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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी


कोई किसी के लिये नही बैठा यंहा
चल उठ रात गयी वो सवेरा अभी हुआ

शुभ प्रभात मित्रों
ध्यानी बोल देता है

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
September 24 at 9:43am ·

हर एक को वो लगा अपना है
लेकिन वो बेगाना निकला
पर्दे की आड़ में बैठा वो अपना
सियार से भी सियाना निकला

ध्यानी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
October 6 ·

टूटे फूटे छूटे मिटटी के घर

टूटे फूटे छूटे मिटटी के घर
बिछड़े अपनों का कहे दर्द

उजड़े सूखे डाल पहाड़
आवाज लगाये दिल कंहा फिर आज

आँखों से कह गयी वो बहती धार
सूखे खेत खड़े पड़े बंजर गाँव

हरयाली क्यों रूठी है ऐसे
कैकई कोप भवन में बैठी हो जैसे

कौन बने फिर जनक महाराज
चलाये हल सीता जन्में हो बरसात

चकबंदी है एक आस जगाती
पहड़ों की अब गरीब क्रांति कहलाती

आओ मिलकर साथ हँसले गा ले
अपने पहड़ों को फिर स्वर्ग बनलें

टूटे फूटे छूटे मिटटी के घर
बिछड़े अपनों का कहे दर्द

उजाड़े सूखे डाल पहाड़
आवाज लगाये दिल कंहा फिर आज

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
November 8 at 7:46am · Edited ·

Gum ke nichai hee dabi hai khushi
Ukero use aaise naa ho kabhi kalm ko chati

Dhyani prnam prnam
— feeling happy.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

लकृष्ण डी ध्यानी
November 7 at 7:02am ·

bas ab chahton ka shar hai
aai subha janai to kidhar hai
sab khadai ke khadai hain yanha
kuch bhi kar to sab beasr hai

shubh svera doston
dhyani

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
October 1 · Edited ·

मै ना भूलूंगा

मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा
वो रात है वो ही रात की बात
वही बात मै दोहराता रहूंगा
मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा

आयी फिर वही रात है
२ अक्टूबर १९९४ की बात है
ना मिला इंसाफ पहाड़ को
मुजफ्फरनगर कांड बरसी को
मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा

जलती रहे मशाल
इस दिल बदन के जान में
इस चिंगारी को ना बुझने दूंगा
अपना हक उन से लेके रहूंगा
मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा

आज वो काला दिन है
वो अन्धेरा अब भी मेरे प्रतिबिम्ब है
इन्साफ तराजू ना झुकने दूंगा
हे उत्तराखंड तेरे लिये लड़ता रहूंगा
मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा

वो अब भी आते सपने मेरे
वो अब भी मुझ से सवाल करते हैं
उनका वो हाल अब भी तड़पता है मुझको
खून के आँसूं वो मुझको रूला जाता है
मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
December 2 at 6:17pm ·

काश ! कोई महसूस करता मुझे

समंदर कि लहरों पर पड़ा पहरा
आँखों मे उतरा आता वो राज गहरा
टुकडों मै बेच रहे वो मेरे सपने
भेद खडे किये जिसने वो है मेरे अपने

अकसर ये होता है होता है क्यों ऐसा
बच जो जाता वो बनता है मेरा हिस्सा
किस्सा पुराना समझकर लोग मुझे भुल जाते
वही पुराने पल चंद मुझे नजर आते

आखों मे सिमटी यादों कि परछाई
अतित कि जो बची है थोडी सी गहराई
उस भरोसे से ही सांस उतर चढ़ रही है
अब भी वो नाडी ऐसे हि चल रही है

काश ! कोई महसूस करता मुझे

एक उत्तराखंडी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
October 6 ·

टूटे फूटे छूटे मिटटी के घर

टूटे फूटे छूटे मिटटी के घर
बिछड़े अपनों का कहे दर्द

उजड़े सूखे डाल पहाड़
आवाज लगाये दिल कंहा फिर आज

आँखों से कह गयी वो बहती धार
सूखे खेत खड़े पड़े बंजर गाँव

हरयाली क्यों रूठी है ऐसे
कैकई कोप भवन में बैठी हो जैसे

कौन बने फिर जनक महाराज
चलाये हल सीता जन्में हो बरसात

चकबंदी है एक आस जगाती
पहड़ों की अब गरीब क्रांति कहलाती

आओ मिलकर साथ हँसले गा ले
अपने पहड़ों को फिर स्वर्ग बनलें

टूटे फूटे छूटे मिटटी के घर
बिछड़े अपनों का कहे दर्द

उजाड़े सूखे डाल पहाड़
आवाज लगाये दिल कंहा फिर आज

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
October 1 · Edited ·

मै ना भूलूंगा

मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा
वो रात है वो ही रात की बात
वही बात मै दोहराता रहूंगा
मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा

आयी फिर वही रात है
२ अक्टूबर १९९४ की बात है
ना मिला इंसाफ पहाड़ को
मुजफ्फरनगर कांड बरसी को
मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा

जलती रहे मशाल
इस दिल बदन के जान में
इस चिंगारी को ना बुझने दूंगा
अपना हक उन से लेके रहूंगा
मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा

आज वो काला दिन है
वो अन्धेरा अब भी मेरे प्रतिबिम्ब है
इन्साफ तराजू ना झुकने दूंगा
हे उत्तराखंड तेरे लिये लड़ता रहूंगा
मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा

वो अब भी आते सपने मेरे
वो अब भी मुझ से सवाल करते हैं
उनका वो हाल अब भी तड़पता है मुझको
खून के आँसूं वो मुझको रूला जाता है
मै ना भूलूंगा
ना तुम को भूलने दूंगा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
September 28 ·

कोई किसी के लिये नही बैठा यंहा
चल उठ रात गयी वो सवेरा अभी हुआ

शुभ प्रभात मित्रों
ध्यानी बोल देता है