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Dhad Orgnization Uttarakhand-धाद संस्था उत्तराखण्ड

Started by पंकज सिंह महर, August 11, 2010, 11:25:34 AM

पंकज सिंह महर

साथियो,
उत्तराखण्ड में यों तो बहुत सी संस्थायें कार्य कर रही हैं, लेकिन कुछ ही संगठन या संस्थायें ऐसी हैं, जो धरातलीय और सराहनीय कार्य कर रही हैं। धाद संस्था उनमें से एक है, इस टापिक के अन्तर्गत हम लोग धाद संस्था द्वारा किये गये तथा किये जा रहे विभिन्न धरातलीय कार्यों के बारे में अवगत होंगे।

पंकज सिंह महर

धाद....! यानि कि आवाज लगाकर लोगों को चेताना। वर्ष १९९२ में उत्तराखण्ड के कुछ प्रबुद्ध लोगों ने इस संस्था (Drive for himalyas anthropocentric devlopement- DHAD) की स्थापना की थी। धाद की स्थापना मुख्य रुप से हिमालय को समझने और उसके विकास के लिये लोगों को जागरुक करने के उद्देश्य से की गई थी। हिमालयी क्षेत्र से पलायन, आर्थिकी की समझ का अभाव, समाज में पारस्परिक संवाद की कमी, संस्कृति और सामाजिक संरचना का अभाव, समकालीन सामाजिक चेतना का अभाव, रचनात्मक वातावरण का अभाव और किसी भी संदर्भ में आवश्यक पहल और जोखिम की कमी, मुख्य कारण और कारक थे, जिन्होंने धाद की आवश्कता की जरुरत समझी गई।

इन्हीं समस्याओं के समाधानो को खोजने का कार्य धाद १९९२ स निरन्तर कर रही है। धाद संस्था ने उत्तराखण्ड आन्दोलन के दौरान विभिन्न पोस्टर जारी किये, नुक्कड़ नाटकों, कविता पोस्टरों और जुलूसों का आयोजन किया, जिससे निश्चित रुप से आन्दोलन को एक नई गति मिली।

वर्तमान में भी धाद निरन्तर रचनात्मक कार्य करता रहता है, उत्तराखण्ड की लोक संस्कृति और धरोहरों को बचाने के लिये यह संस्था निस्वार्थ कार्य कर रही है। धाद प्रकाशन के तहत उत्तराखण्ड की भाषा के संरक्षण के लिये किया जा रहा कार्य अत्यन्त ही सराहनीय और अनुकरणीय है।

पंकज सिंह महर

उत्तराखण्ड आन्दोलन के दौरान धाद द्वारा जारी एक पोस्टर


पंकज सिंह महर

पिछले दिनों प्रसिद्ध लोक गायिका सरस्वती देवी जी की दयनीय स्थिति पर धाद संस्था ने एक पहल की और उन्हें उनका सम्मान दिलाया था। the issue of folk artist came into scene when one of the leading newspaper published the miserable condition of saraswati devi.we advocated the issue and culture deptt gave her immediate help via DHAD.



सरस्वती देवी जी के साथ धाद संस्था के कार्यकर्ता

पंकज सिंह महर

धाद संस्था समय-समय पर उत्तराखण्ड के समसामयिक मुद्दों को पुरजोर तरीके से उठाती रहती है। लोकभाषा के संरक्षण हेतु पिछले दिनों देहरादून में एक गोष्ठी का आयोजन किया गया।


पंकज सिंह महर


धाद की एक गोष्ठी में प्रतिभाग करने आये अरुण थपलियाल,शान्ति प्रसाद जिज्ञासु , मुकेश नौटियाल,रमेश घिल्डियाल, लीलाधर जगूड़ी, कमला पन्त एवं लोकेश नवानी।

पंकज सिंह महर

प्रकृति और मनुष्य के बीच एक स्वस्थ सम्बन्ध की पक्षधरता, पुस्तक का विमोचन करते सुन्दरलाल बहुगुणा


पंकज सिंह महर

uttrakhand main gaon ka ujadana koi nayi baat nahi lekin inki gati rajya banane ke bad aur bad gayi hai.1991-2001 tak is parishetra main 59 gaon janshunya hue the lekin rajya banane ke bad akele rudraprayag main hi 28 gaon khali ho gaye.dhad ne 2010 ka calendar is issue par jari kiya tha

पंकज सिंह महर

धाद संस्था अपने प्रकाशन के द्वारा उत्तराखण्ड की नाम-बेनाम लेखकों को आगे लाने का प्रयास करती रही है। इस प्रकाशन से अब तक कई पुस्तकें जारी हो चुकी हैं, सबसे नई पुस्तक है "लोकभाषाओं के निमित्त" जिसमें लोकभाषाओं के संरक्षण के लिये क्या किया जाना चाहिये और क्या किया जा सकता है, इसको विस्तार से बतलाया गया है।


पंकज सिंह महर

गढ़वाली कविताओं में गजल विधा के मर्मज्ञ श्री मधुसूदन थपलियाल जी की एक पुस्तक "हर्बि-हर्बि" को धाद प्रकाशन ने प्रकाशित किया है।