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Fish Fair (Maun Mela)Jaunsar Uttarkashi-मौण मेला` मत्स्य आखेट

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 01, 2011, 03:13:38 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 
Dosto,

We are sharing information here about a famous and unique Fish Fair which is celebrated in Tehri District of Uttarakhand.

The information has been provided by गोविंदलाल आर्य!

सम्पूर्ण रवांई जौनपुर-जौनसार की छोटी-बड़ी नदियों में मनाया जाने वाला मौंण मेला अब सिर्फ टि‍हरी जनपद में नैनबाग के निकट यमुना की सहायक अगलाड़ नदी में आयोजित किया जाता है
विजयपाल सिंह रावत


राजशाही के समय अगलाड़ नदी का मौण उत्सव 'राजमौण उत्सव` के रूप में मनाया जाता था। उस समय इसके आयोजन की तिथि व स्थान तथा मौण उत्सव में स्थानीय ग्रामों की भागीदारी का निर्धारण टि‍हरी रि‍यासत के राजा द्वारा किया जाता था तथा कई उत्सवों में समय-समय पर टि‍हरी रि‍यासत के राजा की स्वयं रीति‍रि‍वाज के साथ इस उत्सव में शामिल होने के प्रमाण इस क्षेत्र के बुजुर्ग ग्रामीणों की लोक कथाओं व लोक गीतों में सुनाई देते हैं। आज भी इस मेले का आयोजन स्थान, तिथि पूर्व नियमानुसार यहां के बुजुर्गों, सयाणों (प्राचीन सामाजिक व्यवस्था के जनप्रतिनिधि‍) व वर्तमान जनप्रतिनिधि‍यों द्वारा किया जाता है। इस पौराणिक उत्सव में जौनपुर क्षेत्र की पांच पटि्टयों सिलगांव, छजुला, अड़जुला, सिलवाड़, लालुर पंचगई के लगभग ६० गांव मुख्य रूप से भाग लेते हैं।
मौण का शाब्दिक अर्थ उस पौधे के तने की छाल को सुखा कर तैयार किए गए बारीक चूर्ण से है जिसे पानी में डालकर मछलियों को बेहोश कर पकड़ने में किया जाता है। इस पौधे को स्थानीय भाषा में टिमरू (जैन्यो जाइल) कहते हैं। इसका प्रयोग मुख्यत: दांतों को साफ करने व औषधि‍ के रूप में भी किया जाता है।

(Source - http://parvatjan.com)

Continued..

Regards,

M S Mehta

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मौण उत्सव के आयोजन से कुछ दिन पूर्व टिमरू के तनों को काटकर लाया जाता है तथा इसे आग में थोड़ा सा भूनकर इसके तने की छाल को ओखली में कूटकर घराटों व चक्कियों में बारीक पाउडर के रूप में तैयार कर बकरी की खाल के बने थैले, जिन्हें स्थानीय भाषा में 'खलटे` कहा जाता है अथवा सामान्य कपड़ों के थैले में संग्रहीत कर लिया जाता है।
इस मेले की तिथि तय होने के साथ-साथ यह भी तय होता है कि इस वर्ष कौन सा गांव मौण मेले का नेतृत्व करेगा तथा चयनित गांव द्वारा ही मुख्यत: बड़ी मात्रा में टिमरू का पाउडर तैयार किया जाता है। यह पाउडर लगभग ३ से ४ क्विंटल तक होता है। पारम्परि‍क रीति रि‍वाजों के अनुसार ढोल-दमाऊ बजाने वाले पुरुष संदेशवाहक बनकर गांव-गांव तक मौण मेले की सूचना व निमंत्रण पहुंचाते हैं।
इस मेले में मुख्यत: पुरुष अधि‍क संख्या में भाग लेते हैं। जबकि महिलाएं काफी कम संख्या में इस मेले के समापन स्थल में आकर लोकगीतों व लोकनृत्य में सम्मिलित होती हैं। ढोल नगाड़ों व रणसिंगा आदि से सुसज्जित वाद्य यन्त्रों के साथ हाथ में टिमरू का डंडा लिए तथा मछली पकड़ने के जाल  मछकण्डी को टांगकर सीटियां बजाते व हल्ला करते हुए अपने बदन में सिर्फ लंगोट या कच्छा बनियान पहनकर मछली पकड़ने वाले जाल को लिए उस सुनिश्चित स्थान पर पहुंचते हैं जहां पर टिमरू का पाउडर नदी में डाला जाता है। उस नियत स्थान को मेड कहा जाता है तथा मेले में सम्मिलित होने वाले ग्रामीणों को मणेर कहते हैं। सर्वप्रथम जल की पूजा टिमरू के पाउडर से की जाती है। बाद में मौण से भरे थैलों व खलटों पर टिमरू के डण्डों से प्रहार कर उन्हें तोड़ा जाता है। पाउडर से मछलियां बेहोश हो जाती हैं और उसी दिशा में जन सैलाब पानी में टूट पड़ता है। ग्रामीण लोग मछलियों को पकड़कर गले में टंगी मछकण्डी में एकत्रित करते जाते हैं। इसमें अधि‍कांशत: रोहू मछली व एक अन्य सर्पाकार मछली पकड़ी जाती है। जिसे स्थानीय निवासी गूज कहते हैं।
इस दिन पकड़े जाने वाली मछलियों में सबसे बड़ी मछली को गांव के मंदि‍र में चढ़ाया जाता है तथा अन्य मछलियों का इस्तेमाल भोजन में किया जाता है। इसे स्थानीय ग्रामीण शगुन सिद्धि‍ कहते हैं। स्थानीय लोगों से बात करने से पता चलता है कि इस पर्व का अन्य निकटवर्ती क्षेत्रों में बन्द होने का मुख्य कारण इस मेले में हिंसक झगड़ा होना तथा अश्लील गीत "लेचुआ" गाना इस मेले को असभ्य व गैर सामाजिक पर्व के श्रेणी में ला देता है।
आज भी इस मेले में हजारों की संख्या में लोग भाग लेते हैं। जहां स्थानीय बुजुर्ग इसके आयोजन के घटते स्‍तर से चिन्तित हैं वहीं दूसरी तरफ स्थानीय युवक व जनप्रतिनिधि‍ इसे राज्य के मुख्य आकर्षक पर्व के रूप में राज्य पर्यटन विभाग से चिन्हित करा विकसित करने को प्रयासरत हैं।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

नौज्यूला की आराध्‍य देवी मां जगदी
आज तक हमारे पास इस देवभूमि से जुड़े देवी-देवताओं, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व के स्थानों के कोई भी लिखित प्रमाणिक वि‍वरण उपलब्घ नहीं हैं। श्रद्धा और धूमधाम के साथ आयोजित किए जाने वाले कौथिगों, जातों, थौलु-मेलों के पीछे पुख्ता इतिहास है किंतु अलिखित होने के कारण इसके पूर्ण रूप से प्रमाणिक होने में संदेह की सुईयां घूमती रहती हैं। इस परि‍प्रेक्ष्य में 'नौज्यूला की आराघ्य देवी मां जगदी के संबंध में अधि‍क से अधि‍क एवं प्रमाणिक सामग्री को एकत्रित कर पुस्तक प्रकाशित करना निश्चित ही लेखक की अपनी परम्परा व इतिहास के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। लेखक ने पट्टी हिंदाव की जगदी के संदर्भ में मां जगदी को सर्व प्रथम तथ्यों व अनेक दुर्लभ चित्रों सहित बड़ी ही सरस और रोचक शैली में प्रस्तुत किया है। पुस्तक को पढने की निरंरतता और रुचि भी सतत् बनी रहती है।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जिस प्रकार महाराष्‍ट्र में श्री बाल गंगाधर तिलक ने सार्वजनिक गणेशोत्सव को प्रसारि‍त किया था संभवत: हमारे उत्तराखंड की अनेका-नेक मेले-ठेलों, जात, थौलु एवं सांस्कृतिक उत्सवों को भी बढावा देने का प्रयत्न किया गया हो। ये सब विभिन्न प्रकार के उत्सव हमारी बहुआयामी सांस्कृतिक एकात्मकता की ही प्रस्तुतियां हैं। इस लघु पुस्तिका के कलेवर में संपादक ने 'मां जगदी` के संबंध में यहां के भौगोलिक, ऐतिहासिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्वरूप को भी यथासंभव प्रस्तुत करने का स्तुत्य प्रयास किया है। लेखक का अभिमत 'जोगमाया जगदम्बा रूपी कन्या बरास्ता केदारकांठा मयाली कंकण में जगदी के रूप में प्रकट होती है। यही मयाली कंकण हिंदाव की जगदी के उत्पत्ति‍ स्थल के रूप में विख्यात है। जब पहाड़ से भेड़-बकरी पालक (पालसी) एवं महर लोग अपने गांवों को लौटते तो जगदी भी मंयाली कंकण से पंवाली कांठा तक आई लेकिन बताते हैं कि जगदी का मन यहां भी नहीं लगा और जगदी ने हिंदाव की ओर प्रस्थान किया। उल्लिखित, संदर्भ मां जगदी की उत्पत्ति‍ और इतिहास की और प्रकाश डालने का एक पुख्ता उपक्रम है।
नौज्यूला की आराध्‍य देवी मां जगदी को उत्साही और कर्मठ कार्यकर्त्ताओं का इरादा इंरटनेट से भी जोड़ने का है ताकि मां जगदी में आस्था रखने वाले देश-विदेश में मां जगदी की लीलाओं का प्रत्यक्ष दर्शन कर सकेंगे। कहा जा सकता है कि गोविंदलाल आर्य ने एक स्तुत्य एवं साहित्यिक तथा सांस्कृतिक महत्व का एक महत्‍वपूर्ण काम किया है।
समीक्षक- वि‍श्‍वम्भर दत्त नौटियाल
लेखक- गोविंदलाल आर्य

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भाई-चारे का प्रतीक है मौण मेला   मसूरी। जौनपुर का ऐतिहासिक मौण मेला अपने आप में एक अनोखी पहचान बनाए हुए है। मेले में हजारों लोग अगलाड़ नदी से सामूहिक रूप से मछलियां पकड़ते हैं। यह मेला एक जुलाई से शुरू होगा। इस बार मौंण लाने की बारी पट्टी लालूर के पंचगांई की है।    मौण ऐसा मेला है, जिसमें लोगों टिमरू की छाल से बने महीन पाउडर को मौणकोण नामक स्थान पर अगलाड़ नदी में डालकर सामूहिक रूप से मछलियां पकड़ते हैं। इसमें 114 गांव के ग्रामीण ढोल-नगाड़ों के साथ उत्साह पूर्वक भाग लेते हैं, जिसमें पट्टी दशज्यूला, अठज्यूला, सिलवाड़, लालूर, इडवालस्यूं व जौनपुर द्वितीय के समेत जौनसार के लोग प्रतिभाग करते हैं।    खास बात यह है कि टिमरू के इस पाउडर से मछलियां सिर्फ बेहोश होती हैं। बेहोश होने के बावजूद जो मछलियां मौणाइयों की पकड़ में नहीं आ पातीं, वह पानी के प्रवाह में फिर सामान्य अवस्था में आ जाती हैं। इस दौरान महिलाएं लोकगीत गाती है। इसके बाद लोग नदी में जाकर मछलियां पकड़ना शुरू कर देती है। मछली पकड़ने का सिलसिला लगभग तीन किमी लम्बी नदी में चलता है।    मछली पकड़ने के विशेष उपकरण कुंडियाला, फटियाला, जाल, फांड, कुडली का प्रयोग किया जाता है।    यह मेला टिहरी रियासत के राजा नरेन्द्र शाह ने स्वयं अगलाड़ नदी में पहुंचकर शुरू किया था, लेकिन वर्ष 1844 में आपसी भतभेद के कारण यह बंद हो गया। बाद में लोगों द्वारा गुहार लगाने बाद वर्ष 1949 में इस पुन शुरू किया गया। इस बार मौंण लाने की बारी पटटी लालूर के पंचगांई की है। http://khabar.uttara-khand.com/news_detail.php?nid=8072



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हर्षोल्लास से मनाया मौण मछली मारने उमड़े लोग

पुरोला: विकास खण्ड मोरी के गडुगाड़ पट्टी के सैकड़ों लोगों के क्षेत्र की खुशहाली के लिए हर वर्ष मनाए जाने वाला मौण मेला हर्षोल्लास के साथ मनाया। शनिवार को आयोजित मेले में क्षेत्र के नानाई, बिंगसारी, रमालगावं, डोभाल गांव व खरसाड़ी समेत 13 गांव के  हजारों ग्रामीण लोक गीतों, तांदी व रासों के साथ हाथों में लठियां लेकर ढ़ोल नगाड़ों के साथ सामूहिक रूप से केदारगंगा के तट पर भद्रासु पहुंचे।

परंपरा के अनुसार प्रत्येक गांव के स्याणों ने मां रेणुका देवी की पूजा अर्चना कर केदार गंगा में सुरई का दूध व टिमरू का पाऊडर डाला, जिसके बाद ग्रामीणों ने मछलियों का शिकार किया।


इसके बादगांव में भी त्योहार खी धूम रही। मान्यता है कि मछली मारने के लिए नदी में डाला गया टिमरू पाउडर पानी के साथ धान के खेतों तक पहुंचता है और चूहों से धान की फसल की रक्षा करता है।

ग्राम प्रधान सोवेन्द्र सिंह, घनश्याम तिवारी व कमलेश रावत बताते हैं कि रेणुका माता की पूजा अर्चना कर गेहूं की फसल काटने व खेतों में चूहों की भारी सख्यां से हो रहे नुकसान को रोकने के उद्देश्य से मौण मेला मनाया जाता है।

इस दौरान नदी में डाला गया टिमरू पाऊडर रोपाई के समय पानी के साथ खेतों में पहुंचता है तथा चूहों के प्रकोप को कम करता है जिससे क्षेत्र में अच्छी पैदावार होती है। 


Source Dainik Jagran

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उत्तराखंड आनोखी परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। ऐसी ही एक अनोखी परंपरा शनिवार को टिहरी जिले के जौनपुर विकासखंड के मौण मेले में देखने को मिली। जौनपुर सहित आसपास के सैकड़ों गांवों के लोग (मैणाई) कच्ची शराब और ढोल नगाणों के साथ हाथ में टिमरू का डंडा लेकर मछली पकड़ने के लिए भिंडा नामक स्थान पर अगलाड़ नदी में पहुंच थे।

बताया जाता है कि इस मेले में शामिल लोग नदी के पास टिमरू से जलदेवता की पूजा कर नृत्य करते हैं। लोगों का मानना है कि टिहरी रियासत के राजा नरेंद्र शाह स्वयं अगलाड़ नदी पहुंचकर मेले का आयोजन किया था। तब से यह परंपरा चली आ रही है।




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जौनपुर के मौण मेले में िकया जाता है मछलियों का सामूहिक शिकार
• अमर उजाला ब्यूरो
चंबा (टिहरी)। उत्तराखंड अपने रीतिरिवाजों और परंपराओं के लिए देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी प्रसिद्ध है। आज भी यहां ऐसे कई रीतिरिवाज हैं जो यहां के अलावा कहीं और दिखाई नहीं देते। ऐसी ही एक अनोखी परंपरा जौनपुर विकासखंड के मौण मेले में देखने को मिलती है।
हर साल की तरह इस साल भी शनिवार को आयोजित इस मेले में जौनपुर सहित आसपास के सैकड़ों गांवों के लोगों ने (मैणाई) कच्ची शराब लेकर ढोल नगाणों के साथ हाथ में टिमरू का डंडा लेकर मछली पकड़ने के लिए मछकंडी को टांगकर भिंडा नामक स्थान पर अगलाड़ नदी में पहुंचे। मौण मेले का नेतृत्व करने के लिए निर्धारित लालूर पट्टी के मरोड़, नैनगांव, मुनोग, मातली, कैंथ, बुटगंाव के मौंणाई करीब चार कुंतल टिमरू का पाउडर लेकर नदी में पहुंचे और तांदी, रासौं नृ़त्य किया। इसके बाद टिमरू से जलदेवता की पूजा कर टिमरू से भरे थैलों पर प्रहार कर पाउडर को नदी में उड़ेला गया। मछलियों के बेहोश होते ही नदी की दिशा में जनसैलाब पानी में टूट पड़ा। मछली पकड़ने का सिलसिलों कई घंटों तक जारी रहा। जो मछलियां मौणाइयों की पकड़ में नहीं आती कुछ देर बाद वो सामान्य अवस्था में आ जाती हैं। इस मेले में पुरुष अधिक संख्या में शामिल होते हैं। मौण में जौनुपर के करीब 200, जौनसार के 100 और रवांई के 50 गांवों के ग्रामीणों ने प्रतिभाग किया। मेले का लुत्फ उठाने के लिए दर्जनों विदेशी पर्यटक भी मौजूद थे। मेले में करीब 10 कुंतल मछलियां पकड़ी गई। इन्हें घर लाकर खाया जाता है। सामाजिक कार्यकर्ता प्रदीप कवि और कुंदन सिंह पंवार ने सरकार से मौण मेले को विश्वपटल पर स्थापित करने के लिए सहयोग की अपील की।
क्या है मौण
मौण, टिमरू के तने की छाल को सुखाकर तैयार किए गए महीन चूर्ण को कहते हैं। इसे पानी में डालकर मछलियों को बेहोश करने में प्रयोग किया जाता है। टिमरू का उपयोग दांतों की सफाई के अलावा कई अन्य औषधियों में किया जाता है।
ऐसे तैयार किया जाता है मौण
मौण के लिए दो महीने पहले से ही ग्रामीण टिमरू के तनों को काटकर इकट्ठा करना शुरू कर देते हैं। मेले से कुछ दिन पूर्व टिमरू के तनों को आग में हल्का भूनकर इसकी छाल को ओखली या घराटों में बारीक पाउडर के रूप में तैयार किया जाता है।
इसलिए मनाया जाता है मौण
अगलाड़ नदी के पानी से खेतों की सिंचाई भी होती है। मछली मारने के लिए नदी में डाला गया टिमरू का पाउडर पानी के साथ खेतों में पहुंचकर चूहों और अन्य कीटों से फसलों की रक्षा करता है।
राजशाही से चली आ रही है परंपरा
ये मेला टिहरी रियासत के राजा नरेंद्र शाह ने स्वयं अगलाड़ नदी में पहुंचकर शुरू किया था। वर्ष 1844 में आपसी मतभेदों के कारण यह बंद हो गया। वर्ष 1949 में इसे दोबारा शुरू किया गया। राजशाही के जमाने में अगलाड़ नदी का मौण उत्सव राजमौण उत्सव के रूप में मनाया जाता था। उस समय मेले के आयोजन की तिथि और स्थान रियासत के राजा तय करते थे।
•सैकड़ों ग्रामीणों सहित विदेशी पर्यटक भी रहे मौजूद

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     जौनपुर की लोक संस्कृति का प्रतीक मौंण मेला शनिवार को धूमधाम मनाया गया। बड़ी संख्या में अगलाड़ नदी में पहुंचे ग्रामीणों ने तिलक लगाकर रासों नृत्य किया और उसके बाद नदी में मछली पकड़ने की प्रतिस्पद्र्धा शुरू हुई। इस दृश्य को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचे।

शनिवार को प्रखंड जौनपुर की अगलाड़ नदी के भिड़ा कोटा नामक स्थान पर ऐतिहासिक मौंण मेले में विधिवत ढोल नगाड़े के साथ 14 कुंतल टिमरू का पाउडर नदी में डाला गया।

ढोल-नगाड़ो के साथ विभिन्न गांवों के लोग अगलाड़ नदी में पहुंचे और फिर नदी में जाकर मछलिया पकड़ी। मछलियों को पकड़ने के लिए ग्रामीण नदी में करीब पांच किमी दूर पहुंचे। इस बार मौंण लाने व नदी में डालने की बारी पटटी लालूर के ग्राम मरोड़, खैराड़, नैनगांव, भूटगांव, मूनोग, मातली, कैन्थ के ग्रामीण की थी।

इस बार सबसे अधिक मछलियां दीपक रमोला व संदीप ने पकड़ी। मौंण कार्यक्रम सम्पन्न  होने के बाद मेला स्थान पर ग्रामीण एकत्रित हुए और फिर मच्छी का स्वाद लिया।





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