• Welcome to MeraPahad Community Of Uttarakhand Lovers.
 

Niyoli-Hunkiya Baul, Bhagnual-न्योली, हुनकिया बौल, भगनौल,लोक संगीत के हिस्से

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 13, 2009, 10:14:16 PM


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


यह नियोली सुनिए :

ओ जाड़ में काफल  हरिया  छन
वो तुक में काफल काला .

ओ कैले मेरा स्वामी देखि
ओ कान में रायफल वाल

हे हाट की  कालिका
तू दैना है जाय

हे कुशल मंगल माता
स्वामी घर लाये!

ओ घर बाटी निखुख गेई
ओ वो सौराश खाई खीर

ओ जानी -२ पुज्गेयी स्वामी
ओ जम्मू कश्मीर

http://ishare.rediff.com/music/kumaoni-devotional-folk/nyoli/10060897

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


न्योली

भिना घटि पिसो माणू, भिना घटि पिसो माणू
दुसार-तिसार दिन बोछिमा ऐ जाणू
बाड़ बोयो मेती भिना बाड़ बोयो मेती
सिकारी रैपफल छोड़ ध्रै कर खेती


माछि नै भगनू साई माछि नै भगनू
साई चुतिया अमल हैगो रई न सगनू......

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

नामकरणः- ''न्यौली'' कुमाऊँनी गीतों की एक गायन प(ति है। ''न्यौली'' की
व्युत्पति ''नवल'' या ''नवेली'' शब्द से मानी जा सकती है। अर्थात ''न्यौली'' का तात्पर्य
हुआ- नवेली ;कामिनीद्ध को आलम्बन मानकर या सम्बोध्ति करके गाये जाने वाले प्रेम परक
गीत। 35 ''न्यौली'' शब्द की अन्य व्युत्पत्तियाँ निम्न प्रकार की जा सकती हैंः-
;1द्ध न्यौली-नवेली- नव अवली। अर्थात ''नये गीतों की अवली''।
;2द्ध न्यौली-नवेली;नवलद्ध। अर्थात नये छंदां की आशुकविता,जो नितान्त मौलिक हो।
;3द्ध न्यौली-कोयल की एक पहाड़ी प्रजाति, जिसे कुमाऊँ में विरह का प्रतीक माना
जाता है। प्रियतम के वियोग में गहरे घने वन में वह निरन्तर ''झूरती'' ;रोतीद्ध रहती है।36 ऊपर
वर्णित सभी अर्थो में ''न्यौली'' की व्युत्पत्ति पूर्णतः सार्थक और संगत है। अन्तिम व्याख्या
लोकभावना और लोक परम्परा के अनुकूल है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कामनापरक गीतों में ''औछन'' गीत गाये जाते हैं। गर्भिणी की स्थिति का मनोवैज्ञानिक
चित्राण इन गीतों में मिलता है -

खै लियो बोज्यू, मनै की इछिया जो,
खै लियो बोज्यू, बासमती को भात।
उरद की दाल, घिरत भुटारो, दाख दाड़ीमा।
छोलिघ बिजौरा, कैली कचौरी, लाखी को सीकारा।।

"कट्न्या-कट्न्या पौलि ऊँछौ चौमास कौ बन
बग्न्या पाणी थामी जांछौ नी थामीनौ मन"

ये पंक्तियां मुझे एकाधिक कुमाऊँनी गीतों/लोकगीतों में सुनाई दीं और मुझे यह जानकर हैरानी भी हुई और सुख भी कि लोकगीत कितनी सफलता से काव्यात्मक भी रहे हैं। इन पंक्तियों का अर्थ है कुछ यूँ है:

"बार बार कटते रहने पर भी चतुर्मास का वन फिर फिर पनप जाता है,
बहता पानी तो थम जाता है मगर मन नहीं थमता"

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


काटन्या काटन्या पोली आयो चौमासु को वना |
बगंयाँ पाणी थमी जांछो नी थामीनो मना ||
.............................
हात को रुमाल छुट्यो पाणी का खाल में |
कै पापी लै खिति छू मैं दुणा जंजाल में ||
.............................
बरमा जांछ रेलगाड़ी , मथुरा जान्याँ कार |
बची रौंला चिठ्ठी दुला , मरी जूंला तार ||


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


....................
धोती मैली टोपी मैली ध्वे दिन्यो क्वे छै ना |
परदेसा मां मरी जूंला रवे दिन्यो क्वे छै ना ||
..........................
कथै कुनुं को सुणाछ , बड दुःख भारी |
घर जानूं सैणि रिसें , भैर करजदारी ||

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Suresh Pant सुदूर पच्छिमका डोटी अंचलको लोकशैलीमा एस्तो गीत गाईन्छ :

डोटी राम्रो डँडेल्धुरा अछाम राम्रो  साँपे।
मलाई पनि उडाई लैजा ह्यूंचुलीका डाँफे॥
दुल्लुदेई दैलेख सम्म जाँथी हान्यो खम्म।
खाँक फाल तिर्सना झाल घाम लागन्ती सम्म॥
जै गाड बस्याको भोट्या पानी काँ खाँदो हो
हाड मांस माटीका भर हंसा काँ जाँदो हो ||

हरे - ए - ए - हर ----


       
       
  • Suresh Pant ...   पश्चिम नेपाल में ही नहीं, पिठोरागढ़ में भी यह प्रचलित है | यहाँ इसे 'न्योली' के नाम से ज्यादा जाना जाता है  |