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ON-LINE KAVI SAMMELAN - ऑनलाइन कवि सम्मेलन दिखाए, अपना हुनर (कवि के रूप में)

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, March 11, 2010, 11:45:47 AM

धनेश कोठारी

लैन

अहा !!
कन लंगत्यार लगिं च
घोटालों कि,
क्वी भग्यान
हमथैं बि लगान्दु
लैन मा         ॥
Source : Jyundal (A Collection of Garhwali Poems)
Copyright@ Dhanesh Kothari

jagmohan singh jayara

"व्यंग बाण"

जब चल्दा छन,
बिना चुब्याँ चुब्दा छन,
अर घायल भी करदा छन,
यीं धरती मा मन्ख्यौं सनै.

जब छोड़दु छ क्वी,
अपणा मुखारबिन्द बिटि,
कैका खातिर यनु सोचिक,
कनि बितलि वैका मन मा,
अर तब होलु खुश मैं,
छक्किक अपणा मन मा.

सुदि नि चैन्दा छोड़्यॅा,
कै फर "व्यंग बाण",
एक दिन यीं धरती बिटि,
सब्बि धाणी छोड़ी छाड़ी,
हम्न तुम्न चलि जाण.

रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित-"व्यंग बाण" ७.५.२०१०)
(यंग उत्तराखण्ड और मेरा पहाड़ पर प्रकाशित)

jagmohan singh jayara

"बाग बिल्कि"

भग्तु बोडा फर बिल्कि बाग,
ब्याखुनि बग्त ब्याळि,
हबरि  बोलि बल वैन,
डुकरी-डुकरिक माटु खैणिक,
क्या त्वैन बिंग्यालि?

बिंगण मा त यनु औणु छ,
मन्ख्यौंन वैकु ठिकाणु जंगळ,
काटी  काटिक बर्बाद करियालि,
बाग रलु बण बूट बचलु,
होलि   खूब खाणी बाणी,
छकि छक्किक  मिललु सब्ब्यौं,
छोया ढुंग्यौं कू पाणी.

बाग बोन्ना छन हम बचावा,
मिललु तुम सनै सब्बि धाणी,
किलै बिल्कणा छौं हम,
तुम्न अजौं  यनु नि जाणी.

कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित-"बाग बिल्कि" ६.५.२०१०)
(यंग उत्तराखंड, मेरा पहाड़ पर प्रकाशित)

jagmohan singh jayara

"अपणा मुल्क छोड़ि"

सब्बि भै बन्धु बतावा,
अपणा प्यारा मुल्क छोड़ि,
तुम भौं कखि न जावा.....

बिराणु अपणु नि होन्दु,
मन मा बिंगा अर बतावा,
मुक मोड़िक न जावा,
अपणा प्यारा मुल्क छोड़ि,
तुम भौं कखि न जावा.....

जख जन्म ह्वै हमारू,
वख द्वार ताळा न लगवा,
सब्बि भै बन्धु समझावा,
अपणा प्यारा मुल्क छोड़ि,
तुम भौं कखि न जावा.....

कूड़ी पुंगड़ि  बांजा डाळी,
अपणु  मुल्क छोड़ि न जावा,
सब्बि भै बन्धु समझावा,
अपणा प्यारा मुल्क छोड़ि,
तुम भौं कखि न जावा.....

जख  देवतौं का थान,
भूमि  स्वर्ग का समान,
सब्बि मनख्यौं कू मान,
तब्बित बोल्दा छन लोग,
हमारी प्यारी जन्मभूमि,
स्वर्ग का छ समान,
सब्बि भै बन्धु समझावा,
अपणा प्यारा मुल्क छोड़ि,
तुम भौं कखि न जावा.....

रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित -"अपणा मुल्क छोड़ि" २.५.२०१०)
(यंग  उत्तराखंड, मेरा पहाड़ पर प्रकाशित) 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


हो होल वो च्यल (विकास पुरुष उत्तराखंड क)
-----------------------------------------------

भारत क मुकुट राज्य छो उत्तराखंड
देश का २८ नंबर राज्य छो उत्तराखंड

राज्य विकास धारो धार
अब होल यो राज्य क विकास !


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


एक प्रयास कविता लिखने का . चलते -२.. मै इसे बहुत अच्छी कविता नहीं कहूँगा पर सीखने का एक प्रयास

सुंदर ये पहाड़
===========

हिम चादर के लिपटे !
प्राकृतिक छटा को बिखेरे !!
कितने सुंदर है ये पहाड़!
कितने निर्मल है ये पहाड़!!

सूरज सबसे पहले आये यहाँ पर!
डाना कांडो पर लाली फैलाये!!
घुघूती अपने गीत सुनाये!
जन को है जगाये!!
भोर भाई अब उठ जाओ!
अपने नित कामो पर तुम लग जाओ !!

कितना सुंदर है ये पहाड़ !
कितना निर्मल है ये पहाड़ !!

अब दिन चढ़ गया है !
har जगह पूरी फैली है उज्यारी !!
धस काटने चले घस्यारी !
अपने-२ कामो में चले है नर नारी !!

सुंदर द्रश्य है पहाडो के!
कितने है ये मन को लुभाए !!

कितने सुंदर ये पहाड़!!
कितने निर्मल है ये पहाड़ !!

KAILASH PANDEY/THET PAHADI

Great Daju,

Chha gaye aap.....

Quote from: एम.एस. मेहता /M S Mehta on June 21, 2010, 11:22:35 AM

एक प्रयास कविता लिखने का . चलते -२.. मै इसे बहुत अच्छी कविता नहीं कहूँगा पर सीखने का एक प्रयास

सुंदर ये पहाड़
===========

हिम चादर के लिपटे !
प्राकृतिक छटा को बिखेरे !!
कितने सुंदर है ये पहाड़!
कितने निर्मल है ये पहाड़!!

सूरज सबसे पहले आये यहाँ पर!
डाना कांडो पर लाली फैलाये!!
घुघूती अपने गीत सुनाये!
जन को है जगाये!!
भोर भाई अब उठ जाओ!
अपने नित कामो पर तुम लग जाओ !!

कितना सुंदर है ये पहाड़ !
कितना निर्मल है ये पहाड़ !!

अब दिन चढ़ गया है !
har जगह पूरी फैली है उज्यारी !!
धस काटने चले घस्यारी !
अपने-२ कामो में चले है नर नारी !!

सुंदर द्रश्य है पहाडो के!
कितने है ये मन को लुभाए !!

कितने सुंदर ये पहाड़!!
कितने निर्मल है ये पहाड़ !!


dayal pandey/ दयाल पाण्डे

                                      " अपना गम"
गमो के दौर में जी रहा हु में
जीवन की रह से विचलित हो रहा हु में
कहाँ जा रहा हु,क्यों जा रहा हू
जिया नहीं, फिर भी जिए जा रहा हू
रात के भय से साया से ही डराने लगा हू
सूरज से नहीं, चादनी से जलने लगा हू
सोचता हू कही क़यामत न आ जाए
मन की मन्नत मन में नहीं रह जाए
उड़ा न ले ये आंधी मेरी आशाओं को
इसलिए सुनसान सहमा सा बैठा रहता हू
पलको को बिना भिगाए रोते रहता हू
शिशिकिया बता न दे मेरी ब्य्थाओ को
अब तो चिरागों में भी गम हो गया हू में
संसार भी बंद कमरे सा लगाने लगा है
दीवारें भी वेवश चीखने लगी हैं
अभागे कहाँ भागने लगा है
तेरे पथ का पतन हो गया है
उम्मीद भी दफ़न हो गए हैं
में तो लुटाने को भी तैयार था
नहीं खबर की लुटेरा ही यार था
नीरस लगाती है जीवन की ख़ुशी
गमो का ही सहारा है मुझे
कही ये भी न छीन जाए
इसलिए इन्हें ही पकडे रहता हू
सीने में जकडे रहता हू


jagmohan singh jayara

"पहाड़ मा"

प्रकृति कू सृंगार,
प्रकृति कू प्यार,
गुस्सा ऐगि  त,
प्रकृति कू प्रहार,
प्यारी डांडी, काँठी,
गैरी-गैरी सुन्दर घाटी.

घणा बणु का बीच बग्दि,
गदन्यौं की दूध जनि धार,
डाळ्यौं मा बैठ्याँ,
पोथ्लौं कू चुंच्याट,
देवदार, कुळैं का बणु मा,
बग्दा बथौं कू सुंस्याट.

फल फूलू की बयार,
बणु मा हैंस्दा बुरांश,
डाळ्यौं मा बास्दि घुघती,
घोल्ड, काखड़ अर हिल्वांस.

चौखम्बा, केदारकाँठा, त्रिशूली,
बन्दरपूंछ, नंदाघूंटी, पंचाचूली, 
चारधाम, देवभूमि, देवतौं कू देश,
जख रन्दन ब्रह्मा, विष्णु, महेश.

हमारा उत्तराखंड  "पहाड़ मा",
मिल्दु छ  प्रकृति कू प्यार,
जन्मभूमि प्यारी हमारी,
करा वींकू मन सी सृंगार .

रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
दिल्ली प्रवास से..(ग्राम: बागी-नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी, टिहरी गढ़वाल)
(सर्वाधिकार सुरक्षित, यंग उत्तराखंड, मेरा पहाड़, पहाड़ी फोरम पर प्रकाशित)
दिनांक: २१.६.२०१०     



"म्योर पहाड़ का मूल्यांकन"

धन से संभव नहीं,
मन से संभव है,
जब से जुड़ा,
सम्पूरण  पहाड़,
बिना देखे,
"म्योर पहाड़" पर जाना,
संस्कृति, संस्कार, पहाड़ प्रेम,
सब कुछ जाना और पहचाना.

मूल नारायण जी, नंदा माता,
गर्जिया देवी, गुरिल देवता,
राजुला मालू शाही, हरु हीत,
चार धाम, सभी देवताओं के नाम,
बुरांश, पहाड़ के पंछी,
हिंवाली काँठी,ऎपण, भवन कला,
पहाड़ का पहनावा, झोड़ा, नृत्य,
क्या हैं पहाड़ की परम्परा,
सब कुछ ज्ञान मिला और जाना.

प्यारे पहाड़ी मित्र,
जिन्हें देखा नहीं अब तक,
हेम जी, पंकज जी, मेहता जी,
दयाल पाण्डेय जी, मनोज उप्रेती जी,
मोहन दा, अनुभव उपाध्याय जी,
सबसे  "म्योर पहाड़" ने,
परिचय करवाया.

"म्योर पहाड़" ने,
मेरे कवि मन को,
पहाड़ पर,
कवितायेँ लिख कर,
मन के भाव,
व्यक्त करने के लिए,
एक मंच उपलब्ध करवाया.

मैं मन से कामना करता हूँ,
"म्योर पहाड़"
अपने  कालजयी पथ पर,
समय के साथ अग्रसर रहे,
करे नित नयें काम,
पहाड़ी  समाज के लिए,
"म्योर पहाड़" जुग जुग राजी रहे.

क्या कहूं कवि होने  के नाते,
"म्योर पहाड़"  पर सुझाव,
सब मित्र कुशल रहें,
बढे "पहाड़ प्रेम" का भाव.

रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
दिल्ली प्रवास से...(ग्राम: बागी-नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी, टिहरी गढ़वाल)
दिनांक: २२.६.२०१०
http://blogs.rediff.com/devbhoomiuttarakhand/
http://himalayauk.org/2010/06/21/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a1%e0%a4%bc-%e0%a4%ae%e0%a4%be/
http://www.pahariforum.net/forum/index.php/board,3.0.html

dayal pandey/ दयाल पाण्डे

सोचा न था की तुम वही हो
सुंदर हशमुख भावुक लड़की
उर मे समेटे स्नेह संसार
जन्नत वही जहा कही हो
                    सोचा न था की तुम वही हो
शायर की शायरी तुम हो
कवी की मधुर कल्पना
संगीत के सुरों मैं बैठी
गीत, गजल ठुमरी तुम ही हो
                      सोचा न था की तुम वही हो
मन करता है की पास रहू
खेलु संग परिहास करू
टूटे-जुड़े हर पल तुमसे
अर्पण करू ये सांस तुम ही को
                       सोचा न था की तुम वही हो
ख्वाबो मैं पाया जिसको
पलकों मैं बसाया जिसको
आँगन को महकाया जिसने
इन्द्र लोक की हूर तुम ही हो
                      सोचा न था की तुम वही हो
चुनोतियो से मिलाया है
आत्मविस्वास बढाया है
प्रेणा और प्रोत्साहन की
मेरी आश - विस्वास तुम ही हो,