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Fairs & Festivals Of Uttarakhand - उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध त्यौहार एवं मेले

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 04, 2007, 01:48:16 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Vedika Ji.

Take out time and once visit any of our UK's Mela. There is also a famous Mela of Dwarahat.. A song has also been composed on that. "Oh Bhina Kaiske Jano Dwarhata".

Quote from: Vedika Rawat on October 30, 2007, 12:00:06 PM

Meine to ek bhi mela attend nahi kiya hain  :'(  :'(
Quote from: M S Mehta on October 16, 2007, 12:41:35 PM

Some other Melas of Almora.

Kasar Devi Mela
The picturesque old part of the town of Almora is the venue for the fair held twice a year.

Shravan Mela
Jageshwar lying in the beautiful Jatganga Valley, housing one of the 12 jyotirlingas of India, is a complex of 12 temples in all.

Somnath Mela
The Somnath Fair held on Vishuwat Sankranti day is celebrated in the Shiva Temple at Masi.

Devidhura Mela:
The Devidhura Fair is held on the day of Raksha Bandhan in August, at the Varahi Devi Temple.

Ram Lila:
The festival of Dussehra is celebrated with great pomp and show all over Kumaon

Uttaranchali Nauni

waise koi tehri k festival k baare mn pata  hain apko ...

n one more Q ...kya mein apko ab karma de sakti ....I hv completed 31 posts .... :) as of now

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Vedika Ji,

Tehri festivel is very famous. I think you give Karama only after 50 posts. You are near to 50 only 19 posts way.. 

Quote from: Vedika Rawat on October 30, 2007, 12:08:56 PM
waise koi tehri k festival k baare mn pata  hain apko ...

n one more Q ...kya mein apko ab karma de sakti ....I hv completed 31 posts .... :) as of now

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


FAIRS OF PITHOGARH DISTT..

The fairs of Pithoragarh are not only an expression of the religious,social and the cultural urges of the people but have also sustained the folk culture
and have been central to the economic activities of  the people. Jauljibi and Thal fairs are primarily trade fairs. During the navratri fair at the Mahakali
temple at Gangolihat the devotees turn up in a very large number and thus these fairs are manifestly religious in nature. The other famous fairs of the
region are :

Mostamanu fair held in Aug. - Sept.
Kapileshwar fair held on Shivratri.
A
Krishna Janmastami fair held at
Kalapani and Gunji

Kanar Devi fair at Baram in Gori
Valley.

Honkra Devi fair at Birthi

Dhanlekh fair at Askot
Lacchar fair at a place Naini Patal

पंकज सिंह महर

जिन तिथियों में स्नान-दानादि कर्म होते हैं, वे पर्व कहलाती हैं। जिनमें आमोद-प्रमोद, हर्ष-आनंद मानाया जाता है, वे उत्सव कहे जाते हैं। यथा होली-दिवाली के त्यौहार उत्सव हैं। संक्रान्ति, पूर्णिमा, गंगा-दशहरा आदि पर्व हैं। जन्माष्टमी, शिवरात्रि आदि व्रत हैं। पर्वोत्सव अथवा व्रतोत्सव सभी त्यौहार कहलाते हैं। कुमाऊँ में निम्नलिखित त्यौहार माने जाते हैं।

१. संवप्सर प्रतिपदा
चैत शुक्ल पड़वा वर्ष के आरंभ में होती है। इस दिन कहीं-कहीं नवदुर्गा की मूर्ति स्थापित की जाती है। हरेला भी बोया जाता है। देवी के उपासक नवरात्र-व्रत करते हैं। चंडी का पाठ होता है। संवप्सर प्रतिपदा को पंडितों से पंचांग का शुभाशुभ फल सुनते हैं।

२. चैत्राष्मी
को देवी-भक्त व्रत तथा पाठ पूजा करते हैं।

३. रामनौमी

विधवा स्रियाँ तथा राम-भक्त लोग व्रत-पूजन स्वयं करते तथा पुरोहितों व ब्राह्मणों द्वारा कराते हैं।

४. दशाई या दशहरा

चैत सुदी दसमी को देवताओं में हरेला चढ़ाकर स्वयं सिर पर चढ़ाते हैं। नवरात्रि के व्रत को पूर्ण करके दान-दक्षिणा, ब्रह्म-भोज भी कराया जाता है।





पंकज सिंह महर

५. विषुवती उर्फ विखौती

नागरिक द्विज लोगों में इस दिन साधारण पर्व संक्रान्ति का माना जाता है। यह संक्रान्ति मेष भी कही जाती हैं, पर देहाती ब्राह्मण, क्षत्रियों तथा शिल्पकारों में पूजन, मिष्ठान, पानादि से अच्छा उत्सव इस दिन मनाया जाता है। कई स्थानों में मेले भी होते हैं। हुड़का बजाकर पहाड़ी गाने गाये जाते हैं, तथा लोग नाचते हैं। यह यहाँ की सूल निवासी जातियों के समय का प्राचीन उत्सव है। इस दिन मछली भी मारते हैं, और बड़े भी खाते हैं। जितने बड़े खाये, उतने ताले भी ड़ाले जाते रहे हैं। किन्तु अब ताले ड़ालने का रिवाज कम हो गया है (एक गरम लोहे की सलाख से पेट को दागना 'ताला ड़ालना' कहा जाता है ।) इस दिन थल द्वाराहाट स्याल्दे, चौगड़ तथा लोहाखाय में मेले होते हैं।

६. बैसाखी पूर्णिमा

स्नान-दानादि की पर्वी मानी जाती है। गंगा सप्तमी भी पुण्य तिथि गिनी जाती है।


७. नृसिंहचतुर्दशी

इसका व्रत वैशाख सुदी १४ को हरिभक्त लोग करते हैं।


८. बट-सावित्री

३० - स्रियों का व्रत होता हैं। सती सावित्री तथा सत्यवान की कथा सुनी जाती है। बट-वृक्ष के तले मृतक सत्यवान, यमराज तथा सती सिरोमणि सावित्री देवी के चित्र लिखकर इनकी पूजा का जाती है। द्वादश ग्रंथ के डोर की प्रतिष्ठा करके स्रियाँ गले में बाँधती है।


९. दशहरा

ज्येष्ठ सुदी १० को गंगा दशहरा मनाया जाता है। यह भारत-व्यापी पर्व है। गंगा-स्नान, शरबत-दान इस दिन होता है। परन्तु कुमाऊँ में "अगस्व्यश्च पुलस्व्यश्च" इत्यादि तीन श्लोक एक कागज के पर्चे में लिखकर प्रत्येक घर में ब्राह्मणों के द्वारा चिपकाये जाते हैं। ब्राह्मणों को स्वल्प दक्षिणा पुरस्कार में दी जाती है। वज्रपात, बिजली आदि का भय इस 'दशहरे के पत्र' के लगाने से नहीं होता, यह माना जाता है।




पंकज सिंह महर

१०. हरेला, हरियाला या कर्क-संक्रान्ति

श्रावण की संक्रान्ति से १०-११ दिन पूर्व बंस-पात्रादि में मिट्टी डालकर क्यारी बना धान, मक्का, उड़द इत्यादि वर्षा काल में उत्पन्न होने वाले अन्न बोये जाते हैं, इसे हरियाला कहते हैं। इसे धूप में नहीं रखते। इसे पौधों का रंग पीला हो जाता है।

(क) हरकाली महोत्सव - गौरी महेश्वर, गणेश तथा कार्कित्तकेय की मिट्टी को मूर्तियाँ बना उनमें रंग लगा मासान्त की रात्रि को हरियाले की क्यारी में विविध फल-फूल तथा पकवान व मिष्ठान से पूजा की जाती है। दूसरे दिन उत्तरांग पूजन का हरेला सिर पर रखा जाता है। बहन-बोटियाँ टीका, तिलक लगाकर हरेला सिर पर चढ़ाती है। उनको भेंट दी जाती है। यह हरेले का टीका कहलाता है।

(ख) यह हरियाला अन्व्यज पर्यन्त सभी वर्ण और जाति के लोगों में बोया जाता है। संक्रान्ति के दिन अपने-अपने देवताओं पर चढ़ा तब अपने सिर में चढ़ाते हैं। ग्राम-देवताओं की धूनी मठ में, जो "जागा" कहलाते हैं, ग्रामवासी लोग हरु, शैम, गोल्ल आदि अपने ग्राम व कुल-देवता की पूजा रोट-भेंट, धूप-दीप, नैवेध, बलि इत्यादि चढ़ाकर करते हैं। प्रत्येक ग्राम की सीमा पर यह (जागा) मंदिर बने होते हैं। यहाँ २२ रोज तक बैसी (बाईसी) का अनुष्ठान, नवरात्रियों में नवरात्र-अनुष्ठान ग्राम-देवताओं का किया जाता है। हरियाला चढ़ाकर इस दिन पूजा होती है। बैसी अर्थात् बाईसी का व्रत करने वाले इस दिन से २२ रोज तक व्रत और त्रिकालस्नान और एक बार भोजन करके ब्रह्मचर्यपूर्वक साधु-वृति में रहते हैं। दिन-रात घर में नहीं जाते। जागा के सठ में देवता का ध्यान-पूजन, धूनी की सेवा करते हैं। रात्रि में देवता का जागा अथवा जागर द्वारा आवाहन किया जाता है। बहुसंख्यक दर्शक यात्री देव-दर्शानार्थ जाते हैं। धन, पुत्र आरोग्य आदि मनोकामना का आशीर्वाद माँगते हैं।

यह मूल-निवासी पूर्वकालीन जातियों के समय की प्राचीन पूजा-पद्धति है, क्योंकि यह रीति कुमाऊँ से अन्यत्र नहीं देखी जाती।


११. हैरिशयनी

यह प्रसिद्ध व्रत है। चातुर्मात्स्य नियम इस दिन से स्रियाँ धारण करती हैं। हरि-बोधिनी का व्रत पूर्ण होते है।



पंकज सिंह महर

१२. श्रावणी १५

इसे  रक्षाबंधन भी कहते हैं। इस दिन यजुर्वेदी द्विजों का उपाकर्म होता है। उत्सर्जन, स्नान-विधि, ॠषि-तपंणादि करके नवीन यज्ञोपवीत धारण किया जाता है। रक्षा-बंधने भी इसी दिन करते हैं। ब्राह्मणों का यह सर्वोपरि त्यौहार माना जाता है। वृत्तिवान् ब्राह्मण अपने यजमानों को यज्ञोपवीत तथा रक्षा देकर दक्षिणा लेते हैं। 

१३. सिंह या घृत-संक्रान्ति

सिंह संक्रान्ति को ओलगिया भी कहते हैं। पहले चंद-राज्य के समय अपनी कारीगरी तथा दस्ताकारी की चीजों को दिखाकर शिल्पज्ञ लोग इस दिन पुरस्कार पाते थे, तथा अन्य लोग भी फल-फूल, साग-भाजी, दही-दुग्ध, मिष्ठान तथा नाना प्रकार की उत्तमोत्तम चीज राज-दरबार में ले जाते थे, तथा मान्य पुरुषों की भेंट में भी ले जाते थे। यह ओलग की प्रथा कहलाती थी। जिस प्रकार बड़े दिन को अँग्रेजों को डाली देने की प्रथा है, वही प्रथा यह भी थी। अब भी यह त्यौहार थोड़-बहुत मनाया जाता है। इसीलिए यह संक्रान्ति ओलगिया भी कहलाती है। इसे धृत या ध्यू संक्रान्ति कहते हैं। इस दिन (बेड़िया) रोटियों के साथ खूब घी खाने का भी रिवाज है। यह भी स्थानीय त्यौहार है।




पंकज सिंह महर

१४. संकष्ट चतुर्थी

भाद्रकृष्ण ४ को संकष्टहर गणेशजी का व्रत तथा पूजन। चंद्रोदय होने पर चन्देराध्रय-दान देकर भोजन होता है। यह व्रत प्राय: स्रियाँ करती हैं।
 


१५. जन्माष्टमी

यह भारत व्यापी त्यौहार है। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म-दिवस सानंद मनाया जाता है। बहुत से लोग व्रत करते हैं। डोल बनाते हैं। पट्टों में कृष्ण-चरित्र लिखे जाते हैं। उनकी पूजा हती है। कोई फलाहार, कोई निराहार व्रत करते हैं। स्मार्त पहले दिन तथा प्राय: वैष्णव दूसरे दिन व्रत रखते हैं।


१६. हरियाली व्रत

भाद्र कृष्ण तृतीया का यह व्रत होता है। स्रियाँ सौभाग्य के लिए व्रत रखती हैं । सामवेदी लोगों का इस दिन हस्त नक्षत्र में उपाकर्म होता है। 


१७. गणेष चतुर्थी

भाद्र शुल्क ४ को गणेशजी का व्रत-पूजन होता है। श्री कृष्ण भगवान को इस दिन चन्द्रमा का दर्शन करने से मणि की चोरी का कलंक लगा था। अत: इस दिन चन्द्रदर्शन वर्जित है।  


१८. ॠषिपंचमी

इसे नागपंचमी या पर्वती में "बिरुड़ पंचमी" भी कहते हैं। भाद्र शुक्ल पंचमी को स्रियाँ व्रत करती हैं। सप्त ॠषियों का अरुन्धती-सहित पूजन होता है। यों नागपंचमी श्रावण शुल्क में होती है, पर इसी दिन करने का नियम चल पड़ा है। इस दिन नागों की पूजा होती है। इस दिन नागों की पूजा होती है। इस दिन स्रियाँ प्राय: कच्चा अन्न खाती है, और हल से उत्पन्न अन्न का भी निषेध है। 


१९. अमुक्ताभरण सपतमी

भाद्र शुल्क सप्तमी को स्रियों का प्रधान व्रत होता है। सप्त ग्रन्थियुक्त डोर के साथ उमा-महेश्वर का पूजन कर स्रियाँ डोर के धारण करती हैं।


२०. दूर्वाष्टमी

भाद्र शुल्क अष्टमी को यह व्रत होता है। सुवर्ण, रौव्य, रेशम इत्यादि की दूर्वा बनाकर पूजा-प्रतिष्ठा कर स्रियाँ उसे धारण करती है। सौभाग्य-संतति प्राप्ति के लिए दूर्वादेवी से प्रार्थना की जाती है। इस दिन भी अग्नि-पक्क अन्न खाना मना है। 

पंकज सिंह महर

२१. नन्दाषटमी

भाद्र शुल्क अष्टमी से लक्ष्मी पूजा-व्रत आश्विन कृष्ण ८ तक अनेक उपासक लोग करते हैं। नंदादेवी का पूजन चन्द-राजाओं के दरबार में परंपरा से बड़ी धूम-धाम से होता आया है। यह कुमाऊँ के जातीय उत्सवों से एक है। नंदा कुमाऊँ की रणचंड़ी है। यहाँ लड़ाई का मूल-मंत्र नंदादेवी की जय है। इसकी पूजा में भैंसे तथा बकरे का बलिदान होता है। अल्मोड़ा में अब भी पूजा ठाट-बाट से होती है, और बड़ा मेला होता है। चन्द-वंश के अवतंस इसका पूजन करते हैं। नैनीताल में स्व. लाला मोतीराम साहजी ने यह मेला चलाया था। कप्यूर, रानीखेत तथा भवाली में भी मेले होते हैं। कुमाऊँ के राजाओं की यह कुल-देवी बताई जाती है।


२२. अनन्त चौदस-व्रत

भाद्र शुल्क चतुर्दशी को होता है। चतुर्दश-ग्रन्थि के ड़ोर की पूजा-प्रतिष्ठा करके इस अनन्त को स्री-पुरुष पहनते हैं। रोट को नैवेध लगता है। यह व्रत खास-खास लोग करते हैं।


२३. खतड़वा

कन्या-संक्रान्ति को फूल के झंड़े बनाकर बालक उत्सव मनाते हैं। "भैल्लो-भैल्लो" करके नाचते हैं। सूखी घास-फूस का 'खतड़वा' बनाकर होली के तुल्य जलाते हैं। ककड़ी, खीरा खाते हैं, तथा दूसरों पर मारते हैं। गढ़वाल-विजय की यादगार में यह उत्सव मनाना कहा जाता है। सरदार खतड़सिंह गढ़वाल के सेनापति थे, जो मारे गये।


२४. श्राद्ध

आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से अमावस्य-पर्यन्त क्षाद्ध पक्ष व पितृपक्ष कहलाता है। पिता की मृत्यु-तिथि को इस पक्ष में पार्वण श्राद्ध किया जाता है। मातृश्राद्ध केवल नवमी को होता है। अमावस्या को पितृ-विसर्जन की तिथि मानते हैं। तपंण करते हैं। सनातनधर्मी शिल्पकार हरिजन लोग भी इसी दिन श्राद्ध करते हैं। ब्राह्मणों में भात (चावल) के पिंड देने की रीति है। अन्य वर्ण जौ के आटे के पिंड बनाते हैं। ब्रह्मभोज के अतिरिक्त भाई-बांधव, अड़ोस-पड़ोस के लोगों को श्राद्ध में भोजन कराया जाता है। मृत पितरों की स्मृती का यह एक बड़ा पर्व माना जाता है।



२५. दुर्गोत्सव

आश्विन सुदी प्रतिपदा से दुर्गापूजन-उत्सव मनाया जाता है। इसे नवरात्र-व्रत भी कहते हैं। हरियाले की क्यारी बोई जाती है। दुर्गापाठ करते-कराते हैं। प्रतिदिन अथवा अष्टमी को घर-घर में दुर्गापाठ करते हैं। कई लोग नौ दिन व्रत रखते हैं। इस अष्टमी को महाष्टमी भी कहते हैं। इस दिन देवी-मंदिरों में बलिदान होता है। गाँवों में यत्र-तत्र 'जागर' लगते हैं। कहीं-कहीं भैंसे, बकरे खूब मारे जाते हैं।