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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
December 29 ·
·

समय रथ का पहिया चलता चल

समय रथ का पहिया चलता चल
सुख दुःख सबके बीनता है बीनता चल
समय रथ का पहिया चलता चल

बहती गंगा की धार कहे निर्मल
आज तेरा ये पल ,पल में हो जायेगा कल
समय रथ का पहिया चलता चल

फिर भी कुछ ना माने ना कहे ये मन
उड़ चला ... २ तू किधर ये नील गगन
समय रथ का पहिया चलता चल

लिख दिया उसने तेरा आज और कल
बावला बन फिरता बन बन तू किस वन
समय रथ का पहिया चलता चल

समय रथ का पहिया चलता चल
सुख दुःख सबके बीनता है बीनता चल
समय रथ का पहिया चलता चल

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
December 26 at 12:08pm · Edited ·

इस उम्र में भी

इस उम्र में भी
दबे जज्बात उभरने ने लगे
देखकर आप को
हम क्यों जाने ऐसे मचलने लगे
इस उम्र में भी

सोये थे कहाँ क्या पता अब तक वो
दिल के किस कोने में उन्हें मार रखा था
आँखें लड़ी थी बीते बरसों लकड़पन में
उन आँखों की यादों को संभल रखा था
इस उम्र में भी

अहसास वो ही है ,वो पहला प्यार वो ही है
गिरी थी प्रेम की बारिश,वो बूंदों की बौछार वो ही है
मै भी तू भी वो ही है और ये समा भी वो ही है
उसी राह पर मोड़े थे कभी कदम हमने अब भी खड़े वहीँ है
इस उम्र में भी

कुछ ना रह जाता ये जाना हमने अब है
बूढी सांसें कह रही है तेरा इन्तजार अब है
रिश्तों के बंदिशों की वो बंधी लगाम हम पर अब भी है
इस उम्र में भी तेरे हिस्से का बचा रखा वो प्यार अब भी है
इस उम्र में भी

एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
Yesterday ·
·

बस और क्या है मेरे खुदा

बस और क्या है मेरे खुदा
एक है तू लेकिन यंहा टुकड़ों में मिला

पत्थर कंही तू कंही है मजार
मोम जला कंही कंही चढ़ा फूलों का हार

दो आँखें देखे तुझे तू दिखे एक सदा
मानने अगर जाऊं तो तू हो जाता है जुदा

कैसा ये रंग है हम पर चढ़ा
बिखरा पड़ा हुआ है सारा रंगमंच तेरा

बाँटा नहीं तेरा तूने कुछ भी यंहा
तेरा खुद का बनाया ही तुझे बांटता चला

सब कुछ तूने बनाया है ये सारा जंहा
बस इंसान बनकर तू भी अब पछतात होगा

बस और क्या है मेरे खुदा
एक है तू लेकिन यंहा टुकड़ों में मिला

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
January 3 at 9:30pm ·

*
****
ध्यानी प्रणाम
*****************************************************
हम हमको भूल गये फिर क्यों ? ज़माना हमे याद रखेगा
मीनार कितनी हो ऊँची ध्यानी नींव को कौन याद करेगा
बस अफसाना बन उड़ेंगे हवाओं में इधर उधर कूड़े जैसे
कोई तो उस कोड़े को बीनने वाला हमे भी तो कभी मिलेगा

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
January 2 · Edited ·
·

मै और मेरा पहाड़

तेरी आगोश में इस तरह दफना दो मुझको तुम
पत्थर और मुझ में जरा सा भी कोई फर्क ना रहे

बुरंस के रंग से खिली गलों पर वो लाली हो तेरी
साली की सदा मुख पे जीजा के लिये जैसे गाली हो

इस छेड़खानी में गुजार देना उम्र मेरा यूँ ही मौला
दुसरा जन्म अगर देना तो इस धरा का ही वो पानी हो

काफल की मिठास इस तरह तू घुला देना मन मेरे
जीवन के पन्नों में वंहा लिखी तेरी मेरी कहनी हो

कंडली की तरह काँटों भरी मुसीबत जो पड़े तन मेरे
साग उसी का खाके गरीब के दिनों में गुजर बसर हो

मेरा पहाड़ा वो मेरा सब कुछ मेरा जन्म मरण से
सादगी से भरा प्रेम की तरह गंगा में सबका तर्पण हो

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
December 31, 2014 at 11:14am ·

पहाड़ों की रानी फिर आ गयी तू तेरी याद

अब भी वो याद आती है
मेरे साथ साथ वो दिन रात रहती है
भूलने का बहाना करते करते
बहाने बहाने वो याद आती रहती है

अभी तो आयी थी अभी वो जा रही
जिसके आने की ख़ुशी आँखों ने मनाई
देख उस ख़ुशी ने भी तेरी याद दिलाई
पगली तेरे प्यार में वो आँसूं छलका गयी

पहाड़ों की रानी फिर आ गयी तू तेरी याद
अपने से ही मुझे फिर तू दूर कंही ले गयी
उन गुजरे पल वो कल बस तू पल पल बहे
बहती रही तू हवा बन तू मेरे अगल बगल

क्या प्रेम है तेरा या बस सपनों का खेल है
दिन रात सुबह शाम वो आठों प्रहर तू
मेरी मसूरी मेरे बचपन,जवानी और कुछ दिन
जुड़ गयी तेरी माटी मेरे सांसों में कण कण

अब भी वो याद आती है
मेरे साथ साथ वो दिन रात रहती है
भूलने का बहाना करते करते
बहाने बहाने वो याद आती रहती है

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
December 26, 2014 at 12:08pm · Edited ·

इस उम्र में भी

इस उम्र में भी
दबे जज्बात उभरने ने लगे
देखकर आप को
हम क्यों जाने ऐसे मचलने लगे
इस उम्र में भी

सोये थे कहाँ क्या पता अब तक वो
दिल के किस कोने में उन्हें मार रखा था
आँखें लड़ी थी बीते बरसों लकड़पन में
उन आँखों की यादों को संभल रखा था
इस उम्र में भी

अहसास वो ही है ,वो पहला प्यार वो ही है
गिरी थी प्रेम की बारिश,वो बूंदों की बौछार वो ही है
मै भी तू भी वो ही है और ये समा भी वो ही है
उसी राह पर मोड़े थे कभी कदम हमने अब भी खड़े वहीँ है
इस उम्र में भी

कुछ ना रह जाता ये जाना हमने अब है
बूढी सांसें कह रही है तेरा इन्तजार अब है
रिश्तों के बंदिशों की वो बंधी लगाम हम पर अब भी है
इस उम्र में भी तेरे हिस्से का बचा रखा वो प्यार अब भी है
इस उम्र में भी

एक उत्तराखंडी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
20 hrs ·

तुम्हरी सोच

तुम्हरी सोच जब यहीं पर टिकी है मै क्या करूँ ?
जब वो अपने और अपनों से ही घिरी है ,तो मै क्या करूँ ?
तुम्हरी सोच .......

एक घेरा वो फेरा बांध रखा है तूने अपने से कहीं
साफ़ नहीं है धुंधली है वो तेरी तस्वीर,तो मै क्या करूँ ?
तुम्हरी सोच .......

कदम बढाऊँ या रोक लूँ क्या अजीब सी कश्मकश है तेरी
एक आगे और एक पीछे छूट जा रहा है तेरा तो मै क्या करूँ ?
तुम्हरी सोच .......

फूलों की वो चाहत फिर काँटों से मै क्यों प्यारा करूँ ?
जिंदगी बन कांटा चुबा जा सीने हुआ जा नासूर, तो मै क्या करूँ ?
तुम्हरी सोच .......

स्वर्ग से ये सुंदर तेरी देवभूमि तू जन्मा जब ये धरती
फिर ऐ मुर्ख झोला लेकर तू कहाँ और किस ओर चला, तो मै क्या करूँ ?
तुम्हरी सोच .......

हँसना रोना सब किस्मत में लिखा है कौन बदल सकता है यंहा
फिर क्यों इस जग में तू जन्मा जब तू कुछ नहीं कर सकता है,तो मै क्या करूँ ?
तुम्हरी सोच .......

बातों पे अल्फ़ाज़ों के मरहम का वो टिका अगर मैं ना लगा सका
लिखा मेरा ऐ व्यर्थ है एक पग भी अगर मै ना मोड़ सका,तो मै क्या करूँ ?
तुम्हरी सोच .......

तुम्हरी सोच जब यहीं पर टिकी है मै क्या करूँ ?
जब वो अपने और अपनों से ही घिरी है ,तो मै क्या करूँ ?
तुम्हरी सोच .......

एक उत्तराखंडी

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January 6 ·
·

बस और क्या है मेरे खुदा

बस और क्या है मेरे खुदा
एक है तू लेकिन यंहा टुकड़ों में मिला

पत्थर कंही तू कंही है मजार
मोम जला कंही कंही चढ़ा फूलों का हार

दो आँखें देखे तुझे तू दिखे एक सदा
मानने अगर जाऊं तो तू हो जाता है जुदा

कैसा ये रंग है हम पर चढ़ा
बिखरा पड़ा हुआ है सारा रंगमंच तेरा

बाँटा नहीं तेरा तूने कुछ भी यंहा
तेरा खुद का बनाया ही तुझे बांटता चला

सब कुछ तूने बनाया है ये सारा जंहा
बस इंसान बनकर तू भी अब पछतात होगा

बस और क्या है मेरे खुदा
एक है तू लेकिन यंहा टुकड़ों में मिला

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लो चली ,आ रही है हवा

लो चली
आ रही है हवा
आज फिर मेरे गाँव से
याद आ रही ऐसे वो
नदी बन बह रही है
मेरे आँख से
लो चली
आ रही है हवा

उड़ रही है
ये धूल जैसे
चुभ रही है मेरे साँस
मेरे हर वो खाव्ब में
उस एक भूल की
कीमत चुका रहूँ
कल भी
और आज में
लो चली
आ रही है हवा

कभी वो खाव्ब थे
थे लगे वो मीठे मीठे से
अब सब वो ना सच है
ना जाने वो झूठे कैसे
और वो सारे खारे से हो गये
ज़िंदगी बादल बनी
धुप से सफेद साफ़
और धुंधले से हो गये
लो चली
आ रही है हवा

अब भी अटका हुआ हूँ
साँस के मै उस तार से
सिर्फ तारीखें बदलती रही
मौसम के इस मार से
वो खड़ा यंहा पर उदास है
झुरमुट अब चढ़ी हुई
रोशनी के सांवले अंधेरे में
दुबका कर डूबा सूरज
फिर वो आज है
लो चली
आ रही है हवा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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