Author Topic: Flora Of Uttarakhand - उत्तराखंड के फल, फूल एव वनस्पति  (Read 269364 times)

Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,808
  • Karma: +22/-1
Myths and Religious Importance of Bel, Wood Apple in Uttarakhand 
-
Plant Myths, Religious Importance, and Traditions in Uttarakhand (Himalaya) -18
By: Bhishma Kukreti, M.Sc. (Botany) (Mythology Research Scholar)
Botanical name –Aegle marmelos correa
Local name – Bel
Hindi Name –Bel, Bael
Sanskrit Name –Vilva, Bilva
Economic benefits –Fruits are used for pickle and medical uses.

                   Myths, Religious Importance and Traditions
  Bel or Wood apple is a sacred tree. The three leaves together of Wood Apple or Vilva or Bel look like trident (Trishul ) the emblem of Lord Shiva.  It is belief that these three leaves represent Shiva for s ‘Creation’, Preservation’ and ‘Destruction’.  The three leaves of Bel or wood apple as Sin removers too. People pay tribute to Lord Shiva in his temple by offering Vilva/bel leaves as bilpatri/belpatri on Shiv Linga
 Shiva devotees worship bel tree in moths as Marshirsha and  Falgun. .
  In Banhadadharma Puran, the sacred tree came in existence from the cut breast of Lakshmi while she was worshiping Shiva.That is why bel fruit is called fruit of destiny.
 As Banhi Puran, Lakshmi was cow in a birth and from her dung, Bel tree was born.
 There are stories about bel related to Lord Rama too.
In Skand Puran, the tree merged from sweat from  Parvati forehaed.
        Likewise, there are many other region wise folk stories and stories of  legends connected with Bel tree in Shiv Puran, Garur Purans,.
  Ritual Performers use Bel wood for Homa or havan.
 There are more than 108 mantras for offering belpatra on Shiva Linga.
    Bel Leaves and Fruits in Tantric and Mantric Rituals
 On a n Ashwini nakshtra day, Mantric or Tantrik purifies Bel patra and cow milk together and offers that purified milk mixed with bel leaves to childless woman for getting pregnant.
 Mantric suggests for worshipping Surya Graha or Sun on Saturday by worshipping Bel tree.
 Satya Narayn Shastri Khanduri  (1996) detailed about uses of Bel for performing Uddamarehwar tantra in the book Uddamarehwar tantra  . 
-
Copyright@ Bhishma Kukreti, Mumbai 2017
-
Plant Myths  , Religious Importance, Traditions , Garhwal, Uttarakhand ; Plant Myths , Religious Importance, Traditions , Kumaon, Uttarakhand ;Plant Myths , Religious Importance, Traditions , Uttarakhand; Plant Myths , Religious Importance, Traditions , Uttarakhand, Himalaya; Plant Myths , Religious Importance, Traditions , Uttarakhand, North India; Plant Myths , Religious Importance, Traditions , Uttarakhand, South Asia



Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,808
  • Karma: +22/-1


  उत्तराखंड  परिपेक्ष में   घंडुगळी/गरुंडी   की सब्जी ,औषधीय व अन्य   उपयोग और   इतिहास

                                                 
          History /Origin /introduction, Food uses , Economic Uses of Joyweed,  Alternathera sessilis Himalayan   in Uttarakhand context

          उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  जंगल से उपलब्ध सब्जियों  का  इतिहास - 31

                                     History of Wild Plant Vegetables ,  Agriculture and Food in Uttarakhand -                       
         
           उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --   71

                     History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, Food, Recipes  in Uttarakhand -
-
      आलेख -भीष्म कुकरेती (वनस्पति व सांस्कृति शास्त्री )
-
वनस्पति शास्त्रीय नाम -Alternathera sessilis
सामन्य अंग्रेजी नाम - Sessile Joyweed
आयुर्वेदा नाम-मतस्याक्षी
सिद्ध नाम -पोन्नोकाणी
हिंदी नाम - Garundi , gurro गरूण्डी
नेपाली नाम -भिरिंगी झार
उत्तराखंडी नाम -घंडुग्ली , घंडुगळी , Ghandugli
जन्मस्थल संबंधी सूचना - चूँकि घुंडगळी  Alternathera sessilis  आदि के सबसे अधिक विविध रूप दक्षिण अमेरिका में मिलते हैं तो वनस्पति शास्त्री अनुमान लगाते हैं कि शायद दक्षिण अमेरिका ही
घुंडगळी  Alternathera sessilis का जन्मस्थल हो।  Sanschez  del Pinto (2012 )   के अनुसार गरूण्डी , घुंडगळी  Alternathera sessilis का जन्मस्थल लैटिन अमेरिका ही है और वहां से यह पौधा पुराने गोलार्ध में फैला।  डा गुप्ता अनुसार गरूण्डी , घुंडगळी  Alternathera sessilis के जन्मस्थल के बारे में अभी तक ठीक जानकारी नहीं मिल सकी है। फिर गुप्ता (2014  ) में सिद्ध करने का प्रयत्न किया कि गरूण्डी , घुंडगळी  Alternathera sessili  स्थल प्रशांत महासगरीय किसी द्वीप में हुआ होगा।  चीनी वनस्पति शास्त्री  Fun  आदि (2013 ) ने माना कि गरूण्डी , घुंडगळी  Alternathera sessilis चीन , व  दक्षिण एशिया होना चाहिए।
संदर्भ पुस्तकों में वर्णन - चरक (1000  BC , सी पी खरे की पुस्तक ) ने सारे पौधे को बुद्धि , स्मरणः शक्ति , बाह्य सुंदरता वृद्धि हेतु हिदयात दी है।  भावप्रकाश  (16 वीं सदी ) में  गरूण्डी , घुंडगळी  Alternathera sessili को कोढ़ , रक्तशुद्धि हेतु प्रयोग की हिदायत दी गयी है ।  भावप्रकाश में मत्स्यशाका     Alternathera sessilis व Ethyndra fluctuans  को एक ही  माना गया  है
   चीन के पास होने व आयुर्वेदिक औषधि होने से अंदाज लगाया जा सकता है कि उत्तराखंड में यह पौधा 3000 साल  से किसी  ना किसी रूप में प्रयोग होता रहा होगा।
 
हल्के गुलाबी रंग की टहनी वाले गरूण्डी , घुंडगळी  Alternathera sessilis जमीन में पसरने वाली लता है जो पानी के किनारे भूमि व दलदल में ही उगती है और अनाज के खरपतवार के रूप में उगता है।  वास्तव में यह फल हेतु हानिकारक है।
              औषधि उपयोग -
 आँखों के विकार  नष्टीकरण , रक्त उल्टी रोकने, उत्पादन शीलता बढ़ाने , फोड़े आदि के उपचार में काम आती है।

सब्जी उपयोग
डा जे के तिवारी आदि ने लिखा है कि यह पौधा सब्जी पकाने के काम आता है ( जॉर्नल ऑफ अमेरिकन साइंस , 2010 )
      सब्जी बनाने का तरीका
धूली  व कटी पत्तियां - दो  कप या आवश्यकतानुसार
उबली उड़द या  अरहर या  गहथ - दो चमच
हरी  मिर्च कटी, लम्बाई में -चार
आधा कटा प्याज - आधा घन इंच
अदरक - पिसा हुआ
लहसून - दो जखेलि पिसा
हल्दी व धनिया पॉउडर मसाले - एक या  डेढ़ चमच स्वादानुसार
काली मिर्च - एक पीसी हुयी
कटा धनिया
  कढ़ाई में सरसों का तेल गरम कर राई  या जख्या का तड़का डालें , तड़कने दें , वैसे सफेद दली उड़द के बीज भी तड़के में इस्तेमाल किये जा सकते हैं। उड़द बीज भूरे हो जायँ तो अदरक , लहसून डालें भूने  और तब प्याज डालें। कुछ देर बाद मसाले  डाल कर करछी घुमाते रहिये।  जब प्याज पारदर्शी हो जायं तो कटे घुंडगळी दाल साथ में डालें व तीन मिनट तक पकाएं। फिर पकी सूखी दाल डालें।  मिनट तक पकने दें।  हिलाते रहिये।  तरी बनानी है तो पकी दाल का पानी डालें।
 फिर कटा धनिया डालकर उतार दें व ढक्क्न से  तीन मिनट तक ढके रहिये। गरमागरम परोसिये रोटी या चावल के साथ। 
 


 



Copyright@Bhishma Kukreti Mumbai 2018

Notes on History of Culinary, Gastronomy in Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Doti Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dwarhat, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Champawat Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Nainital Uttarakhand;History of Culinary,Gastronomy in Almora, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Bageshwar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Udham Singh Nagar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Chamoli Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Rudraprayag, Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pauri Garhwal, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dehradun Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Tehri Garhwal  Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Uttarakhand Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Haridwar Uttarakhand;

 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )


Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,808
  • Karma: +22/-1
Myths and Religious Importance of Khair, Catechu in Uttarakhand 
-
Plant Myths, Religious Importance, and Traditions in Uttarakhand (Himalaya) – 19
By: Bhishma Kukreti, M.Sc. (Botany) (Mythology, Culture Research Scholar)
Botanical name –Acacia catechu
Local name – Khair
Hindi Name –Kttha Ped, Khair
Sanskrit name -Khadira
Economic benefits – Medicine for cough, cold, piles, bath by  kattha water for strengthening body of women after delivery. Uses for fodder, Fuel; furniture and household items, tanning and chewing with pan.
                   Myths, Religious Importance and Traditions
   Khair or catechu is one of the sacred plants of Uttarakhand.
     People use Kattha or Khair or catechu wood  in Yagya or Havan/homa.
 People also use Khair tree wood at funeral. People believe that Khair offer ‘mukti’ to deceased soul.

     Kattha in Vashikaran Mantra
  Tantric –Mantric use Kattha with pan, supari , lime for performing “Pan Vashikarn mantra . The Mantric recites following Mantra  purify Pan, Line, Kattha, Supari 28 times.
कुमाऊं -गढ़वाल में प्रचलित 'पान कत्था  वशीकरण'  मंत्र

(यह मंत्र बहुत ही कम प्रचलित है किन्तु आवश्यकता पड़ने पर मांत्रिक प्रयोग करते हैं )
ॐ नमो आदेस गुरु कूं, मेघ बर्ण पान ,शंख बर्ण चूना ,रक्त बर्ण खैर , बाटक बर्ण गोला , चार पे दशों ला दे ,हात दे ,त  छांगळ पेटी दे ,त पांगळ पेटीते ह्वे , अब घर छोड़ि दे , द्वार छोड़ि ,भाई बैण , सोनारा कामनी पगे लाई अमुके की ताताई , अमुके पास लाई फूरो मंत्र लूणो चमार की आण , शब्द साँचा पिंड कांचा , मेरी गुरु की भक्ति फुरो मंत्र ईश्वरा वाचा

 आभार -श्री वीरेंद्र जखमोला , जसपुर , गढ़वाल

  There are also many folk songs wherein song creators illustrated Khair  as –
धारि  मा की उर्ख्याळी ए ,  ब्वे कुटेन्दि बि नी च
आलु झन्ग्वर ए , ब्वे कुटेन्दि बि नी च
खैराकी  गंजेळी ए , ब्वे उठेन्दि बि नी च 
-
Copyright@ Bhishma Kukreti, Mumbai 2017
-
Plant Myths  , Religious Importance, Traditions , Garhwal, Uttarakhand ; Plant Myths , Religious Importance, Traditions , Kumaon, Uttarakhand ;Plant Myths , Religious Importance, Traditions , Uttarakhand; Plant Myths , Religious Importance, Traditions , Uttarakhand, Himalaya; Plant Myths , Religious Importance, Traditions , Uttarakhand, North India; Plant Myths , Religious Importance, Traditions , Uttarakhand, South Asia



Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,808
  • Karma: +22/-1

Myths and Religious Importance of Tumri, Tumdi, Tumbi , Elongated Neck Bottle Gourd in Uttarakhand 
-
Plant Myths, Religious Importance, and Traditions in Uttarakhand (Himalaya) – 20
By: Bhishma Kukreti, M.Sc. (Botany) (Mythology, Culture Research Scholar)
-
Botanical name – Lagineria vulgaris Synonyms –Lagineria siceraria
Local name –Tumri, Tumdi, तुमड़ी
Hindi Name –  तुम्बी ,  घड़ा गर्दन की लौकी , कडुवी लौकी
Sanskrit Name – Tumbani, Katu Tumbi
Economic benefits – Ayurveda medicines referred in  Charak Samhita as cough, useful in heart problem, useful for pregnant women, if not bitter useful for vegetables. Containers were common in Uttarakhand before plastic revolution.
                   Myths, Religious Importance and Traditions
        The Nath priest use Tumri, Tumdi or pitecher neck bottle gourd for making Ektara or Tumbi a one sting musical instrument.
                     Seeds for Children Garland
 People put a garland on orphan age child neck. There are many materials on such garland as the purified tiger nails, ajwain /ajowan  thaili (small bag of purified ajowan seeds) and purified seeds of Tumdi/Tumri.
   Use in  Thief Catching Tantric-Mantric Ritual
 In past Tumri/Tumdi तुमड़ी मंत्र, was performed by Tantric-Mantric for catching the thief in case of theft. The ritual performer or Tantric used to catch Tumri /Tumdi by a tag and used to recite following Mantra or other Mantras. Tumri/Tumdi  used to walk and used to reach at thief place. (It was a perception perhaps).  People call that Tantric ritual as Tumdi Chalana. 
-   चोर पकड़ने हेतु तुमड़ी मंत्र
-   -
ओउम नमो गुरु को आदेस
माता पिता गुरु देवता को आदेस
काली काली महाकाली, अघोर काली
ब्रह्मा कि बेटि, राजा इन्द्र की शाली
इन्द्र शान से बजावे ताली
क्या क्या करन्तो आयी
आप काली भस्मन्ती आइ ,
पर लोह की कील उखेल्न्ती आइ
आप चौकी उखेलन्ती आइ
पर चौकी उठालन्ती आइ
मेरा चोर पकड़ी नी लाइता नौ नौरतों की पूजा नी पाई
काली कुखडी मंद की घाट ट्ज देखो
तेरा अवतार आपकी चौकी करनी लाइ
तो आगे जादू पीछे घाऊ, माता चंदीका की दूधि दंता लाइ
अपना गुरु का मांश  खाई
मेरा गुरु की दुआई
फोर मंत्र इश्वरो वाच:

Copyright@ Bhishma Kukreti, Mumbai 2017
-
Plant Myths  , Religious Importance, Traditions , Garhwal, Uttarakhand ; Plant Myths , Religious Importance, Traditions , Kumaon, Uttarakhand ;Plant Myths , Religious Importance, Traditions , Uttarakhand; Plant Myths , Religious Importance, Traditions , Uttarakhand, Himalaya; Plant Myths , Religious Importance, Traditions , Uttarakhand, North India; Plant Myths , Religious Importance, Traditions , Uttarakhand, South Asia



Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,808
  • Karma: +22/-1

Myths, Religious Importance of Jau, Barley on Basant Panchami festival in Uttarakhand 
-
Plant Myths, Religious Importance, and Traditions in Uttarakhand (Himalaya) – 21
By: Bhishma Kukreti, M.Sc. (Botany) (Mythology, Culture Research Scholar)
Botanical name – Hordeum vulgare
Local name – Jau, जौ
Hindi Name – Jau, जौ
Sanskrit Name –Akshta, Aksta, Dhanyaraja
Economic benefits – Many medicinal and food values (Will explain in other chapter)
              Barley (Jau) Myths, Religious Importance and Traditions on Basant Panchami
 There are many religious importance of barley in Uttarakhand. However, one of the very important aspects of barely myth is putting barley plants on door head sides on Basant Panchami. This ritual perhaps, is exclusive in India.
   Basant Panchami is sign of arrival of spring in India.
 On Basant Panchami, the iron smith of the family uses up root barely with roots before sun rise. Then before sun rise, the iron smith puts piles of barley plants with root on the courtyard of his master (Thakur).
   After taking bath by all family members the ritual of sticking barley plant on both sides of door head starts. Turmeric Pithai is spit on barley plants. The four or five barely roots are put on fresh cow dung. Then cow dung with barely roots are stuck on both sides of door heads. The barley stems with leaves hang downside on Singar of door. The person sees that the dung and roots are properly stuck.  Usually, elder the family member puts turmeric on door center head and on barley stuck on door head too (Pithai). Barley roots with cow dung are stuck on each door of house and cattle yard too.
  After the rituals, people start taking Puri-Pakode.
  People color a new white cloth by turmeric solution as symbol of Basant Panchami.
This is the day, in Garhwal and Kumaon, collective song and dance also start in night. This song and dance in night continues till Bikhot (Baishakhi).
 


-
Copyright@ Bhishma Kukreti, Mumbai 2017
-
Plant Myths  , Religious Importance, Traditions , Garhwal, Uttarakhand ; Plant Myths , Religious Importance, Traditions , Kumaon, Uttarakhand ;Plant Myths , Religious Importance, Traditions , Uttarakhand; Plant Myths , Religious Importance, Traditions , Uttarakhand, Himalaya; Plant Myths , Religious Importance, Traditions , Uttarakhand, North India; Plant Myths , Religious Importance, Traditions , Uttarakhand, South Asia



Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,808
  • Karma: +22/-1
        उत्तराखंड  परिपेक्ष में   मकोई , मकोय   की सब्जी ,औषधीय व अन्य   उपयोग और   इतिहास

                                                 
          History /Origin /introduction, Food uses , Economic Uses of  Himalayan Black Nightshade   in Uttarakhand context

          उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  जंगल से उपलब्ध सब्जियों  का  इतिहास - 32

        History of Wild Plant Vegetables ,  Agriculture and Food in Uttarakhand - 32                       
         
           उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --   73

                     History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, Food, Recipes  in Uttarakhand -73
-
      आलेख -भीष्म कुकरेती (वनस्पति व सांस्कृति शास्त्री )
-
वनस्पति शास्त्रीय नाम - Solanum nigrum
सामन्य अंग्रेजी नाम -Black Nightshade
संस्कृत नाम - ध्वांक्क्षमाची , काकामाची
हिंदी नाम -मोकोय
नेपाली नाम -जंगली बिही
उत्तराखंडी नाम -मकोई , मकोय
 मकोई एक वार्षिक शाखीय पौधा है जिसकी लम्बाई 60 सेंटीमीटर तक  है और खड़ा मिलता है। पत्तियां अंडाकार किन्तु कोने तीखे होते हैं। फल शुरू में हरे ,  हैं जो पककर नारंगी या काले हो जाते हैं।  वास्तव में मकोई एक खर पतवार है जो पानी के नजदीक, छाया व फसल के साथ उगता है।  फसल को नुक्सान पंहुचाने वाला खर पतवार माना जाता है।
                   ---जन्मस्थल संबंधी सूचना -
मकोई प्राकृतिक रूप से   उत्तरी -पश्चिम अफ्रिका , यूरेसिया -तुर्की आदि , चीन व हिमालय माना जाता है। आज यह सब जगह पाया है।  मिड्टेरियन को भी इसका जन्मस्थल माना जाता है। । प्राचीन ब्रिटेन के प्रागैतिहासिक मलवे में मकोई के बीज कोयला मिलने से भी सिद्ध होता है मकोई पुराना पौधा है। एडवार्ड सैलिसबरी का मानना है ब्रिटेन में यह पौधा निओलिथिक कल से भी पहले पाया था। चरक संहिता में मकोई / काकामाची का उल्लेख सब्जी व दवा हेतु हुआ है (जी  . सी चक्रवर्ती , 1896 ) . भावप्रकाश (सोलहवीं सदी ) में भी मकोई का उल्लेख मिलता है . सिद्ध साहित्य में मकोई को मन्नत्ताक्काली कहा  गया है। सी पी खरे अनुसार सुश्रुता ने मकोई को सुरासादी वर्ग में रखा है।
-
                        ---आयुर्वेद में प्रयोग
मकोई त्वचा रोग अवरोधक, पेचिस अवरोधक है।  मकोई में कैल्सियम , फोस्फोर व विटामिन A होता है , पत्तियों व डंठल रस अल्सर व अन्य पेट की बीमारी में उपयोग होता है। फल स्वास , भूख बढ़ाने , मूत्र बढ़ाने , पेचिस रोकने , आँख बीमारी में उपयोग होते हैं।
-
      ---भोजन रूप में गलत फहमी -
 मकोई की तरह एक पौधा Atropa belladonna  (Deadly  Nightshade ) वातव में विषैला होता है किन्तु गलतफहमी में मकोई को भी विषैला मान लिया जाता है।
-
         -------मकोई की पत्तियों की सब्जी भोजन विधि ---
   सामग्री
कटी या साबुत पत्तियां -  आवश्यकतानुसार जैसे दो बड़े कप (पत्तियों को तने  से अलग कर पानी में छोड़ दें जिससे मिटटी आदि नीचे बैठ जाय , फिर दो  धो कर पानी निथार दें )
मूंग दाल - दो चमच (वैकल्पिक  )
झंगोरा या चावल या गहथ - भिगोकर पिसा  हुआ पेस्ट
तेल - १ से डेढ़ चमच
राई , जीरा -तड़का हेतु
मिर्च , लहसुन, हल्दी  सहित मसाले - सामन्य गढ़वाली मसाले पिसे या सिल -वट्ट में  पीसे  हुए
हरी मिर्च - एक कटी
प्याज - तीन चार कटे
   तेल को कढ़ाई में गरम होने के बाद जीरा , राई व भाग को तड़के , फिर प्याज व मूंग को तड़कने दें , पत्तों को मसालों के साथ भूनें व फिर झंगोरे /चावल पेस्ट को डालकर भुने।  पानी डालकर ढक्क्न लगाकर पकाएं।
 बिना झंगोरे /चावल पेस्ट के भी राई /पालक जैसी सब्जी बनाई जा सकती है। गरमा गरम परोसें।



Copyright@Bhishma Kukreti Mumbai 2018

Notes on History of Culinary, Gastronomy in Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Doti Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dwarhat, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Champawat Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Nainital Uttarakhand;History of Culinary,Gastronomy in Almora, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Bageshwar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Udham Singh Nagar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Chamoli Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Rudraprayag, Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pauri Garhwal, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dehradun Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Tehri Garhwal  Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Uttarakhand Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Haridwar Uttarakhand;

 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )

Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,808
  • Karma: +22/-1
          उत्तराखंड  परिपेक्ष में  लिसोड़ा , लसोड़ा    की सब्जी ,औषधीय व अन्य   उपयोग और   इतिहास

                                                 
          History /Origin /introduction, Food uses , Economic Uses of  Himalayan Indian Cherry or Glue Berry , Cordia dichotuma   in Uttarakhand context

          उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  जंगल से उपलब्ध सब्जियों  का  इतिहास - 33

                                     History of Wild Plant Vegetables ,  Agriculture and Food in Uttarakhand -   33                       
         
           उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --   74

                     History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, Food, Recipes  in Uttarakhand -74
-
      आलेख -भीष्म कुकरेती (वनस्पति व सांस्कृति शास्त्री )
-
वनस्पति शास्त्रीय नाम -Cordia dichotoma
सामन्य अंग्रेजी नाम -Indian Cherry or Glue Berry
संस्कृत नाम - बहुवारा , सेलु
हिंदी नाम -लसोड़ा , लसोड़ा टेंटी ,गुंदा
नेपाली नाम -लसूरा , लसूड़ा
उत्तराखंडी नाम - लिसोड़ा , लसोड़ा
वृक्ष - लिसोड़ा , लसोड़ा , गुंदा  का पेड़ मध्य ऊंचाई वाला पेड़ है। इसकी ठूंठ 25 -50 सेंटीमीटर की होती है और ऊंचाई 10 मित्र तक हो जाती है।  पत्तियों से यह छत जैसा दीखता है।  भूरे रंग की छाल   वाला पेड़ है। इसके फूल  सफेद होते हैं और केवल रात को ही। लिसोड़ा , लसोड़ा , गुंदा के  फल पहले गुलाबी पीले होते हैं जो पककर काले हो जाते हैं।
जन्मस्थल संबंधी सूचना -लसोड़ा, लिसोड़ा , गुंदा की जन्मभूमि दक्षिण पूर्व चीन , भारत , हिमालय , हिन्द चीन आदि स्थल।  इससे जाहिर होता है कि लसोड़ा उत्तराखंड में हजारों साल से पाया जाता है।
संदर्भ पुस्तकों में वर्णन - सुश्रुता ने लसोड़ा, लिसोड़ा , गुंदा के औषधीय उपयोग के बारे में उल्लेख किया है।  वाल्मीकि रामायण में उडालकास पेड़ का  उल्लेख है जो शायद लसोड़ा हो सकता है। महाभारत में भी उड्डालका का  है। महाभारत सेल्समातका  का उल्लेख है जो Cordia myxa   हो सकता  है।  Cordia myxa को उत्तराखंड में लसोड़ा  ही कहा जाता है।
 जानवर औषधि - लसोड़ा, लिसोड़ा , गुंदा मवेशियों की ल्यूकोरहोइया , मुंह और पैर की बीमारियां उपचार हेतु  लसोड़ा, लिसोड़ा , गुंदा का उपयोग  होता है।
चारा - जानवरों को पत्तियां  व फल चारे हेतु उपयोग होता है।
मनुष्य औषधि -उपयोग  -लसोड़ा, लिसोड़ा , गुंदा के कई भागों का कीड़ों  के काटने पर घाव सफाई, छाल का रस दस्त व अन्य पेट की बीमारी हेतु , पाचन  वृद्धि , फल रस शरीर में जलन उपचार , फल रस कफ , बलगम साफ़ करने हेतु उपयोग होता है
लकड़ी - कृषि उपकरण  बनाने में उपयोग
 
--------लसोड़ा की सब्जी -
जितनी सब्जी बनानी हो उतने कच्चे फलों को अलग कर दीजिये।
फिर इन फलों को 10 मिनट तक उबालें।  पानी निथार कर ठंडा होने दीजिये।
फिर चाकू से लसोड़े की टोपी छील  दीजिये।   और दो से चार टुकड़ों में काट लीजिये। गुठली  दीजिये।
अब जैसे उबले आलू के गुटके दार  जाती है वैसे  छौंका लगाकर , नमक , मसालों के साथ भूना जाता है और 4 से 5 मिनट तक पकाया जाता है।
मुख्यतया लसोड़ा उप सब्जी होती है।
-------लसोड़ा , गुंदा का अचार -
गुंदा का अचार भी बनाया जाता है।




Copyright@Bhishma Kukreti Mumbai 2018

Notes on History of Culinary, Gastronomy in Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Doti Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dwarhat, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Champawat Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Nainital Uttarakhand;History of Culinary,Gastronomy in Almora, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Bageshwar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Udham Singh Nagar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Chamoli Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Rudraprayag, Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pauri Garhwal, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dehradun Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Tehri Garhwal  Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Uttarakhand Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Haridwar Uttarakhand;

 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )

Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,808
  • Karma: +22/-1
    उत्तराखंड  परिपेक्ष में  गदिरा /सीतावर्क /सिताभारका   की सब्जी ,औषधीय व अन्य   उपयोग और   इतिहास

                                                 
          History /Origin /introduction, Food uses , Economic Uses of  Himalayan  Common Cockscom, Celosia argentea  in Uttarakhand context

          उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  जंगल से उपलब्ध सब्जियों  का  इतिहास - 34

        History of Wild Plant Vegetables ,  Agriculture and Food in Uttarakhand -    34                   
         
           उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --   75

          History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, Food, Recipes  in Uttarakhand -75
-
      आलेख -भीष्म कुकरेती (वनस्पति व सांस्कृति शास्त्री )
-
वनस्पति शास्त्रीय नाम -Celosia argentea
सामन्य अंग्रेजी नाम -Common Cockscom, Quail    Grass
संस्कृत नाम -सीतावर्क

नेपाली नाम -सिताभारका
उत्तराखंडी नाम - गदिरा
पौधा - वास्तव में यह एक खर पतवार है जो एक क्षेत्र में फ़ायदाबंद होता है तो दूसरे क्षेत्र में फसल के लिए आक्रमणकारी खर पतवार सिद्ध हो जाता है। 1000 मीटर  , 1600 मीटर  (नेपाल व उत्तराखंड ) से 3000  मीटर ऊंचाई वाले स्थानों में पाया जाता है। अफ्रीका में इसे खेतों के मींडों में अन्य परजीवियों से बचाने लगाया जाता है।  गदिरा /सीतावर्क /सिताभारका बहुशाखीय पौधा 40 से 200 सेंटीमीटर ऊँचा हो सकता है।  गदिरा /सीतावर्क /सिताभारका चटकीले लाल या गुलाबी फूलों से पहचाना जाता है।  सफेद फूल भी चटकीले आकर्षक होते हैं।
जन्मस्थल संबंधी सूचना - वनस्पति -
वनस्पति शास्त्रियों में जन्म स्थल के बारे में एक मत नहीं है। कोई अफ्रीका को और कोई भारत  व भारतीय उपमहाद्वीप को गदिरा /सीतावर्क /सिताभारका जन्मस्थल मानते हैं. प्राचीन चीनी भेषक साहित्य मेंगदिरा /सीतावर्क /सिताभारका वर्णन मिलता है। प्राचीन चीनी पुस्तकों में   गदिरा /सीतावर्क /सिताभारका को भुकमरी का खाद्य पदार्थ में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।
यह पौधा सभी महाद्वीपों में पाया जाता है । अफ्रीका के कई देशों में खेती की जाती है। 
औषधीय उपयोग - गदिरा /सीतावर्क /सिताभारका के भिभिन्न भागों से फोटोफोबिया , सरदर्द , त्वचा , घाव , दस्त , श्वेत प्रदर बीमारियों में औषधि उपयोग होता है। डाइबिटीज उपचार हेतु बीजों से दवाई बनाई जाती है
 भोजन उपयोग -
गदिरा /सीतावर्क /सिताभारका में कैल्सियम , फॉस्फोरस
गदिरा /सीतावर्क /सिताभारका की पत्तियों व डंठल से स्वादिष्ट , पौष्टिक तरकारी व सूप , फाणु , कपिलू बनाया जाता है जो पौष्टिक होता है।  फूलों से भी तरकारी बनती है।

गदिरा /सीतावर्क /सिताभारका से हरी  सब्जी , फाणु , कपिलू  ऐसे ही बनाया जाता है जैसे कि पालक या मर्सू से बनाया जाता है। गदिरा /सीतावर्क /सिताभारका को  अन्य सब्जियों के साथ भी पकाया जा सकता है।


Copyright@Bhishma Kukreti Mumbai 2018

Notes on History of Culinary, Gastronomy in Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Doti Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dwarhat, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Champawat Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Nainital Uttarakhand;History of Culinary,Gastronomy in Almora, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Bageshwar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Udham Singh Nagar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Chamoli Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Rudraprayag, Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pauri Garhwal, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dehradun Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Tehri Garhwal  Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Uttarakhand Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Haridwar Uttarakhand;

 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )


Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,808
  • Karma: +22/-1
  उत्तराखंड  परिपेक्ष में   कंडारा   की सब्जी ,औषधीय व अन्य   उपयोग और   इतिहास

                                                 
          History /Origin /introduction, Food uses , Economic Uses of  Himalayan Wallich's Thistle  , Cirsium walichii in Uttarakhand context

          उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  जंगल से उपलब्ध सब्जियों  का  इतिहास - 35

              History of Wild Plant Vegetables ,  Agriculture and Food in Uttarakhand -      35                 
         
           उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --   76

   History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, Food, Recipes  in Uttarakhand -76
-
      आलेख -भीष्म कुकरेती (वनस्पति व सांस्कृति शास्त्री )
-
वनस्पति शास्त्रीय नाम - Cirsium walichii
सामन्य अंग्रेजी नाम -Wallich's Thistle
संस्कृत नाम -
हिंदी नाम - बूंगसी
नेपाली नाम -थकाल , काँटा
उत्तराखंडी नाम -कंडारा
यह पौधा हिमालय में अफगानिस्तान से भूटान व चीनी हिमालय में पाया जाता है।  इसका असहय निकलता है कि कंडारा का जन्मस्थल हिमलाय है।
  कंडारा एक बहुशाखीय पौधा है जो 4 से 10 फ़ीट तक ऊंचा तक जाता है। पत्तियों के किनारे  कंटीली होती हैं कंडारा 1200 से 3300 मीटर ऊंचे  स्थलों में उगता है।
---------कंडारा का भोजन उपयोग -
      कंडारा की जड़ों/ ट्यूबर  को छीलकर सब्जी बनाई जाती है जैसे अरबी या पिंडालू की सब्जी बनाई जाती है.
इसके फूलों से सेपल , पेटल निकालकर फूल के आधार को भूख में जंगलों में खाया जाता है



Copyright@Bhishma Kukreti Mumbai 2018

Notes on History of Culinary, Gastronomy in Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Doti Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dwarhat, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Champawat Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Nainital Uttarakhand;History of Culinary,Gastronomy in Almora, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Bageshwar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Udham Singh Nagar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Chamoli Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Rudraprayag, Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pauri Garhwal, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dehradun Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Tehri Garhwal  Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Uttarakhand Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Haridwar Uttarakhand;

 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )



Bhishma Kukreti

  • Hero Member
  • *****
  • Posts: 18,808
  • Karma: +22/-1
    उत्तराखंड  परिपेक्ष में   बन पिंडालू , पापड़ी , जंगली अरबी   की सब्जी ,औषधीय व अन्य   उपयोग और   इतिहास

                                                 
          History /Origin /introduction, Food uses , Economic Uses of  Himalayan  Gonatanthus  pumilus in Uttarakhand context

          उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  जंगल से उपलब्ध सब्जियों  का  इतिहास - 36

              History of Wild Plant Vegetables ,  Agriculture and Food in Uttarakhand -  36                     
         
           उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --   77

       History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, Food, Recipes  in Uttarakhand -77
-
      आलेख -भीष्म कुकरेती (वनस्पति व सांस्कृति शास्त्री )
-
वनस्पति शास्त्रीय नाम - Gonatanthus pumilus
सामन्य अंग्रेजी नाम - Dwarf Gonatanthus

हिंदी नाम -जंगली अरबी
नेपाली नाम -पतरकच
उत्तराखंडी नाम - बण पिंडाळू , पापड़ी /पपड़ी
जन्मस्थल संबंधी सूचना - हिमालय में जनस्थल है।
  बन पिंडालू बिलकुल पिंडालू जैसे ही होता है किन्तु इसके पत्तियों का रंग अधिक गहरा और पत्तियां हृदय नुमा , अधिक तिकोनी।  पत्तियां 8 -15 सेंटीमीटर लम्बी व 5 से 10 सेंटीमीटर चौड़ी होती हैं व लम्बे डंठल से जड़ या कंद जुडी होती है. पानी के नजदीक ही पाया जाता है।
 औषधि उपयोग - पत्तियों  को मानव घाव व जानवरों के घाव पर एन्टीबायटिक रूप में लगाया जाता है।  जड़ों का उपयोग छाती दर्द उपचार में उपयोग होता है। कैंसर के इलाज हेतु भी उपयुक्त माना जा है।

------------पत्तों से से गुंडळ ----
बन पिंडालू का गुंडळ या पत्यूड़ बनाने में उपयोग होता है - पत्तों को काटकर उसमे आलण  (छोला हुआ बेसन , मकई का आटा आदि ) नमक , मसाले मिलाकर  प्रेसर कूकर , अथवा बड़ी पत्तियों के अंदर डालकर तवे में या गरम राख में पकाकर केक बनाया जाता है।  फिर केक को काटकर गुंडळ के टुकड़ों को तेल , भांग के छौंके के साथ गरम किया जाता है।  ठंडा ही परोसा जाता है।
  ----पत्तियों की सब्जी --
बन पिंडालू की पत्तियों से अलग या या अन्य सब्जियों के साथ मिलाकर सब्जी बनाई जाती है।
    ----कंद उपयोग -
कंद का उपयोग भी घरेलू पिंडालू जैसे ही कई भाजी बनाई जाती हैं , सुखी , थिंचोणी , तरीदार आदि।  मिश्रित सब्जी भी बनाई जाती हैं।
 चूँकि बन पिंडालू अधिक चरचरा होता है तो धीरे धीरे बन पिंडालू का उपयोग घट रहा है


Copyright@Bhishma Kukreti Mumbai 2018

Notes on History of Culinary, Gastronomy in Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Doti Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dwarhat, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Champawat Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Nainital Uttarakhand;History of Culinary,Gastronomy in Almora, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Bageshwar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Udham Singh Nagar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Chamoli Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Rudraprayag, Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pauri Garhwal, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dehradun Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Tehri Garhwal  Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Uttarakhand Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Haridwar Uttarakhand;

 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )

 

Sitemap 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22