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ON-LINE KAVI SAMMELAN - ऑनलाइन कवि सम्मेलन दिखाए, अपना हुनर (कवि के रूप में)

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, March 11, 2010, 11:45:47 AM


            "खिलकर कहा गुलजार से"

फूल ने खिलकर, गुलजार से कहा?

मे खिलकर भी तनहा,मे
तुमसे मिलकर भी तनहा।

कलियों ने मुस्करा कर कहा,
तनहा क्यो कहते हो,

जरा देखो तो सही अपने कदमो की ओर,

हम तुम्हारे खिलने के इन्तजार मे,
वसंत की शोभा बढा रहे है।

बहार ने मिलकर आवाज दी,
कि मे आ रही हु, वसंत का रूप धारण कर।

मानवता को खुशियां देने के लिए,
मानव के हृदय मे,
इंसानियत का रंग भरने के लिए।

स्वरचित-11/03/2010

jagmohan singh jayara

      "हमारा पहाड़"

ऋतु बसंत  के रंग में,
रंग गया  है,
क्योंकि, रंग बिरंगे फूल,
खिले हुए हैं सर्वत्र,
पाखों,गाड, गदनों और,
गांवों की सारों में,
बह रही है बसंत की बयार.

विचरण कर रहे हैं,
देवभूमि के देवता,
पर्वत शिखरों और,
ताल, बुग्यालों पर,
जहाँ बह रही है,
धीमी-धीमी बासंती हवा,
मन को मदहोश करने वाली.

कहीं दूर से देख रही हैं,
हिंवाली काँठी जैसे,
चौखम्बा, त्रिशूली, पंचाचूली,
नंदाघूंटी, केदारकांठा,
आपस में अंग्वाल मारकर,
हमारे पहाड़ पर छाए बसंत को,
जिसने उन्हें आकर्षित कर लिया है,
लेकिन, वो बेखबर है.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
(सर्विधिकार सुरक्षित १४.३.२०१०)

TALIYAN.............JAGMOHAN JI KE LIYE......... BAHOOT ACHA.

KYA BAAT HAI FALGUN KE RANG NE CHAIT KO BHI RANG DIYA HAI.
OR SAATH-SAATH HAMARE KAVI MITRON KO BHI. OR SABHI MEMBERS KO BHI.

AAYEEYE AAP SABHI KA SWAGAT HAI.
"KAVI GOSTHI ME"

jagmohan singh jayara

बसंत में खिला "बुरांश" बुला रहा है,
चलो मित्रों उत्तराखंड घूम  आएँ,
कवि मित्रों कल्पना में विचरण करो,
कैसा लग रहा कविता में बताएँ.
(जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु")

कुछ देर के लिए ही सही,
फिर वापस आ गये है।

कल्पना मे बिचरण करना,
लगता तो अच्छा ही है।

मगर अफसोस इस बात का कि,
न चाह कर भी हम,
लौट कर आ जाते है।

स्वरचित 15/03/2010

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720




सभी कवियों का बहुत-२ धन्यवाद...

अब विषय परिवर्तन -     उत्तराखंड के विकास पर आप कविता लिख सकते है !
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विषय : उत्तराखंड का विकास


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


मैंने थोड़ी सी कोशिश की कुछ विकास के बारे में कुछ शब्द कविता के रूप में लिखू !
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ये था नारा हमारा
आज दो अभी तो उत्तराखंड राज्य दो

राज्य मिला पर विकास नहीं मिला !
एक बार हाथ, एक बार कमल खिला !!
विकास के इन्होने  बड़े सपने दिखाए !
९ साल में चार मुख्य मंत्री बनाये!!

बेरोजगारी पर बेरोजगारी !
महंगाई पर है महंगाई !!
हर तरफ है मारामारी !
भ्रष्टचार बन गयी अब महामारी !!

किसी के गाव में  पहुची है रोड !
किसका विकास कौन सा विकास !!
आज मानुष हो गया है उदास !
हाय रे हाय कौन करेगा विकास !!

गाव छोड़ कर लोग है भागे !
एक नहीं हजारो है भागे !!
बूड़े लोग गाव में रोये!
उनके बच्चे वापस नहीं आये !!

कहाँ होनी थी राजधानी !
किसकी की यह मनमानी !!
जनता है बेचारी लाचार !
सरकार करे उपलब्धियों का प्रचार !

हाय रे हाय.. वाह रे वाह
कैसा है यह विकास..




(c) www.merapahad.com

jagmohan singh jayara

"उत्तराखंड कू विकास"

होंणु छ पर यनु नि,
कि हमारा तुमारा गौं मा,
द्वारू फर लग्याँ ताळा,
हमारा हाथुन खुलि जौन,
जौं घरु मा नि  लग्यन अजौं,
ऊ  सदानि आबाद रौन.

जब उत्तराखंड बणि थौ,
सब्यौं का मन मा जगि थै,
सतत विकास की आस,
खेत, खल्याण, गौं, गौळा मा,
होलु मन चैन्दु विकास .

जबरि बिटि हमारू राज्य  बणि,
सच  मा नेतौं अर चमचौं  कू,
होंणु छ असल मा विकास,
जनता जस की तस छ,
हबरि होंणी मन मा निराश.

असली विकास तब होलु,
जब प्रवासी उत्तराखंडी,
अपणा राज्य अर गौं लौटला,
खाला पहाड़ कू कोदु, झंगोरू,
जख्यांन साग पात छौंकला.

आली रौनक गौं गौं मा,
हैन्सलि नीमदरी, तिबारी, डिंडाळि,
होलु छोरौं कू किब्लाट,
या छ सच्चा विकास की झलक,
शायद आपन भी बिंग्याली.

इच्छा सब्यौं की या ही छ,
अपणा राज्य कू हो विकास,
दगड़ा मा उत्तराखंड कू पर्यावरण,
सुरक्षित रौ सदानि या छ आस.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित १६.३.२०१०)
जन्मभूमि: बागी-नौसा, चन्द्रबदनी, टिहरी गढ़वाल.