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Don’t Mind Mahraj Holi hai - बुरा न मानो होली है

Started by dayal pandey/ दयाल पाण्डे, February 24, 2010, 05:34:57 PM

हुक्का बू

ओहो रे नातियो.....तुमरी कविता धेखी बेर मैं के आ गयो जोश,
कुछ तुकबन्दी मेरी तरफ बटी ले पैं.......

पलायन, आपदा, बेरोजगारी और भूख,
ग्लोबल वार्मिंग, विद्युत परियोजनाओं से नदियां रही सूख,
राज-काज और राज्य की देख हालत,
आन्दोलनकारी और जनता हो रही आहत,
पहाड़ के भविष्य को लेकर सब हो रहे सशंक,
लेकिन शेरवानी बदल-बदल फोटो खिंचा रहे निशंक।

हुक्का बू

आन्दोलन का पर्याय था जो,
भूखा-प्यासा रहकर लड़ता था जो,
घर-बार दांव पर लगा मरता था वो,
राज्य के लिये,
अनशन करता कभी चन्द्रबदनी में लेकर भोंपू,
कभी सत्याग्रह के लिये चुनता श्रीयंत्र टापू,
पहले तो सबकी कर देता था छरबट्ट,
लेकिन मंत्री बनते ही खामोश हो गया दिवाकर भट्ट

Lalit Mohan Pandey

होली की आशीष...

होली का फगुवा की यो छो आशीष, सब जन बची राया लाख बरीश...   
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हो हो हो आजकी होली कैका घर, आज की होली मेरापहाड़ का घर,
मेरापहाड़ का सपे सदस्य बची रन लाख बरीश....
..हो हो हो अघिली होली तक इनार परिवार मै एक एक नया सदस्य आ जाओ हो..
..हो हो हो जैको ब्या नै होरयो, uko  ब्या हो जो हो...
..हो हो हो जैको ब्या हो गो, uko  एक एक नान (बच्चा) हो जो हो...
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हमारो क्या को गटो जन मान्या, बरस दिन की होली हो यो ...

dayal pandey/ दयाल पाण्डे

उत्तराखंड के बनाते हैं प्रहरी
निर्णय लेने मैं करते देरी
कार्यकर्ताओ  से करते गद्दारी
सरकार मैं भी भागेदारी
ढलते उम्र मैं मारी गए मत्ती
सर पर देखो लाल बत्ती
पार्टी मैं भी करते हेराफेरी
ये हैं जी कशी सिंह ऐरी

dayal pandey/ दयाल पाण्डे

बुढ़ापे मैं भी हीरो लगते
काम अब विलेन का करते
९० मैं भी ऐसा जोश
गोपियाँ देख खो देते हैं होश
उत्तराखंड के मुरारी
कलयुगी अवतारी
नारायण दत्त तिवारी

पंकज सिंह महर


Meena Rawat


सत्यदेव सिंह नेगी



होली है
रंग बरसे भीगे चुनरवाली रंग बरसे

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Excellent Poem on Various Leaders by Dayal Pandey Ji.

Don't Mind Holi Hai.

Happy Holi to all the members.

Quote from: dayal pandey/ दयाल पाण्डे on February 26, 2010, 01:41:21 PM
बुढ़ापे मैं भी हीरो लगते
काम अब विलेन का करते
९० मैं भी ऐसा जोश
गोपियाँ देख खो देते हैं होश
उत्तराखंड के मुरारी
कलयुगी अवतारी
नारायण दत्त तिवारी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Article by our Senior Member - Shri Charu Tiwari Ji on Holi
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मत मारो मोहना पिचकारी

उत्तराखण्ड के जनकवि शेरदा 'अनपढ' की होली पर बनी एक कविता प्रतिवर्ष होली में व्यवस्था के खिलाफ रंग डालने को प्रेरित करती है। कविता है-
मत मारो मोहना पिचकारी,
पैलिके छू मंहगाई मारी
मत मारो मोहना पिचकारी...
   शेरदा की मंहगाई पर लिखी यह कविता आज देश और उत्तराखण्ड की व्यवस्था पर सटीक चोट करती है। अब पिचकारी भी कहां मारूं। जहां-तहां बदरंग व्यवस्था पर कोई रंग चढ़ेगा भी नहीं। सुविधाभोगी रंग में रंग चुके उत्तराखण्ड के नीति-नियंताओं पर कोई रंग नहीं भा रहा है। यहां एक ही रंग है सत्ता का। उसके लिये हौल्यार भी अलग हैं और आयोजक भी अलग। इसमें जनता नहीं पूंजीपति शामिल होते हैं। इसमें बांधों का रंग है, सिडकुल में उद्योग लगाने का जुगाड़ है, देहरादून में बैठकर दलाली करने वालों की जमात है, टासंफर पोस्टिंग है, माफिया-अधिकारी और नेताओं का गठजोड़ है। ये सब मिलकर नई होलियों की रचना कर रहे हैं। बोल बदल गये हैं, संगीत बदल गया है अब होली के स्थान भी बदल रहे हैं। जनता ने कहा हमारी होली गैरसैंण में तो पार्टियों ने कहा देहरादून में। इस नहीं होली की जील उठाने वाले कहीं थापर है तो कहीं, जेपी। कहीं नैनो लगाने वाला टाटा है तो कहीं सब्सिडी डकार भागने वाले उद्योगपति। सत्ता की होली में अब राष्टीय ही नहीं क्षेत्रीय राजनीतिक दल भी शामिल होने लगे हैं। गांव में होली खेलने के लिये लोग नहीं हैं। सरकार बाहर से हाल्यारों को बुला रही है। कभी बोगश्वर मेले में तो कभी गौचर में। इसके अलावा हर शहर में महोत्सव मनाकर वह पहाड़ को रंगना चाहती है। मुबई से कलाकार आ रहे हैं। नगर पालिकाओं को भारी बजट सौंपा जा रहा है कार्यकzम करने के लिये। इसके अलावा विरासत जैसी संस्थायें हैं पहाड़ की संस्कृति की पहरेदार। होलियों को संरक्षित यही करेंगी। सरकार ने ऐसे ही हजारों एनजीओ ओ अपना एजेंट बनाया है। पूरे वर्ष सरकार ने जनता के साथ खूब होली खेली। बेरोजगार कहां  होली खेलें। विधानसभा के आगे पहरा है। ज्यादा अपनी बात करोगे तो सरकार डंडों की होली खेलेगी। गोली से होली खेलेगी। आत्महत्या के लिये मजबूर करने की होली खेलेगी। हल्द्वानी में बेरोजगारों को जहर पीने की होली ोलनी पड़ी। देहरादून में राणा को टावर में चढ़कर आत्महत्या की हाली खेलनी पडी। पूरे पहाड़ में अपराधों की होली खेली जा रही है। देहरादून में नये हाल्यारों की मौज है। राजनीतिक छुटभैयौं को लालबत्ती मिल रही है। मुख्यमंत्राी हर महीने, हर साल एक पुस्तक लिखकर होली खेल रहे हैं। महंगे ग्लैज पेपर पर अपना फोटो छपवा रहे हैं। शहरों में अपने चमचों के माध्यम से अपने को राष्टकवि घोषित करने में लगे हैं। उनके लिये पूरे साल भर होली ही होली है। देश-विदेश में लोग उन्हें सम्मानित कर रहे हैं। उन्हें उर्जा प्रदेश का मुख्यमंत्राी बताया जा रहा है। उस प्रदेश का जहां इस समय आठ घंटे की विद्युत कटौती चल रही है।
   खैर, होली में इस तरह के रंग घुस गये हैं। यही परेशानी है। इन रंगों ने उत्तराखण्ड के रंग को बदलना शुरू किया है। बदरंग होली की इस प्रवृत्ति के खिलाफ नई होली की रचना का समय आ गया है। उत्तराखण्ड आंदोलनों की जमीन रही है। यहां आंदोलन भी होली रंगों मे सराबोर हो जाते हैं। आंदोलन के दौर में ऐसी होलियों की रचना हुयी है जो व्यवस्था पर तो चोट करती ही है, जनता को संघर्ष का संदेश भी देती थी। जनकवि 'गिर्दा' द्वारा रचित एक होली विदेशी कंपनियों के खिलाफ माहौल बनाती है। इस तर्ज पर उत्तराखण्ड की व्यस्था पर एक होली पिछले दिनों हमारे साथियों ने गायी। यह होली की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ आप सबको प्रेषित-
झुकि आयो शहर में व्यापारी
अलिबैर की टेर गिरधारी। झुकि...
उद्योगपतियों की गोद में बैठी,
निशंक मारो पिचकारी। झुकि...
देहरादून में लूट मची है,
आओ लूटो व्यापारी। झुकि...
एनजीओ से विकास की रचना
सरदार बने अफसर भारी। झुकि...
झूठ रचो, प्रपंच रचो है,
विकास पर विज्ञापन भारी। झुकि...
कमल का फूल, कांगzेस की विरासत,
लालबत्तियों की भरमारी। झुकि...
यूकेडी को दोस्त बनाकर,
गैरसैंण पर साजिश भारी। झुकि...
अपराधी पहाड़ चढ़े हैं,
निशंक की कविता न्यारी। झुकि...
माफिया ठेकेदार, पहाड़ को लूटें,
नेताओं को सत्ता प्यारी। झुकि...
इस होली के संकल्प बडो है,
अबकी है जनता की बारी। झुकि..