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COW Protection गौ संरक्षण

Started by विनोद सिंह गढ़िया, August 15, 2010, 04:05:05 PM

विनोद सिंह गढ़िया

"गौ मूत्र" के प्रयोग से समाप्त होने वाली व्याधियां :

प्रसिद्ध आयुर्वेदाचार्य हरिओम शास्त्री के अनुसार गोमूत्र श्वांस, कास, शोध, कामला, पण्डु, प्लीहोदर, मल अवरोध, कुष्ठ रोग, चर्म विकार, कृमि, वायु विकार मूत्रावरोध, नेत्र रोग तथा खुजली में लाभदायक है। गुल्य, आनाह, विरेचन कर्म, आस्थापन तथा वस्ति व्याधियों में गोमूत्र का प्रयोग उत्तम रहता है। गोमूत्र अग्नि को प्रदीप्त करता है, क्षुधा [भूख] को बढ़ाता है, अन्न का पाचन करता है एवं मलबद्धता को दूर करता है। गोमूत्र से कुष्ठादि चर्म रोग भी दूर हो सकते हैं तथा कान में डालने से कर्णशूल रोग खत्म होता है और पाण्डु रोग को भी गोमूत्र समाप्त करने की क्षमता रखता है। इसके अलावा आयुर्वेदिक औषधियों का शोधन गोमूत्र में किया जाता है और अनेक प्रकार की औषधियों का सेवन गोमूत्र के साथ करने की सलाह दी जाती है। आयुर्वेद में स्वर्ण, लौह, धतूरा तथा कुचला जैसे द्रव्यों को गोमूत्र से शुद्ध करने का विधान है। गोमूत्र के द्वारा शुद्धीकरण होने पर ये द्रव्य दोषरहित होकर अधिक गुणशाली तथा शरीर के अनुकूल हो जाते हैं। रोगों के निवारण के लिए गोमूत्र का सेवन कई तरह की विधियों से किया जाता है जिनमें पान करना, मालिश करना, पट्टी रखना, एनीमा और गर्म सेंक प्रमुख हैं।

विनोद सिंह गढ़िया

पर्यावरण और गाय

कृषि, खाद्य, औषधि और उद्योगों का हिस्सा के कारण पर्यावरण की बेहतरी में गाय का बड़ा योगदान है ।
प्राचीन ग्रंथ बताते हैं कि गाय की पीठ पर के सूर्यकेतु स्नायु हानिकारक विकीरण को रोख कर वातावरण को स्वच्छ बनाते हैं । गाय की उपस्थिति मात्र पर्यावरण के लिए एक महत्वपूर्ण योगदान है ।
भारत में करीब ३० करोड़ मवेशी हैं । बायो-गैस के उत्पादन में उनके गोबर का प्रयोग कर हम ६ करोड़ टन ईंधन योग्य लकड़ी प्रतिवर्ष बचा सकते हैं । इससे वनक्षय उस हद तक रुकेगा ।
गोबर का पर्यावरण की रक्षा में महत्वपूर्ण भाग है ।
गोबर के जलन से वातावरण का तापमान संतुलित होता है और वायु के कीटाणुओं का नाश ।
गोबर में विष, विकिरण और उष्मा के प्रतिरोध की क्षमता होती है । जब हम दीवारों पर गोबर पोतते हैं और फर्श को गोबर से साफ करते हैं तो रहनेवालों की रक्षा होती है । १९८४ में भोपाल में गैस लीक से २०,००० से अधिक लोग मरे । गोबर पुती दीवारों वाले घरों में रहने वालों पर असर नहीं हुआ । रूस और भारत के आणविक शक्ति केंद्रों में विकीरण के बचाव हेतु आज भी गोबर प्रयुक्त होता है ।
गोबर से अफ्रीकी मरूभूमि को उपजाऊ बनाया गया ।
गोबर के प्रयोग द्वारा हम पानी में तेजाब की मात्रा घटा सकते हैं ।

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गाड़िया जी बहुत ही बढ़िया टोपिक पेस किया है आपने,धर्मप्राण भारत के हरदे सम्राट ब्रह्रालीन अन्न्त श्री स्वामी श्री करपात्री जी  महाराज द्वारा संवंत २00१ में संस्थापित अक्षिल भारतवासीय धर्मसंघ ने अपने जन्मकाल से ही मॉ भारतीय के प्रतीक गो रक्षा पालन पूजा एंव संर्वधन को अपने प्रमुखा उद्देश्यो में स्थान दिया था। सन २१४६ में देश में कांग्रेस की अंतरिम  सरकार बनी । भारतीय जनता ने अपनी सरकार से गोहत्या के कलंक  को देश के मस्तक से मिटाने की मांग की। किंतु  सत्ताधारी  नेताओं ने पूर्व घोषणाओ की उपेक्षा कर धर्मप्राण भारत की इस मांग  को ठुकरा दिया।

सरकार की इस उपेक्षावर्ती  से देश के गोभक्त नेता एवं जागरूक जनता चिन्तित हो उठी। उन्हे इससे गहरा  आघात लगा। सन` १९४६ के दिसम्बर मास में देश के प्रमुख नगर बंबई श्रीलक्ष्मीचण्डी-महायज॔ के साथ ही अखिल भारतीय धर्मसंघ   के तत्वाधान में आयोजित विराट गोरक्षा सम्मेलन मे स्वामी करपात्री जी  ने देश के धार्मिक सामाजिक एंव राजनैतिक नेताओं एंव धर्मप्राण जनता का आह्रान किया। देश के सवोच्च धर्मपीठो के जगदगुरू शंकराचार्य संत महात्मा विद्वान राजा-महाराजा एंव सद`गहस्थो ने देश के समक्ष उपस्थित इस समस्या पर गम्भीर विचार मंथन किया। और सम्मेलन  में सर्वसम्मत  घोषणा की गयी कि गयी " सरकार से यह सम्मेलन अनुरोध करता है कि देश के सर्वविध कल्याण को ध्यान में रखते हुए भारतीय धर्म और संस्कृति के प्रतीक गोवंश की हत्या कानून द्वारा प्रतिबन्ध लगा दे। कदाचित सरकार ने अक्षया त्रतीय   २३ तदनुसार २८ अप्रैल  १९९८ तक सम्मेलन के अनुरोध पर ध्यान नही दिया तो अखिल भारतीय धर्म संघ देश की राजधानी दिल्ली मे सम्पुर्ण गो हत्याबंदी के लिए अंहिसात्मक सत्याग्रह प्रारम्भ कर देगा। उक्त घोषणा के पश्चात्  शिष्ट मण्डलो गो रक्षा सम्मेलनो जन सभाओ हस्ताक्षर आन्दोलन एवं स्मरण पत्रों  द्वारा सरकार के कर्ण धारो को गोहत्या बंदी की मॉग का औचित्य एवं अनिर्वायता समझाने की भरसक चेष्टा  की गयी; किंतु सरकार के कानपर जू तक नही रेंगी।

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                                   धार्मिक अनुष्ठानों में गाय की महत्ता
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हमारी संस्कृति में गायों और मंदिरों में एक मजबूत रिश्ता है ।

    * गाय को दैविक माना गया है ।

    * दिन गाय की पूजा से शुरू होता है ।

    * गाय को खिलाना और उसकी पूजा करना दैविक अनुष्ठान है ।

    * पारिवारिक उत्सवों में गाय की प्रधानता है ।

    * ऐसे अनेक त्योहार हैं जहाँ गाय प्रमुख होती है ।

    * अनेक मंदिरों के प्रवेशद्वार पर गाय का छप्पर होता है जिससे पवित्रता की भावना बढ़ती है ।

    * पंचगव्य से सफाई और शुद्धि की हमारी परंपरा है ।

    * भगवान की मूर्तियों को दूध, दही और घी से स्नान कराते हैं ।

    * पवित्र प्रदीप प्रज्जवलन हेतु हम घृत का प्रयोग करते हैं । देवताओं को भी घी का नैवेद्य चढ़ाते हैं ।

    * भगवान के प्रसाद में घी और दूध डाला जाता है ।

    * देवताओं के शृंगार में मक्खन का प्रयोग होता है ।

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गोमूत्र और गोमय (गोबर) से आयुर्वेद की औषधियां, रसायन, टाइल्स, डिस्टेंपर, कीटाणु नाशक चूर्ण, दंत मंजन, हवन सामग्री का औद्योगिक उत्पादन कई शहरों में आरंभ हो चुका है। इससे गौमूत्र 5 रु. लीटर और गोबर 5 रु. किलो खरीदे जाने का सिलसिला आरंभ हो चुका है। गौमूत्र, गोबर से बनने वाले उत्पाद कुटीर उद्योग का रुप लेते जा रहे हैं। इससे रोजगार के नये अवसर पैदा हो रहे हैं।

पंचगव्य भारतीय समाज में सनातन काल से चला आ रहा है। इसका प्रतीकात्मक उपयोग देखते आ रहे हैं। इसके चिकित्सकीय गुणों का आकलन कर जन-जन के सामने लाने का वक्त आ गया है। पंच गव्य, देह, मन, बुध्दि को शुध्द करता है।

आजादी के पहले महात्मा गांधी ने कहा था कि आजादी प्राप्त होने पर पहला काम देश में गौ वध पर प्रतिबंध लगाना होगा। लेकिन राय सरकारों ने गौवंश के वध पर प्रतिबंध लगाने की पहल की है। जब तक केन्द्रीय कानून नहीं बनता, इस पर समग्र रोक संभव नहीं हो पाएगी। विडंबना की बात है कि भारत में गौवंश की हत्या ने उद्योग की रूप हासिल कर लिया है। एक ओर गौ वंश का क्षरण हो रहा है, दूसरी ओर देश में पोषक आहार का संकट गहराता जा रहा है। गौपालन के प्रति निरुत्साहित होने के पीचे गौपालन का अलाभकारी हो जाना है।

इसे आर्थिक आधार देना होगा। इसके लिए गौ उत्पादों का व्यावसायीकरण करना होगा। पंचगव्य की महिमा को प्रामाणिकता के साथ जन-जन तक पहुंचाना सामयिक आवश्यकता है। पंचगव्य गौ दुध, गौ दही, गौ धृत, गोमय और गौ मूत्र के लिए स्वदेश गाय की नस्ल की जरूरत पड़ेगी। देशी गाय के दूध में अन्य रसायनों के साथ जो लवण, धातुएँ हैं, उनमें सोना भी है।

गाय के पचास किलोग्राम दुध में एक ग्राम सोना की मात्रा होती है। यही वे तत्व हैं जो मानव जीवन को स्वास्थ्य, दीर्घ आयु, तेज, ओज प्रदान करते हैं। गाय के दूध में प्राप्त स्वर्णतत्व अन्यत्र दुर्लभ है। इससे गौपालन और पंचगव्य के गुणकारी होने का प्रमाण मिलता है।

विनोद सिंह गढ़िया

उत्तराखंड में दिन-प्रतिदिन गायों एवं गौ वंश की कमी होती जा रही है, जो एक हमारे सामने प्रमुख समस्या के रूप में उभर कर आ रही है | आज हमारे पहाड़ में खेत जोतने के लिए बैल नहीं मिल रहे हैं, क्या हम इन खेतों को ट्रेक्टरों से जोत सकते हैं ......? बिलकुल नहीं, जहाँ  मीलों  पैदल चलकर हम अपने घर पहुचते हैं, वहां ट्रैक्टर कैसे जायेगा और जहाँ जाने लायक है तो सीड़ीनुमा छोटे-छोटे खेतों को कैसा जोतेगा .....? तो हमें क्या करना होगा ............? हमें तो बैल ही चाहिए | बैल कहाँ से आएगा .............? समस्या और खड़ी..........तो हमें गौ माता को पालना होगा ...............गाय होगी तो उत्तराखंड में पैदा इस समस्या का समाधान होगा |

हेम पन्त

गाय भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग है...जन्म से लेकर मृत्यु तक (गौदान आदि) मनुष्य जीवन के हर हिस्से में गाय का महत्वपूर्ण स्थान है. गौवंश के संरक्षण के लिये हरसंभव प्रयास किये जाने चाहिये..


पंकज सिंह महर

उत्तराखंड की संस्कृति और समाज में प्राचीन काल से ही गाय और गौ मूत्र को आदर प्रदान किया गया है| हमारे यहां शुद्धि के लिए अन्य समाजों की तरह गंगा जल के बजाय गौ मूत्र से ही शुद्धि की जाती है| भले ही महिलाओं की मासिक धर्म की अशुद्धि हो, जन्म-मरण की अशुद्धि हो या किसी स्थान को पवित्र करना हो उत्तराखंडी समाज में किसी और वास्तु की अपेक्षा, यहां तक की गंगाजल से भी ज्यादा शुद्ध गौमूत्र को महत्व दिया जाता है|

रही बात गाय की तो कोइ भी शुभ कार्य हो या किसी भी प्रकार का धार्मिक आयोजन, बिना गौ-दान के कोइ भी कार्य पूरा नहीं होता है| यहाँ तक की अंतिम संस्कार के समय भी गौदान कराये जाने का प्रावधान है| यह सब प्रावधान हमारे पुरखों ने पशु के साथ अपने आत्मीय सम्बन्धो को बनाए रखने के लिए बनाए होंगे|





विनोद सिंह गढ़िया

गाय का दूध क्यों होता है फायदेमंद ?

सभी जानवरों में गाय का दूध सबसे ज्यादा फायदेमंद माना गया है।  आखिर  गाय में क्या खूबियां होती हैं जो उसके दूध का इतना महत्व होता है। गाय के दूध का महत्व उसमें मौजूद तत्व बढ़ाते हैं।

गाय के दूध में स्वर्ण तत्व होता है जो शरीर के लिए काफी शक्तिदायक और आसानी से पचने वाला होता है। गाय की गर्दन के पास एक कूबड़ होती है जो ऊपर की ओर उठी और शिवलिंग के आकार जैसी होती है। गाय की इसी कूबड़ के कारण उसका दूध फायदेमंद होता है। वास्तव में इस कूबड़ में एक सूर्यकेतु नाड़ी होती है। यह सूर्य की किरणों से निकलने वाली ऊर्जा को सोखती रहती है, जिससे गाय के शरीर में स्वर्ण उत्पन्न होता रहता है। जो सीधे गाय के दूध और मूत्र में मिलता है।

इसलिए गाय का दूध भी हल्का पीला रंग लिए होता है। यह स्वर्ण शरीर को मजबूत करता है, आंतों की रक्षा करता है और दिमाग भी तेज करता है। इसलिए गाय का दूध सबसे ज्यादा अच्छा माना गया है।