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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 

बालकृष्ण डी ध्यानी


उन कन्धों में इतना बोझ है
जिस से रीढ़ की हड्डी झुक रही है
वंहा झुक रही थी साथ मेरी मजबूरी
ये देख कर रो पड़ी मेरी खुदारी

ध्यानी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
23 hrs · Edited ·

एक लकीर खिंच दी है उन अपनों ने ही
उसे मिटने की कोशिश करता रहा उम्र भर
शायद कामयाब हो जाऊं
नहीं तो
अब कम हो जाऊंगा
फिर लुप्त हो जाऊंगा
ये मेरे पेड़ पहाड़
और मै
ध्यानी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
Yesterday at 4:06am ·

मै तो जलता ही रहता अंगारों पर

मै तो जलता ही रहता अंगारों पर
धुँआ तू किस लिये मुझे बैचेन कर जाता है
मै तो जलता ही रहता अंगारों पर

चाह है ना इन्तजार किसी का
पथ पर बैठ दिल किसका ख्याल करता है
ना कोई आया ना कोई यंहा आने वाला
पल पल दिल तू धड़कन बढ़ सा जाता है
मै तो जलता ही रहता अंगारों पर

रोने वालों पर हँसते हैं सब ना कोई रोने वाला
ये दुखड़े जी के आके ना कोई सीने वाला
पिलाते हैं सब यंहा जी भर आंसू मय के
लड़खड़ाते कदमों ना कोई मंजिल पहुंचाने वाला
मै तो जलता ही रहता अंगारों पर

जल जलकर राख सा एक रोज मै हो जाऊंगा
जलने के बाद ही शायद मै उससे मिल पाऊंगा
जब तक ना गिरेगा एक बून्द आंसू उसका मेरे लिये
मै तो यूँ ही अपने आप में जलता रह जाऊंगा
मै तो जलता ही रहता अंगारों पर

मै तो जलता ही रहता अंगारों पर
धुँआ तू किस लिये मुझे बैचेन कर जाता है
मै तो जलता ही रहता अंगारों पर

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
October 2 at 2:38am ·

मेरी मशाल तू जलती रहे

दो शब्द तो बोल नही सकते
दो कदम अपने घर के बहार क्या निकालेंगे

२० साल तक जो सो रहे है
उन्हें अब तुम ही बताओ अब हम कैसे जगायेंगे

हार मान ली वो जीनों ने अपने से
उन्हें कैसे अब हम जीत दिलायेंगे

छोड़ना चाहते है जो खुद को ही खुद से
अब तुम ही बोलो उन्हें कैसे वापस आने को हम समझायेंगे

एक मशाल जला राखी है मैंने अपने आप में
अब लगता है वो भी आकर उसे भी बुझा जायेंगे

अपनों को ही जब अपना इतिहास पता नहीं उस अपने को
किस काली भैंस के आगे जा के अपना बीन बजायेंगे

दो शब्द तो बोल नही सकते
दो कदम अपने घर के बहार क्या निकालेंगे

एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
October 1 at 6:48am · Edited ·

मै ना भूलूंगा

मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा
वो रात है वो ही रात की बात
वही बात मै दोहराता रहूंगा
मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा

आयी फिर वही रात है
२ अक्टूबर १९९४ की बात है
ना मिला इंसाफ पहाड़ को
मुजफ्फरनगर कांड बरसी को
मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा

जलती रहे मशाल
इस दिल बदन के जान में
इस चिंगारी को ना बुझने दूंगा
अपना हक उन से लेके रहूंगा
मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा

आज वो काला दिन है
वो अन्धेरा अब भी मेरे प्रतिबिम्ब है
इन्साफ तराजू ना झुकने दूंगा
हे उत्तराखंड तेरे लिये लड़ता रहूंगा
मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा

वो अब भी आते सपने मेरे
वो अब भी मुझ से सवाल करते हैं
उनका वो हाल अब भी तड़पता है मुझको
खून के आँसूं वो मुझको रूला जाता है
मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
September 29 at 6:01am ·

आईना देखो मैं कंही हूँ की नही

आईना देखो मैं कंही हूँ की नही
अपने को ही ढूंढता राह उम्र भर मै मिला कंही ही नही
आईना देखो मैं कंही हूँ की नही

मिल गया हो जो तुम्हें बतला देना मुझको भी
मेरा वो प्रतिबिंब जरा मुझे भी दिखला देना हो सके तो
आईना देखो मैं कंही हूँ की नही

अपने को ही ना पा सका जब खुद ही खुद से मै
क्यों खोजने चला था मैं बहार मै इस दुनिया को
आईना देखो मैं कंही हूँ की नही

उलझा ही रहा अपने ही काले साये से इस तरह
तेरा उजाला भी मुझे नाकाफी क्यों गुजरा
आईना देखो मैं कंही हूँ की नही

आईना देखो मैं कंही हूँ की नही
अपने को ही ढूंढता राह उम्र भर मै मिला कंही ही नही
आईना देखो मैं कंही हूँ की नही

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
September 27 at 10:33am ·

लाल बत्ती

लाल बत्ती जल पड़ी
हरी बुझ गयी है
वो
उठा खड़ा है
क्यों पड़ा है
वो
रस्ते में ऐसे क्यों
किससे लगा है
वो
अनजान है या पहचान
आखिर कौन है
वो
मंगती है भूख उससे
बैचेना खड़ा है
वो
मानव मानव देख रहा
लाल बत्ती हरी हो गयी चल पड़ा है
वो

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
4 hrs ·

देख रहा हूँ

अब थोड़े थोड़े
भीड़ काम हो जायेगी
लकड़ी जलकर ख़ाक
चमड़ी रखा हो जायेगी
अस्थि बचेगी
मेरी वो आस जगाये
मेरा अपना होगा कोई
उसे जो गंगा में बहाये
देख रहा हूँ
खुद को ही अब मै
कुछ करना चाहता हूँ
छटपटाना चाहता हूँ
कुछ कर नही पा रहा हूँ
मूक मै तब भी था
और मौन मै अब भी हूँ
बस सब जो था मेरा
मुझ से सब धीरे धीरे गया
बस एक चीज ना गयी
जो साथ मेरे चली आयी
वो छटपटाहट तब भी थी
वो छटपटाहट अब भी है
अब थोड़े थोड़े
भीड़ काम हो जायेगी
लकड़ी जलकर ख़ाक
चमड़ी रखा हो जायेगी
अस्थि बचेगी
मेरी वो आस जगाये
मेरा अपना होगा कोई
उसे जो गंगा में बहाये

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
7 hrs ·

जो रहना है रह जायेगा

जो रहना है रह जायेगा
तू छोड़ के इसे क्या पायेगा
जो रहना है रह जायेगा

लिखा था जो बिक गया अब
दिल था एक टुकड़ों में बंट जायेगा
जो रहना है रह जायेगा

बरसात रोते हंसते जायेगी
आँखों में बुँदे फिर भी आयेगी
जो रहना है रह जायेगा

बहना था वो बह गया देखो
अब उसे कैसे रोक पायेगा
जो रहना है रह जायेगा

हवा को झोंका पंछी उड़ जायेगा
उड़ गया ,छोड़ा घोसला याद आयेगा
जो रहना है रह जायेगा

जो रहना है रह जायेगा
तू छोड़ के इसे क्या पायेगा
जो रहना है रह जायेगा

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
22 mins ·

बिती बातें

सब बिती बातें हैं
उन बातों का क्या
पीछे वो छूटी राहें हैं
उन राह हूँ का क्या

किसको फर्क पड़ा है
जिस पर गुजरी है उसको पता है
दर्द दिल को कितना हुआ है
जिसने उसे सहा है

ये जो आँखें हैं
जा के उन से पूछो जरा
अकेल में गुमसुम क्यों
ना ऐसे तुम बहो जरा

चुपचाप खड़ी सी है
एक अनसुलझी पहेली वो
क्या मेरी सहेली है
एक अनजान गली सी वो

ना आना यंहा दुबारा
तेरा घर नही अब तू तो है बंजारा
खंडहर उजाड़ा भूमि में
कैसे अब हंसेगा तेरा वीराना

सब बिती बातें हैं
उन बातों का क्या
पीछे वो छूटी राहें हैं
उन राह हूँ का क्या

एक उत्तराखंडी

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