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ON-LINE KAVI SAMMELAN - ऑनलाइन कवि सम्मेलन दिखाए, अपना हुनर (कवि के रूप में)

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, March 11, 2010, 11:45:47 AM

सत्यदेव सिंह नेगी

कबूतरी जी आप हो इस धरा पर संस्कृति की माला   
आपने इस देवक्षेत्र तो एक धागे में पिरोडाला     
सभी करें बिनती एक सुर में उस विधाता से     
आपके स्वास्थ्य की गुजारिस है उस दाता से     
है हमें विस्वास अटूट उस दाता के न्याय पर     
देगा सबको अच्छी खबर आपको ठीक कर   

दीपक पनेरू


हम सारे ही नौसिखिये है, ऐसे सीखा तो जाता है,
वीर अर्जुन पुत्र अभिमन्यु कि तरह यहाँ,
कौन पेट से सीखकर आता है,
कुछ हमने लिखा और कुछ आपने,
फिर शब्दों का गोलमोल हुआ,
पहाड़ी और अंग्रेजी शब्दों संग,
ये कविताओं का कैसा झोल हुआ,


Quote from: sunder singh negi/तनहा इंसान on August 16, 2010, 04:29:57 PM
शब्दहीन न होना तुम जग मे, देवो के देव हो तुम,
ये क्या कह दिया तुमने, सबके प्यारे सत्यदेव हो तुम.

तनहा की लेखनी पर, मंत्र मुग्ध हो जाते हो तुम.
तनहा भी नौसिखिया है, ये कैसे भूल जाते हो तुम.

तनहा इंसान 16-08-2010


दीपक पनेरू


बहुत ही सुंदर पंक्तियाँ है नेगी जी अति सुंदर


Quote from: सत्यदेव सिंह नेगी on August 16, 2010, 04:37:08 PM
कबूतरी जी आप हो इस धरा पर संस्कृति की माला   
आपने इस देवक्षेत्र तो एक धागे में पिरोडाला     
सभी करें बिनती एक सुर में उस विधाता से     
आपके स्वास्थ्य की गुजारिस है उस दाता से     
है हमें विस्वास अटूट उस दाता के न्याय पर     
देगा सबको अच्छी खबर आपको ठीक कर   

दिपक तुम्हारी दुवाओ पढकर, चढा तनहा को भी बुखार,
नेगी जी की लेखनी पढकर, हुआ तनहां फिर से बिमार.
तनहा को छोड़ो तनहा, क-क के लिए दुवाऐं करो हजार.

तनहा इंसान 16-08-2010

दीपक पनेरू


अरे आप क्यों मुरझाते हो,
हम लोगो को तो ये रोग लगा,
बिना ज्ञान, बिना धूनी के,
ना जाने कैसा जोग लगा,

आप कवि हो अपने नाम से सुंदर,
शब्दों का अच्छा ज्ञान है पाया,
मैं सोचू आप ये क्यों लिखते हो,
ये सोच मेरा दिल भर आया......

सच्ची में महाराज....

Quote from: sunder singh negi/तनहा इंसान on August 16, 2010, 04:42:24 PM
दिपक तुम्हारी दुवाओ पढकर, चढा तनहा को भी बुखार,
नेगी जी की लेखनी पढकर, हुआ तनहां फिर से बिमार.
तनहा को छोड़ो तनहा, क-क के लिए दुवाऐं करो हजार.

तनहा इंसान 16-08-2010

मेरा गांव मेरा पहाड़, कितना है तेरा प्यार निराला.
ठंडक की तो खान है तु, गरम पिलाये चाय का पयाला.
कोंन है ऐसा जो नही जानता, कोंन नही तेरा मतवाला.

तनहा इंसान 16-08-2010

सत्यदेव सिंह नेगी

खूब चल रहा शीत द्वंध कलम के दो वीरों का   
मजे लुट रहा सत्यदेव चमक देख हीरों का   
तेज है दीपक में तो आभा सुन्दर  की अमिट   
देख मेरे चक्षु असमंजस में ऐसा मुझे प्रतीत   
एक वार करे दूजा कटे शब्द की बारिश हुई   
स्तब्ध हूँ मैं भी भीगूँ एक और गुजारिश हुई   
प्रेम मन्दाकिनी में खूब लगाऊं दुबकी   
तुम जैसा मै भी हो जाऊं अभिलाषा मेरे मन की 

दो दिन का है जीवन का मेला, यही सभी कहते है दिपक.
मै कैसे जानु मन का विरह तुम्हारा, सबके प्यारे दिपक.

बाकी बचा है जीवन का मेरा, एक दिन का और मेला.
तनहा समझा तुमहै उजाला, जीवन है मेरा मिट्रटी का ढेला.

तनहा इंसान 16-08-2010

Raje Singh Karakoti

तनहा की व्यथा सुनकर दिल हुआ गमसार  क्या  हमेशा ऐसा ही था तनहा  दुखी और लाचार !!  गुज़ारिश यही है तनहा से की अपनी व्यथा बताओ   कुछ हमारी भी सुनो और कुछ अपनी सुनाओ !!   

Quote from: sunder singh negi/तनहा इंसान on August 16, 2010, 05:03:22 PM
दो दिन का है जीवन का मेला, यही सभी कहते है दिपक.
मै कैसे जानु मन का विरह तुम्हारा, सबके प्यारे दिपक.

बाकी बचा है जीवन का मेरा, एक दिन का और मेला.
तनहा समझा तुमहै उजाला, जीवन है मेरा मिट्रटी का ढेला.

तनहा इंसान 16-08-2010

सत्यदेव सिंह नेगी


सच में रोग है ये प्रेम ये मैंने आज जाना   
दोनों प्रेमियों में है कविता का खजाना   
एक दूजे को हिम्मत दे देख मै नादान सन्न   
लड़ते हो या खेल है ये या ये दोनों का फन 
चलता रहे तुम दोनों का ये फंसना फ़साना   
मुझे भी नित मिलता रहेगा नया अफसाना   
राजे सिंह जी बिच बिच में लगाके ठुमके   
मै भी सोचूं आयटम बॉय है इस क्रिकेट के