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ON-LINE KAVI SAMMELAN - ऑनलाइन कवि सम्मेलन दिखाए, अपना हुनर (कवि के रूप में)

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, March 11, 2010, 11:45:47 AM

(इस तरहै होगा विकास)

ऐंसे नही, होगा विकास,
जैसे हो रहा, है विकास।

जिस दिन मिटेगा,
तेरा-मेरा भाव ह्रदॅय से,
उस दिन होगा सबका विकास।

कैसे नही होगा विकास,
तुम भी करो, मै भी करूंगा,
जब सब करंगे, तभी होगा विकास।

संकल्प लो, विश्वास जगाओ,
संयुक्त हो हर, घर परिवार,

टूटकर पुनः जुडता नही कुछ भी,
जुड भी जाये तो, गांठ पर गांठ।

पारदर्शिता हो मुख्य आधार,
हर दिन होगा, जीर्णोधार।

देव भुमी की पावन धरती पर,
फिर पवॅतीय, खेत लहरायेगे,

कोयल मिठी बोल, सुनायेगी।
कफुवा गद-गद होकर, खत-खतायेगा।

घुघुती फिर से, विरह के राग छेडेगी,
पलायन अपनी, जडो़ की ओर लौटेगा।

पुन: करंगे, उजडे, घरो का शिलान्यास।
इस तरहै होगा हमारे, पहाड़ो का विकास। 

स्वरचित 16-03-2010

क्या कोई यह बता सकता है कि इस "विकास" कि कविता मे कितने कुमाउनी शब्दो का प्रयोग किया गया है?

सत्यदेव सिंह नेगी


जब  मै  स्कूल  में  पढता  था 
रोज  गरीबी  देखा  करता  था
पैंट  में  टल्ला  जूते  में  भी  टल्ला
पर  मै  फिर  भी  खुश  था  न  जाने  क्यों  भला
खेती  भी  होती  थी  परदे  की  जगह  धोती  थी
मछली का  सुरा  कोदे  की  रोटी
सबसे  बढ़िया  पसंद  होती
सोचते  बड़े  होके  खूब  पैसा  कमाएंगे
गरीबी  को  कोसों  दूर  भगायेंगे
बड़े  हो  गए  गरीबी  भी  चली  गयी
मगर  ये  क्या  हमारी  तो  पहचान  ही  बदल  गयी
अब  न  पड़ोस  में  बोड़ी  ब्वाडा  काकी  काका
यहाँ  तो  यादवजी  मलिक  साब  पंजाबी  बांका
अब  कभी  गाँव  जाते  हैं  अपनों  से  मिल  नहीं  पाते  हैं
खली  पड़े  हैं  उनके  घर  इक्के  दुक्के  बूढ़े  उधर
सोचता  हूँ  इस मिटटी  ने  हमें  जीवन  दिया  ज्ञान  दिया
और  हमने  बड़े  होके  इसको  ही  छोड़  दिया


पंकज सिंह महर

उत्तराखण्ड के लिये विकास की बात,
नई नहीं है हमने कितनी लगाई धाद...
गले फट गये....!
तो हमने सोचा कि आखिर
ये विकास है क्या बला?
क्या बात हुई कि हमारी धाद
का इस पर क्यों नहीं हुआ असर भला?
चिन्तन किया मनन किया,
समझ कुछ न पाया,
फिर पूछा मैने बूबू से तो,
उन्होंने यह बतलाया।
विकास का वि नेताओं के लिये है और
कास जनता के लिये आरक्षित है।
इसलिये उत्तराखण्ड भी काश से ही काम चलाये।

धनेश कोठारी

बिगास

ब्वै का सौं
ब्याळी ही अड़ेथेल छौ मिन्
तुमारा गौं खुणि बिगास

परसी त ऐ छा मैंमु
तुमारा मुल्क का बिधैक
ब्लोक का प्रमुख
गौं का परधान
बिगास कि खातिर

ऊंका गैल मा छा
सोरा-सरिक
द्वी-येक चकड़ैत
जण्ण चारे-क लठैत
परैमरी का मास्टर जी
पैरा चिंणदारा ठेकेदार
चाट पूंजि खन्दारा गल्लेदार

सिफारिशि फोन बि ऐगे छा
लाट साबूं का
रोणत्या ह्‍वेक मांगणा छा बिगास
सब्बि भरोसू देगेन् मिथैं
कमी-शनि बुखणौ कू

मेरि बि धरिं छै
वे दिनी बटि/ कि
आज मि मांगणू छौं बोट
भोळ मिन् तुम
मंगत्या नि बणै/ त
अपड़ि ब्वै कू.........!

जा फंडु जा गौं
जागणूं होलू तुमतैं बिगास
जागणूं होलू तुमारि मवसि कू

Copyright@ Dhanesh Kothari

Bhishma Kukreti


Bhishma Kukreti

कवि सम्मलेन युवाओं के लिए है किन्तु मैं वसंत विषय के कारण एक गढ़वाली लोक गीत का समावेश करना चाहूंगा
ग्वीराळ फूल फुलिगे म्यार भीना
माळऊ बेड़ा फ्यूंळड़ी फुलिगे भीना
  झाप्न्याळइ   सकने फूली गे भीना
पलिसारी  लगली फूली गे भीना
  द्यूंळ थान कुणजु फूली गे भीना
  गैरी गदनी तुसारू फूली गे भीना
  डान्द्युं  फूली गे बुरांस मेरा भीना
डाळ  फूलो बसंत बौड़ी गे भीना
बसन्ती रंग मा रंग दे भीना
ग्वीराळ फूली गे म्यार भीना

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Thanks a lot sir.

Anyone can join this sir...This is not for only young guys. We, of course, need blessing from seniors also.

Excellent poem. by you. Wah wah wah..

Sir.. -


Quote from: bhishma kukreti on March 17, 2010, 06:25:45 AM
कवि सम्मलेन युवाओं के लिए है किन्तु मैं वसंत विषय के कारण एक गढ़वाली लोक गीत का समावेश करना चाहूंगा
ग्वीराळ फूल फुलिगे म्यार भीना
माळऊ बेड़ा फ्यूंळड़ी फुलिगे भीना
  झाप्न्याळइ   सकने फूली गे भीना
पलिसारी  लगली फूली गे भीना
  द्यूंळ थान कुणजु फूली गे भीना
  गैरी गदनी तुसारू फूली गे भीना
  डान्द्युं  फूली गे बुरांस मेरा भीना
डाळ  फूलो बसंत बौड़ी गे भीना
बसन्ती रंग मा रंग दे भीना
ग्वीराळ फूली गे म्यार भीना


खीमसिंह रावत

मैं जब पहाड़ से शहर आया, पहाड़ का दर्द साथ लाया  |
पथरीले रास्तों पर घुमना, रिमझिम बरखा में भीगना |
बेडु के पेड़ पर चढ़ जाना, पके पके बेडु को टीपना |
यों ही सब छोड़ आना, तब कितना बुरा लगा था |

फुलदेई से साल्दे तक, प्युली बुरास मिहोव बसींग |
पेड़ों पर पऊ का आना, दुधभाती का हंसना खिलाना
हाथ से हाथ थामना ,   पैरों से पैर मिलाकर चलना |
झोडों धौस्यला  गाना, भाग्नोलों पर रहरह कर थिरकना |
यों ही सब छोड़ आना, तब कितना बुरा लगा था |

आमों पर बौर का आना, खुशबू से मदहोश हो जाना |
हरे पेड़ों में छुपछुप कर, कूहूँ -२ कोयल का गाना, 
माँ का बुलाना मनाना,  गेहूं के खेतों में उमी पकाना |
पुतेइयों  का उड़ना इठलाना,  और  भौरों का  गुनगुनाना |
जाड़ें का परदा गिर जाना, धीरे धीरे वसंत का आ जाना |
यों ही सब छोड़ आना, तब कितना बुरा लगा था |

ठन्डे पानी के लिए जाना, लकड़ी से तौली गागर बजाना |
प्याज नूँण साथ ले जाना, आधे रास्ते में बैठकर खाना |
हा हा कर गघेरों को गजाना,  यही है बचपन का खजाना|
यों ही सब छोड़ आना, तब कितना बुरा लगा था |



jagmohan singh jayara

"उत्तराखंड का विकास"

कल्पना में देखा मैंने,
उत्तराखंड का विकास,
दौड़ रही थी रेलगाड़ी,
कर्णप्रयाग  और बागेश्वर में,
प्रिय पर्वतों  के पास.

खुशनुमा माहौल था,
खुश हो रहे थे सब भाई बैण,
उत्तराखंड की स्थाई  राजधानी,
बन गई गैरसैण.

बिजली बन रही छोटे बाँधो से,
जल से लबालब  भरे ताल,
स्वर्ग सुन्दर से लग रहा,
अपना कुमाऊँ और गढ़वाल.

सड़क मार्ग से ट्रक ढ़ो रहे,
उत्तराखंड के फल फूल,
कुटीर और लघु उद्योग उन्नति कर रहे,
जिसमें छुपा है विकास का मूल.

किराए पर पर्यटकों के लिए,
ढूँढी जा रही तिबारि और डिंडाली
ग्रामीण पर्यटन फल फूल रहा,
लोगों में बढ़ रही खुशहाली.

चर्चा का विषय बना हुआ,
सबसे अधिक उत्तराखंड में प्रति व्यक्ति आय,
देख उत्तराखंड की तरक्की,
कवि "जिग्यांसु"  फूले नहीं समाय.

कवि मित्र रचनाओं में  कर रहे,
अपने  बीते  अतीत को याद,
उत्तराखंड की  खुशहाली के लिए,
कवि  "ज़िग्यांसु" कर रहा,
बद्रीविशाल जी से फ़रियाद.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित १६.३.२०१०)
निवास: गढ़देश से दूर दिल्ली प्रदेश.