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Water Crisis In Uttarakhand : पानी की समस्या से जूझता उत्तराखण्ड

Started by हुक्का बू, April 05, 2010, 12:52:36 PM

हुक्का बू

नातियो/पोथियो,
उत्तराखण्ड भारत वर्ष के लिये पानी का सबसे बड़ा स्रोत है। पूरे देश की जीवन दायिनी कही जाने वाली गंगा और यमुना नदी उत्तराखण्ड के पहाड़ों से उतरने वाली नदियों को अपने आप में समाहित कर, जल संग्रहण कर ही पूरे देश को पानी बांट्ती हैं। लेकिन् उत्तराखण्ड की विषम भौगोलिक परिस्थिति ऐसी है कि यहां का पानी यहां के ही काम नहीं आ पा रहा है।

सरकार की अदूरदर्शी नीति के कारण आज पौड़ी हो या पिथौरागढ़, अल्मोड़ा हो या चमोली, देहरादून हो या बागेश्वर, खासतौर पर पर्वतीय जिलों में पानी की स्थिति भयावह होती जा रही है। विडम्बना है कि गंगा-यमुना के मैत में खच्चरों से, टैकरों से पानी का ढुलान करने की जरुरत पड़ रही है। सरकार को साल भर पानी की कोई चिन्ता नहीं है, लेकिन गर्मी आते ही पानी के लिये योजनाओं, टैकरों से ढुलान, स्रोतों का पुनर्वास के काम पर हर साल लाखों का वारा-न्यारा होने लगता है, लेकिन परिणाम ढाक के तीन पात।

राज्य आन्दोलन के दौरान घर-बार छोड़कर सड़क पर निकली "कोदा-झंगोरा खायेंगे, उत्तराखण्ड बनायेंगे" का नारा लगाने वाली हमारी दिदी-भुली, ईजा-आमा आज भी पानी की एक-एक बूंद के लिये परेशान हैं। सरकार इन सबसे सरोकार न रखते हुए आंकड़ों के माध्यम से बाजीगरी कर गर्व से बताती है कि उत्तराखण्ड में पानी की कमी नहीं है, सब जगह पानी मिल रहा है, जहां नहीं है, वहां टैंकरों से पानी दिया जा रहा है।

कोई इन नुमांइदों से यह पूछे कि राज्य बनने के १० साल बाद भी करोड़ों रुपये के बजट खर्च कर देने के बाद भी आज तक उत्तराखण्ड के मात्र 16826 गांवो में  आप पानी क्यों नहीं पहुंचा सके?

हेम पन्त

बुबू, भौत ही ज्वलन्त समस्या उठा दी हो आज आपने....

पहाड़ों में नौले, धारे और चुपटोले सूखते जा रहे हैं और सरकार का ध्यान यहाँ की नदियों का दोहन करके बिजली बनाने या रोड़ी-बजरी बेचने पर है, ऐसे में पानी की समस्या तो होगी ही....

हुक्का बू

कहने को तो उत्तराखण्ड को water tank of asia कहा जाता है, लेकिन इस वाटर टैंक की नाक के नीचे जाने कितने ही गांव पानी को तरस रहे हैं। आज भी पहाड़ों में लोग पानी के लिये ४-४ मील से पानी लाने के लिये अभिश्प्त हैं। हर साल गर्मी आते ही गांव के आस-पास के जल स्रोत सूख जाते हैं। कहीं पर नदी से आ रही पाईप लाईन को ऊपर के ही गांव वालों द्वारा क्षतिग्रस्त कर दिया जाता है। सरकार हैण्डप्म्प लगाकर सरकारी पैसे का दुरुपयोग करने पर जुटी है। हैण्ड पम्प यदि पुराने सूख चुके नौलो-धारो पर लगते तो अच्छा होता, पुराने नौलो_धारों से पानी को रिचार्ज करने की पहल की जाती तो अच्छा होता। आज के वैज्ञानिक युग में हम इंडिया मार्का हैण्ड पम्प लगाकर अपने कर्तव्यों की इति श्री कर लेते हैं और थोड़े ही दिन में वह शो-पीस बनकर रह जाते हैं। आज की स्थिति यह है कि उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रो में लगे ८५ % हैण्ड पम्प सूख चुके हैं और जल संस्थान का कहना है कि मरम्मत हैड़ में बजट नहीं है।

काली, गोरी, रामगंगा, सरयू, पिंडर, भागीरथी, अलकनण्दा जैसी सदानीरा नदियों के होते हुये भी हम आज अपने १८००० गांवों में रह रहे लोगों  को पानी नहीं पिला पा रहे। वर्ल्ड बैंक और एशियन डेवलपमेंट बैंक, स्वजल, स्वैप के माध्यम से लोगों को पानी देने के नाम पर घालमेल हो रहा है। स्वैप जैसी योजना जो गांव के लोगों के अंशदान से बननी है.....जब आदमी के पास रोटी खाने के लिये पैसे नहीं है, वह दूसरे के खेतों में मजदूरी करके अपना पेट पाल रहा है, उससे सरकार कहती है कि योजना में अंशदान करो।

आखिर यह सरकार क्या करना चाहती है..........पानी जैसी मुलभूत आवश्यकता की पूर्ति के लिये आज तक सरकार कोई ठोस नीति क्यों नहीं बना पाई। इसका उत्तर है कि नौकरशाही पर हमारी सरकारें आश्रित रही हैं। अपने हाई-फाई दिमाग के आधार पर  जो योजनायें उन्होंने बनाई, उन्हीं को अमली जामा पहना दिया गया।इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है, ५००० फीट की ऊंचाई पर जहां पर वाटर लेबल ४००० फीट नीचे हो, वहां पर हैण्ड पम्प लगा देना।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


One of our friends has just returned from Pahad and he has seen the scene of acute shortage of water there. This is very dangerous sign. The issue is to be sensitized by the Govt and they must start campaign for water harvesting and planting of trees.

This can only save our environment and for dire consequences related to water.

हुक्का बू

ये हैण्ड पम्प सूखे कैसे, इसकी तह में अगर जायें तो ये हैण्ड पम्प हार्ड राक की कैविटी पर लगा दिये गये या ऐसी जगह लगे, जहां पर थोड़ा बहुत ग्राउंड वाटर ्पेड़--पौधों से बचा था। कैविटी में या वाटर लेबल में जब तक पाने आया, ये पानी देने लगे, लेकिन बाद में सूख गये। कैविटी में जो hp लगे थे, उनमें पानी कड़वा आता था, क्योंकि वह पानी सदियों से उन पत्थरों के बीच में था। तो यह था हमारी सरकार का अदूरदर्शी अभिनव (innovative)प्रयास, जो कि सफल ही नहीं होना था। दूसरी मजेदार बात यह भी हुई कि hp लगा दिये गये और सरकार ने यह सोचा कि यह कभी खराब नहीं होंगे, इसलिये इनकी मरम्मत के लिये बजट की कोई व्यवस्था नहीं की गई, अब शायद कर दी गई है, लेकिन वह इतनी है कि उससे एक जिले के भी पम्प सही नहीं होगे।

अब सरकार दूसरा अभिनव (innovative)प्रयास करने जा रही है। वह है पहाड़ों में नलकूप लगाना......हे भगवान...पहाड़ों पर यदि मैदानी क्षेत्रों के ही प्रयास और योजनायें फलीभूत हो जाती तो हम क्या पागल थे, जिन्होने इस कारण अलग राज्य की मांग की थी। हम पीने के लिये पानी के लिये तरस रहे हैं। आज भी पहाड़ों में कई गांव ऐसे हैं, जहां पर परिवार का एक सदस्य सुबह ही रोटी बांधकर कनस्तर लेकर जाता है और दिन भर में एक कनस्तर पाने का जुगाड़ कर पीने का पानी जुटा रहा है। लेकिन सरकार को इससे क्या.....मंत्री जी लोग विभागीय अधिकारियों को हड़का रहे हैं कि हमारे आवास में पानी के नार्मल फिल्टर नहीं आर०ओ० सिस्टम लगवाओ, जनता पीने के पानी के लिये (शुद्ध तो छोड़ ही दीजिये) तरस रही है, उनकी बला से।

दूसरी बात सरकार पानी के स्रोतों को ट्रेप कर रही है, लेकिन क्या वह जल संरक्षण या संवर्द्धन के लिये भी कुछ कर रही है। क्या सरकार यह भी सोचती है कि भई ये पानी कैसे आ सकती है? पानी के स्रोतों को कैसे रिचार्ज किया जाये? सच्चिदानन्द भारती जब उफरैंखाल के उस गांव में पानी ला सकते हैं, जहां लोग अपनी लड़की ब्याहनी तक बंद कर रहे थे, कि वहां पर हमारी लड़की किसी दिन पानी लाते-लाते ही मर जायेगी। तो सरकार क्यों नहीं ऐसा कर पाती है?
देश-विदेश के वैज्ञानिकों से सलाह लेने वाली सरकार का ध्यान इस ओर क्यों नहीं जाता कि हम पहले अपने जल संसाधनों को विकसित कैसे करें, पहले तो ऐसी परेशानी नहीं आती थी, नौले-धारे खाल थे, उनमें पर्याप्त पानी रहता था, अब क्या हुआ....क्या इसकी तह तक सरकार या उसके नुमाइंदों ने जाने की कोशिश भी की या खाली पैसा खपाते रहे?

हुक्का बू

खैर सरकार को तो आंकड़े पेश करने हैं और इसमें उनके नौकरशाह पारंगत ही हुये, मैदान के सेवित आंकड़ों को मिला-जुला कर ऐसी तस्वीर पेश करेंगे कि लगेगा, वाह....उत्तराखण्ड में तो पानी की कमी ही नहीं है और सरकार ने बहुत अच्छा काम किया है। लेकिन सरकार को धरातल की बात सुननी चाहिये और उस पर काम करना चाहिए। आम जनता को क्या परेशानी है, उसकी परेशानी को कैसे दूर किया जा सकता है, उसके लिये संविधान ने व्यवस्था दी कि इस हेतु जनप्रतिनिधि होंगे, लेकिन जब यह लोग सिर्फ अपने चुनाव के चंदे, अपने धंधे और अपने बंदे तक ही सीमित हो जायें। तो क्या होना है?

अब आते हैं, अपनी जिम्मेदारी पर, सरकार को गरियाना बहुत आसान है, मीन-मेख निकालना भी आसान है। लेकिन सरकारों को भी अपनी जिम्मेदारियों का एहसास होना चाहिये, सरकार को यह जान लेना चाहिये कि वह अपने कर्मचारियों के जरिये जनता की सेवा करने के लिये बनी है, जनता पर राज करने के लिये नहीं। जनता को अपने अदूरदर्शी फैसलों से भरमाने के लिये नहीं।

हमारी भी जिम्मेदारी बनती है, क्योंकि हम हर चीज को सरकार पर नहीं थोप सकते, अपनी इस दुर्दशा के लिये हम भी जिम्मेदार हैं, हमने ही अपने ऊपर नेताओं, नौकरशाहों को हावी होने दिया है, हमने ही उनको यह मौका दिया है कि जो कुछ कर लो, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन परेशानी से सरकार या उसके कार्मिक प्रभावित नहीं होते। राजधानी हो या जिला मुख्यालय या ब्लाक मुख्यालय, पानी नहीं आयेगा तो यहां के ्कर्मचारियों के लिये सबसे पहले टैकरों से पानी आ जायेगा।

अभी हेम नाती हल्द्वानी का जिक्र कर रहा था, वहां की स्थिति यह है कि गौला से पानी पिलाने का दावा करने वाला जिला प्रशासन खुद गौला का पानी इसलिये नहीं पीता, क्योंकि उसमें प्रदूषण है और पानी थोड़ा सा कड़वा है। वहां के जिला स्तर के आला अधिकारियों के घरों में धौलाखेड़ा के ट्यूबवैल से टैंकरों से पानी आता है।

हमें भी अपनी जिम्मेदारियों का एहसास होना चाहिये, हमें भी चाल-खाल बनानी होंगी, बांज-बुरांश, पईयां, उतीस आदि से वाटर फ्रेडली पेड़ लगाने होंगे, जल संरक्षण एवं संवर्धन के अपने पुरातन पद्धतियों को जानना होगा, उनपर काम करना होगा। गांव में समूह बनाकर ऐसे काम करने होंगे, जिससे पानी रिचार्ज हो सके। इस फोरम में इस विषय को उठाने का मेरा यही मकसद है कि ऐसे तरीके लोग सुझायें और हम लोग अपने-अपने माध्यम से अपने गांवों में उसको लागू कर सकें। क्योंकि अब हम सरकारों से नाउम्मीद हो गये हैं और हम सरकार की तरह उस दिन का इंतजार नहीं कर सकते कि पानी के अभाव में उत्तराखण्ड में भी कोई जान बर्बाद हो।

हुक्का बू

कुछ दिनों पहले हमारी सरकार ने एक और इनोवेटिव प्रयास किया था, चाल-खाल बनाने का और इस महत्वपूर्ण योजना में ऐसी खामियां कर दी गई कि इनसे जल संरक्षण तो नहीं हां भूस्खलन जरुर हो जायेगा।
पानी के संरक्षण के लिये आबादी के ऊपर भी चाल-खाल बनाये गये, जो दरकते पहाड़ों में कभी भी कोई बड़ा हादसा कर सकते हैं।
ये ऐसी जगह बननी चाहिये जहां पर पानी के स्रोत हों या पहले रहे हों, ताकि वे रिचार्ज हो सकें। जंगलों के नजदीक, जंगल के बीच में छोटे-छोटे खाल बनाने, नदियों, नालों, धारों, नौलों के उदगम के पास ये बनने चाहिये और घाटी के इलाकों में ऐसी जगह बनने चाहिये थे, जहां पर पानी संग्रह हो सके। अर्थात ये ऐसी जगह बनने चाहिये थे कि सारी धार से नीचे पानी आकर इसमें रुक सके, लेकिन मैने खुद देखा कि कई जगहों पर यह धार में या सैन जगहों में बने हैं, जो कि आज निष्प्रयोज्य हो चुके हैं और इनमें आज सिर्फ गाय-बैल आदि जानवर फंस रहे हैं।

चाल-खाल, बने, इससे अवश्य पानी का संरक्षण और संवर्द्धन हो सकता है, लेकिन यह वैज्ञानिक आधार पर बनने चाहिए, खतरा विहीन, जन विहीन क्षेत्र में बनने चाहिये। यह अच्छी कोशिश है, लेकिन बिना सोचे-समझे इस कार्य को कार्यान्वित किया गया, जिससे यह योजना भी असफल होती दिख रही है।

पंकज सिंह महर

यह खेदपूर्ण है कि एक तिहाई देश को पानी उपलब्ध करा रहा हमारा प्रदेश पानी से बेहाल है, इस हेतु सरकार को दीर्घकालिक पम्पिंग योजनाओं पर फोकस करना होगा। लिफ्ट से पानी को जनता तक पहुंचाया जा सकता है।  यदि किसी स्थान पर ५०-१०० गांवों तक पानी पहुंचाना हो तो अलग-अलग योजना बनाने के बजाय एक बड़ी पम्पिंग योजना से इन सब गांवों को आच्छादित करना चाहिये। मैं समझता हूं, यह आसान भी होगा और कम खर्चीला भी।

हुक्का बू

हां, पम्पिंग योजनाओं की बात सही है, लेकिन मुद्दा यह भी तो है कि सरकार इस राज्य के लिये इस राज्य के हिसाब से योजनायें बनायेगी? अभी तक तो सरकारें दूसरे प्रदेशों की ही कापी कर रही हैं, कहा जाता है कि नकल के लिये अकल चाहिये, तो हमारी सरकारों को भी अकल से साथ नकल करनी चाहिये। हमें पहाड़ी प्रदेशों नार्थ ईस्ट, हिमांचल, कश्मीर आदि की योजनाओं का अध्ययन करके योजनायें बनानी चाहिये, न कि उ०प्र०, म०प्र० या स्विटजरलैंड की। लेकिन खेद है कि अभी तक इसमें कुछ नहीं हुआ, असल में सरकार एक साथ अधिक मुनाफा चाहती है(यह मुनाफा प्रदेश के लिये है या अपने लिये, पता नहीं)  और अंतर्राष्ट्रीय बैकों से कर्जा लेकर बड़ी योजनाओं, जल विद्युत, ऊर्जा प्रदेश के नाम पर सिर्फ जनता को बरगलाना ही चाहती है।

सरकार अगर कुछ करना ही चाहती है तो मेरी समझ में यह नहीं आता कि पानी देने की कसरत समय रहते जाड़ों से ही क्यों नहीं शुरु हो जाती। पानी मानव की मूलभूत और सबसे जरुरी आवश्यकता है, हमें अपने शरीर को चलाने के लिये सबसे ज्यादा जरुरत पानी की ही होती है। अगर हम सबसे आवश्यक चीज नहीं दे पा रहे, तो सड़क, पानी, स्वास्थ्य आदि का क्या करेंगे? आदमी इन सुविधाओं का उपभोग करने के लिये बचना भी तो चाहिये।

क्या यह दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है कि हमारी सरकार यह बयान दे रही है कि पानी की कमी नहीं होने देंगे, टैंकरों से पानी दिया जायेगा। टैंकरों से कितना पानी कहां-कहां दे पाओगे महाराज, आज भी उत्तराखण्ड मे सैकड़ों ऐसे गांव हैं, जहां सड़क नहीं है और है भी तो टैंकर के चलने लायक नहीं है। पहाड़ तो पहाड़ हुये आप मैदानी क्षेत्रों में ही पानी नहीं दे पा रहे हैं, जहां पर नलकूप हैण्ड पम्प आसानी से लग सकते हैं। हरिद्वार जैसे जिले में जहां गंगा जैसी नदी है, वहां का वाटर लेबल १०० मीटर पहुंच गया है। देहरादून जिला, जिसके एक ओर गंगा और दूसरी ओर यमुना बहती है, वहां पर आप पानी नहीं दे पा रहे हैं। कारण क्या है...........जहां पूरे विश्व में पानी के लिये लोग परेशान हैं और तीसरा विश्व युद्ध पानी के कारण होने की आशंका जता रहे हैं, लेकिन उत्तराखण्ड एक ऐसा राज्य है, जहां पर पानी की कोई कमी नहीं है, कमी है उस पानी को नियोजित रुप से आम आदमी तक पहुंचाने की, इसके लिये नीति-रीति की जरुरत है, जो सरकारें बनाती हैं, लेकिन सरकार सोई है..............।

jagmohan singh jayara

"ठंडु मतलब"

बांज बुरांश का बण मा,
ढुंगा का नीस बिटि निकल्दु,
कांच की तरौं  छाळु,
निकळ्वाणि पाणी,
कखन पेण अब,
पहाड़़ मा  पौंछिगि,
बोतळ बन्द पाणी.

प्रसून जोशीजिन,
ठंडा कू मतलब,
कोकाकोला बतायी,
बोडिन देखि टेलीविजन फर,
एक दिन जब गै  बजार,
ठंडु  पाणी समझिक,
वींन कोकाकोला की बोतळ,
घट्ट घटकाई.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित ४.४.२०१०)