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Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 26, 2009, 12:54:53 PM

Bhishma Kukreti



  जैकीर्ति  शाह और प्रद्युम्न शाह काल याने वर्तमान  उत्तराखंड व भारत

Uttarakhand Tourism in Jaikirti Shah and Pradyuman Shah Period
(  शाह काल में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -54

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -  54                 

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--161 )   
    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 161


    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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जैकीर्ति शाह काल (1780 -1785 ) में जैकीर्ति ने केवल दो ढाई साल ही नाम हेतु शासन किया।  डोभाल मंत्रियों  की आपस में दलबंदी , खण्डूड़ी व डोभाल मंत्रियों  के मध्य हत्त्या वाला बैमनस्य नेगियों, घमंड सिंह मियाँ द्वारा श्रीनगर की गलियों में अराजकता प्रसारण , सिक्खों का दून पर आक्रमण , अजबराम का षड्यंत्र , उधर कुमाऊं में जोशियों के नापाक षड्यंत्र ,प्रद्युमन शाह का कुमाऊं में राज करना आदि गढ़वाल राज के अवसान समय आने का काल है।
  प्रद्युम्न शाह काल (1786 -1804 ) काल तो कुमाऊं की आग द्वारा  गढ़वाल को मटियामेट करने वाला है।  गढ़वाल में षड्यंत्रों का काल है और अंत में गोरखाओं द्वारा गढ़वाल पर अधिकार की कहानी है।
     
              वर्तमान भारत व उत्तराखंड में इतिहास की पुनरावृति
  जैकीर्ति  शाह काल में जैसे क्षेत्रीय क्षत्रपों जैसे नेगियों , मियाओं द्वारा  श्रीनगर में अराजकीय विप्लव हुआ था राजकाज बंधक बना दिया गया था ठीक उसी तरह दक्षिण के राजनैतिक क्षत्रपों ने संसद को बंधक बना लिया है समाज , राजधर्म हासिये पर है और स्वार्थपरक राजनीति अग्रिम पंक्ति में है।
  गढ़वाल के राजकुमार या राजा पराक्रम व प्रद्युम्न शाह के मध्य शासन हेतु षड्यंत्र में गढ़वाल नेपथ्य में चला गया था षड्यंत्र अग्रिम पंक्ति में थे। कॉंग्रेस और भाजपा व अन्य दलों के लिए भारत महत्वपूर्ण  रह ही नहीं गया है अपितु एक दूसरे  को नंगा करने की राजनीति ही रह गयी है सभी दल भारत की बेज्जती करने में आगे दिख रहे हैं।  विदेश नीति में भी राजनैतिक दलों द्वारा एक दूसरे को नीचा दिखाने की नीति भी अच्छे संकेत नहीं दे रहे हैं।
    उत्तराखंड में कॉंग्रेस व भाजपा द्वारा केवल और केवल सत्ता हथियाने हेतु आपस में घोर राजनैतक युद्ध , भाजपा व कॉंग्रेस के अंदर ही अंदर भयंकर भीतरघात ने उत्तराखंड राज्य को उतण खंड बना दिया है।

        पर्यटन उद्यम में निरंतरता व स्थायित्व आवश्यक होता है

  कोई भी पर्यटन तभी विकसित होता है जब योजनाओं के कार्यों में  निरंतरता रहे। राजनैतिक दलीय ओछी नीति कार्यों को प्रभावित करे तो पर्यटन विकास की वही  दुर्दशा होगी जो दुर्दसा आज उत्तराखंड पर्यटन की है।  भाजपा और कॉंगेस की आपस में लड़ने की ओछी नीतियां  उत्तराखंडपर्यटन को आगे नहीं बढ़ने दे रही हैं और सबसे बड़ा रोड़ा है पुराने कार्यों को बंद करना व नए कार्य शुरू करना।  पर्यटन में निरंतरता न हो तो पर्यटन विकसित नहीं हो पाता।  राजनैतिक उठापटक से  उत्तराखंड पर्यटन वैसे विकसित नहीं हो रहा है जिसका वह  हकदार है।

 

         समाज ही उत्तरदायी है

राजनीतिज्ञ दूसरे ग्रह  से अवतरित नहीं होते हैं अपितु हमारे समाज से ही आते हैं।  यदि उत्तराखंड में राजनीतिक कारणों से पर्यटन उस पायदान में नहीं पंहुचा है जिसका उत्तराखंड हकदार है तो उसमे समाज ही उत्तरदायी है।  उत्तराखंडी समाज को ही उत्तरदायित्व लेना होगा कि राजनीतिज्ञ व प्रशासन उत्तराखंड पर्यटन को सही दिशा देकर आगे ले जाएँ।


Copyright @ Bhishma Kukreti   28/3 //2018

ourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी ...

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -4
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  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;


Bhishma Kukreti

Tum, Chup Kilai Chhin! Garhwali Poetry Collection concerns for Himalaya
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(गढ़वाल, उत्तराखंड,हिमालय से गढ़वाली कविता  क्रमगत इतिहास  भाग - 323)
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(Critical and Chronological History of Garhwali Poetry, part -323)
  By: Bhishma Kukreti   
     The Garhwali poetry collection 'Tum Cup Kilai Chhin' by Dipak Nautiyal 'Nishant' (B.1975, Javari, Rudraprayag) is concerning for Himalayan Villages, Himalayan societies and Himalayan environment.
    There are 40 varied subject Garhwali poems in the present collection.  The subjects are pain for rural Himalayan women, migration from Himalayan villages, Changing Himalayan villages, nature imageries of Himalaya, ruined Himalayan villages, love, helpless Himalayan villagers those could not migrate and many other subjects.
       The poetry forms are modern and melodious too.  Dipak uses frequently Rudraprayag dialects but do not disturb the readers. Dipak Nautiyal offered only one lyric in the volume.
      Dipak has been successful in making images by proper symbols common and unconventional ones-
           Visual Imageries
डोखरी पोंगड्यों बिटेन
देखणु रयियों त्वे
घार बिटेन गाड तक
    Images by Figure of Speeches
पहाड़ कु पाणी
पहाड़ कु पराणी
बरखा का धारों सी
बगणों च गंगा छाला मा
   Images by Emotion
हे बसंत
त्वे न्यूतण तैं
उखड़ी सेरा बिटिन
फ्योंळी का फूल दगड़ी 
मन की गिंडाक खोली
  Images by comparison
नौना थैं बैट बौल अर
नौन्युं घास -पाणी  नि लायी ?
  Many poems in the collection are satirical as –
नेता जी ....
एक -द्वी -तीन -चार
यूं कि रक्षा करा त भगवान
घोटालों की बाण मा
जू ठाट कना छन राज मा
  There are various mood and tones in the present poetry collection.
  Garhwali Drama activist Gajendra Nautiyal and poetry critic Manju Dhoundiyal appreciated poems by Dipak Nautiyal.

Tum Cup Kilai Chhin A Garhwali Poetry Collection
By: Dipak Nautiyal, 2013
Winsor Publishing Co, Dispensary Road, Dehradun
Copyright@ Bhishma Kukreti, 2018
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चमोली गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत  इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत  इतिहास ; टिहरी गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत  इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत  इतिहास ; देहरादून गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत  इतिहास ; हरिद्वार गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत  इतिहास ;
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History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Uttarkashi Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Tehri Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Dehradun Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Chamoli Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Pauri Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History  Garhwali poems from Haridwar ;



Bhishma Kukreti



Jitendra Mohan Pant: A Garhwali Poet of Din Bandhu-Ism
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(गढ़वाल, उत्तराखंड,हिमालय से गढ़वाली कविता  क्रमगत इतिहास  भाग - 321)
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(Critical and Chronological History of Garhwali Poetry, part -321)
  By: Bhishma Kukreti   
  Jitendra Mohan Pant created and published a few Garhwali poetries. Jitendra Mohan Pant was born in in 1961, in village Syoli, Pauri Garhwal, Uttarakhand. After taking PG degree, Jitendra joined Army medical core. Jitendra created poems in Hindi and Garhwali as well. Jitendra expired at early age in 1999.
  Garhwali people will remember Jitendra Mohan Pant for his Din Bandhu-Ism in Garhwali poetry. Din Bandh-Ism poetries illustrate equality and empowerment of poor and socially backward class. Prem Lal Bhatt, Jaya Nand Khugas Baulya ji are remarkable poets of Din Bandhu -Ism in Garhwali poetry world
    Jitendra created less number of poetries and his contribution for developing Garhwali poetry literature is important. 
  Jitendra created poems related to social discrimination and imbalance in wealth distribution in India; class differences  in the society (Nanda Devi Twese Vinti ch meri); hill village images (Pyaru Pyaru Ganv Myaru Syoli) and childhood memoirs( Vo School ka  Din ).
   Jitendra shows more concern for common man, poor men  and those suffering due to caste system or  wealth generation by a couple of wealthy men.
        The poetic language of Jitendra Pant is simple, easily understandable. His style of comparison through common symbols is marvelous as in following poem –
कैकी बिरल़ी भी नौणी छ्वड़दी छी,
क्वी रुटि क गफा कु तरसदा छिन,
कैका कुकर हलवा खांदा छिन,
कैका बच्चा भूखा सींदा छिन।
Most of symbols are taken from common life and common figures as Rahim and Mira ( Vo school ka din) .
     The poems are in conventional style.
निर्धनौ शोषण किलैकी
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  गरीब, अमीर कि भारत म या असमानता किलै की च,
निर्धन कु शोषण किलै कि च, यो अत्याचार किलै की च।

कैकी बिरल़ी भी नौणी छ्वड़दी छी,
क्वी रुटि क गफा कु तरसदा छिन,
कैका कुकर हलवा खांदा छिन,
कैका बच्चा भूखा सींदा छिन।
देश का धन थै बंटणा म यो भेदभाव किलै की च,
निर्धन कु शोषण किलै कि च, यो अत्याचार किलै की च।।

जैका भैंसा बंड्या कै छीन,
वो दूध की बूंद नि पे सकदू,
जो सर्या दुन्या कु पेट पल़द,
वो पुटगु भोरी नि खा सकदू।
काम कन वलौं खुणै, अपणी चीज कु अभाव किलैं की च?
निर्धन कु शोषण किलै कि च, यो अत्याचार किलै की च।।

क्वी बैठि . बैठि कै राज कैरी
शासन अपणु चलाणा छीं,
गरीब का खून थै चुसणा छीं,
वेका पसीना से नहाणा छीं।
अमीर गरीब का जीवन से ख्यल्णु रैंदु किलै की च,
निर्धन कु शोषण किलै कि च, यो अत्याचार किलै की च।।

क्वी धन का ऊंचा डांडों म,
घुमदा ही रैंदा जाणू च,
क्वी कभि ऐथर नि बढ़ी पांदू,
सदनि ही लमडणु रैंदु च।
आवा, ये गरीब थै थामा, यो गिरणु किलै की च,
निर्धन कु शोषण किलै कि च, यो अत्याचार किलै की च।।

आवा जवान भैं बंदो,
ईं खाई थै मिटा द्ययूंला,
गरीबै मदद कैरि की
वैथे ऐथर सरकाई द्ययूंला।
आज तक देखी कैकी भि, दुन्या सियीं राई किलैं की च,
निर्धन कु शोषण किलै कि च, यो अत्याचार किलै की च।।

     Jitendra expired  at early age. However, whatever Jitendra created for within short period is remarkable for Garhwali poetry world.
(Created in 1979, Curtsey by Dharmendra Pant  )


Copyright@ Bhishma Kukreti, 2018
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चमोली गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत  इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत  इतिहास ; टिहरी गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत  इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत  इतिहास ; देहरादून गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत  इतिहास ; हरिद्वार गढ़वाल , उत्तराखंड , उत्तरी भारत कविता , लोकगीत  इतिहास ;
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History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Uttarkashi Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Tehri Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Dehradun Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Chamoli Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History and review of Garhwali Poems, Folk Song from Pauri Garhwal, Uttarakhand, South Asia; History  Garhwali poems from Haridwar ;


Bhishma Kukreti


पड्वा बल्द : एक प्रशसनीय व्यंग्य कविता  संग्रह
Padwa Bald by Umesh Chamola: One of Finest Garhwali Satirical poem collections
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(गढ़वाल, उत्तराखंड,हिमालय से गढ़वाली कविता  क्रमगत इतिहास  भाग -322 )
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(Critical and Chronological History of Garhwali Poetry, part -322)
   (Review of a satirical poetry collection 'Padwa Bald)
  By: Bhishma Kukreti   
                  Dr. Umesh Chamola (b.1973, Kaushalpur, Rudraprayag) is a multi-lingual multi genre creative.  Padwa Bald is his remarkable satire creation.
              There are 32 satirical Garhwali poems in this collection. Most of the subjects are attacking on mal practices, corruption in administration, wrong customs, repression and suppression in various fields and various ways.
     Umesh uses old or current sayings for attacking on culprits as in Guru Chela poem-
  गुरु पेंदु पव्वा एक
चेला पेंदु चारेक
  In many places Dr. Chamola ridicules wrongs by  indirect methods as-
   संगती पड्वा बल्द छन
योंकी छ्वीं कैमू लगाणी
Question-answer is one the perfect ways for satirizing in literature or questioning readers is also way of teasing and Umesh uses the both in his verses.
  मी ना पूछा
मीन कती खुशि पाई ?
      One of the ways of criticizing satirically is creating paradox, contradiction  or using praise for criticizing the wrong . Dr. Umesh Chamola uses paradoxical way with ease –
दाग बल अच्छा छन ,
...
अर यूँ धूणों तैं
मटयाणा पाणी का तळोम
गोता छन लगाणा
   Using ignorance by any character is one the methods for creating humor and satire. Dr. Chamola used ignorance by a character in his poem 'Mund Nikhol'.
        Umesh cleverly creates humor and irony by surprising headings of his poem as 'Thag Roti.
     In many cases, dr. Chamola uses complex vocabulary for satirizing the wrongs as in Bhyuchal poem-
हे ऐंच वळू !
पोरे दुंगे चरों
ऐंसू दें भी
भ्यूंचळ अयां
Dr. Umesh cleverly uses figure of speeches for creating sharp satire and sarcasm.
   लोग साल भर माँ एक दिन होली खेल्दन पर सि त साल भर आरोप –प्रत्यारोप अर किचड़ा की होलि खेल्दन.
  Dr. Umesh has word power for using various tactics in creating satire, irony, mockery, ridicules. 
   Poetry critic Dr. Manju Dhoundiyal states that Umesh has great potentiality for creating satirical poems.
  Dr. Umesh Chamola uses conventional and free style in creating satirical poems.
    Overall, the present poetry collection 'Padwa Bald' by Dr. Umesh is one of the finest Garhwali poetry collections.
Copyright@ Bhishma Kukreti, 2018
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Bhishma Kukreti



Prem Lal Gaur Shastri: A Garhwali Poet 
(गढ़वाल, उत्तराखंड,हिमालय से गढ़वाली कविता  क्रमगत इतिहास  भाग - 320)
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(Critical and Chronological History of Garhwali Poetry, part -320)
  By: Bhishma Kukreti   (Literature Historian)
    A famous Hindi creator Prem Lal Gaur Shastri created Garhwali prose as well Garhwali poetry. Critics appreciated his Garhwali prose article collection 'Premakanki '
      Prem Lal Gaur Shastri was born in 1947 Gaind, Talla Dhangu, Pauri Garhwal (Uttarakhand). After getting Acharya degree from Haridwar, Prem Lal Shastri shifted to Chandigarh.
    A social activist Prem Lal Shastri created a few Garhwali poems published in a few periodicals.
   His poems illustrate pain of society, pain of migration for search of jobs and worsening situation in hills of Uttarakhand. He created a couple of satirical poems too.
    The language of poems by Prem Lal Shastri is Sanskritized. He uses both the conventional style and free style in creating Garhwali poems.

  स्वर्गा  रोहणी
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आज मुक्त धरा कु जीवन
आज मुक्त गगन –समोरण
संतापित –शिषित छ केवल –
अब तक अपणी धरती I
आज विव्हल छ स्वर्गा रोहणी II
अश्रु –भेद आप्लावित तन
वर्चस्वहीन व्यथित जन जीवन
सतत श्रम पीड़ित अंतर्मन I
कब तक या किस्मत मा अपणी-
आज दुखी छ या धरती
आज विव्हल छ  स्वर्गारोहणी II
(Anjwal, October 1990)


Copyright@ Bhishma Kukreti, 2018
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Bhishma Kukreti

अट्ठारहवीं सदी में हरिद्वार में चिकित्सा पर्यटन

Uttarakhand Tourism in Haridwar in Eighteenth Century
(  अठारहवीं सदी में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -55

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -  55                 

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--162 )   
    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 162


    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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  हरिद्वार (गंगाद्वार , कनखल, मायापुरी  ) का  उल्लेख महाभारत , केदारखंड , कालिदास साहित्य ,  हुयेन सांग , तैमूर लंग संस्मरण , गुरु नानक संस्मरण , आईने अकबरी , थॉमस कोरियट ,एडवार्ड  ऐटकिंसन आदि में मिलता है। हरिद्वार के पास सहारनपुर में सिंधु सभ्यता के भी अवशेष मिले हैं।
     तैमूर लंग ने बैशाखी के समय हरिद्वार में कत्ले आम किया था।

                          अट्ठारहवीं सदी में कुम्भ मेला

   यह एक आश्चर्य ही है कि हिन्दू गाते फिरते रहते हैं कि कुम्भ मेला सहस्त्रों वर्षों  से चल रहा है किंतु सबसे पहले कुम्भ मेले का उल्लेख दास्तान -ए -मजहब  (1655 ) में संकेत से ही मिलता है कि जब 1640 में दो अखाड़ों के मध्य युद्ध हुआ था।
   खुलसत -अल -तवारीख़ (1695 ) में बैसाखी के दिन गंगा स्नान आदि क उल्लेख है और लिखा है प्रत्येक 12 वे वर्ष में जब सूर्य कुम्भ राशि में प्रवेश करता है तो  मेला लगता है। किन्तु ग्रंथ में कुम्भ नाम नहीं मिलता है।
   कुम्भ मेले का सर्वप्रथम  उल्लेख 'चहर गुलशन  (17 59 ) में ही मिलता है जिसमे उल्लेख है कि जब गुरु कुम्भ में प्रवेश करता है तो लाखों लोग , फकीर , सन्यासी हरदीवार में जमा होते हैं , नहाते हैं , दान , पिंड दान करते हैं।   स्थानीय सन्यासी प्रयाग से आये फकीरों पर आक्रमण करते हैं।
1750 तक कुम्भ मेला सबसे बड़ा व्यवसायी मेला बन चूका था।

      कुम्भ मेले में 1760 का रक्तपात
धीरेन भगत  व अन्य लेखक जैसे माइकल कुक (2014 )  की पुस्तक 'ऐनसियंट रिलिजन ऐंड  मॉडर्न पॉलिटिक्स (पृ. 236 ) , ईस्ट इण्डिया कम्पनी के रजिस्टरों से पता चलता है कि 1760 के कुम्भ मेले में शैव्य गुसाईं  व वैष्णव बैरागियों मध्य भयंकर युद्ध हुआ था जिसमे 18000 बैरागी मारे गए थे।  1760 के पश्चात जब तक ब्रिटिश ने मेले का प्रबंध अपने हाथ  में नहीं लिया था तब तक वैष्णव बैरागी कुम्भ मेले में भाग नहीं ले सके थे।


       1783 के कुम्भ मेले में हैजा प्रकोप

   1783 का हरिद्वार कुम्भ मेला हैजा प्रकोप के लिए जाना जाता है।  कुम्भ मेले हरिद्वार में लगभग 10 -20  लाख भक्तों ने भाग लिया था। शीघ्र ही हरिद्वार में हैजा फ़ैल गया।  जिसमे पहले आठ दिनों में ही 20 सहस्त्र लोगों की जाने गयीं।  ज्वालापुर में हैजा नहीं फैला।
   जो लोग मेले के बाद बद्रीनाथ यात्रा पर गए वे अपने साथ हैजा गढ़वाल ले गए और वहां भी जाने गयीं।
   
        1796 में सिख उदासियों द्वारा शैव्य गुसाइयों की निर्मम हत्त्या

   तब कुम्भ मेले का प्रबंध शैव्य गुसाईं संभालते थे , सिखों के अड़ियल पन से शैव्य व सिखों में ठन गयी।  सिखों के साथ 12 -14 सहस्त्र  खालसा सैनिक भी थे।  कुम्भ के अंतिम दिन 10 अप्रैल 1795  के सुबह 8 बजे से खालसाओं ने गुसाइयों पर हमला बोल दिया कर उसमे लगभग 500 गुसाईं मारे गए।  सिखों ने 3 बजे हरिद्वार छोड़ दिया।
   
           गुसाइयों द्वारा यात्रियों से कर उगाई

  गुसाईं यात्रियों से कर उगाते थे। गुसाईं हाथ में तलवार व ढाल लेर मेले का प्रबंध करते थे।  गुसाईं महंत लोगों की शिकायत सुनते थे और शिकायत समाधान करते थे।


    कुम्भ मेले में चिकित्सा


   ब्रिटिश शासन से पहले मेलों में चिकित्सा सुविधा क्या थी पर कोई ऐतिहासिक रिकॉर्ड नहीं मिलता है।  ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा विभिन्न व्याधियों व चिकित्सा व्यवस्था रपटों और स्वामी विवेकानंद के 1880 -92  के मध्य हरिद्वार आने और उनके बीमार पड़ने के वृत्तांत से अनुमान लगाया जा सकता है कि सौ वर्ष पहले हरिद्वार में चिकित्सा व्यवस्था कैसे रही होगी। बाद में रामकृष्ण संस्थान ने सेवाश्रम चिकित्सालय खोला और 1902 तक अठारह महीनों में 1054 रोगियों ने हरिद्वार व ऋषिकेश में स्वास्थ्य लाभ लिया।

   कई नागा साधू , गुसाईं , बैरागी व महंत आयुर्वेद विज्ञ  होते थे और चिकित्सा में योगदान देते थे।

अनुमान ही लगाना पड़ेगा कि चूंकि मेले में हिन्दू ही अधिक भाग लेते थे तो आयुर्वेद चिकित्सक ही मेले में अधिक रहे होंगे।

      धार्मिक मेलों में विद्वान् व विशेषज्ञ भी ज्ञान आदान प्रदान हेतु आते थे तो आयुर्वेद चिकित्स्क अवश्य ही अपना अपना चिकित्सा ज्ञान आदान  प्रदान करते रहे होंगे।

       सत्रहवीं सदी से ही हरिद्वार में धार्मिक मेले व्यवसायक भी होने लगे थे तो जड़ी -बूटी -भष्म आदि की विक्री भी हरिद्वार में होने लगी होगी।  वैसे भी मंडी होने के कारण सामान्य समय में गढ़वाल की जड़ी बूटी व अन्य क्षेत्रों की औषधीय वनस्पति व औषधि हरिद्वार में सैकड़ों वर्षों से व्यापारिक स्तर पर बिकती ही रहती थी।

     यूनानी चिकित्स्क भी मुफ्त में या व्यवसायिक तौर पर हरिद्वार कुम्भ मेले या अन्य धार्मिक मेलों में चिकित्सा करते ही रहे होंगे।  रुड़की तहसील में मुस्लिम गाँवों की उपस्थिति से हड्डी बिठाने वाले , मालिस से व्याधि  दूर करने वाले , कई अन्य व्याधियों को दूर करने वाले घरेलू , यूनानी चिकित्स्क अवश्य मेले में आते रहे होंगे।


            राजस्थान या मुल्तान क्षेत्र से आने वाले जड़ी बूटी विक्रेता

  आज भी हरिद्वार में पारम्परिक आरोग्य चिकित्सा से जुड़े लोग जड़ी बूटी सड़क पर बेचते हैं (आज ये हीलर्स अधिकतर सेक्स बीमारियों हेतु जड़ी बूटी या औषधि बेचते हैं (कुमार अविनाश भाटी मुकेश कुमार , 2014 , ट्रेडिशनल ड्रग्स सोल्ड बाई हर्बल हीलर्स इन हरिद्वार , इण्डिया , इंडियन नॉलेज ऑफ ट्रेडिशनल नॉलेज , vol  13  (3 ) , पृ  600 -05 ) ) ।  ये हीलर्स /आरोग्य साधक अधिकतर राजस्थान घराने के होते हैं। सत्रहवीं -अठारवीं सदी में भी   आरोग्यसाधक जड़ी बूटी मेलों में बेचते होंगे।  मुल्तान क्षेत्र के आरोग्यसाधक भी हरिद्वार में चिकित्सा औषधि बेचते रहे होंगे।


        राजाओं , जमींदारों द्वारा यात्रा याने चिकत्स्कों का प्रबंध

    राजा , महाराजे व जमींदार , धनिक भी हरिद्वार  यात्रा पर आते थे।  अवश्य ही वे धनी , सम्पन लोग या तो अपने साथ चिकित्स्क लाते होंगे या हरिद्वार के पारम्परिक पंडों की सहायता से चिकित्सा प्रबंध करवाते होंगे।

          गुरु नानक की यात्रा पश्चात सिख भी जत्थों में आते थे तो अवश्य ही साथ में वैद्य भी आते ही होंगे।

      सदाव्रत या धर्मार्थ चिकित्सालय भी हरिद्वार में रहे होंगे जिनका प्रबंध आश्रमों व मंदिरों द्वारा होता होगा।  गढ़वाल में सदियों से सदाव्रत या मंदिर व्यवस्थापक न्यूनाधिक रूप से चिकित्सा प्रबंध भी करते थे। गढ़वाल में सदाव्रत हेतु मंदिरों को भूमि मिली होती थी। 


Copyright @ Bhishma Kukreti 29  /3 //2018

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  कुषाण युग में हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर में सड़कें 
Roads in Kushan era n Haridwar, Bijnor,   Saharanpur

Ancient  History of  Kushanा in Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  191
                   
                           

कुषाण कालीन हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग - 191                 


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती


        कुषाण काल में चीन व रोम से व्यापर संबंध शुरू हुए। पूरी अपनी पुस्तक में लिखता है कि व्यापार वृद्धि व साम्राज्य सुरक्षा हेतु अच्छी सड़कें निर्माण की गयीं। सड़कों में सुधार किया गया था , सुपथ बनाये गए थे।
    सकल ( सियालकोट ) से प्रतिदिन  पाटलिपुत्र तक 500 गाड़ियां जातीं थीं।  साकल से  श्रुघ्न (सहारनपुर ) से  कालकूट कालसी (सहारनपुर -देहरादून प्राचीन  सीमा ) से गढ़वाल भाभर होते हुए गोविषाण (काशीपुर ) से अहिच्छत्रा मार्ग था।  सोपारा से श्रावस्ती व कशी से तक्षशिला सार्थ चलते थे। राजकीय सुरक्षा के अतिरिक्त लोग अपने साथ पंडित , मार्ग दर्शक भी ले जाते थे।  संभवतया पंडित चिकित्सा में भी सहायक होते थे।
बांस के पुल - नदियाँ पार करने हेतु बांस के पुल बनाये जाते थे।  बड़ी चौड़ी नदियों में नाव से परिहवन होता  था। छोटी छोटी नदियों पर बाँध बनाकर नाव चलाने लायक बना दिए गए थे।
   हरिद्वार से बद्रीनाथ मार्ग - पुरी  अनुसार कुषाण काल से पूर्व ही हरिद्वार से बद्रीनाथ मार्ग से देवप्रयाग होते हुए धार्मिक यात्राएं शुरू हो चुकीं थीं।  संभवतया हरिद्वार -बद्रिकाश्रम मार्ग में भी सुधार हुआ होगा।            धार्मिक सहिष्णुता
यद्यपि कुषाण कालीन शासक बौद्ध थे तभी भी उनकी मुद्राओं में हिंदी , जैन , देवताओं को समुचित स्थान मिला है जो धार्मिक सहिष्णुता का प्रतीक है। 

  कुषाण कल म सभी पंथ की देवी देवताओं की मूर्ति निर्मित होतीं थीं।
हरिद्वार में पशुबलि ?
   कुषाण युग में वैदिक यज्ञों  पशु बलि देने की प्रथा   हो सकता है हरिद्वार के मंदिरों जैसे चंडी मंदिर में पशु बलि दी जाती रही होगी। चंडी मंदिर व उत्तराखंड के कई देवी मंदिरों में पशु बलि कुछ समय पहले ही बंद हुईं

  विष्णु की नारायण रूप में पूजा
     विष्णु की नारायण व वासुदेव रूप में पूजा प्रचलित थी।  बद्रिकाश्रम नारायण रूप में प्रचलित था। विष्णु का सहठुजा रूप व कमलासन अधिक प्रसिद्ध हुआ था।  ंलराम की भी मूर्तियां इस काल में निर्मित हुईं।
 
      शुंग व कुषाण काल में सबसे अधिक पूजा शिव की होती थी। शिव की पूजा रूद्र , पशुपरी व नाग रूप में पूजा होने लगी थी। मथुरा में कुषाण कालीन अर्धनारेश्वर मूर्ति व चतुर्भुज शिव की मूर्ति मिलीं हैं
       शिव को लिंगरूप में भी पूजा होती थी।
हरिदवार -कोटद्वार मार्ग में लल ढांग में पांडुवलाखंडहरों में लिंगधारी मूर्ति मिली थी जिसमे लिंग पर हर गौरी की आकृतियां अंकित हैं (डबराल उत्तराखंड का इतिहास भग -3 पृ . 236
डाब राल अनुसार वीरभद्र में गंगा तट पर लाल शिला का बना एक सुंदर मुखलिंग मिला था (वही )

    बूटधारी सूर्य
  सूर्य को बूट पहने मूर्ति में निर्मित करने की कला कुषाण युग की ही दें है।  उत्तराखंड में कटारमल मंदिर व  मंदिरों में सूर्य बूटधारी सूर्य रूपमे मिलते हैं (डबराल , वही )

    नाग देवता की पूजा
   भात ही नहीं उत्तराखंड में भी कुषाण काल में नाग  पूजा अधिक होती थी।  मूर्तियों में सर्पों को मानव रूप दिया जाता था।   (वी डी महाजन 1990 ,  ऐनसियंट इंडिया , पृ. 1450 ) और नाग पूजा प्रचलित  हुयी
  तीर्थ यात्राओं का प्रचलन भी कुषाण युग में प्रचलित हो चुका था। सम्राट अशोक ने स्वयं कई बौद्ध तीर्थों यात्रा की थी
      अनुमान लगा सकते हैंकि कुषाण काल में हरिद्वार एक तीर्थ स्थल रूप में विकसित हो चुका था। यदि हरिद्वार कुषाण काल में तीर्थस्थल रूप अख्तियार न करता तो सातवीं सदी में चीनी यात्री हरिद्वार की  ओर आकर्षित नहीं होता।

     हरिद्वार से बद्रीनाथ यात्रा
  देवप्रयाग में रघुनाथ मंदिर के पीछे कुछ शिलालेखों में यात्रियों के नाम हैं जो दूसरी से चौथी सदी के मध्य देवप्रयाग आये थे व व शिलालेखों में (एपिग्राफिया इंडिका पृष्ठ 133 ) मानपर्वत (माणा ) अंकन से डा छावड़ा ने अनुमान लगाया कि ये यात्री माणा याने बद्रिकाश्रम गए थे।  तब बद्रिकाश्रम जाने का एक ही मार्ग था हरिद्वार से देवप्रयाग होते हुए बद्रिकाश्रम पंहुचना। 
           हरी की पैड़ी
यदि जनश्रुतियों पर विश्वास करें तो कुषाण  युग में  हरिद्वार में हरी की  पैड़ी पवित्र स्थल प्रसिद्ध हो जाना चाहिए था।  जनश्रुतियों में कहा जाता है कि माहराज विक्रमादित्य (कालिदास काल )  ने हरी की पैड़ी निर्माण किया था।

 

कुशाण इतिहास संदर्भ -
पुरी , इण्डिया अंडर कुषाणज
महाभारत
बंदोपाध्याय - प्राचीन मुद्राएं
घ्रिशमैन , ईरान
एलन - क्वाइन्स ऑफ अन्सिएंट इण्डिया
राहुल , मध्यएशिया का इतिहास
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास भाग -३



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   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --

हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -


      Ancient Kushan  Era History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of ushan  Era Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of ushan  Era Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Telpura Haridwar, Uttarakhand  ;   Ancient  ushan  Era History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  ushan  Era History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient   History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand  ;  Ancient  ushan  Era History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand  ;   Ancient ushan  Era History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ;     Ancient ushan  Era History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ;     Ancient  ushan  Era History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ;    Ancient History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient ushan  Era History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar;      History of ushan  Era Narsan Haridwar, Uttarakhand ;    Ancient History of Bijnor;    Ancient  History of Nazibabad Bijnor ;    Ancient History of ushan  Era Saharanpur;   Ancient  History of Nakur , ushan  Era Saharanpur;    Ancient   History of Deoband, ushan  Era Saharanpur;     Ancient  History of Badhsharbaugh , ushan  Era Saharanpur;   Ancient ushan  Era Saharanpur History,     Ancient ushan  Era Bijnor History;
कनखल , कुषाण कालीन हरिद्वार  इतिहास ; तेलपुरा , कुषाण कालीन हरिद्वार का इतिहास ; सकरौदा ,  कुषाण कालीन हरिद्वार का इतिहास ; भगवानपुर , कुषाण कालीन हरिद्वार का इतिहास ; कुषाण कालीन रुड़की ,हरिद्वार का इतिहास ; झाब्रेरा हरिद्वार का इतिहास ; मंगलौर कुषाण कालीन हरिद्वार का इतिहास ;लक्सर हरिद्वार का इतिहास ; कुषाण कालीन सुल्तानपुर ,हरिद्वार का इतिहास ;पाथरी , कुषाण कालीन हरिद्वार का इतिहास ; बहदराबाद , हरिद्वार का इतिहास ; लंढौर , हरिद्वार का इतिहास ;बिजनौर इतिहास; नगीना ,  बिजनौर इतिहास; नजीबाबाद , नूरपुर , कुषाण कालीन बिजनौर इतिहास; कुषाण कालीन     कुषाण कालीन सहारनपुर इतिहास;  Haridwar Itihas, Bijnor Itihas, Saharanpur Itihas

                     :=============  स्वच्छ भारत !  स्वच्छ भारत ! बुद्धिमान उत्तराखंड  =============:




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उत्तराखंड परिपेक्ष्य में आयुर्वेद निघण्टु  रचना काल

(  आयुर्वेद निघण्टु और में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -5

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -  5                 

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--16 )   
    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 16


    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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वैदिक शब्दों अथवा क्लिष्ट शब्द संग्रह को निघण्टु कहते थे। चिकित्सा सबंधी
औषधि संबंधी शब्दकोशों को सामन्य भाषा में अब निघण्टु कहते हैं।
अमरकोश या  पाणनि अष्टाध्यायी में भी चिकत्सा शब्द कोष मिलते हैं जिन्हे आयुर्वेद निघण्टु कहते हैं
आयुर्वेद निघण्टु में निम्न विषयों पर चिंतन
मनन होता  है
१- बनस्पति का भ्पूगोलिक वितरण
२ -बनस्पति का कोई विशेष गुण
३- बनस्पति का किसी अन्य बनस्पति से या किसी जंतु से समानता
४- बनस्पति के प्रत्येक भाग का उपयोग
५- तौल के मानक
६-बनस्पति में किसी ग्रंथि होने के प्रभाव
७-पत्तों की संख्या व पत्तों के प्रकार
८- फूल की बनावट व विशेषता
९- फलों की विशेषता
९- बीजों के रंग
९- तने का आकार -प्रकार
१०- बनस्पति से बहने वाला दूध या गोंद (latex ) व विशेषता
११- बनस्पति को सूंघने , छूने पर विशिष्ठ प्रभाव या गुण
१२- बनस्पति की विशिष्ठ सुगंध
१३- कांटे
१४- बनस्पति का प्राकृतक वास
ऐतिहासिक महत्व व पूर्व में संहिताओं व निघण्टुओं  में वर्णन
१५- औषधि निर्माण व चिकित्सा विधि





आयुर्वेद निघंटु रचनाएँ व औषधि पर्यटन


पांचवीं सदी से आयुर्वेद निघंटु (शब्दकोश ) रचने या संकलित होने शुरू हो गए थे।

अष्टांग निघण्टु (8 वीं सदी ) , पर्याय रत्नमाला (नवीन सदी ) , सिद्धसारा निघण्टु (नवीं  सदी ) , हरमेखला निघण्टु (10 वीं सदी ) ,चमत्कार निघण्टु व मदनांदि निघण्टु (10 वीं सदी ) ,  द्रव्यांगनिकारा ,द्रव्यांगगुण ,धनवंतरी निघण्टु  , इंदु  निघण्टु ,  निमि निघण्टु ,अरुण दत्त निघण्टु , शब्द चंद्रिका , ( सभी 11 वीं सदी ); वाष्पचनद्र निघण्टु , अनेकार्थ कोष (  दोनों 12 वीं सदी ) ; शोधला निघण्टु , सादृशा निघण्टु ,प्रकाश निघण्टु , हृदय दीपिका निघण्टु  (13 वीं सदी ) ;  मदनपाल निघण्टु ,आयुर्वेद महदादि ,राज निघण्टु , गुण  संग्रह (सभी 14 वीं सदी ), कैव्यदेव निघण्टु , भावप्रकाश निघण्टु , धनंजय निघण्टु  (नेपाल ) ,आयुर्वेद सुखायाम ( सभी 16  वीं सदी के ) आदि  संकलित हुए।


आठवीं सदी के माधव कारा रचित 'रोग विनिश्चय' में व्याधियों के लक्षण व रोगी के लक्षण व रोग कारकों पर चिंतन हुआ है।


सत्रहवीं सदी में रचित आयुर्वेद निघण्टु


सत्रहवीं सदी में निम्न आयुर्वेदिक निघंटुओं  की रचना हुईं  -

लोलिम्बराज कृत -वैद्यवातम्सा अथवा वैद्य जीवन

केशव का कल्पद्रिकोष

त्रिमलभट्ट का द्रव्यगुण शतक व द्रव्य दीपिका

सूर्य कृत चूड़ामणि निघण्टु

माधवकारा  कृत पर्यायरत्नावली

हरिचरण सेन कृत पर्यायमुक्तावली जो पर्यायरत्नावली का परिमार्जित  ग्रंथ लगता है

    अठारहवीं उन्नीसवीं सदी में रचे गए निघण्टु  (1773 AD )

18 वीं सदी के निघण्टु

महादेव कृत हिकमत प्रकाश

राजबल्लभ  कृत राज्बल्ल्भ निघण्टु

रामकारा कृत निघण्टु रामकारा

विष्णु वासुदेव कृत द्रव्य द्याव्य रत्नावली निघण्टु

व्यासकेशवराम कृत लघु निघण्टु


19 वीं  सदी में रचे गए निघण्टु

लाला सालिग्राम कृत वनस्पति शास्त्र निघण्टु

जय कृष्ण ठाकुर कृत वनस्पति शास्त्र निघण्टु

ब्रजचंद्र गुप्ता रचित वनौषधि दर्पण निघण्टु

सौकार दाजी पाडे  रचित वनौषधि दृश्य निघण्टु


स्थानीय भारतीय षाओं में भी निघण्टु रचे गए हैं जैसे पाली में बुध्यति , तेलगु में बल्ल्भाचार्य रचित वैद्यचिन्तामणि।

    इस लेखक ने किसी अन्य उद्देश्य से अनुभव किया कि इन निघण्टुओं में मध्य हिमालय -उत्तराखंड के कई ऐसी वनस्पतियों का वर्णन है जो या तो विशेषरूप से यहीं पैदा होती  हैं या मध्य हिमालय में प्रचुर मात्रा में पैदा होती हैं।  जैसे भुर्ज, भोजपत्र  या पशुपात की  औषधि उपयोग कैव्य देव निघण्टु ,भावप्रकाश निघण्टु व राज निघण्टु में उल्लेख हुआ है। भोजपत्र औषधि का वर्णन अष्टांगहृदय (5 वीं सदी ) में उत्तरस्थान अध्याय भी हुआ है।

    यद्यपि  इस क्षेत्र में खोज की अति आवश्यकता है किन्तु एक तथ्य तो स्पष्ट है कि इतने उथल पुथल के मध्य भी गढ़वाल , कुमाऊं , हिमाचल , नेपाल की औषधि वनपस्पति प्राप्ति , इन वनस्पतियों का औषधि निर्माण हेतु कच्चा माल निर्माण विधि या निर्मित औषधि विधियों के ज्ञान व अन्य अन्वेषण का कार्य व मध्य हिमालय व भारत के अन्य प्रदेशों में औषधि ज्ञान का आदान प्रदान हो ही रहा था। उत्तराखंड से औषधीय वनस्पति , औषधि निर्माण हेतु डिहाइड्रेटेड , प्रिजर्वड कच्चा माल , या निर्मित औषधियों का निर्यात किसी न किसी माध्यम से चल रहा था।  उसी तरह आयात भी होता रहा होगा। 



Copyright @ Bhishma Kukreti   /3 //2018

ourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी ...

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -4
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  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;


Bhishma Kukreti


व्यापार की  बुराई करना मानव पर अन्याय है (उत्तराखंड पर्यटन )


( ब्रिटिश युग   में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -58

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -  58                 

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--195 )   
    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 195


    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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  भारत में महाभारत काल से ही धन की प्रशंसा होती है धन की आवश्यकता को महत्व दिया जाता रहा है किंतु व्यापार द्वारा धन कमाई को ओछा माना जाता रहा है।  वैश्यों से दक्षिणा लेना उचित माना जाता है किन्तु वैश्य वृति को हीन  माना जाता रहा है। उत्तराखंड पर्यटन परिपेक्ष्य में आज भी पहाड़ियों के मध्य यही विचार अधिक चल रहा है।  कृपया पर्यटन पर पत्रकारों  की कोई रपट पढ़िए।  एक ओर वे पर्यटन में शासन की सुस्ती को खरी खोटी सुनाते हैं वहीं दूसरी ओर  व्यापार की कटु आलोचना भी करते रहते हैं।  प्रत्येक वासी प्रवासी पहाड़ी का रोदन होता है कि उत्तराखंड में पर्यटन विकसित हो ही नहीं रहा है औऱ स्वयं पर्यटन  व्यापार में निवेश नहीं करता है।
       बहुत से साहित्यकार प्रवासियों पर व्यंग कसते हैं कि प्रवासी देरादून में घर बना रहे हैं।  किन्तु वेचारे नहीं जानते कि देहरादून , ऋषिकेश में घर निर्माण वास्तव में पर्यटन को ही संबल देता है।
  वास्तव में सभी जागरूक पहाड़ियों को सम्पन प्रवासियों को कोटद्वार , सतपुली , नरेंद्रनगर , द्वारहाट आदि स्थानों में घर ही नहीं दूकान निर्माण हेतु प्रेरित करना चाहिए जिससे पर्यटन में न्य निवेश आये।

                 ब्रिटिश काल में उत्तराखंड विकास के नेपथ्य में ब्रिटिश का व्यापारिक मानसिकता का हाथ है

  इसमें दो राय नहीं हैं कि ब्रिटिश जन का गढ़वाल -कुमाऊं विकास के पीछे व्यापार बृद्धि मुख्य उद्देश्य था।  गढ़वाल -गोरखा शासन की तुलना में जनता को अधिक सुविधाएं मिलीं तो वे सुविधाएं ब्रिटिश व्यापार वृद्धि हेतु निर्मित की गयीं थीं।

व्यापार से समाज में सम्पनता  आती है -
   व्यापार केवल कुछ व्यक्तियों हेतु सम्पनता नहीं लाता अपितु संपूर्ण समाज में सम्पना लाता है। बहुत साल पहले बहुत से पहाड़ी घोड़ा चलाने व्यापार में उतरे तो जनता क माल परिहवन की सुविधा मिलने लगी।  प्राचीन समय में गलादार टिहरी से बैल लाते थे व सलाण  में बेचते थे।  विक्रेता व क्रेता  को लाभ तो मिलता ही था साथ में जहां वे रात्रि वास करते थे उन्हें कुछ न कुछ तो देते ही थे।

व्यापार आजीविका साधन जन्मदाता है
  व्यापार की प्रकृति ऐसी है कि एक व्यापार अपने साथ कई अन्य व्यापारों को भी जन्म देता है जो आजीविका दायक होते हैं।
  व्यापार हेतु आधारभूत संरचना की आवश्यकता होती है और इन आधारभूत संरचनाओं (infrastructure ) से जनता को स्वयमेव सुविधाएँ मिलने लगती हैं।

व्यापार सब्सिडी से नहीं उत्पादनशीलता के बल पर विकास करता है
विश्व में एशिया व अफ्रिका में कृषि व किसान अधिक समस्याग्रस्त हैं।  एशिया में तो भारतीय सनातन धसरम की मानसिकता काय कर रही है।  सनातन धर्म में अनाज , मांश , दूध आदि विक्री को तुच्छमाना गया था।  वही मानसिकता चीन से लेकर मलेसिया तक अभी भी विद्यमान है।  चीन में कुछ समय तक सेल्समैन को बुरी नजर से देखा जाता था के पीछे भी सनातन धर्मी मानसिकता ही थी। वर्तमान में भारत में भी राजनीतिक दल किसानों को केवल अनाज उपजाने की फैक्ट्री मानते हैं और कोई एक ऐसा तंत्र खड़ा नहीं किया गया कि किसान कृषि को स्वतंत्र व्यापार मानकर चले तो किसान अपने आप कई नए क्षेत्रों से कमाई साधन खोजे व उन साधनों को परिस्कृत करे.

   व्यापार नए अविष्कारों का जन्मदाता होता है
व्यापार की  एक विशेषता है कि वह  नए आविष्कार करने को विवश होता है। 18 वीं सदी से आज तक जितने भी बड़े आविष्कार हुए वे युद्ध अथवा व्यापर जनित आविष्कार हैं।

  व्यापार लाल फीताशाही भंजक होता है

व्यापार लाल फीता शाही भंजक होता है ,


व्यापार कर्म को अधिक महत्व दायी होता है

व्यापार कर्म से चलता है भाषणों से नहीं।

  सर्वांगीण विकास हेतु व्यापार

छोटे या बड़े व्यापार हेतु जीवन के प्रत्येक कार्यकलापों की आवश्यकता होती है और न कार्यकलापों को व्यापार स्वयं विकसित करता जाता है।

व्यापार भविष्यदृष्टा समाज पैदा करता है

व्यापार की आत्मा भविष्य दृष्टि होती है।  व्यापार भविष्यदृष्टा सामाज पैदा करता है।


  व्यापार स्वावलम्बी व अनुशासित समाज पैदा करता है

   व्यापार में स्वावलंबन व अनुशासन आवश्यक है।  व्यापार स्वावलम्बी व अनुशासित समाज की रचना करता है  व अनुशासित समाज की परवरिश करता है। 


Copyright @ Bhishma Kukreti   31/3 //2018

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उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी ...

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -4
-


  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;


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काशीपुर फैक्ट्री और स्थान छवि वर्धन में डोक्युमेंट्री फिल्मों का महत्व (संदर्भ फेसबुक में दिनेश कंडवाल व मनोज इष्टवाल ) -- -

Uttarakhand Tourism in British Raj -1
( ब्रिटिश युग में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -57

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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -  57                 

(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--163 )   
    उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 163


    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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  ब्रिटिश भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के नाम से व्यापार करने आये थे और व्यापार प्रसारण व रक्षा हेतु ब्रिटिश भारत भाग्य बिधाता बन बैठा।
  सन 1803 में अवध नबाब के साथ संधि में अंग्रेजों ने कुमाऊं के भाभर -तराई भार पर अधिकार कर लिया और तराई में एक फैक्ट्री खोल दी।  यह फैक्ट्री रेशों से कपड़े , थैले व चीड़ के रेजिन से लीसा निर्माण करती थी।  फैक्ट्री हेतु कच्चा माल पहाड़ों से आने लगा।  गढ़वाल से भी लोग कच्चा माल जैसे भांग के रेशे व लीसा पंहुचाने लगे।
  इतिहासकार बीडी पांडे अनुसार - फैक्ट्री में कम्पनी अधिकारी बार बार एते थे।  सभी अधिकारी कुमाऊं की भौगोलिक व प्रकृति से प्रसन्न होते थे। 1802 में लार्ड वेस्ले ने गॉट को कुमाऊं के जंगलों , जलवायु व न्य परिश्थिति निरिक्षणार्थ भेजा। 1811 -12 में मूरक्राफ्ट व कैप्टेन हेनरी तिब्बत गए व वहां सैनकों द्वारा बंदी बना लिए गए।  छूटने के बाद उन्होंने कुमाऊं के बारे में अलंकृत भाषा में रिपोर्ट भेजी।  कम्पनी उच्च अधिकारी गार्डनर ने भी सकारात्मक रिपोर्ट भेजी।  कहते हैं कि सर्वोच्च अधिकारी हेस्टिंग भी काशीपुर होते हुए कुमाऊं आया था। हेस्टिंग ने भी गुप्त रिपोर्ट भेजी थी जिसमे कम्पनी सर्वोच्च अधिकारी हेस्टिंग ने प्रार्थना की थी कि काश ! कुमाऊं जैसा प्रदेश हमारे हाथ लग जाय !
     नेपाल संधि से पहले ही ब्रिटिश अधिकारियों ने कुमाऊं को नेपाल से छीनकर हस्तगत करने की ठोस योजना बना ली थी।
        कुमाऊं की सकारात्मक रिपोर्टों ने लंदन में बैठे निर्णय में सक्षम अधिकारियों को भी कुमाऊं के प्रति आकर्षण पैदा किया था।  आज भी ये रिपोर्टें कुमाऊं को प्रसिद्धि दिलाती ही रहती हैं। 
   
             डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का पर्यटन विकास व स्थान छविकरण ( प्लेस ब्रैंडिंग ) में महत्व
  डॉक्यूमेंट्री फिल्म व पर्यटन का चोली दामन का साथ है। जब ल्यूमेरे बंधुओं ने 1895 में मूविंग कैमरा अन्वेषित किया तो पर्यटन उद्यम को एक नया माध्यम मिला। लुमेरे बंधुओं की फ़िल्में - अ  'गंडोला सीन इन वेनिस  ' व 'द फिश मार्केट ऐट मार्सेलीज फ्रांस ' , 'द बात ऑफ मिनर्वा ऐट मिलान ' फ़िल्में पर्यटन उद्यम में मील स्तम्भ हैं।  इन फिल्मों ने पर्यटन जगत में क्रान्ति ला  दी थी।  वर्तमान में भी पयटन में फिल्म पर्यटन (Film Tourism ) बहुत प्रचलित हो गया है।  टूरिस्ट ब्रैंड डॉक्यूमेंट्री या वज्ञापन फिल्मों द्वारा टूरिस्ट प्लेस दिखते हैं व पर्यटन स्थल को प्रसिद्धि दिलाकर पर्यटकों को पर्यटन स्थल तक आने को मजबूर करते हैं।
यह  सिद्ध हो चुका है कि फ़िल्में अन्य माध्यमों की तुलना में पर्यटन को सर्वाधिक प्रभावित करती हैं
         फेसबुक में मोबाइल फ़िल्में मोबाईल व लाइव व कुछ कमजोरियां

      उत्तराखंड संबंधी फेसबुक में भी बहुत सी हलचल होती रहती हैं।  सभी सदस्य अपने अपने क्षेत्र की जाने अनजाने फिल्मों या फोटुओं द्वारा ब्रैंडिंग करते रहते हैं। आंतरिक पर्यटनविकास  हेतु यह आवश्यक भी है. किन्तु मुझे भूगर्भशास्त्री दिनेश कंडवाल ने जितना प्रभावित किया है उतना किसी अन्य सदस्य ने नहीं किया है।  दिनेश कंडवाल एक कुशल फोटोग्राफर  तो है ही साथ में फोटो को आकर्षक कैप्सन देने में भी माहिर है तभी तो दिनेश के फेसबुकिया दोस्तों को साइकलबाड़ी के बारे में ज्इतने कम समय में ञान  हो गया है। लघु स्तर पर प्लेस ब्रैंडिंग कैसी होती है दिनेश से सीखना चाहिए। 
बहुत से सदस्य फोटो पोस्ट कर देते हैं किन्तु शीलरशकदेने पर परिश्रम नहीं करते हैं।  बिना शीर्षक के फोटो या फिल्म ऐसी ही है जैसे एक मनुष्य बिना सिर के। दूसरा दिनेश कंडवाल जो भी फोटो पोस्ट करता है वह फोटोग्राफी कोण से या अन्य नजरिये से कुछ विशेष भी होता है।  खिचड़ी छविकरण में प्रयोग नहीं की जाती है।  एक सधे सब सध सिद्धांत  भी लागू होता है
  इतिहास के मामले में मनोज इष्टवाल की फ़िल्में त्वरित आकर्षित करने में सक्षम हैं।  मनोज साथ में इतिहास वृत्तांत देकर क्षेत्र विशेष को वास्तव में अति विशेष बना देता है।  डॉक्यूमेंट्री फिल्मों में भाषा असरदार होनी ही चाहिए।  हाँ नेपथ्य की ध्वनियों पर अभी बहुत से लोगों का ध्यान कम ही गया  है। नेपथ्य की ध्वनियाँ मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालने में कामगर सिद्ध होती हैं।
  फेसबुक में ही  हेमा उनियाल की फोटो भी स्थान ब्रैंडिंग हेतु कामयाब पोस्ट  हैं।  संस्कृति विशेष पोस्ट सदस्यों को आकर्षित करती ही हैं।  हेमा उनियाल भी वृत्तांत देकर स्थान विशेष के प्रति आकर्षण पैदा करने में सक्षम है।
       फेसबुक में लाइव पोस्ट
आजकल मुझे प्रत्येक दिन फेसबुक में लाइव पोस्ट भी आने लगी हैं और वास्तव में ये लाइव पोस्ट मुझे चिड़चिड़ा बना देती हैं।  मैं यह समझ कर लाइव पोस्ट खोलता हूँ कि कुछ विशेष होगा किन्तु मित्र यही नहीं बताते की यह लाइव
किस स्थान का है
क्यों मैं अपना समय बर्बाद कर यह लाइव फिल्म देखूं ?
किस प्रयोजन से मुझे लाइव पोस्ट हो रही हैं
मेरे लिए क्या कार्य है (मुझे क्या ऐक्शन लेना है ?)


Copyright @ Bhishma Kukreti   /1/42018

ourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी ...

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -4
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