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Sameshwar Temples in Uttarkashi- समेश्वर देवता के मंदिर, उत्तरकाशी, उत्तराखंड

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 25, 2011, 01:32:06 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Dosto,

The famous Temple Sameshwar Devta is in block Mori, Patti Ador and village Kotgav. This place is very famous for religious point of view. A road leads from Mori to Netwad then Motaad and reaches to Kotgaav where Lord Sameshwar Temple is situated. From the main market of Motaad, the Sameshwar Devta Temple is at 1 km distance.  पुस्तकों में इस मंदिर अनेक स्थानों पर दुयोधन (समसू) को समर्पित देवालय कहा गया है जो यहाँ के स्थानीय निवासी इस भिन्न मत रखते है ! यहाँ के लोक मत के आधार पर समेश्वर "क्षेत्र रक्षक देवता' के रूप में अधिक तर्क संगत एवंम प्रासंगिक है!  इस टोपिक में हम समेश्वर देवता के उत्तरकाशी जिले में विभिन्न स्थलों पर बने मंदिरों के बारे में बतायंगे! इस टोपिक में कुछ जानकारी हेमा उनियाल जी गढ़वाल के मंदिरों पर लिखी गयी किताब "केदारखंड" से लिया गया है!

    photo  Sameshwar temple

M S Mehta

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यह मंदिर तीन पट्टियों अडोर, पंचगायी और बड़ासू में से अडोर का मुख्य मंदिर है! तीन पट्टियों के अंतर्गत शामिल २१-२२ गावो में भी इस देवता के अधिकांश स्थानों पर प्राचीन मंदिर है ! ये गाव है !

१)  पट्टी अडोर के चार गाव -  १. कोटगाव २. सिंदरी ३. सांकरी (इनमे से सांकरी में समेश्वर मंदिर नहीं है)

२) पट्टी बड़ासू के चार गाव - १) डाटमीर२. गंगाड ३. पवाणी ४.असोला (इनमे से पवाणी में समेश्वर मंदिर नहीं है)

पट्टी पंचगाई के गाव पट्टी पंचगाई बड़ी पट्टी है ! जिसमे १४-१५ गाव शामिल है! इस पट्टी का मुख्य केंद्र जखोल है! पच्गायी के गाव

१. तल्ला पाँव
२. मल्ला गाव
३. सून्कुन्दी
४. जखोल
५. सावडी
६. सटटूडी
७. धरा
८. सिरगा
९.  फिताड़ी
१०. राला
११. कसाला
१२. लिवाड़ी
१३. हेरुपुर (इन गावो में से संवादी, सतुतुडी, हेर्पुर, राला, सुन्कुंदी, तालुका में समेश्वर देवता के मंदिर नहीं है !




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भेड़-बकरियों ने की मंदिर की परिक्रमा


बड़कोट (उत्तरकाशी)। उत्तरकाशी की रंवाई घाटी अपनी पौराणिक संस्कृति के लिए विश्व विख्यात है। नौगांव ब्लाकके पाली गांव में हर चार साल में होने वाले 'अठोड़' (भेड़) मेले की धूम एकअनोखी और आश्चर्य चकित कर देने वाली परंपरा है जो आज भी विद्यमान है।  मेले में गांव व क्षेत्र की भेड़-बकरियां दूरस्थ बुग्यालों से आकर मंदिर प्रांगण में मंदिरों की परिक्रमा करती हैं। इस ऐतिहासिक मेले को देखने के लिए दूर-दूर से लोग यहां पहुंचते हैं। पाली गांव में बुधवार को आयोजित हुआ यह 'कठोड़ मेला' पौराणिक रीति-रिवाजों के साथ-साथ डोली नृत्य, लोक नृत्य और गीतों की थाप पर धूमधाम से मनाया गया। दूर-दराज से पहुंचे श्रद्धालुओं और मेहमानों के लिए स्थानीय उत्पादों से बने व्यंजनों से स्वागत करते हैं। तहसील बड़कोट के अंर्तगत यमुनोत्री मार्ग पाली गाड़ से चार किमी की पैदल दूरी पर बसे पाली गांव में लगाने वाला कठोड़ मेला हर चार साल बाद मनाया जाता है। कई दशकों पूर्व इस मेले की शुरूआत 'अष्ट बलि' यानि आठ भेड़ों की बलि देकर की जाती थी। अष्ट बलि दिए जाने के कारण ही यह मेला 'अठोड़ मेला' के नाम से प्रसिद्ध है। यह अष्ट बलि अराध्य देव समेश्वर और जाख देवता को खुश करने और क्षेत्र की खुशहाली के लिए दी जाती थी। आज अराध्य देवता गांव वालों की महीनों बाद दूरस्थ बुग्यालों से घर पहुंची हजारों भेड़-बकरियों की पूरी टोली को सम्मोहित कर गांव में मंदिर प्रांगण में मंदिर के चारों ओर सात बार परिक्रमा करते हैं। हजारों भेड़ बकरियां मंदिर की यह परिक्रमा एक आश्चर्यजनक दृश्य होता है। भेड़ व बकरियों की एक सभ्य सेना की टीम की तरह समेश्वर व जाख देवता के निर्देशों का पालन करती हैं। इसी अनोखे दृश्य को देखने और देवताओं और पशुधन के आशीर्वाद लेने के लिए दूर-दूर से हजारों की संख्या में ग्रामीण और श्रद्धालु पहुंचे। वर्तमान समय में यह मेला अष्टबलि के बजाय कठोड़  मेले के रूप में प्रचारित है।  बुधवार को आयोजित मेले में भेड़-बकरियों की परिक्रमा के साथ ही इसमें डोली नृत्य, स्थानीय तांदी गीत और लोक नृत्य का दौर देर रात तक चला।
   

Source - Dainik Jagran.
This is the news of 2010.

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समेश्वर देव का प्राचीन मंदिर फिताड़ी गाव (७००० फीट) में ज्ञात है ! लिवाड़ी गाव से ८ किलोमीटर की दूरी में राला, कासला गाव को पार करते ही फिताड़ी गाव है ! फिताड़ी गाव से ७ किलोमीटर के बाद जखोल गाव है ! पंचगाई पट्टी का मुख्य केंद्र जखोल है! यही प्राचीन समेश्वर देव का मंदिर है!


 

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Sameshwar or Duryodhana worship: Duryodhana (of Mahabharata) is worshipped in the upper valleys of the rivers Tons, Yamuna, Bhagirathi, Balganga and Bhilangana.



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समेश्वर देव की प्राचीन कथा के स्थानीय बुजुर्ग सुनते है ! सर्व प्रथम समेश्वर देव का आगमन कश्मीर क्षेत्र से हनोल तक हुवा है ! हनोल में उन दिनों एक राक्षस का आतंक था! सद्कुडिया वीर को इस राक्षस का वध करने की शिफ्ट समेश्वर देव द्वारा ही प्रदान की गयी !

वारिश न होने पर समेश्वर देव की पूजा अर्चना की जाती है और वहां वरिश हो जाती है ! ! निकट में ही नेटवाड में स्थित पाखू दविता के मंदिर को इस कथानक से जोड़ा जाता है की पाखू वह राक्षस है जिसे समेश्वर देव की शकित से ही मारा गया !

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पूजा पद्धति समेश्वर मंदिर (कोटगाव) में पूजा का समय दोपहर १ बजे का नियत है! पूजा उपरांत मंदिर के पुजारी स्वयं के निर्मित हाथो का भोजन करते है ! मंदिर के पुजारी बिल्जवांण / रावत का भी इस मंदिर के साथ रोचक इतिहास जुड़ा हुवा है ! किवदंती है सर्व प्रथम बिल्जवांण जाती के पूर्व दूणी (फतेह्पर्वत, मोरी विकास खंड, उत्तरकाशी) में आये ! वहां से आखेट खेलते वे जंगल में चले गए ! जब वे घर लौटे तो उनकी आँखों की ज्योती क्षीण हो गयी और जब को कोट गाव की तरफ आते उनके आँखे ठीक हो जाती और जब वे फतेह्पर्वत की और चले जाते थे तो उनके उनके आँखे बन्ध हो जाती थी ! इस तरह कोट गाव क्षेत्र की और चलते-२ वे राला गाव की और पहुचे जहाँ समेश्वर की मूर्ती भी थी गाव वालो द्वार तब उनके कहा गया था की आप ही इस देवता के पुजारी आप ही बनगे ! 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


समेश्वर देव के साथ इस क्षेत्र की परी आंछारी भी साथ-२ बताई जाती है! विनासु में आंछारी मंदिर है ! जिस पहाड़ पर यह मंदिर है उस पहाड़ पर भारत के मानचित्र सदर्श आक्रति यहाँ के स्थानीय निवास करते है !

आंछारी मंदिर में संतानहीन महिलाए व् अन्य लोग जाते है ! समेश्वर देव के जिन जिन गावो में मंदिर स्थापित है वहां अन्य देवता के मंदिर स्थापित नहीं है ! मात्र कोट गाव में ही समेश्वर मंदिर के पास  लव कुश का मंदिर स्थापित है ! जिसकी इस क्षेत्र में मान्यता है !