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Tribute to Great Poet and Our Beloved Girda आखिर गिरदा चले गये.. श्रद्धांजली

Started by हेम पन्त, August 22, 2010, 11:57:47 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

A tribute to Girida..

Famous poem by Girish Tiwari "Girda" on Uttarakhand State Struggle.

सरजू-गुमती संगम में गंगजली उठूँलो-उत्तराखण्ड ल्हयूँलो 'भुलू' उत्तराखण्ड ल्हयूँलो
उतरैणिक कौतीक हिटो वै फैसला करुँलो-उत्तराखण्ड ल्हयूंलो 'बैणी' उत्तराखण्ड ल्हयूंलो
बडी महिमा बागेस्यरै की के दिनूँ सबूतऐलघातै उतरैणि आब यो अलख जगूँलो-
उत्तराखण्ड ल्हयूँलो भुलु उत्तराखण्ड ल्हयूँलो

धन -मयेडी छाति उनरी,धन त्यारा उँ लाल, बलिदानै की जोत जगै ढोलि गै जो उज्याल
खटीमा,मंसुरि,मुजफ्फरनगर कैं हम के भुली जुँलो-उत्तराखण्ड ल्हयूँलो 'चेली' उत्तराखण्ड ल्हयूँलो
कस हो लो उत्तराखण्ड, कास हमारा नेता, कास ह्वाला पधान गौं का,कसि होली ब्यस्था
जडि़-कंजडि़ उखेलि भली कैं , पुरि बहस करुँलो-उत्तराखण्ड ल्हयूँलो
वि कैं मनकसो बैंणूलोबैंणी फाँसी उमर नि माजैलि दिलिपना कढ़ाई
रम,रैफल, ल्येफ्ट-रैट कसि हुँछौ बतूँलो-उत्तराखण्ड ल्हयूँलो 'ज्वानो' उत्तराखण्ड ल्हयूँलो
मैंसन हूँ घर-कुडि़ हौ,भैंसल हूँ खाल, गोरु-बाछन हूँ गोचर ही,चाड़-प्वाथन हूँ डाल
धूर-जगल फूल फलो यस मुलुक बैंणूलो-उत्तराखण्ड ल्हयूँलो 'परु' उत्तराखण्ड ल्हयूँलो
पांणिक जागि पांणि एजौ,बल्फ मे उज्याल, दुख बिमारी में मिली जो दवाई-अस्पताल
सबनै हूँ बराबरी हौ उसनै है बतूँलो-उत्तराखण्ड ल्हयूँलो विकैं मनकस बणलो
सांच न मराल् झुरी-झुरी जाँ झुट नि डौंरी पाला, सि, लाकश़ बजरी चोर जौं नि फाँरी पाला
जैदिन जौल यस नी है जो हम लडते रुंलो उत्तराखण्ड ल्हयूँलो विकैं मनकस बणलो
लुछालुछ कछेरि मे नि हौ, ब्लौकन में लूट, मरी भैंसा का कान काटि खाँणकि न हौ छूट
कुकरी-गासैकि नियम नि हौ यस पनत कँरुलो-उत्तराखण्ड ल्हयूँलो विकैं मनकस बणलो
जात-पात नान्-ठुल को नी होलो सवाल, सबै उत्तराखण्डी भया हिमाला का लाल
ये धरती सबै की छू सबै यती रुँलो-उत्तराखण्ड ल्हयूँलो विकैं मनकस बणलो

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720




उत्तराखंड के प्रसिद्ध जनकवि गिरदा का निधन
22    अगस्त ,  2010

देहरादून। उत्तराखंड के विख्यात जन कवि गिरीश तिवाडी उर्फ गिरदा का आज हल्द्वानी में निधन हो गया। वे 68 साल के थे। उनके परिवार में उनकी पत्नी और एक पुत्र है हल्द्वानी स्थित एक निजी अस्पताल से प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रख्यात जन कवि गिरदा ने आज पूर्वाहन लगभग 10 बजे अंतिम सांस ली।

वे पैट का अल्सर फटने के बाद 20 अगस्त को अस्पताल में भर्ती हुए थे। उनका 21 अगस्त को आपरेशन किया गया। मगर आंत फटने के बाद हुए इन्फैक्शन के कारण उन्हें बचाया नहीं जा सका। गिरदा के नाम मशहूर गिरीश तिवारी चिपको आंदोलन से लेकर उत्तराखंड आंदोलन तक सभी जन आंदोलनों में सक्रिय रहने के साथ ही अपने कविताओं के माध्यम से वे जनता को जागरूक करने के साथ ही बुराइयों पर प्रहार करते रहे हैं।



http://www.khaskhabar.com/girish-trivedi-08201022986577052.html

Meena Rawat



हलिया

ईश्वर दिवंगत आत्मा को शान्ति प्रदान करे.
गिर्दा के निधन पर हुई क्षति की पूर्ति कभी नहीं हो सकती.

खीमसिंह रावत

गिरीश  तिवारी  हमारे बीच में गिर्दा के नाम से महशूर का एकाएक दुखद  सामाचार पाकर मन अत्यंत दुखी हुवा | यह भी सत्य है की जो जन्मा है उसे एक न एक दिन जाना होता है| किन्तु किसी के जाने से परिवार, किसी के जाने से परिवार व रिश्तेदार प्रभावित होते हैं गिर्दा जैसे  व्यक्तित्व के चले जाने से पूरी मानवता प्रभावित होती है | वाणी से लयब्रध कहकर सामाजिक सरोकारों को जन मानस तक पहुचाना उनके व्यकित्व को आम आदमी से ऊपर उठाता है| आज हमारा अगुवाई करनेवाला नहीं रहा, एक अपूर्णीय क्षति हुई है|   

गिर्दा के आत्मा को परमात्मा अपने श्री चरणों में स्थान दे |

chandra prakash

bhagwan girda ki aatma ko shanti de ....girda ne  apni kavitaye ke  madhayam se jan chetna ko badava diya.............

jagmohan singh jayara

"नगाड़े खामोश हैं"

जनकवि "गिर्दा" जी,
सच  में आज,
आपके चले जाने से,
हम हतप्रभ और,
दुःख में डूबे हैं.

अहसास हो रहा है,
आपने सच कहा,
"सिलसिलों को सलाम,
मंजिलों को सलाम,
आने वाले तेरे-मेरे,
कल को सलाम"
लेकिन, आज हम,
और नगाड़े खामोश हैं.

प्रभु आपकी आत्मा को,
शांति और स्थान प्रदान करे,
अपने साकेत  धाम में.
(जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु")

Jasbeer Singh Bisht

Ye sunkar bhaut dukh hua ki Girda ab hamare beech nahi rahe...lekin unki yaadein aur kavitaye hume hamesha unki yaad dilati rahengi..Bhagwan unki aatma ko shanti de...

दीपक पनेरू

प्रसिद्ध जनकवि (अब  दिवंगत) पूज्यनीय स्व० श्री गिरीश चन्द्र तिवारी  "गिर्दा" को मेरी और मेरी कलम की ओर से एक छोटी सी भावपूर्ण श्रंधांजलि........
 


  कुछ अनकहे कुछ अनसुने,
  कुछ लिखे और कुछ दिखे,
  अपनी स्वछन्द लेख्ननी से आपने,
  कितने अमूल्य शब्द लिखे...
 
  पहाड़ को पहाड़ के लिए,
  पहाड़ की तरह खड़ा होकर,
  कभी प्यार से, कभी जोर से,
  कभी हँसकर, कभी रोकर,
 
  आपने हमें चलना सिखाया,
  उठ दिल खोल अपनी बात कही,
  किसी ने सुना, किसी ने किया अनसुना,
  कही चुप रहे लोग "गिर्दा" कही आपकी बात सुनी,
 
  आपकी ओ बातें ओ कवितायेँ,
  ओ बच्चों की तरह पुचकारना,
  सदा याद रहेगा हमें,
  ओ जीतकर भी हारना.......
 
  क्योंकि ख़ुशी हमारी मर न जाए,
  दिल इस पहाड़ से भर ना जाये,
  फिर कोई फिरंगी इस भारत की देवभूमि को,
  आपने बल से गुलाम कर ना जाये,
 
  मेरा आखिरी सलाम आपको,
  फूल बनकर रहोगे नज़रों में,
  आपकी अमूल्य बाणी, और सोच,
  जिन्दा रखेगी चर्चाओ और ख़बरों में,
 
  अहसास हमें होने लगा है...
  अमूल्य हीरा हमने खो दिया.....
  कुछ न कर पाया "दिल ये नादाँ"
  बस ये सुनकर रो दिया.........
 
  गिर्दा भगवन आपकी आत्मा को शांति प्रदान करे......
 
  रचना दीपक पनेरू
  दिनाक २३-०८-२०१०