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ON-LINE KAVI SAMMELAN - ऑनलाइन कवि सम्मेलन दिखाए, अपना हुनर (कवि के रूप में)

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, March 11, 2010, 11:45:47 AM

मत करो अपने मन को, गम से गमासार,
तनहा मागता है माफी, जोडकर दोनो हाथ,

क्यो सुनना चाहते हो राजे जी, तनहा की लाचारी.
ये तनहा छोड़ जो आया है, अपने प्यारे गांव, पहाड़.


तनहा इंसान 16-08-2010

Raje Singh Karakoti

नेगी जी सच कहूं तो आप भी नहीं हैं कुछ कम     कविता के इस महासमर के आप हैं छुपे रुस्तम !!     रहते हैं हरदम आप शब्दों के तीर यूं ताने      खाके चोट जिसकी लगे हर कोई बिलबिलाने !!     
सच में रोग है ये प्रेम ये मैंने आज जाना   
दोनों प्रेमियों में है कविता का खजाना   
एक दूजे को हिम्मत दे देख मै नादान सन्न   
लड़ते हो या खेल है ये या ये दोनों का फन 
चलता रहे तुम दोनों का ये फंसना फ़साना   
मुझे भी नित मिलता रहेगा नया अफसाना   
राजे सिंह जी बिच बिच में लगाके ठुमके   
मै भी सोचूं आयटम बॉय है इस क्रिकेट के


शब्दो के है तीर नुकिले बहुत, प्यारे सत्यदेव जी.
एक ही शब्द से भेद देते हो, कई शब्द सत्यदेव जी.

कहते है मे हु नौसिखिया कवि, हर बार सत्यदेव जी.
तुम्हारे लुभावने शब्दो से तो, खुश हो जाये इद्र देव भी.

तनहा इंसान 16-08-2010

दीपक पनेरू


"सुंदर जी" लो में फिर से आ गया,
पहाड़ो कि बात सुन मुझसे न रहा गया,
स्वर्ग कि आशा करे कोई तो,
उसे पता पहाड़ का देना,
घूस खोरी का जमाना है,
फिर भी आप कुछ मत लेना,
आपने कितने भावुक मन से,
इतना प्यार जताया है,
ये दो रोटी और पेट कि मार ने,
हमें पहाड़ से दूर भगाया है.....

लगे रहो बस लगे रहो.....


Quote from: sunder singh negi/तनहा इंसान on August 16, 2010, 05:17:02 PM
मत करो अपने मन को, गम से गमासार,
तनहा मागता है माफी, जोडकर दोनो हाथ,

क्यो सुनना चाहते हो राजे जी, तनहा की लाचारी.
ये तनहा छोड़ जो आया है, अपने प्यारे गांव, पहाड़.


तनहा इंसान 16-08-2010

क्या तीर चलाया राजे जी, तुमने नेगी जी के शब्दो पर.
इंतजार करो थोडी देर, अभी जल्दी देगे वो तुमहै उत्तर.
तनहा इंसान 16-08-2010

दीपक पनेरू

क्या कहने "सत्य देव जी" के,
  ओ तो शब्दों का पिटारा है,
  समुंदर से भी गहरे ओ,
  हम तो समुंदर का किनारा है,
 
  "राजे जी" भी बीच बीच में,
  कुछ नया नया फरमाते है,
  में इनसे कुछ पूछता हूँ,
  क्या दिल कि लिखने में शर्माते है?
 
  दीपक पनेरू
  16 -08 -2010
 
 

पहाड़ सुना है हम सब बिन, दिपक जी,
गांव सुना लगता है, अपनो के बिन.

बीस दिन जब छुट्रटी जाता हु दिपक जी.
याद आ जाते है विताये, वहा पुराने दिन.

तनहा इंसान 16-08-2010

Raje Singh Karakoti

माना की शाम हो चली और तारे भी लगे टिमटिमाने पर तनहा जी मैं और नेगी जी आप की बातो में नहीं आने वाले !!   कोशिशें लाख कर लो , हम को भिड़ा न पाओगे हिमालय जैसी अटल यारी को यूं डिगा न पाओगे !!     
Quote from: sunder singh negi/तनहा इंसान on August 16, 2010, 05:33:35 PM
क्या तीर चलाया राजे जी, तुमने नेगी जी के शब्दो पर.
इंतजार करो थोडी देर, अभी जल्दी देगे वो तुमहै उत्तर.
तनहा इंसान 16-08-2010

सत्यदेव सिंह नेगी


सुंदरजी आपका तरीका पसंद आया   
बच्चे के हाथ से कैसे ब्लेड छुड़ाया   
जानने लगा मै कि क्या है लिखना और क्या नहीं   
आप का सुक्रिया कैसे करूँ अदा पकड़ा सही   
राजे सिंह जी से करू हाथ जोड़ मै बिनती   
मेरी कोइ बुरी तमन्ना नहीं थी   
आजकल खेल का मिजाज ही है कैसा   
मैच भले न हो अच्छा मगर वसूलना है पैसा

दिल से बडे ही कठोर हो राजे तुम तो,
अच्छा लगा राजे, तुम्हारा लुभावनापन.

तनहा भी था कठोर, कभी बचपन मे,
पर माँ ने भर दिया "मुझमे" दुलारापन.

तनहा इंसान 16-08-2010