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Ukhimath,Guptkashi-उखीमठ गुप्तकाशी, मह्रिषी दयानंद का बैराग्य स्थान उत्तराखंड

Started by Devbhoomi,Uttarakhand, March 06, 2010, 07:49:06 AM

Devbhoomi,Uttarakhand

पिछले देढसौ सालों में सनातन हिन्दु धर्म व जाति में और उसके द्वारा समस्त संसार में प्रेरणा व प्रकाश प्रदान करनेवाले और नवजीवन की लहर पैदा करनेवाले दो प्रतापी महापुरुष हो गये । दोनों ज्योतिर्धर थे । दोनों ने जनकल्याण का कार्य किया । दोनों परम मेधावी, त्यागी, बैरागी और राष्ट्रप्रेमी थे । एक का नाम था वेदांत केसरी, रामकृष्ण मिशन के प्रणेता स्वामी विवेकानंद और दूसरे थे आर्यसमाज के संस्थापक, आर्षदृष्टा, महर्षि दयानंद ।

महर्षि दयानंद जब महर्षि के रूप में ख्यात नहीं हुए थे और अज्ञात परिव्राजक के रूप में भारत की यात्रा कर रहे थे तब घुमते-घुमते हिमालय के सुप्रसिद्ध स्थल उखीमठ में आ पहुँचे।

कुछ समय उन्होंने वहाँ शांति से गुजारा था । उस वक्त उनकी उम्र छोटी थी पर योग्यता बडी थी । उनमें वैराग्य व सत्य की लहरें तरंगित हो रही थी ।

उखीमठ के महंत पर इनका सिक्का जम गया । उन्होंने दयानंदजी को अपना उत्तराधिकारी बनाने का निश्चय कर लिया । एक बार उनके समक्ष इसका प्रस्ताव भी पेश किया और हमेशा के लिए उखीमठ में ही रहकर वहाँ की गद्दी स्वीकारने के लिए आग्रह किया ।



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दयानंद के जीवन का यह एक बडा प्रलोभन था । उखीमठ जैसे सुंदर व समृद्ध स्थल के महंत होने की महत्ता और दूसरी भोग-वैभव-युक्त सुखी जीवन की संभावना । परंतु त्याग, संयम और वैराग्य की प्रबल भावनावाले, भावी महर्षि होने के लिए ही अवतीर्ण, दयानंदजी को वह पद तनिक भी चलायमान न कर सका ।

वे अडिग रहे और बोले, 'यह छोटा-सा मठ अपनी समस्त संपत्ति तथा समृद्धि के साथ मुझे मेरे ध्येय से च्युत नहीं कर सकता । यह पद, प्रतिष्ठा और संपत्ति मेरे मन को मोहित नहीं कर सकती । मैं सुख, संपत्ति और सत्ता में बंधने के लिए नहीं अपितु बंधे हुओं को छुड़ाने के लिए आया हूँ ।'

और यह कह वे उस मठ के बाहर निकल पडे । महंत उन्हें देखते रह गये ।

ऐसा उत्कृष्ट और उत्कट था महर्षि दयानंद का वैराग्य । इसी वैराग्य, त्याग और सत्य से प्रेरित होकर उन्होंने भविष्य में जो महान कार्य किया यह सर्वविदित है । इसी कारण वे अमर हो गये ।

ध्येय की सतत स्मृति और निष्ठा मनुष्य को सदा जाग्रत बनाये रखती है और प्रलोभनों से गुजरकर आगे बढने की क्षमता प्रदान करती है । दयानंद ने अपने जीवन के द्वारा यह करके दिखाया ।



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Ukhimath (4,500 ft.) is on the other side of the Mandakini River Valley from Gupt Kashi--a relatively short steep walk by foot, or a much longer way by road.  Ukhimath is the winter seat of Kedarnath, as well as the winter home of the priest who presides over his worship.

  After the Kedarnath temple closes for the winter, a movable image of Kedarnath is brought in procession to Ukhimath, where it resides until the Kedarnath temple reopens in late April or early May.





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गुप्तकाशी से नीचे की तरफ मंदाकिनी  की वादी, चौखम्भा दर्शन, बद्रीनाथ, नीलकंठ, ऊखीमठ और ऊपर की तरफ केदारनाथ की बर्फ से ढकी पर्वतमालाओं का सर्वदिग्दृश्य देखा जा सकता है। यह एक मुख्य पड़ाव है और खुद अपने बलबूते पर एक छोटा शहर है – जहां एक डाक एवं तार घर, बैंकों, एक अस्पतालों, एक पुलिस स्टेशन और अनेक होटल एवं ढाबों की सेवाएं एवं सुविधाएं उपलब्ध हैं।

गुप्तकाशी के मंदिरों को उसके जितना ही पुराना माना जाता है। इसके हाल ही के इतिहास का उल्लेख ब्रिटिश गढ़वाल एक गजटियर (1910) में देखा जा सकता है जिसमें लेखक एच.जी. वाल्टन ने टिप्पणी की है कि यह जगह शिव के मंदिर के साथ धर्मशालाओं का संग्रह है। उसने मंदाकिनी नदी पर 140 फुट स्पैन के लटके हुए पुल का उल्लेख भी किया है जो इस गांव को ऊखीमठ से जोड़ता है।

गुप्तकाशी से बामुश्किल एक या दो किलोमीटर नीचे ऊखीमठ के रास्ते पर विद्यापीठ है, पूरे राज्य में सर्वाधिक ऐतिहासिक संस्कृत एवं आयुर्वेद स्कूल। यह कोई आश्चर्य नहीं है कि गुप्तकाशी में आयुर्वेद्ध पद्धति और अनेकों आयुर्वेदाचार्यों या आयुर्वेद चिकित्सकों की एक समृद्ध परंपरा है।



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Here's a shot inside the courtyard.  The man with the drum is something like a herald, because when anyone comes inside he begins to drum, to announce one's presence to the deity (and receive his gratuity for doing so).  The rest of the time he stands off to the side, as will be evident in later photos.

The open-air portico at the top right covers an image of Shiva's bull Nandi, who as usual is right outside the main temple.

The surrounding rooms on the outside walls are offices and residences, and there is also a school on the premises--all things consistent with being a math ("monastery").



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Here's a closer shot of the portico.  Note the mixed construction styles.  The roof on the left is covered with slate slabs (traditional), the portico with tin over wood (also traditional), and the roof on the left is a concrete slab.

Note too the casual atmosphere, with one man reading the paper, and two others lounging and talking together (this was taken as I was walking out, so they had already shown me around and received my donation).

For them the summer is the slow season, and I'm sure that visitors are relatively few, and large parts of the day are spent relaxing. 



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केदारनाथ में एक जगह गुप्त काशी है। उस जगह का नाम गुप्तकाशी इसलिए पड़ा कि पांडवों को देखकर भगवान शिव वहीं छुप गए थे। गुप्तकाशी से भगवान शिव की तलाश करते हुए पांडव गौरीकुंड तक जाते हैं। लेकिन इसी जगह एक बड़ी विचित्र बात होती है। पांडवों में से नकूल और सहदेव को दूर एक सांड दिखाई देता है।

भीम अपनी गदा से उस सांड को मारने दौड़ते हैं। लेकिन वह सांड उनकी पकड़ में नहीं आता है। भीम उसके पीछे दौड़ते हैं और एक जगह सांड बर्फ में अपने सिर को घुसा देता है। भीम पूंछ पकड़कर खिंचते हैं। लेकिन सांड अपने सिर का विस्तार करता है। सिर का विस्तार इतना बड़ा होता है कि वह नेपाल के पशुपति नाथ तक पहुंचता है। पुराण के अनुसार पशुपतिनाथ भी बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है।

देखते ही देखते वह सांड एक ज्योतिर्लिंग में तब्दील हो जाता है। फिर उससे भगवान शिव प्रकट होते हैं। भगवान शिव का साक्षात दर्शन करने के बाद पांडव अपने पापों से मुक्त होते हैं।



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गुप्‍तकाशी का वहीं महत्‍व है जो महत्‍व काशी का है। यहां गंगा और यमुना नदियां आपस में मिलती है। ऐसा माना जाता है कि महाभारत के युद्ध के बाद पांण्‍डव भगवान शिव से मिलना चाहते थे और उनसे आर्शीवाद प्राप्‍त करना चाहते हैं।

लेकिन भगवान शिव पांडवों से मिलना नहीं चाहते थे इसलिए वह गुप्‍ताकाशी से केदारनाथ चले गए। गुप्‍तकाशी समुद्र तल से 1319 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह एक स्‍तूप नाला पर स्थित है जो कि ऊखीमठ के समीप स्थित है।

कुछ स्‍थानीय निवासी इसे राणा नल के नाम से बुलाते हैं। इसके अलावा पुराना विश्‍वनाथ मंदिर, अराधनेश्रवर मंदिर और मणिकारनिक कुंड गुप्‍तकाशी के प्रमुख आकर्षण केन्‍द्र है।

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गुप्तकाशी में कोई सिनेमा हॉल या मनोरंजन की जगह नहीं है। पूरा कस्बा जल्दी सो जाता है और जल्दी उठ जाता है। सुबह छह बजे ताजातरीन बारिश से हरी-भरी पहाड़ियां सूर्य की रोशनी में जगमगा उठती हैं। हवा स्वच्छ है। मुझे बताया गया कि यहां मौसम पूरे वर्ष सुहावना रहता है। दूसरी पहाड़ी पर ओखीमठ अभी भी धुंधलके में छिपा हुआ है।

गुप्तकाशी का सौंदर्य अभी भी बैरक जैसी दिखने वाली इमारतों से खराब नहीं हुआ है, जो कई विकसित हो रहे पहाड़ी कस्बों में खड़ी हो रही हैं। पुराने दोमंजिले मकान पत्थर के बने हुए हैं, जिनके ऊपर भूरे स्लेट की छतें हैं। वहां के लोगों में से एक हमें गुप्तकाशी के प्रसिद्ध मंदिर में ले जाता है। बनारस की तरह वहां विश्वनाथ और दो धाराओं (भूमिगत धारा) के रूप मंे शिव की पूजा होती है।

यह दोनों धाराएं पवित्र यमुना और भगीरथी की प्रतीक हैं। इसी मंदिर की वजह से इस जगह का नाम गुप्तकाशी पड़ा है - छिपा हुआ बनारस। उस कस्बे और उसके आसपास के क्षेत्रों में ढेर सारे शिवलिंग हैं। वहां रहने वाले लोग कहते हैं - जितने कंकर, उतने शंकर। वहां की पवित्रता को व्यक्त करने के लिए यह एक जन कहावत बन गई है।

मैं इस नदी तक फिर लौटकर आऊंगा। इस नदी ने मेरे हृदय को अपने मोहपाश में बांध लिया है। और उसी तरह इस नदी तट पर रहने वाले यहां के उदार और भाईचारे से भरे हुए लोगों ने मेरा दिल जीत लिया है