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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
September 10
कब जाग्ला

कब जाग्ला
कब जगा व्हाला
कब अपरा पहाड़ थे
कब ये अपरा समझला

नींदि इनि चढ़ीच
चौतरफा देक सियिंच
ह्युंद जनि जमीच
उकालु मा दाढीच

भैर ना भित्तर
गैर जनि व्हैगे छित्तर
उड़्ना बन तित्तर
जनि माया की छतर

पैल कैल बुलण
धैल कैल लगण
कुम्भकरण नींदि से
पैल कैल जगण

कब जाग्ला
कब जगा व्हाला
कब अपरा पहाड़ थे
कब ये अपरा समझला

एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
September 8
देक तेरी लाडी थे

देक तेरी लाडी थे
आच नींदि नि आनि
आँखि ते बुलानि बाबाजी
मांजी मी रुलाणी
देक तेरी लाडी थे
आच नींदि नि आनि

रुसों बैठ्युं छों कुलण
जिकोड़ी ते धैय लगानि
आच बोई ने मार मि थे
मिल दाल भात नि खानि
देक तेरी लाडी थे
आच नींदि नि आनि

खुज्दा रैंद तै खुटा मेरा
झट ऐजा लाडी की बोल्यूं मानी
जब लगाली तै बडुळि बाबाजी
बिंग ले मिल ते थे हाक मारी
देक तेरी लाडी थे
आच नींदि नि आनि

देक तेरी लाडी थे
आच नींदि नि आनि
आँखि ते बुलानि बाबाजी
मांजी मी रुलाणी
देक तेरी लाडी थे
आच नींदि नि आनि

एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
1 hr · Edited ·

आवाज आयी कानों में

आवाज आयी कानों में इन खेत और खलिहानों में
गरीब क्रांति का रथ चला ये मेरे पहाड़ों में

चल चकबंदी का संदेश फैला गीत मेरे
मेरे पहाड़ों के किसानों किसानों और जन जन के कानों में

आवाज आयी कानों में इन खेत और खलिहानों में
गरीब क्रांति का रथ चला ये मेरे पहाड़ों में

पलायन रोकने का चकबंदी एक मात्र तरीका है
खुशहाल होगा मेरा पहाड़ उन आशा की निगाहों में

आवाज आयी कानों में इन खेत और खलिहानों में
गरीब क्रांति का रथ चला ये मेरे पहाड़ों में

चल एक आवाज तो भी उठा चल कदम से कदम मिला
इस जन क्रांति में तो पहले अपना नाम लिखा

आवाज आयी कानों में इन खेत और खलिहानों में
गरीब क्रांति का रथ चला ये मेरे पहाड़ों में

आवाज दे रहा गाँव तेरा खेत और खलिहान तेरा
इस बंजर को फिर उपजाऊ बना मट्टी से सोना उगला

आवाज आयी कानों में इन खेत और खलिहानों में
गरीब क्रांति का रथ चला ये मेरे पहाड़ों में

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ख रोने ना देना
अपने को और अपनों को

तू ही तो वो सहारा
बिन तेरे ना दिखता किनारा
आँखों से ना ओझल होने देना
सपना जो तेरा वो मेरा

देख खोने ना देना
देख रोने ना देना
अपने को और अपनों को

पत्थर पर लिखी तकदीरें
छपी वंहा तेरी मेरी तस्वीरें
मिलकर है सब रंग भरना
देख कंही अकेला ना चलना

देख खोने ना देना
देख रोने ना देना
अपने को और अपनों को

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
10 hrs ·

अकेला चला राह जब
रस्ते अपने आप जुड़ने लगे
अकेला चला जब मै
एक एक अपने सारे बिछड़ने लगे

ध्यानी बोल देता है

शुभरात्री मित्रों

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
23 hrs ·

चल

फिर लड़ै लगे
अपरा विरासत बचाण बाण
दिल्ली मा
अपरा गढ़वाल भवन बाणा
देक्ला काद्गा खुटा
भैर आला सात हिटला
काद्गा अपरा
एक हुला
क्द्गा उत्तराखंडी जुटला
तुम नि आला तर कया
मी त जोंलों
अपरा ढुंगु राज्य बाण
अपरू विरुद्ध जातेलु
अपरू हक़ लेकि रोलों
ना देक ना सोच
सियां ना रै
अब त जगा
फिर लड़ै लगे
फिर आजना नि चढ़े चडे
वैंकी खिंडी मि खेलण
देक याकलू मिल
रण जीती की ऐना
म्यारा दगडी मेरा देबता छिन
ना देर कैर
वि सुबेर आणि छन फिर
कया देलू जवाब
आपरी जल्मभूमि थे
चल जोंला दगड
चल बयां खुठ भैर त धैर
इतिहस ते बुलणु
चल
अपरा विरासत बचाण बाण
दिल्ली मा
अपरा गढ़वाल भवन बाणा

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
Yesterday at 9:08am ·

अब

मन ना लगे
अब अंतर मन

जल थल
अब सबका जीवन

अकेला खड़ा
अब प्रश्न पड़ा

अछूता ना कोई
अब सबको छुआ

घिर घिर वो
अब धरा गिरा

मन ना लगे
अब अंतर मन

जल थल
अब सबका जीवन

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
September 19 at 7:58am ·

रस मधुरस में एक रचना

अपने को ले कस और बस कस
रस मधुरस एक रचना

पन्नों पर आ उभर उभर
अपने को ले कस और बस कस

गन्ने का वो मीठा रस
ओखली में अपने सर को रख

अपने को ले कस और बस कस
नीम का वो कड़वा घोल

बस मीठा मीठा बोल
अपने को ले कस और बस कस

जिंदगी है एक सफर
रिश्तों पर पड़ेगा निर्भर

अपने को ले कस और बस कस
रस मधुरस एक रचना

पन्नों पर आ उभर उभर
अपने को ले कस और बस कस

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
3 hrs ·

इस रंग बिरंगी दुनिया के

इस रंग बिरंगी दुनिया के
कुछ रंग चुराने आया हूँ
खोटा सिक्का प्रेम साथ मेरे
मै उसको चलाने आया हूँ
इस रंग बिरंगी दुनिया के

नीला रंग आकाश को ओढे
नदी संग बह सागर से मिलने आया हूँ
हरे रंग की चादर बिछाकर
फूलों के सारे रंग चुराने आया हूँ
इस रंग बिरंगी दुनिया के

मन की अभिलाष ये श्वेत रंग
सूरज मिल तेज फैलाने आया हूँ
कला रंग आत्मा और मथन
प्रज्वलित परमात्मा से मिलाने आया हूँ
इस रंग बिरंगी दुनिया के

पीला रंग पीतांबर पहने
वो बांसुरी की तान सुनने आया हूँ
इस बेरंग दुनिया में
मै खुशियों के रंग भरने आया हूँ
इस रंग बिरंगी दुनिया के

इस रंग बिरंगी दुनिया के
कुछ रंग चुराने आया हूँ
खोटा सिक्का प्रेम साथ मेरे
मै उसको चलाने आया हूँ
इस रंग बिरंगी दुनिया के

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
9 hrs ·

मन मेरे
आज जला कौन
आज घर लौट कर आया कौन
राम या रावण
शुभ विजयादशमी अगर रावण जला है तो
मन मेरे

ध्यानी