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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
October 5 at 5:54am ·

जो रहना है रह जायेगा

जो रहना है रह जायेगा
तू छोड़ के इसे क्या पायेगा
जो रहना है रह जायेगा

लिखा था जो बिक गया अब
दिल था एक टुकड़ों में बंट जायेगा
जो रहना है रह जायेगा

बरसात रोते हंसते जायेगी
आँखों में बुँदे फिर भी आयेगी
जो रहना है रह जायेगा

बहना था वो बह गया देखो
अब उसे कैसे रोक पायेगा
जो रहना है रह जायेगा

हवा को झोंका पंछी उड़ जायेगा
उड़ गया ,छोड़ा घोसला याद आयेगा
जो रहना है रह जायेगा

जो रहना है रह जायेगा
तू छोड़ के इसे क्या पायेगा
जो रहना है रह जायेगा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
October 4 at 5:12am ·

इस रंग बिरंगी दुनिया के

इस रंग बिरंगी दुनिया के
कुछ रंग चुराने आया हूँ
खोटा सिक्का प्रेम साथ मेरे
मै उसको चलाने आया हूँ
इस रंग बिरंगी दुनिया के

नीला रंग आकाश को ओढे
नदी संग बह सागर से मिलने आया हूँ
हरे रंग की चादर बिछाकर
फूलों के सारे रंग चुराने आया हूँ
इस रंग बिरंगी दुनिया के

मन की अभिलाष ये श्वेत रंग
सूरज मिल तेज फैलाने आया हूँ
कला रंग आत्मा और मथन
प्रज्वलित परमात्मा से मिलाने आया हूँ
इस रंग बिरंगी दुनिया के

पीला रंग पीतांबर पहने
वो बांसुरी की तान सुनने आया हूँ
इस बेरंग दुनिया में
मै खुशियों के रंग भरने आया हूँ
इस रंग बिरंगी दुनिया के

इस रंग बिरंगी दुनिया के
कुछ रंग चुराने आया हूँ
खोटा सिक्का प्रेम साथ मेरे
मै उसको चलाने आया हूँ
इस रंग बिरंगी दुनिया के

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
October 3 at 10:48pm ·

मन मेरे
आज जला कौन
आज घर लौट कर आया कौन
राम या रावण
शुभ विजयादशमी अगर रावण जला है तो
मन मेरे

ध्यानी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
October 7 at 7:59am ·

बिती बातें

सब बिती बातें हैं
उन बातों का क्या
पीछे वो छूटी राहें हैं
उन राह हूँ का क्या

किसको फर्क पड़ा है
जिस पर गुजरी है उसको पता है
दर्द दिल को कितना हुआ है
जिसने उसे सहा है

ये जो आँखें हैं
जा के उन से पूछो जरा
अकेल में गुमसुम क्यों
ना ऐसे तुम बहो जरा

चुपचाप खड़ी सी है
एक अनसुलझी पहेली वो
क्या मेरी सहेली है
एक अनजान गली सी वो

ना आना यंहा दुबारा
तेरा घर नही अब तू तो है बंजारा
खंडहर उजाड़ा भूमि में
कैसे अब हंसेगा तेरा वीराना

सब बिती बातें हैं
उन बातों का क्या
पीछे वो छूटी राहें हैं
उन राह हूँ का क्या

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
October 6 at 7:32am ·

टूटे फूटे छूटे मिटटी के घर

टूटे फूटे छूटे मिटटी के घर
बिछड़े अपनों का कहे दर्द

उजड़े सूखे डाल पहाड़
आवाज लगाये दिल कंहा फिर आज

आँखों से कह गयी वो बहती धार
सूखे खेत खड़े पड़े बंजर गाँव

हरयाली क्यों रूठी है ऐसे
कैकई कोप भवन में बैठी हो जैसे

कौन बने फिर जनक महाराज
चलाये हल सीता जन्में हो बरसात

चकबंदी है एक आस जगाती
पहड़ों की अब गरीब क्रांति कहलाती

आओ मिलकर साथ हँसले गा ले
अपने पहड़ों को फिर स्वर्ग बनलें

टूटे फूटे छूटे मिटटी के घर
बिछड़े अपनों का कहे दर्द

उजाड़े सूखे डाल पहाड़
आवाज लगाये दिल कंहा फिर आज

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
October 5 at 8:10am ·

देख रहा हूँ

अब थोड़े थोड़े
भीड़ काम हो जायेगी
लकड़ी जलकर ख़ाक
चमड़ी रखा हो जायेगी
अस्थि बचेगी
मेरी वो आस जगाये
मेरा अपना होगा कोई
उसे जो गंगा में बहाये
देख रहा हूँ
खुद को ही अब मै
कुछ करना चाहता हूँ
छटपटाना चाहता हूँ
कुछ कर नही पा रहा हूँ
मूक मै तब भी था
और मौन मै अब भी हूँ
बस सब जो था मेरा
मुझ से सब धीरे धीरे गया
बस एक चीज ना गयी
जो साथ मेरे चली आयी
वो छटपटाहट तब भी थी
वो छटपटाहट अब भी है
अब थोड़े थोड़े
भीड़ काम हो जायेगी
लकड़ी जलकर ख़ाक
चमड़ी रखा हो जायेगी
अस्थि बचेगी
मेरी वो आस जगाये
मेरा अपना होगा कोई
उसे जो गंगा में बहाये

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
October 1 at 6:48am · Edited ·

मै ना भूलूंगा

मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा
वो रात है वो ही रात की बात
वही बात मै दोहराता रहूंगा
मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा

आयी फिर वही रात है
२ अक्टूबर १९९४ की बात है
ना मिला इंसाफ पहाड़ को
मुजफ्फरनगर कांड बरसी को
मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा

जलती रहे मशाल
इस दिल बदन के जान में
इस चिंगारी को ना बुझने दूंगा
अपना हक उन से लेके रहूंगा
मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा

आज वो काला दिन है
वो अन्धेरा अब भी मेरे प्रतिबिम्ब है
इन्साफ तराजू ना झुकने दूंगा
हे उत्तराखंड तेरे लिये लड़ता रहूंगा
मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा

वो अब भी आते सपने मेरे
वो अब भी मुझ से सवाल करते हैं
उनका वो हाल अब भी तड़पता है मुझको
खून के आँसूं वो मुझको रूला जाता है
मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी


कोई किसी के लिये नही बैठा यंहा
चल उठ रात गयी वो सवेरा अभी हुआ

शुभ प्रभात मित्रों
ध्यानी बोल देता है

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
October 6 at 7:32am ·

टूटे फूटे छूटे मिटटी के घर

टूटे फूटे छूटे मिटटी के घर
बिछड़े अपनों का कहे दर्द

उजड़े सूखे डाल पहाड़
आवाज लगाये दिल कंहा फिर आज

आँखों से कह गयी वो बहती धार
सूखे खेत खड़े पड़े बंजर गाँव

हरयाली क्यों रूठी है ऐसे
कैकई कोप भवन में बैठी हो जैसे

कौन बने फिर जनक महाराज
चलाये हल सीता जन्में हो बरसात

चकबंदी है एक आस जगाती
पहड़ों की अब गरीब क्रांति कहलाती

आओ मिलकर साथ हँसले गा ले
अपने पहड़ों को फिर स्वर्ग बनलें

टूटे फूटे छूटे मिटटी के घर
बिछड़े अपनों का कहे दर्द

उजाड़े सूखे डाल पहाड़
आवाज लगाये दिल कंहा फिर आज

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
October 1 at 6:48am · Edited ·

मै ना भूलूंगा

मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा
वो रात है वो ही रात की बात
वही बात मै दोहराता रहूंगा
मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा

आयी फिर वही रात है
२ अक्टूबर १९९४ की बात है
ना मिला इंसाफ पहाड़ को
मुजफ्फरनगर कांड बरसी को
मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा

जलती रहे मशाल
इस दिल बदन के जान में
इस चिंगारी को ना बुझने दूंगा
अपना हक उन से लेके रहूंगा
मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा

आज वो काला दिन है
वो अन्धेरा अब भी मेरे प्रतिबिम्ब है
इन्साफ तराजू ना झुकने दूंगा
हे उत्तराखंड तेरे लिये लड़ता रहूंगा
मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा

वो अब भी आते सपने मेरे
वो अब भी मुझ से सवाल करते हैं
उनका वो हाल अब भी तड़पता है मुझको
खून के आँसूं वो मुझको रूला जाता है
मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा

एक उत्तराखंडी

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