिसका जिक्र आदम ने रिपोर्ट ऑन पिलग्रिम रुट किया है।  एक अन्य आश्चर्य यह भी है कि यद्द्यपि यात्रियों की दूध हेतु बड़ी मांग थी किन्तु कालाओं   को छोड़ अन्य लोग चट्टियों में भैंस नहीं रखते थे कालाओं में बहुत से वैद व  तो वैदकी भी कर लेते थे।
    ब्रिटिश शासन ने आदम को यात्रा मार्ग में सुधार हेतु रिपोर्ट बनाने आदेश दिया और आदम ने चट्टी प्रबंधन को सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था करार दिया तथा लिखा कि  गढ़वाल में किसी सुधार की आवश्यकता ही नहीं है । सुरक्षा , यात्रा  सुविधा  प्रबंधन ही तो पर्यटन प्रवंधन है जो चट्टी मालिक करते थे.
           बाबा   काली कमली वालों का योगदान
बाबा कमली वालों की धर्मशालाओं व औषधालयों का गढ़वाल पर्यटन में बड़ा योगदान है। 


Copyright @ Bhishma Kukreti  7/4 //2018

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -6
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Bhishma Kukreti


             युग शैल के अश्वमेध यज्ञ कर्ता  शासक और हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर का इतिहास  (290 -350 ई )-1


     Ashwamedha yagya Performing Kings & History of haridwar, saharanpur and bijnor
        Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  198
                   
                         
                     हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  198               


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती


            अंतिम कुषाण नरेश पश्चात व कुणिंद शासन अवसान बाद पर्वतीय उत्तराखंड व मैदानी प्राचीन उत्तराखंड इतिहास हेतु निम्न सूचनाओं पर निर्भर करना पड़ता है -
अ -  छत्रेश्वर , भानु व रवां की कुणिंद मुद्राएं
ब - गोविषाण में मित्र वंशजों के इष्टका लेख जो बिजनौर इतिहास पर प्रकाश डालने में सहायक हैं
स -प्रयाग प्रसस्ति जिसमे कर्तृ पुर नृपति का उल्लेख है
द -लाखामंडल में प्राचीन प्रसस्ति जो सहारनपुर व हरिद्वार इतिहास हेतु सहायक हैं
  उपरोक्त सामग्रियों से अनुमान लगता है कि कुणिंद अवसान कालीन शासक व गोविषाण (उधम सिंह नगर ) मित्रवंशी समकालीन थे।
       
               पश्चिम देहरादून के जौनसार बाबर क्षेत्र में  (पूर्वी सहारनपुर व उत्तरी हरिद्वार से सटा क्षेत्र ) जयदास या उसके किसी वंशज का शासन था .
         शिव भवानी
जगतग्राम (  पश्चिम देहरादून ) में पुरातत्व विभाग ने 1952 -54 खुदाई की तो देहरादून , सहारनपुर , हरिद्वार इतिहास के नए पृष्ठ खुले।  अम्ब्री गाँव में शिव भवानी का एक अभिलेख मिला व अश्वमेध यज्ञ के चिन्ह भी जगतग्राम में मिले (asidehraduncircle. in /excavation . html )
    महाभारत अनुसार सूर्यवंशी  नभागपुत्र ने प्राचीनकाल में अंबरीष में यज्ञ किया था (आदि पर्व 1 /227 ) .   ब्राह्मी लिपि  व ईंटों से लगता है कि यह साइट तीसरी सदी की है।  अश्वमेध यज्ञ की बलि स्थान व गुरुदाकार वेदी से सिद्ध हुआ कि यहां युगशैल के शासकों ने अश्वमेध यज्ञ किया था। भारत में तीसरी सदी में अश्वमेध यज्ञ की सूचना अभी तक नहीं मिली है।
     चूँकि अभी अभिलेख पढ़ा नहीं गया है तो शिव भवानी के बारे में अधिक जानकारी अभी तक नहीं हो सकी है
 







Copyright@ Bhishma Kukreti  Mumbai, India  2018

   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --

हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -


      Ancient History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Telpura Haridwar, Uttarakhand  ;   Ancient  History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient   History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand  ;  Ancient  History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand  ;   Ancient History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ;     Ancient History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ;     Ancient  History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ;    Ancient History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar;      History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;    Ancient History of Bijnor;    Ancient  History of Nazibabad Bijnor ;    Ancient History of Saharanpur;   Ancient  History of Nakur , Saharanpur;    Ancient   History of Deoband, Saharanpur;     Ancient  History of Badhsharbaugh , Saharanpur;   Ancient Saharanpur History,     Ancient Bijnor History;
कनखल , हरिद्वार  इतिहास ; तेलपुरा , हरिद्वार  इतिहास ; सकरौदा ,  हरिद्वार  इतिहास ; भगवानपुर , हरिद्वार  इतिहास ;रुड़की ,हरिद्वार इतिहास ; झाब्रेरा हरिद्वार  इतिहास ; मंगलौर हरिद्वार  इतिहास ;लक्सर हरिद्वार  इतिहास ;सुल्तानपुर ,हरिद्वार  इतिहास ;पाथरी , हरिद्वार  इतिहास ; बहदराबाद , हरिद्वार  इतिहास ; लंढौर , हरिद्वार  इतिहास ;बिजनौर इतिहास; नगीना ,  बिजनौर इतिहास; नजीबाबाद , नूरपुर , बिजनौर इतिहास;सहारनपुर इतिहास; देवबंद सहारनपुर इतिहास , बेहत सहारनपुर इतिहास , नकुर सहरानपुर इतिहास Haridwar Itihas, Bijnor Itihas, Saharanpur Itihas


)




Bhishma Kukreti


टिहरी रियासत में पर्यटन तंत्र  भाग -1

Laws for Tourism Development in Tehri Riyasat
( ब्रिटिश युग में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -66

-

  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -  66               

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--170)   
    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 170


    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )

  टिहरी रियासत  काल 1816 -1948 तक को अधिकतर जन शोषण काल माना जाता है किन्तु टिहरी रियासत काल में सुचारु उत्तराखंड पर्यटन हेतु कई पग भी उठाये गए थे।

                मोटर मार्ग

1937 -38 में ऋषिकेश से देवप्रयाग मोटर मार्ग निर्मित हुआ पीछे इस मार्ग का  कीर्तिनगर तक विस्तार विटार किया गया
   1921 में ऋषिकेश से नरेंद्र नगर मोटर मार्ग का कार्य प्रारम्भ हुआ पीछे मोटर मार्ग टिहरी तक पंहुचाया गया।
     मानवेन्द्र शाह काल में टिहरी से धरासू तक मोटर मार्ग निर्मित हुआ।
            1940 में टिहरी रियासत में निम्न मुख्य मार्ग थे -
ऋषिकेश नरेंद्र नगर मोटर मार्ग-53 मील
ऋषिकेश देवप्रयाग -कीर्तिनगर मोटर मार्ग -63 मील
टिहरी मसूरी अश्व मार्ग -40 मील
अन्य कच्ची सड़कें 844 मील
             राज्य बंगले
टिहरी रियासत के राजकीय बंगले - कौड़िया , धनोल्टी , पौ , डांगचौरा , धरासू , नाकुरी  बड़ाहाट , भटवाड़ी , हरसिल , जांगला , देवलसारी , मगरा , बड़कोट ,पुरोला , बडियार , फाकोट , नागणी , चमुवा , टिहरी , प्रताप नगर , नरेंद्र नगर और कीर्ति नगर में थे।
              जनता द्वारा मार्ग निर्माण
  अधिकतर मार्ग निर्माण जनता द्वारा ही किये जाते थे।
         टिहरी में नाट्य गृह
टिहरी में एक नाट्य गृह भी निर्मित  किया गया जहां नाटक व सांस्कृतिक प्रोग्रैम होते थे। पांच सखा के गढ़वाली नाटक पाखो का मंचन इसी नाट्यगृह में हुआ था।
      देव प्रयाग में पाठशालाएं
भवानी शाह काल में 1860 में हिंदी व संस्कृत पाठशालाएं खोली  गयीं जो आतंरिक पर्यटन हेतु लाभकारी था।

   गंगाजल विक्रय
भवानी शाह ने गंगोत्री के गंगा जल विक्रय हेतु ठेके की प्रथा प्रारम्भ क।
   भवानी शाह ने कतिपय मंदिरों का जीर्णोद्धार किया व एक दो नए मंदिर भी निर्मित किये व राजप्रासाद भी निर्मित किये।

      प्रताप शाह काल 1871 -1886
प्रताप शाह ो भवन निर्माण का शौक था। टिहरी में मोटर चलने लायक सड़कें बनवायीं।
        टिहरी में चिकित्सालय
प्रताप शाह ने टिहरी में चिकित्सालय बनवाया जहां राजवैद्य रवि दत्त व यूरोपियन पद्धति के डा हरिराम भारतीय चिकित्स्क थे।

     प्रताप नगर की स्थापना
  प्रताप शाह ने टिहरी से 9 मील की दूरी पर 7 हजार फ़ीट की ऊंचाई पर 1877 में प्रताप नगर बसाया। जहां कई उद्यान व भवन निर्मित हुए।  टिहरी से प्रताप नगर तक मार्ग चौड़ा किया गया।

  टिहरी रियासत में शिकार पर्यटन
  भवानी शाह व सुदर्शन शाह अंग्रेज भक्त थे और इस भक्ति प्रदर्शन हेतु कई अंग्रेजों जैसे विल्सन हंटर को शिकार खेलने की इजाजत दे दी थी।  इस दौरान सैकड़ों वन्य जंतु मारे गए।  1935 में वन्य जीवन धिनियम से शिकार खेलने पर प्रतिबंध तो नहीं लगा किन्तु कुछ वन सुरक्षित क्षेत्र घोषित किये गए। 

  चट्टी तंत्र
  गुप्तकाशी या मंदाकिनी घाटी से गंगोत्री -जमनोत्री यात्रा मार्ग व ऋषिकेश -यमनोत्री यात्रा मार्ग पर तीन चार मील पर चट्टियां थीं। केदार सिंह फोनिया ने अपनी  उत्तराखंड पर्यटन पुस्तक में इन चट्टियों का विस्तार से वर्णन किया है


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1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -6
-


  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;


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   युगशैल शासक शील वर्मन

History of  Yugshail Kings of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur

    Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  199
                   
                         
                     हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग - 199                 


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती

राजा शीलवर्मन ने अशोक शिलालेख के ठीक सामने जगतग्राम नामक स्थान में एक या अधिक अश्वमेध यज्ञ किये थे।  यज्ञ हेतु उसने गरुडाकार बलि वेदियां बनायीं थीं जिनकी ईंटों पर निम्न अभिलेख अंकित हैं (सरकार सलेक्टेड इंस्क्रिप्सन vol 1 पृष्ठ 99 ) -
१- सिद्धम , युगेश्वरस्याश्वमेधे युगशैलमहीपते
इष्टका वार्षगणस्य नृपतेशीलवर्मण
२- नृपतेर्वाषगणस्य पोण षष्ठस्य धीमत:
चतुर्थस्याश्वमेधस्य चित्यो  यं शीलवर्मण
उपरोक्त इष्टा लेख से निम्न तथ्य सामने आते हैं -
अ -राजा शीलवर्मन वार्षगण्य गोत्र में पैदा हुआ था
ब = युगशैल या तो राजधानी थी या शासित प्रदेश का नाम था।
स - पोण शीलवर्मन का छटा पूर्व पुरुष था
ध - शीलवर्मन ने इससे पहले तीन अश्वमेध यज्ञ किये थे और एक तो जगतग्राम में सम्पन हुआ था।
             वार्षगणस्य गोत्र
वार्षगणस्य गोत्र उत्तराखंड में नहीं मिलते हैं।  महाभारत अनुसार वार्षगण एक प्राचीन ऋषि थे जो सांख्य व योग गुरु थे।  सांख्य व योग ग्रंथों में वार्षगण का नाम आदर से लिया गया है।  वार्षगण का समय दूसरी सदी का माना जा सकता है। शीलवर्मन छटी पीढ़ी का पुरुष है तो शीलवर्मन का काल तीसरी सदी का माना जा सकता है।
     शीलवर्मन का काल तीसरी सदी के ही समय में यमुना घाटी में सेन बर्मन ने यदुवंश की स्थापना की थी। लाखामंडल में राजकुमारी ईश्वरा लेख में जिन 12 राजाओं के नाम मिले हैं।  किन्तु सरकार व राम चंद्रन इतिहासकार इसे एक ही राजा नहीं मानते हैं।
                      पोण
           शीलवर्मन पोण की छटी पीढ़ी में पैदा हुआ था।  पोण को शीलवर्मन का वंश संस्थापक मान सकते हैं। किन्तु पोण के विषय में कोई अन्य सूचना उपलब्ध नहीं है।  हर्षचरित का पौण /पौणकि के भी संबंध स्थापित नहीं होते हैं।
  शीलवर्मन से पहले चार वंशक भी अज्ञात ही हैं। समुद्रगुप्त से पहले छत्रेश्वर , भानु , रावण, शिवभवानी को शीलवर्मन के पूर्वज व इन्हे पोण उत्तराधिकारी मानने हेतु कोई प्रमाण नहीं उपलब्ध हैं। शिव भवानी पररवर्ती शासक था या शीलवर्मन पूर्वर्ती था पर भी एकमत नहीं हुआ जा सकता है। 

          अश्वमेध यज्ञकर्ता नृप होने से शीलवर्मन का हरिद्वार व पूर्वी सहारनपुर पर शासन होना तर्कसंगत है किन्तु बिजनौर पर तब किसका शासन था अज्ञात ही है।  क्या तब बिजनौर पर मित्र वंशियों का शासन था पर चर्चा अगले अध्याय में की जायेगी।






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   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --

हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -


      Ancient History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Telpura Haridwar, Uttarakhand  ;   Ancient  History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient   History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand  ;  Ancient  History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand  ;   Ancient History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ;     Ancient History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ;     Ancient  History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ;    Ancient History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar;      History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;    Ancient History of Bijnor;   seohara , Bijnor History Ancient  History of Nazibabad Bijnor ;    Ancient History of Saharanpur;   Ancient  History of Nakur , Saharanpur;    Ancient   History of Deoband, Saharanpur;     Ancient  History of Badhsharbaugh , Saharanpur;   Ancient Saharanpur History,     Ancient Bijnor History;
कनखल , हरिद्वार  इतिहास ; तेलपुरा , हरिद्वार  इतिहास ; सकरौदा ,  हरिद्वार  इतिहास ; भगवानपुर , हरिद्वार  इतिहास ;रुड़की ,हरिद्वार इतिहास ; झाब्रेरा हरिद्वार  इतिहास ; मंगलौर हरिद्वार  इतिहास ;लक्सर हरिद्वार  इतिहास ;सुल्तानपुर ,हरिद्वार  इतिहास ;पाथरी , हरिद्वार  इतिहास ; बहदराबाद , हरिद्वार  इतिहास ; लंढौर , हरिद्वार  इतिहास ;ससेवहारा  बिजनौर , बिजनौर इतिहास; नगीना ,  बिजनौर इतिहास; नजीबाबाद , नूरपुर , बिजनौर इतिहास;सहारनपुर इतिहास; देवबंद सहारनपुर इतिहास , बेहत सहारनपुर इतिहास , नकुर सहरानपुर इतिहास Haridwar Itihas, Bijnor Itihas, Saharanpur Itihas


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टिहरी रियासत राजा के पर्यटनोमुखी कार्य  (देव नागरी टाइप राइटर का ांसेस्क कीर्ति शाह )
Touism in Tehri Kingdom
( टिहरी रियासत  में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -67

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  - 67                 

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--171)   
    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 171


    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
कीर्ति शाह काल 1887 -1913 है

     पौड़ी -चमोली गढ़वाल पर ब्रिटिश शासन काल में सदाव्रत गाँवों की आय से 1850 ई से चिकित्सालय व धर्मशालाएं निर्मित होने लगे थे।  टिहरी रियासत में यात्रा मार्ग व पर्यटकों की चिकित्सा   लगभग  उपेक्षित ही रही।    टिहरी यात्रा क्षेत्र में विषैली मखियों के काटने से यात्रियों के पैरों में सूजन आ जाती थी व वे चलने में  लाचार हो जाते थे।  साथी यात्री उन्हें छोड़ जाते थे व कई भूख से मर जाते थे। इसके अतिरिक्त प्लेग , अपच व दस्त से यात्रियों को कष्ट होता था।  टिहरी क्षेत्र के पर्यटन छवि धूमिल पद गयी थी और यात्री संख्य पर प्रभाव पड़ रहा था।
कीर्ति शाह ने ऋषिकेश से गंगोत्री -यमुनोत्री , मूखीम जाने वाले मार्गों का जीर्णोद्धार करवाया व चिकित्सालय खुलवाए व नदियों पर झूले बनवाये जिससे गंगोत्री -यमुनोत्री यात्रियों को बहुत लाभ पंहुचा।  कीर्ति शाह ने सार्वजनिक निर्माण विभाग की स्थापना की राजधानी व प्रमुख मार्गों का जीर्णोद्धार किया गया।  कई धर्मशालाएं भी खोले गए।  कुछ डाक बंगले भी खोले गए। देवप्रयाग , प्रतापनगर , गंगोत्री व यमुनोत्री की व्यवस्था भार पुलिस को सौंप दी गयी। कीर्ति शाह ने कुष्ठाश्रम की भी स्थापना की।

           देवनागरी टाइप राइटर अन्वेषण

कीर्ति शाह स्वयं भी बिलक्षण था।  दरबार के
कई मैकेनिकल कार्य वह स्वयं करता था। देव नागरी  टाइप राइटर की खोज का श्रेय कीर्ति शाह को जाता है किन्तु उसने अपना नाम न देकर निर्माण कार्य किसी कम्पनी को दे दिया। (भक्त दर्शन , गढ़वाल की दिवंगत विभूतियाँ पृष्ठ 190 )
      कीर्तिनगर स्थापना
  कीर्ति शाह ने गंगा तट पर श्रीनगर के समीप , मलेथा से कुछ दूर कीर्ति नगर की स्थापना की।
       राजमाता द्वारा मंदिर निर्माण
   कीर्ति शाह को राज मिलने से पहले राजकाज महारानी राजमाता गुलेरी चलाती थीं।  कीर्ति शाह के राज भार संभालने के बाद राजमाता गुलेरी ने पुराने दरबार के नीचे बद्रीनाथ , रंगनाथ , केदारनाथ, गंगा जी मंदिर अपने गहने बेचकर निर्मित किये। राजमाता गुलेरिया ने यात्रियों हेतु एक धर्मशाला भी बनवायी जिसमे यात्रयों को मुफ्त रहने व भोजन का प्रबंध किया जाता था।  राजमाता गुलेरिया ने अपने द्वारा निर्मित मंदिरों के प्रबंधन हेतु समिति भी बनाई थी। टिहरी के बद्रीनाथ मंदिर में संस्कृत में राजमाता का प्रशस्ति पत्र अंकित  है।
         सर्व धर्म सम्मेलन
राजा कीर्ति शाह सनातन धर्मी था किन्तु अन्य धर्मों का भी आदर करता था। एक बार कीर्ति शाह ने  सनातन ,जैन ,आय समाज इस्लाम के विद्वानों को बुलाकर सर्व धर्म सम्मेलन करवाया जिसमे विद्वानों ने अपने धर्मों के बारे में मत दिए।
      स्वामी रामतीर्थ आगमन
  कीर्ति शाह को 1902 में पता चला कि स्वामी राम तीर्थ आये हैं तो कीर्ति शाह ने स्वामी राम तीर्थ को राजकीय अतिथि बनाया और उन्हें टिहरी निवास का आग्रह किया।  कीर्ति शाह ने स्वामी राम तीर्थ का जापान में सर्व धर्म सम्मेलन में सम्मलित होने का पूरा प्रबंध किया। स्वामी रामतीर्थ के जल समाधि बाद कीर्ति शाह ने स्वामी जी के पुत्र को इंजीनियरिंग शिक्षा का प्रबंध किया।

    कीर्ति शाह के उपरोक्त कार्य निश्चित ही गढ़वाल छवि वृद्धिकारक व पर्यटन विकासोन्मुखी थे। टिहरी में नगरपालिका स्थापना व वाटर वर्क्स जैसे विभागों की शुरुवात भी पर्यटन वृद्धि कारक होते ही हैं।  कीर्ति शाह नव कृषि या वैकल्पिक कृषि जैसे बागवानी का समर्थक थ। 



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1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -6
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        शीलवर्मन का शासित क्षेत्र

History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History from 250-350 AD

    Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  200
                   
                         
                     हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  200               


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती


         शीलवर्मन के इष्टकाल में युगशैल के  अतिरिक्त किसी शासित क्षेत्र का नाम नहीं आया है .  एक ही श्लोक  में दो बार युगशैल आने का अर्थ है युगशैल काल सूचक , व स्थान सूचक भी था। युगशैल को राज्य या राजधानो दोनों माना जा सकता है। शीलवर्मन ने जगतग्राम (यमुना पूर्वी तट ) अश्वमेध यज्ञ सम्पन किया जिसका अर्थ है शीलवर्मन का शासन यमुना तट से पूर्व की ओर दूर दूर तक फैला होगा।  कोई एक दो ग्राम जीतने पर कोई अश्वमेध यज्ञ नहीं करेगा।  युगशैल का अर्थ दो शैल या जोड़ी में पहाड़ भी हो सकता है। याने चार अश्वमेध सम्पन करने वाले शासक का विजिट क्षेत्र लघु हिमालय या  मध्य हिमालय भी हो सकता है।  सहारनपुर का पूर्वी क्षेत्र तो अवश्य ही कालसी या जगतग्राम के अंतर्गत रहा होगा।
    अनुमान लगाया जा सकता है कि जगतपुर का नाम युगपुर रहा होगा।
       यदि गोविषाण का मित्र वंश शीलवर्मन का संबंधी या सहभागी था या उसने अश्वमेध में युगशैल को नजराना देना स्वीकार किया हो तो सहारनपुर , हरिद्वार व बिजनौर का भाबर क्षेत्र शीलवर्मन के अंतर्गत रहा होगा।  शीलवर्मन का शासन क्षेत्र अवश्य ही समृद्ध क्षेत्र था। वीरभद्र , ऋषिकेश में प्रथम शताब्दी के समृद्धशाली मृद िनत से बने भवन दीवारें व वाद के पुरात्व अवशेष इस अनुमान को बल देते हैं कि शीलवर्मन का शासन हरिद्वार पर अवश्य था। 
     डा डबराल के पांडुवाला (लालढांग , बहादुराबाद तहसील हरिद्वार ) पुरात्व अवशेष अध्ययन भी इंगित करते हैं कि उस काल में मैदानी भागों में पक्की लाल ईंटो का प्रचलन था व ईंटो पर चित्रकारी की जाती थी पांडुवाला अवशेष अध्ययन बाटते हैं कि भोज्य सामग्री परोसने हेतु कई कायस्थ व धातु उपकरण प्रयोग होते थे। 
     शीलवर्मन काल में शिक्षा का प्रचार संतोषजनक था अन्यथा इष्टका लेख का कोई प्रयोजन न होता।
      शुंग व कुषाण युग में जनता शैव्य सम्प्रदाय की और झुक गयी थी।  वीरभद्र में चौथी -पांचवीं सदी का शैव्य मंदिर भी यही इंगित करता है।  शुंग काल में गरुड़ आकृति का प्रचलन हो गया था विदेशी राजा भी गुर्द ध्वज उपयोग करते थे।  जगतग्राम में गरुडाक्रिति वलिवेदी से अनुमान लगता है वैष्णव धर्म भी प्रचलित था ।
          शील वर्मन का शासन काल
शीलवर्मन का शासन काल समुद्रगुप्त के शासन कल से पहले ही होना चाहिए।  समुद्रगुप्त का शासन काल 340 ई से शुरू होता है और दस वर्ष उसे मध्य देश जीतने में लगे।  अतः शीलवर्मन का शासन काल 340 -350 मध्य माना जा सकता है।  इष्टका लिपि तीसरी सदी की मानी गयी है। 
  रावण , पृथ्वीमित्र , शिवभावानी व शीलवर्मन के मध्य आठ आठ साल का अंतर् होना चाहिए






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   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --

हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -


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Prakriti ar Manikhi: Garhwali poetry collection preaching with mixed emotions
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(गढ़वाल, उत्तराखंड,हिमालय से गढ़वाली कविता  क्रमगत इतिहास  भाग - 326)
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(Critical and Chronological History of Garhwali Poetry, part -326)
  By: Bhishma Kukreti   
     Most of the poems from 53 poems of Prakriti ar Manikhi a Garhwali poetry collection by youngpoet  Arvind 'Prakriti Premi (born 1986, Bajiyal, Tehri ) are of preaching nature. The poets of initial period of Modern Garhwali poets used to create such preaching and inspiring poems as Sada Nand Kukreti or yogendra Puri.
Vandana is about prayers for development of local languages as Garhwali and Kumaoni.Prakriti uthige is about preaching for timely action, Katyala is about protecting trees for human benefits; Gham is about characteristics of sunlight, 'jwanii ma thaki ni jai ' illustrates comparision between karma and Bhagy (Action and Luck); the poem 'Bhed kai ma ?' criticizes human beings for his  matirailistic approaches and characteristicsof nature without any quality control department; sola ana sacchi bat and Yakhi Chhuti Jan', Andher ni holi',  are poems of  universal philosophical subject. There are satirical and mixed emotional poems too in this volume as Timlwa bantwara  (satire), Rauntyalu Uttarakhand (Images of Uttarakhand); Barkha re , Dilai bat  both with (love emotion).
            There are mixed emotions and sentiments in the poems by Arvind Prakriti Premi. Arvind did his best for using nature symbol for creating philosophical images.
    The poems are in modern style but with rhymical tones and structure.
The dialects by Arvind are from Tehri Garhwal area but easily understandable by readers from other regions
    A research Associate Chandra Shekhar Tiwari rightly stated that those poems would be perfect in creating awareness among people.
Prakriti ar manikhi : Garhwali poetry collection
Poet Arvind 'Prakriti Premi'
year -2017 , pages 71
Publisher -  Winsar Publishing Co, Dehradun   

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चमोली गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत  इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत  इतिहास ; टिहरी गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत  इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत  इतिहास ; देहरादून गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत  इतिहास ; हरिद्वार गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत  इतिहास ;
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History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Uttarkashi Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Tehri Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Dehradun Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Chamoli Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Pauri Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History  Garhwali poems from Haridwar ;



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राजा नरेंद्र शाह काल में टूरिज्म

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Uttarakhand Tourism in Narendra Shah Ruling Period
( बमें उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म-4 )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  68

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -  68               

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--172)   
    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 172


राजा नरेंद्र शाह का शासन काल 1919 से 1946 तक रहा। . यह काल टिहरी में स्वंत्रता आंदोलन व राज अत्त्याचारों का काल रहा।  टूरिज्म या पर्यटन दृष्टि से निम्न घटनाएं प्रमुख रहीं -


नरेंद्र नगर की स्थापना

प्रताप शाह व कीर्ति शाह ने अपने नाम से नगर बसाये थे किन्तु वे मोटर मार्ग से भी जुड़ पाए।  नरेंद्र शाह ने ऋषिकेश से 10 मील की दुरी पर 5000 फ़ीट की ऊंचाई पर उड्याळी गाँव में नरेंद्र नगर बसाया जो आज भी उत्तराखंड पर्यटन में अपना योगदान देने में सक्षम है। नगर निर्माण कार्य 1921 में  सहस्त्र चंडी कर्मकांड से शुरू हुआ और दस सालों तक चलता रहा।  महल कार्य 1924 में सम्पन हुआ।  गृह प्रवेश उत्स्व भी धूमधाम से मनाया गया।  सेक्रेट्रिएट भवन 1942 में पूरा हुआ।  नरेंद्र नगर में डाकघर , दुकाने कर्मचारियों के लिए भवन आदि सभी का प्रबंध किया गया था और 30 लाख रूपये में नगर बसाया गया था।


    हेली हॉस्पिटल

१९२५ में नरेंद्र नगर में हेली हॉस्पिटल का निर्माण कार्य 1921 से शरू  हुआ। टिहरी से ऋषिकेश पैदल मार्ग का चौड़ीकरण भी किया गया। जनता से मुफ्त में 'प्रभु सेवा ' के नाम पर कार्य करवाया गया।


चिकित्सालयों की स्थापना

नरेंद्र शाह ने पुराने चिकित्सालयों में नए यंत्रों का प्रबंध किया व कुछ और चिकित्सालय भी खुलवाए।  कुछ डिस्पेंसरियां भी खोलीं गयीं।


  वीर गबर  सिंह स्मारक

प्रथम विश्व युद्ध में शौर्य हेतु विक्टोरिया क्रॉस पदक प्राप्त गबर सिंह की स्मृति में 1924 में चम्बा में एक स्मारक का निर्माण हुआ।


नरेंद्र शाह द्वारा विदेश यात्राएं

नरेंद्र शाह ने 11 बार विदेश यात्रायें  कीं।


ऋषिकेश कीर्ति नगर मोटर मार्ग


1937 -38 में देवप्रयाग से कीर्ति नगर तक मोटर मार्ग निर्मित किया गया।


  नरेंद्र नगर टिहरी मोटर मार्ग व टिहरी से उत्तरकाशी मोटर मार्ग योजनाएं


नरेंद्र शाह और मंत्री चक्रधर जुयाल मोटर मार्ग के पक्षधर थे।  1939 तक नरेंद्र नगर से टिहरी मार्ग पर चम्बा तक मोटर चलने लगीं थीं।

  टिहरी से उत्तरकाशी मोटर मार्ग हेतु सर्वेक्षण कार्य भी किया गया।  कीर्ति नगर से टिहरी मोटर मार्ग की भी योजना बनाई गयी थी।


     तीर्थ यात्रा  सुधार बिल

1924 में तीर्थ यात्री आगमन  वृद्धि हेतु तीर्थ यात्री सुधार बिल पास हुआ।  इस विधान में पंडों , पुजारी हेतु हिंदी , संस्कृत शिक्षा अनिवार्य किये गए व यात्रियों की सुविधा हेतु  चट्टियों में नव प्रबंधन व निरीक्षण का प्रावधान किया गया व अन्य सुविधा हेतु कार्य प्रावधान किये गए। पंडों , पुजारियों को तीर्थ यात्री उन्मुखी बनाने का कार्य प्रशंसनीय ही माना जाएगा।



     द्वितीय विश्व युद्ध में गढ़वालियों का शौर्य

प्रथम विश्व युद्ध की भांति द्वितीय विश्व युद्ध में भी गढ़वाल प्लैटून का शौर्य अविश्मरणीय रहा व गढ़वाल को एक नई छवि व प्रसिद्धि मिली।  दोनों गढ़वाल को सेना में भर्ती होने से समृद्धि के नए द्वार खुले जो आज तक चल ही रहा है।  गढ़वालियों द्वारा विदेश यात्राों या यहीं से कई  नई संस्कृति गढ़वाल को मिलीं जैसे गंगासलाण में गेंद व हिंगोड़ खेल व उत्तररखण्ड को मुशकबाज वाद्य यंत्र।  सेना कर्मियों द्वारा उत्तरखंड के मैदानी हिस्से में बसने का हौसला भी सेना ंवृत कर्मियों द्वारा गढ़वालियों को मिला।  भूतपूर्व सैनिकों ने पर्यटन उद्यम में भी निवेश किया जैसे दुकानें खोलना या भवन निर्माण करना।   सैनिकों द्वारा गढ़वाल में आधुनिक संस्कृति या सभ्यता भी आयात हुयी।  कोटद्वार , काशीपुर जसपुर , देहरादून में नई बसाहत  का श्रेय तो भूतपूर्व सैनिकों  को ही जाता है।  गाँवों में शराब प्रचलन भी सैनिकों द्वारा ही बढ़ा। 







    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )

Copyright @ Bhishma Kukreti  10 /4 //2018

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -6
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Bhishma Kukreti


       
   पांडुवाला पुरात्व और कुषाण काल परवर्ती  हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर इतिहास

   Place of Panduwala, LalDhang  in Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History


        Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -201
                   
                         
             हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -   201             


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती


           पांडुवाला पुरातत्व अन्वेषण का श्रेय इतिहास खोजी डा शिव प्रसाद को जाता है (उत्तराखंड इतिहास भाग 3  पृष्ठ 276 -277 ।
पांडुवाला लालढांग के पश्चिम में कोटद्वार -हरिद्वार मार्ग पर स्थित है। लालढांग हरिद्वार जनपद का बहादुराबाद तहसील का भाग है जो हरिद्वार से 19 . 4 किलोमीटर पूर्व की दूरी पर है और कोटद्वार से पश्चिम  की और 27 किलोमीटर दूरी पर है। पांडुवाला बिजनौर-पौड़ी गढ़वाल सीमा पर स्थित है।
       डा डबराल ने सूचना इस प्रकार दी -
" पांडुवाला सुरक्षित वन में दूर दूर तक प्राचीन वस्तियों के खंडहर फैले हैं। (काल 250 -350 ई  ) शीलवर्मन काल में पांडुवाला एक समृद्ध नगर था।  नगर को पांडुवाला स्रोत्र या रवासन नदी से जल प्राप्त होता था। तालाब तट पर लाल ईंटों की पक्के घात बने थे। तालाब से एक नहर निकाली गयी थी।  शायद गंदे पानी निकास हेतु बनाई गयीं थीं या सिंचाई हेतु।  संभवतः तालाब के किनारे छोटे मोठे मंदिर थे।
      नगर में मुख्य मंदिर शिव मंदिर था।  मंदिर में लाल शिला की लिंगोद्भव मूर्ति थी। मूर्ति मथुरा काल की सुंदर मूर्ति थी (कुषाण काल ). संभवतः कुषाण युग के बाद भी मथुरा कला नष्ट नहीं हुयी थी।  इस मूर्ति को उठाकर पांडुवाला मंदिर में प्रतिष्ठित किया गया है।  अन्य मंदिरों की छोटी मूर्तियां नजीबाबाद मंदिर में प्रतिष्ठित की गयी  किन्तु ये मूर्तियां आठवीं सदी के बाद की हैं।
     जहां आजकल बणगूजरों की बस्ती हैं वहां कभी नगर का विशिष्ठ भाग रहा होगा। यहां यत्र तत्र कटी हुईं शिलायें पड़ी हैं।  इन ईंटों का आकार व प्रकार वीरभद्र में मिले अवशेषों से मिलती हैं। सौ वर्ष पूर्व यहां कई मूर्तियां व चित्रित शिलायें बिखरी थीं जिन्हे मूर्ति चोर ले गए हैं।  "
          स्तूप
पांडुवाला में एक वृहद बौद्ध स्तूप था।  डा डबराल ने लिखा (उपरोक्त संदर्भ ) इस स्तूप के ऊपर छह -बारह फिट तक मिटटी पड़ी है। मैं इस स्तूप देखने गर्मियों में 1968 में गया था। पांडुवाला स्रोत्र के पानी ने स्तूप को बीच से काट डाला है। दीवारों के कुछ भाग दिखाई पड़ते हैं।  किन्तु सुरक्षा न होने से बजरी आदि से ढक गए हैं।
  अब भी स्रोत्र की तलहटी में दोनों और दूर दूर तक मृतिका पात्रों की भरमार है। सावधानी से खोदने पर पात्र पूरे निकल आते हैं।
   डा डबराल को खुदाई बाद कुछ्   मृतिका पात्र मिले थे।
दीपक - छोटे पात्र आज केदीपकों  जैसे थे जो छोटी छोटी सामग्री रखने हेतु रही होंगीं।
कटोरियाँ - लंबोतरी चपटी व रेखाओं से चित्रित कटोरियाँ तरल भोज्य पदार्थ खाने हेतु उपयोग होती थीं
थालियां -थालियां गोल थीं व मध्य में एक गोल आकृति अंकित रहती थी जो  द्योतक रहा होगा।  कुछ थालिओं के मध्य में समांतर रेखाएं चित्रित है यह भी स्तूप का द्योतक होंगे।
कुछ पात्रों  के गले के नीचे कांच मिले जो घिसाई का द्योतक हैं।  कुछ पात्रों में गले के निचे लेप किया गया है। ये पात्र लाल रंग के हैं। अनगिनित आकार की कुंडियां , छातियां मटकियां , मटके भी डा डबराल को मिले थे।
  कुछ मृतिकाओं में अस्थि रसायन मिले।
     एक पात्र के अध्ययन में एक टूटी वाले मृतिका भांड को विशेषज्ञ राय कृष्ण दास ने कुषाण युगीन करार दिया।
फुरर ने प्राचीन पांडुवाला की पहचान ब्रह्मपुर से की। 


 





Copyright@ Bhishma Kukreti  Mumbai, India  2018

   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --

हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -


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