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Gopal Babu Goswami - गोपाल बाबू गोस्वामी उत्तराखंड के महान गायक

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2007, 11:08:58 AM


राजेश जोशी/rajesh.joshee

Dhanyavaad Mehta ji,
I was facing some problem to access Mera Pahad for last one month only today I am able to access.  I also mailed to Anubhav and he told me that Mera Pahad is working fine.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



गोपाल बाबु गोस्वामी ने उत्तराखंड के हर पहलू पर गाने बनाये है ! ये गाना के बोल देखिये कैसे :

   पहाड़ की ऊँची नीची धार
  मठों मठों हीटू बाना वे.. .
   मठों मठों हीटू बाना वे.. .

   बाटा बडो उकाव, उलार
  मठों मठों हीटू बाना वे.. .

   पियूली क फूल सुवा, पियूली का फूल
  जवानी में भरी रे छे, जस नैनीताल

  पहाड़ की ऊँची नीची धार
  मठों मठों हीटू बाना वे.. .
   मठों मठों हीटू बाना वे.. .

Devbhoomi,Uttarakhand

उत्तराखंड के अल्मोड़ा ज़िले के छोटे से गांव चांदीकोट में जन्मे गोपाल बाबू गोस्वामी का परिवार बेहद गरीब था. बचपन से ही गाने के शौकीन गोपाल बाबू के घरवालों को यह पसंद नहीं था क्योंकि रोटी ज़्यादा बड़ा मसला था. घरेलू नौकर के रूप में अपना करियर शुरू करने के बाद गोपाल बाबू ने ट्रक ड्राइवरी की. उसके बाद कई तरह के धंधे करने के बाद उन्हें जादू का तमाशा दिखाने का काम रास आ गया. पहाड़ के दूरस्थ गांवों में लगने वाले कौतिक - मेलों में इस तरह के जादू तमाशे दिखाते वक्त गोपाल बाबू गीत गाकर ग्राहकों को रिझाया करते थे.एक बार अल्मोड़ा के विख्यात नन्दादेवी मेले में इसी तरह का करतब दिखा रहे गोपाल बाबू पर कुमाऊंनी संगीत के पारखी स्व. ब्रजेन्द्रलाल साह की नज़र पड़ी और उन्होंने नैनीताल में रहने वाले अपने शिष्य (अब प्रख्यात लोकगायक) गिरीश तिवाड़ी 'गिर्दा' के पास भेजा कि इस लड़के को 'देख लें'. गिर्दा बताते हैं कि ऊंची पिच में गाने वाले गोपाल बाबू की आवाज़ की मिठास उन्हें पसंद आई और उनकी संस्तुति पर सांग एंड ड्रामा डिवीज़न की नैनीताल शाखा में बड़े पद पर कार्यरत ब्रजेन्द्रलाल साह जी ने गोपाल बाबू को बतौर कलाकार सरकारी नौकरी पर रख लिया.यहां से शुरू हुआ गोपाल बाबू की प्रसिद्धि का सफ़र जो ब्रेन ट्यूमर से हुई उनकी आकस्मिक मौत तक उन्हें कुमाऊं का लोकप्रिय गायक बना गया था. जनवरी के महीने में हल्द्वानी में होने वाले उत्तरायणी मेले में निकलने वाले जुलूस में हज़ारों की भीड़ उनके पीछे पीछे उनके सुर में सुर मिलाती थी. "कैले बाजै मुरूली", "घुरु घुरु उज्याव है गो", "घुघूती ना बासा" और "रुपसा रमोती" जैसे गाने आज भी खूब चाव से सुने जाते हैं और कुछेक के तो अब रीमिक्स तक निकलने लगे हैं.

Pawan Pahari/पवन पहाडी

गोपाल बाबु गोस्वामी. लोक गायक उत्तराखण्ड आज हमारे बीच नहीं है. लेकिन उनके गीत आज भी हमारे जेहन मे  गूंजते है. उनका एक प्रसिद्द गीत .................................

हाई तेरी रूमाला, गुलाबी मुखडी
के भली छाजिरे, नाखेकी नथुली.
हाई तेरी रूमाला.

गवे गलोबंदा, हाथों की धगुली-२
चम् चमा चमकिरे, कपाई बिंदुली-२
हाई तेरी रूमाला,....................



हाई तेरी रूमाला, गुलाबी मुखडी
के  भली छाजी रे, नाखेकी नथुली -2
हाई तेरी रूमाला...........................

सनी रे घाघरी, मखमली आँगेरी-२
के भली छाजिरे रंगीली पिचोडी-२
हाई तेरी रूमाला...................

हाई तेरी रूमाला, गुलाबी मुखडी
के  भली छाजी रे, नाखेकी नथुली -2
हाई तेरी रूमाला...........................

तेरी गावे जंजीर , हाथों मैं प्होजिया-2
छान छान चन्किरे, हाथो ही चूडियाँ-२
हाई तेरी रूमाला, गुलाबी मुखडी
के  भली छाजी रे, नाखेकी नथुली -2
हाई तेरी रूमाला...........................

Devbhoomi,Uttarakhand

pawan bhaiji apne to sahi kaha hai ki gopal ji humare beech nahi hai ye galat hai bhaiji unka sareer humre beech nahi hai lekin unki awaaj aaj bhi devbhoomi ki in pahadiyon goonj rahi jo ki har uttarakhandi ko sunai deti hai

Pawan Pahari/पवन पहाडी

maine ye nahi kaha ki Gopal Babu Goshwami nahi hai . maine to ye kaha ki kewal we nahi hai lekin unke geet unki awaaz aaj bhi uttarakhand main jiwit hai.... unhe hum kaise bhool sakte hai.......

Devbhoomi,Uttarakhand

गोपालबाबू गोस्वामी

स्व गोपाल बाबू गोस्वामी जी एक महान गायक एवं सन्गीतकार होने के साथ साथ समाज के प्रति बडा जागरुक थे। मैं यहां पर उनके द्वारा गाये और रचित गीतों के माध्यम से उनके पर्यावरण प्रेम के बारे में जानने व समझने का प्रयास करुंगा।
गोस्वामी जी को पहाड और पहाड़ के प्राकर्तिक स्वरूप से बड़ा प्यार था, उनके हर गीत में पहाड़ और उसका अंग प्रत्यंग एक नये रूप में उपस्थित होता है जैसे नीचे के गीत में गोस्वामी जी पहाड की हवा को गले लगने को कह रहे हैं, ये कुछ कुछ कालीदास के मेघदूत की याद दिलाता है, पर यहां सन्देशवाहक मेघ की जगह हवा है:-
गोस्वामी जी पहाड़ और पर्यावरण प्रेमी तो थे ही जोकि उनके गीतों से स्पष्ट है पर साथ ही वह पर्यावरण संरक्षण के प्रति भी जागरूक थे। जैसे नीचे के गीत में गोस्वामी जी बान्ज के जंगल को न काटने का सन्देश दे रहे हैं:-
सरकारी जंगल लछिमा बान्ज नी काट लछिमा बान्ज नी काटा.....
इसी प्रकार इस गीत में गोस्वामी जी की पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरुकता प्रदर्शित होती है:-
आज यौ मेरी सुन लो पुकारा, धाद लगौं छ यौ गोपाला.......




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