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ON-LINE KAVI SAMMELAN - ऑनलाइन कवि सम्मेलन दिखाए, अपना हुनर (कवि के रूप में)

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, March 11, 2010, 11:45:47 AM

और हमारे उभरते हुवे कवि मेहता जी ने तो कमाल ही कर दिया है कवि मित्रो व दोस्तो उनके लिए तालियां तो होनी हि चाहिए.

तालियां........तालियां.....तालियां....तालियां.

shailesh

शायद  हम  नहीं समझते हैं
विकास क्या है , इसीलिए चिल्लाते है राजनिति पर
और आंसूं बहते है अपनी हालत पर
और देखते हैं राह किसी विकास पुरुष या अवतार की !

हम नहीं समझते हैं, विकास का मतलब क्या होता है
इसलिए सोचते है, की ऊंचे ऊंचे भवन , माल , और ५ स्टार होटल या ट्रेन की पटरियां
बदल देगी भविष्य पहाड़ों का !
और समझते है की उपभोगवादी नजरिया ही विकास का मापदंड है !

परन्तु मेरी समझ से
विकास कहीं न कहीं हमारी चेतना से जुड़ा है
हमारी बोद्धिक और भावात्मक चेतना से
और यही प्रतिबिंबित होती है , हमारे समाज मे , साहित्य मे, संस्कृति मे, राजनीती मे !

इसलिये विकास की बात करने से पहले
हमें  चिंतन करना होगा, कैसे
हम बोद्धिक और भावात्मक रूप से सबल बन सके
जो देश, धर्म, जाति, क्षेत्र, संस्कृति, धन  के प्रति जुनूनी ना हो !
जो वैचारिक और भावात्मक रूप से पक्षपातपूर्ण ना हो !
जो तार्किक हो, और संवेदनशील हो  !
साहसी  और संघर्षशील भी
और  जिसका नजरिया वस्तुनिष्ठ हो !

अगर अपनी चेतना को इस ओर ले जा सके !
तो उसके बाद जो कुछ भी घटित होगा !
वह शुभ ही होगा !
और एक आमूल बदलाव लायेगा सामाजिक संरचना मे,
और यह  परिलक्षित होगा, राजनीती मे , साहित्य मे , संस्कृति मे !
और तभी वह घडी आएगी की हम एक समय मे आधुनिक भी होंगे और ऐतिहासिक भी !
तब हम अपने इतिहास  और अपने भविष्य  दोनों का सम्मान करेंगे !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Thanks Dr Shailesh Ji... wah wah. Kya Kavita Likhi hai. Akhir Kavita Likhane ke Bahane to aap Maidan Me Aaye hai..

Quote from: shailesh on March 18, 2010, 06:16:37 PM
शायद  हम  नहीं समझते हैं
विकास क्या है , इसीलिए चिल्लाते है राजनिति पर
और आंसूं बहते है अपनी हालत पर
और देखते हैं राह किसी विकास पुरुष या अवतार की !

हम नहीं समझते हैं, विकास का मतलब क्या होता है
इसलिए सोचते है, की ऊंचे ऊंचे भवन , माल , और ५ स्टार होटल या ट्रेन की पटरियां
बदल देगी भविष्य पहाड़ों का !
और समझते है की उपभोगवादी नजरिया ही विकास का मापदंड है !

परन्तु मेरी समझ से
विकास कहीं न कहीं हमारी चेतना से जुड़ा है
हमारी बोद्धिक और भावात्मक चेतना से
और यही प्रतिबिंबित होती है , हमारे समाज मे , साहित्य मे, संस्कृति मे, राजनीती मे !

इसलिये विकास की बात करने से पहले
हमें  चिंतन करना होगा, कैसे
हम बोद्धिक और भावात्मक रूप से सबल बन सके
जो देश, धर्म, जाति, क्षेत्र, संस्कृति, धन  के प्रति जुनूनी ना हो !
जो वैचारिक और भावात्मक रूप से पक्षपातपूर्ण ना हो !
जो तार्किक हो, और संवेदनशील हो  !
साहसी  और संघर्षशील भी
और  जिसका नजरिया वस्तुनिष्ठ हो !

अगर अपनी चेतना को इस ओर ले जा सके !
तो उसके बाद जो कुछ भी घटित होगा !
वह शुभ ही होगा !
और एक आमूल बदलाव लायेगा सामाजिक संरचना मे,
और यह  परिलक्षित होगा, राजनीती मे , साहित्य मे , संस्कृति मे !
और तभी वह घडी आएगी की हम एक समय मे आधुनिक भी होंगे और ऐतिहासिक भी !
तब हम अपने इतिहास  और अपने भविष्य  दोनों का सम्मान करेंगे !

dayal pandey/ दयाल पाण्डे


पंकज सिंह महर

Quote from: shailesh on March 18, 2010, 06:16:37 PM
शायद  हम  नहीं समझते हैं
विकास क्या है , इसीलिए चिल्लाते है राजनिति पर
और आंसूं बहते है अपनी हालत पर
और देखते हैं राह किसी विकास पुरुष या अवतार की !

हम नहीं समझते हैं, विकास का मतलब क्या होता है
इसलिए सोचते है, की ऊंचे ऊंचे भवन , माल , और ५ स्टार होटल या ट्रेन की पटरियां
बदल देगी भविष्य पहाड़ों का !
और समझते है की उपभोगवादी नजरिया ही विकास का मापदंड है !


बहुत ही सटीक काव्यात्मक टिप्पणी।

          पहाड़ और विकास

विकास तो करने से होगा,मगर संसाधनो का क्या होगा।
अगर संसाधन ही न हौ, तो विकास कैसे, संभव होगा।

अगर सड़क,रेल पटरी नही होगी, हवाई पट्टी नही होगी।
तो क्या पहाड़ खुद मानव का, व्यवस्थापक बन जायेगा।

जल के संसाधन न होंगे,
तो पांच-छह हजार फिट की उचाई पर,
क्या पहाड़ खुद पानी चढा देगा।

स्वास्थ सेवायें नही होंगी,चिक्तिसक,नही होंगे,
तो शहरो से ले जाई जा रही बिमारी का,
पहाड़ खुद ही इलाज कर देगा।

स्कुल नही होंगे,अध्यापक नही होंगे,
तो क्या पहाड़ खुद शिक्षक बन जायेगा।

पहाड़ो कि पहचान उनकी आपो-हवा-पानी थी,
वह भी आज अंतिम सांसै ले रही है।

कवि सत-सत नमन करता है उनको,
जो मुस्किल हालातो मे भी वहा जी रहे है।

अब अंत मे सवाल यह करता है "सुन्दर",
क्या मुस्किल हालातो मे जी रहे पहाडियों को,
पहाड़ खुशियां लौटा देगा?। 

स्वरचित

सुन्दर सिंह नेगी 19-03-2010

jagmohan singh jayara

"विकास के लिए पानी"

पहाड़ प्यासा रहने लगा है,
सूखते जल स्रोतों के कारण,
पहाड़ पर  जब पीने को,
नहीं मिलेगा पानी,
उत्तराखंड के विकास की कल्पना,
कैसे हो सार्थक?
सच में है बेमानी.

जल है तो जीवन है,
ये सच है, नहीं कहानी,
उत्तराखंड के विकास के लिए,
पहाड़ों पर रोकना होगा पानी.

पहाड़, पत्थर और पानी,
उत्तराखंड की ये हैं निशानी,
डगमगाए नहीं अस्तित्व  इनका,
जंगलों में झलके जवानी.

अनियंत्रित  विकास प्रकृति को,
लीलता और  चुनौती देता है,
जो पहाड़ में खलल पैदा करेगा,
लोभी मानव लालच में आकर,
लीलेगा पहाड़ का पर्यावरण,
क्या पर्वतजन ये सब,
किसके विकास के लिए सहेगा,
देखो टिहरी विस्तापितों को.

विकास एक सतत प्रक्रिया है,
जो उत्तराखंड में, आज है जारी,
मानव संसाधन का विकास हुआ,
पहुँच  गए सब  शहरों की ओर,
अब लौटना है लाचारी.

चुनौती है मानव अस्तित्व के लिए,
पहाड़ पर जल संकलन हो,
क्योंकि पहाड़ पर चाहिए,
"विकास के लिए पानी",
इसके बिना विकास हो,
कहता है कवि "ज़िग्यांसु"
सच नहीं, सचमुच है नादानी.

रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित १९.३.२०१०)
(मुझे पर्वतों से प्यार है...मैं यही कहता हूँ)

धनेश कोठारी

हाल

दाऽ
स्यु बीति
आजादी कु
पचासुं साल
ऊंड फुंड्वा
खादी झाड़िक
बणिगेन मालामाल/ अर
हम स्यु छवां
आज बि
थेकळौं पर थेकळा धारि
कुगत, कुहाल/ अर
कंगाल
Source : Jyundal (A Collection of Garhwali Poems)
Copyright@ Dhanesh Kothari

shailesh

हम शायद  नहीं जानते पहाड़ी होने का अर्थ
और ना ही समझते है, पर्वतों की  जीवटता,
उनकी उथल पुथल, और उनका संघर्ष उनकी सहनशीलता
हमें नहीं पता की पहाड़ों का बनना क्या होता है ,
इसीलिए तो नहीं समझ पाते की कैसे पर्वत जन्म देता है खुद को ,
कैसे रोज ऊंचा होता जाता है ,
सागरमाथा की तरह , कंचनजंघा की तरह
नंदा देवी या त्रिशूल की तरह
कैसे अपने मे जन्म देता है खूबसूरत घाटियों को
और सदाबहार नदियों को ,
चीड, देवदार, बांज और बुरांश को
ना ही समझ पाते है उस अपार सम्पंदा के मिलने के महत्व को

अगर हम ये सब समझते तो शायद
विकास के नाम पर
उसको तोड़ने की,  लूटने की जिद नहीं होती
ना ही हम पलायन करते
क्यूंकि पहाड़ की प्रकृति को समझना और आत्मसात करना  ही
पहाड़ को बचाने और बसाने की शुरुवात है !

इसीलिए हम कुमाउनी गढ़वाली तो है
हम किसी गाँव के भट्ट है जोशी है पाण्डेय है ,
सेमवाल है , नौटियाल है , डिमरी है ,
राणा है , रावत है , नेगी है ,
पर शायद पहाड़ी नहीं है !
इसीलिए हम ज्यादा सुखद महसूस करते है , हल्द्वानी , देहरादून , या दिल्ली मे
और लुड़क पड़ते है उस ओर

ना ही हम समझते है उस संस्कृति का मतलब,
ना ही उसकी जीवन्तता को
जो उन पहाड़ों और घाटियों के संघर्ष से पैदा हुई है
इसीलिए तो दिल्ली, देहरादून, या हल्द्वानी की किसी कालोनी मे
थोडा  शराब पीकर
थोडा बहुत झोडा, छोलिया नाच कर
और अपने सांसदों, नेताओं, और ठेकेदारों का अभिनन्दन कर खुश हो लेते है
हम खुश हो जाते २ या ३ मिनट का पहाड़ी नाच गाने का जिक्र टीवी चनेलों मे देखकर
और  कभी कभी  अपनी पहचान को दुरुस्त करने के लिए
अपने गाँव भी घूमकर आ जाते है, कुलदेवी के दर्शन कर आते है
और जरूरत पड़ी तो जागर लगा लेते है !
और वापस लौटते समय सरकार, विकास और अभावों का रोना रो लेते है
और फटाफट दिल्ली, देहरादून की बस मे चढ़ जाते है !

ना हम समझते है विकास का मतलब इसीलिए
हम गरियाते है उन् लोगों को जो गैरसैण राजधानी की बात करते है !
और हँसते है उनकी नासमझी पर , और समझाते है उनको देहरादून मे राजधानी फायदे
दुरुस्त करने की कोशिश करते है उसकी विकास के प्रति समझ  को
और उसी तथाकथित विकास के लिए
हम बेच रहे है अपनी नदियाँ , अपने पहाड़ , अपने जंगल
और रोज रोज अपने ब्लॉग पर, या फोरम पर
दैनिक जागरण, या कभी कभी इकोनोमिक्स टाइमस
मे बाँध बनाने या जमीन बिकने  की छपी खबर को डाल देते हैं
और खुश हो लेते हैं की पहाड़ भी अब जल्दी ही दिल्ली या देहरादून बन जायेगा

इसीलिए विकास की बात करने से पहले
हमको समझना होगा,
पहाड़ की जटिलता को, उसकी सरलता को
उसकी संवेदनशीलता को, उसकी नित नूतनता को
उसके जनजीवन को, उसकी संस्कृति को 
उसकी बिना मांगे दी हुए बहुमूल्य सम्पदा के  महत्व को!
तभी हम पकड़ पाएंगे उस सम्यक बिंदु को
जो विकास और विनाश के बीच की सूक्ष्म रेखा  बनाता है !

हेम पन्त

Aisi vicharottejak kavita likhne ke liye aapki jitni tareef ki jaye kam hai... har shabd mein gahare arth aur sachchai hai