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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
January 26 at 12:45pm · Edited ·

मेरे देश की वीरंगना

कामनी तू दामिनी तू
मेरे हिन्द की तू गामिनी तू

शारदे तू भारती तू
मेरे वीरों की तू आरती तू

काली तू चण्डी तू
माँ मेरी सप्त अखंडी तू

रानी लक्ष्मी तू जीजा माता तू
वीर सपूतों की जननी तू

हाथ में तिरंगा तेरे
दायें कंधे बांह में राईफल तेरे

चले कदम से कदम तेरे
दायें बायें हर पल संग तू

तिरंगा रहे सदा लहराता
बन दे अपने आँचल को पतंग तू

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
January 26 ·
·

ज़िन्दगी में

कामयाबी हो हासिल
ना जाने किस मायने में
रूठे अपने ,टूटे सपने
सब रहे अपने अपने से
ज़िन्दगी में

सब मंजिलें खोजने में
अपनी उम्र गुज़ार देते हैं
आता क्या हिस्से में
बस अफ़सोस जता देते है
ज़िन्दगी में

कमज़ोर आदमी है
कमज़ोर उसका सच
अधूरी रहती वो कहनी
अधूरा है उसका ये मंच
ज़िन्दगी में

ये कोई कहानी नहीं,
एक वो देखा सपना था
आधा है अब भी वो
अब भी वो अधूरा सा...

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
9 hrs ·

आ गये फिर याद

आ गये फिर याद
दिन वो लड़कपन के
गिरने लगी वही बरसात
उन यादों के उस समंदर से

आ गये फिर याद
दिन वो लड़कपन के

चिर यौवन ने पाठ पढ़ाया
सुंदरता ने अपने करीब ले जाकर
कली तब जा कर फूल बनी थी
जब भौरों ने उसे रिझाया

आ गये फिर याद
दिन वो लड़कपन के

मादकता ने रूप निखारा
मेला हुस्न का यूँ सजाकर
प्रेम ऊर्जा का संचार हुआ था
उन दो नयनों को तब मिलकर

आ गये फिर याद
दिन वो लड़कपन के

कुछ लिखा था हम ने मिलकर
प्रणय के उस कोरे कागज पर
शरमाई सकुचाई-सी खड़ी वो
अब भी इस बूढ़े मन के दरवाजे पर

आ गये फिर याद
दिन वो लड़कपन के

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
Yesterday at 6:18am ·

जब कभी भी

जब कभी भी मैंने पूछा अपने से ही
तुम ने ही बस मुझको तब आवाज दी थी
बजते रहे घुंघरू पैमाने ने वो चाह की थी
दो घूंट चढ़ते उतरते बस तुम्हरी याद रही

मैने तो दफना दिया था अपने को यंही
थोड़ी मिटटी रह गयी गीली मुझ में कंही
आ के तूने फिर उसमे फूल खिला डाला
जिंदा हूँ मै मुझ में ऐ महसूस करा डाला

थोड़ा झुंझलाया तुझ पर थोड़ी तो लड़खड़ाई
शरमा शरमा के बेशर्मी भी अब नजर आयी
हाथ और आँखों ने एक दूसरे से इशारे किये
जाम पे जाम और महफ़िल ने वाह वाह किये

अपना ना रहा ना रहा अब तो बेगाना भी
कैसे अग्न जली है खुद को ही जला डाला
रखा बन गया हूँ धुँआ तन मन कर डाला
हाये मधुशाला तूने क्या ये हसर कर डाला

जब कभी भी मैंने पूछा अपने से ही
तुम ने ही बस मुझको तब आवाज दी थी
बजते रहे घुंघरू पैमाने ने वो चाह की थी
दो घूंट चढ़ते उतरते बस तुम्हरी याद रही

एक उत्तराखंडी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
February 6 at 2:53am ·

वो हंसी मेरी

उस क्षण मै खुश था
क्यों की मेरा कोई अपना वो खुश था
ना जाने वो आँसूं कहाँ आज गुम थे
आज वो गम का समंदर भी सामा सुम था
उस क्षण मै खुश था

उड रही थी वो हंसी
ना जाने अब तक कहाँ वो फंसी थी
खिल खिला रही थी वो अपने से ही
अपनों के संग जो आज वो खुल के मिली थी
उस क्षण मै खुश था

कुछ बोल रही थी वो
या कुछ वो कहना या बताना चाहती थी
आज मुझे लगता है वो मुझे अपना बनाना चाहती थी
बड़े दिनों बाद वो खुलकर मुझे आजमाना चाहती थी
उस क्षण मै खुश था

मै मदहोश था ना किसी को कुछ होश था
वो हँसते मुस्कुराते मुझ से चली जा रही थी
भूल गया था मै जीने को वो मुझे जीना सीखा रही थी
मुझे वो बड़े दिनों बाद अपने आप से मिला रही थी
उस क्षण मै खुश था

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
February 6 at 12:45am ·

बात दिल की करूँ या मैं अब चुप रह हूँ

बात दिल की करूँ या अब मैं चुप रह हूँ
बहते आँसूं आँखों से ना पूछूँ उसे मै बहने दूँ
बात दिल की करूँ या मैं अब चुप रह हूँ

संगदिल ज़माना क्या उससे उम्मीद करूँ
किसे जाके सुनाऊँ मेरा फ़साना किस से मै बात करूँ
बात दिल की करूँ या मैं अब चुप रह हूँ

अपने से लगा हूँ मैं अपने से ही प्यार करूँ
जहाँ भी जाऊं धोखा है अब मै किस पे ऐतबार करूँ
बात दिल की करूँ या मैं अब चुप रह हूँ

दर्द का समंदर है वो किनार भी अब कहने लगा
कश्ती फांसी बीच मझधार में मेरी किस को आवाज दूँ
बात दिल की करूँ या मैं अब चुप रह हूँ

साँस भी अब बोझल हुयी है अब आने जाने से
दो दिन की अब तो ये मेहमान है वो इस गरीब खाने से
बात दिल की करूँ या मैं अब चुप रह हूँ

बात दिल की करूँ या अब मैं चुप रह हूँ
बहते आँसूं आँखों से ना पूछूँ उसे मै बहने दूँ
बात दिल की करूँ या मैं अब चुप रह हूँ

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
February 5 at 5:18am ·

एक वोट वो तेरा

अब देखो
उस नीति को
मिलाकर अब
इस नीति में
आज है वो बहुत
अपने से ही विचलित में
ढूंढ़ रही ना जाने
डुबाने वो
कौन सा क्षितिज
एक वोट वो तेरा

कमल खिला
हाथ उठा और आप बोला है
हर एक वो बड़बोला
जो राह में मिला
क्या खिलायेगा वो
क्या पिलायेगा वो
देखना कंही ना
वो फिर धोखा दे जायेगा
एक वोट वो तेरा

ग्राफ ऐसा चढ़ा
नशा और ऐसा बढ़ा
जीत भाई जीता भाई
अब तो हम तुम
पांच साल का मिला दम
निकाल देना इन का दम
हो जायेगा हर दफन
तेरा कौन सा है कफ़न
एक वोट वो तेरा

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
February 4 at 6:03am ·

चित्र में मैंने खोजा की जहाँ बस खाली नजर आया

कभी अपना लगता है कभी वो अब पराया लगता है
ये चार दिनों का मेला बस अब एक सपना लगता है
कभी एक दिन वो मेरा था एक दिन वो कभी तेरा था
बचे वो बाकी दो दिन बस अब यंहा व्यापार लगता है

प्रणाम
आप का अनुज
बालकृष्ण डी ध्यानी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
February 4 at 5:06am ·

मेरी आवाज

मेरी आवाज
आज मेरी परवाज बन जा
ले अक्षरों का सहरा
मेरे क़दमों के निशाँ बन जा
बस कहना इतना
किसी भूले पथिक का
मैं वो रास्ता बन जाऊं
बस दिल मेरा तू इतना चाहे
अपने पहड़ों पर
अपनों के कदम मोड़ सकूँ
मेरी आवाज
आज मेरी परवाज बन जा
ले अक्षरों का सहरा
मेरे क़दमों के निशाँ बन जा

बालकृष्ण डी. ध्यानी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
February 3 ·
·

नाकमियां कोशिशें बढ़ती हैं

नाकमियां कोशिशें बढ़ती हैं
लड़ लड़ के सांसे जीना सिखाती हैं
नाकमियां नाकमियां ......

पहाड़ों की नदियां सुनो लोरियाँ सुनाती हैं
अपने और अपनों का दर्द चुपचाप सहला जाती हैं
नाकमियां नाकमियां ......

परछाइयाँ हर पल साथ वो निभाती हैं
अँधेरे उजाले से कैसे निभाना बता जाती हैं
नाकमियां नाकमियां ......

मोम पिघलती है तन्हा अकेले रोती है
पतंगा सौ बार समा के लिये अपने को खो देता है
नाकमियां नाकमियां ......

एक अकेला दिल ना जाने कितनी बार धड़कता है
हर वो धड़कन ज़िंदा है ऐ अहसास दे जाती है
नाकमियां नाकमियां ......

बात लंबी ना हो तो उसे ज्याद खींचना अच्छा नहीं
थोड़े में जो अपने को सिमटले उससे सच्चा अब कोई नही
नाकमियां नाकमियां ......

कह जाती है वो आँखें बातें अब कई अनकही सी
लिखता रहता हूँ जो महसूस करता हूँ इस जमीं से
नाकमियां नाकमियां ......

आसमानों में उड़ता रहता हूँ मैं अपने ही ख्यालो में
हरदम मेरे वजूद को रखता हूँ मै अपने पायदानों में
नाकमियां नाकमियां ......

एक उत्तराखंडी

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