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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
December 21 at 5:38am ·

अभी तो बहुत कुछ है

अभी तो बहुत कुछ है
करना हसिल मुझे ......२
जाने वो कैसा पथ होगा
जिस पे चलना है आखिर मुझे ......२
अभी तो बहुत कुछ है................

आशा निराशा में जंग ऐसी लगी हुयी
छाने ना पाये मन मेरे अंधेरा तुझे
उस उजाले को है पाना मुझे
प्रकाशित करना है हर छोर को
अभी तो बहुत कुछ है................

अगर मगर के इस खेल में
निकल ना जाये ये वक़्त तेरा मेरा
नूतन नया सवेरा सदा आता यंहा
शीघ्र कर गया वक़्त ना आएगा फिर यंहा
अभी तो बहुत कुछ है................

सांसों का क्या है भरोसा
टूट जाये जाने वो किस मोड़ पर
बन जा कोई नयी कहानी यंहा
छूट जाये सदा तेरी निशानी इस जहाँ
अभी तो बहुत कुछ है................

अभी तो बहुत कुछ है
करना हसिल मुझे ......२
जाने वो कैसा पथ होगा
जिस पे चलना है आखिर मुझे ......२
अभी तो बहुत कुछ है................

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
December 20 at 5:49am ·

कुछ तो लिखूं

कुछ तो लिखूं ......२
जो ये मेरा दिल कहे
इस फलक पर सब वो उभरे
जो मै सोचों ये मन मेरे
कुछ तो लिखूं ......२
जो ये मेरा दिल कहे

इस हरेभरे रंग को लेकर
सब के जीवन में मै उतार लूँ
नीले गगन के संग उड़कर
बहती नदी का बहाव बनू
कुछ तो लिखूं ......२
जो ये मेरा दिल कहे

चिड़ियों की तरह चहकूं मै
भौरों की मै गुनगान बनू
फूलों की मुस्कान हो मुझमें
चाहे फिर एक पल का मै मेहमान बनू
कुछ तो लिखूं ......२
जो ये मेरा दिल कहे

वो लिखता चले मुझमें उसे
मै उस पर यूँ ही लिखता चलूँ
गर मै कंही रोक भी गया
मेरे अधूरे पथ पर और कोई चले
कुछ तो लिखूं ......२
जो ये मेरा दिल कहे

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
December 18 at 12:34am · Edited ·

स्कुल जिंदगी का

स्कुल जिंदगी का
यंहा किसने बनया होगा
गम और खुशी का मेला
यंहा किसने लगाया होगा
स्कुल जिंदगी का..........................

आँखों को किसने
यंहा देखना सिखाया होगा
पैरों को जीवन पथ पर
किसने चलना सिखाया होगा
स्कुल जिंदगी का..........................

साँसों की लय पर
जंहा धड़कन नाचती हो जी
उस सीने की बढ़ती घटती रफ़्तार को
किसने धड़काया होगा
स्कुल जिंदगी का..........................

हाथों को कैसे पता चला जी
किसको गले लगाना है
चेहरे को कैसे मालुम हुआ
किस से शरमाना,लजाना है
स्कुल जिंदगी का..........................

जीवन मरण के इस खेल को
किसने यंहा बिछाया होगा
पाप पुण्य के इस भेद को
कौन यंहा समझ पाया होगा
स्कुल जिंदगी का..........................

स्कुल जिंदगी का
यंहा किसने बनया होगा
गम और खुशी का मेला
यंहा किसने लगाया होगा
स्कुल जिंदगी का..........................

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
December 13 at 7:00am ·

आज पी भी ना थी फिर भी लड़खड़ा मैं गया

आज पी भी ना थी फिर भी लड़खड़ा मैं गया
उस हसीन ने मुझे आज जब जमकर पिलाया

आँखों का वो नशा था छाया इस तरहं मन पर
उस हसीन ने मुझे जब अपने दिल से लगाया

प्रेम और मदिरा में जब भी हुयी कभी जंग है
हार ने शराब से जीत ने यार संग साथ निभाया

आज छूटा मैख़ाना मेरा टूटा अब पैमाना मेरा
बिखरे -बिखरे खयालात जब उसने संभले मेरे

आज पी भी ना थी फिर भी लड़खड़ा मैं गया
उस हसीन ने मुझे आज जब जमकर पिलाया


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बालकृष्ण डी ध्यानी
December 10 at 8:30am ·

दो पल ही पास मेरे

दो पल ही पास मेरे
आज और कल....................... २
जाती हुयी सांसे मेरी
फिर एक बार मेरे साथ चल
छूटा तेरा कुछ पीछे
तू चला किधर
दो पल ही पास मेरे
आज और कल....................... २

समय ही नही पास मेरे
सागरों की लहरें ना यूँ तू मचल
साहिल बुलाये अब पास मुझे
जब डूब रहा है मेरा सफर
दो पल ही पास मेरे
आज और कल....................... २

रह गयी बस अब बची तमन्ना
दबी थी सीने में ना और तू धड़क
माटी के ढेर में सोया बीज पड़ा
क्यों अंकुरित होने को उसे अब भी ललक
दो पल ही पास मेरे
आज और कल....................... २

मंजिल थी कंहा मेरी
और मेर कदम बहके थे किस ओर
टूटा फूटा पड़ा है कर्म मेरा
अब ना जोड़ सकेगा कोई गोंद
दो पल ही पास मेरे
आज और कल....................... २

एक उत्तराखंडी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
December 26 at 12:08pm · Edited ·

इस उम्र में भी

इस उम्र में भी
दबे जज्बात उभरने ने लगे
देखकर आप को
हम क्यों जाने ऐसे मचलने लगे
इस उम्र में भी

सोये थे कहाँ क्या पता अब तक वो
दिल के किस कोने में उन्हें मार रखा था
आँखें लड़ी थी बीते बरसों लकड़पन में
उन आँखों की यादों को संभल रखा था
इस उम्र में भी

अहसास वो ही है ,वो पहला प्यार वो ही है
गिरी थी प्रेम की बारिश,वो बूंदों की बौछार वो ही है
मै भी तू भी वो ही है और ये समा भी वो ही है
उसी राह पर मोड़े थे कभी कदम हमने अब भी खड़े वहीँ है
इस उम्र में भी

कुछ ना रह जाता ये जाना हमने अब है
बूढी सांसें कह रही है तेरा इन्तजार अब है
रिश्तों के बंदिशों की वो बंधी लगाम हम पर अब भी है
इस उम्र में भी तेरे हिस्से का बचा रखा वो प्यार अब भी है
इस उम्र में भी

एक उत्तराखंडी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
December 26 ·
·

ऐ भी जा

ऐ भी जा ,ऐ भी जा
ऐ भुला आ भी जा
अपरू पहाड़ ऐ गढ़वाल
ऐ छूछा आ भी जा

मेरु , तेरु जिकोड कु ,बौल्या रे अपरी सीमा कया च
ये त ये च तेरु , और्री मेरु और्री ऐ कु कया च
जाण ले जाण जा रे ऐ अपरू नातू पहाड़ कु
सैर थे कर बिदा

ऐ भी जा ,ऐ भी जा
ऐ भुला आ भी जा
अपरू पहाड़ ऐ गढ़वाल
ऐ छूछा आ भी जा

देक ले जै थे बी यख , तेरु जणी देख्णु किले
जाण ले पछाँण ले अपरुँ थे अब तू पछाँण ले
कनी बोलुं, ते बिगेर कनि च मेरु पहाड़
भुला रे चल परती फिर

ऐ भी जा ,ऐ भी जा
ऐ भुला आ भी जा
अपरू पहाड़ ऐ गढ़वाल
ऐ छूछा आ भी जा

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
December 25 ·
·

कविता हिंदी

चलो लिखें कविता हिंदी
भारत माँ के माथे की बिंदी
ऊषा आये रोज जगाये
भाव नये नित मन उपजाये

तब अभिभूत करे ये मन
अकिंत हो तब पन्नों में स्वर
तब हिर्दय से बहे शब्दों की गंगा
निखरे सोच सब कुछ हो चंगा

हर एक वो पटल सजायें
शब्दों से शब्दों के फूल खिलायें
तब हो नई ऊर्जा का संचार सर्वत्र
कविता साथी जब हो ऐसा

अनचाहे कितने उभरे ख़याल
सजोंये ले मैंने गमलों का आधार
पाठकों ये आप का है प्यार दुलार
इस कविता को भी अपना दो प्यार

चलो लिखें कविता हिंदी
भारत माँ के माथे की बिंदी
ऊषा आये रोज जगाये
भाव नये नित मन उपजाये

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
December 22 at 2:20am · Edited ·

क्या अब भी ये उत्तराखंड तेरा है या मेरा है ?

१४ बरस बीते श्री राम भी घर को आ जाते हैं
कब आयेगी वो अमावस्या जब दिये वो घर घर जलते हैं
पूछ रहा हूँ अपनों से ही अपनों को ही मै बोल रहा
आंसूं बैठे दूर बहा ने से चल अपने घर फिर तू लौट आजा

उन शहीदों से जा पूछो जिसने खायी सीने पर गोली
ले नारा उत्तरखंड का जिनकी शहादत अब तक ना सोयी
उनके घरों में एक बार जरा जा कर तो देखो क्या हुआ
उनकी तस्वीर गीली है क्यों अब तक है वो माँ रो रही

क्या अब भी ये उत्तराखंड तेरा है या मेरा है ?
मैदान और पहाड़ों के बीच कैसी है मची तनातनी
एक बार जब मिले और लड़े थे एक लक्ष्य लेकर
फिर भी वो उदेश्य हमारा अब तक क्यों अधूरा है

अगर अब ना जागेगा तू सोया ये पहाड़ रह जायेगा
राजनीति के बीच भंवर तेरे प्यार फंसा सा रह जायेगा
देख फिर अपने भविष्य हाथों क्या सपने तू छोड़ जायेगा
भगोड़ा बंजारा रिक्त तेरा पहाड़ उत्तराखंड रह जायेगा

१४ बरस बीते श्री राम भी घर को आ जाते हैं
कब आयेगी वो अमावस्या जब दिये वो घर घर जलते हैं
पूछ रहा हूँ अपनों से ही अपनों को ही मै बोल रहा
आंसूं बैठे दूर बहा ने से चल अपने घर फिर तू लौट आजा

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
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अभी तो बहुत कुछ है

अभी तो बहुत कुछ है
करना हसिल मुझे ......२
जाने वो कैसा पथ होगा
जिस पे चलना है आखिर मुझे ......२
अभी तो बहुत कुछ है................

आशा निराशा में जंग ऐसी लगी हुयी
छाने ना पाये मन मेरे अंधेरा तुझे
उस उजाले को है पाना मुझे
प्रकाशित करना है हर छोर को
अभी तो बहुत कुछ है................

अगर मगर के इस खेल में
निकल ना जाये ये वक़्त तेरा मेरा
नूतन नया सवेरा सदा आता यंहा
शीघ्र कर गया वक़्त ना आएगा फिर यंहा
अभी तो बहुत कुछ है................

सांसों का क्या है भरोसा
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अभी तो बहुत कुछ है................

अभी तो बहुत कुछ है
करना हसिल मुझे ......२
जाने वो कैसा पथ होगा
जिस पे चलना है आखिर मुझे ......२
अभी तो बहुत कुछ है................

एक उत्तराखंडी

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