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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
January 7 at 12:13pm ·

तुम्हरी सोच

तुम्हरी सोच जब यहीं पर टिकी है मै क्या करूँ ?
जब वो अपने और अपनों से ही घिरी है ,तो मै क्या करूँ ?
तुम्हरी सोच .......

एक घेरा वो फेरा बांध रखा है तूने अपने से कहीं
साफ़ नहीं है धुंधली है वो तेरी तस्वीर,तो मै क्या करूँ ?
तुम्हरी सोच .......

कदम बढाऊँ या रोक लूँ क्या अजीब सी कश्मकश है तेरी
एक आगे और एक पीछे छूट जा रहा है तेरा तो मै क्या करूँ ?
तुम्हरी सोच .......

फूलों की वो चाहत फिर काँटों से मै क्यों प्यारा करूँ ?
जिंदगी बन कांटा चुबा जा सीने हुआ जा नासूर, तो मै क्या करूँ ?
तुम्हरी सोच .......

स्वर्ग से ये सुंदर तेरी देवभूमि तू जन्मा जब ये धरती
फिर ऐ मुर्ख झोला लेकर तू कहाँ और किस ओर चला, तो मै क्या करूँ ?
तुम्हरी सोच .......

हँसना रोना सब किस्मत में लिखा है कौन बदल सकता है यंहा
फिर क्यों इस जग में तू जन्मा जब तू कुछ नहीं कर सकता है,तो मै क्या करूँ ?
तुम्हरी सोच .......

बातों पे अल्फ़ाज़ों के मरहम का वो टिका अगर मैं ना लगा सका
लिखा मेरा ऐ व्यर्थ है एक पग भी अगर मै ना मोड़ सका,तो मै क्या करूँ ?
तुम्हरी सोच .......

तुम्हरी सोच जब यहीं पर टिकी है मै क्या करूँ ?
जब वो अपने और अपनों से ही घिरी है ,तो मै क्या करूँ ?
तुम्हरी सोच .......

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
January 6 ·
·

बस और क्या है मेरे खुदा

बस और क्या है मेरे खुदा
एक है तू लेकिन यंहा टुकड़ों में मिला

पत्थर कंही तू कंही है मजार
मोम जला कंही कंही चढ़ा फूलों का हार

दो आँखें देखे तुझे तू दिखे एक सदा
मानने अगर जाऊं तो तू हो जाता है जुदा

कैसा ये रंग है हम पर चढ़ा
बिखरा पड़ा हुआ है सारा रंगमंच तेरा

बाँटा नहीं तेरा तूने कुछ भी यंहा
तेरा खुद का बनाया ही तुझे बांटता चला

सब कुछ तूने बनाया है ये सारा जंहा
बस इंसान बनकर तू भी अब पछतात होगा

बस और क्या है मेरे खुदा
एक है तू लेकिन यंहा टुकड़ों में मिला

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
January 2 · Edited ·
·

मै और मेरा पहाड़

तेरी आगोश में इस तरह दफना दो मुझको तुम
पत्थर और मुझ में जरा सा भी कोई फर्क ना रहे

बुरंस के रंग से खिली गलों पर वो लाली हो तेरी
साली की सदा मुख पे जीजा के लिये जैसे गाली हो

इस छेड़खानी में गुजार देना उम्र मेरा यूँ ही मौला
दुसरा जन्म अगर देना तो इस धरा का ही वो पानी हो

काफल की मिठास इस तरह तू घुला देना मन मेरे
जीवन के पन्नों में वंहा लिखी तेरी मेरी कहनी हो

कंडली की तरह काँटों भरी मुसीबत जो पड़े तन मेरे
साग उसी का खाके गरीब के दिनों में गुजर बसर हो

मेरा पहाड़ा वो मेरा सब कुछ मेरा जन्म मरण से
सादगी से भरा प्रेम की तरह गंगा में सबका तर्पण हो

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
Yesterday ·
·

अब भी

एक बूंद गिरी गर्जना से
उथल पुथल धरती कर गयी
हाय अब क्या होगा इस कल्पना से
मन मेरा मुझसे और भयभीत हुआ

क्या बीता था पिछले साल
आँखों में वो तस्वीर अब भी ज़िंदा है
कुरेदता रहता है अक्सर वो मुझे
बांते अब भी वो मुझसे करता है
एक बूंद गिरी गर्जना से
उथल पुथल धरती हुयी..............

अंकांशाओं से घिर है मन
अकेला है इस कारण डरा है मन
विध्वंस का वो देखा खुला तांडव नाच
विचलित कर देता है मझको अब भी वो आज
एक बूंद गिरी गर्जना से
उथल पुथल धरती कर गयी ............

हर तरफ छाया यंह डर का राज
पहड़ों पर फैला उसका काला सम्राज्य
तत्र सर्वत्र नाश भेद जैसे ध्वनि बजी
कलियुग समाप्ति की अवधि अब है सीमित
एक बूंद गिरी गर्जना से
उथल पुथल धरती कर गयी ..............

बालकृष्ण डी ध्यानी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
January 9 ·
·

लो चली ,आ रही है हवा

लो चली
आ रही है हवा
आज फिर मेरे गाँव से
याद आ रही ऐसे वो
नदी बन बह रही है
मेरे आँख से
लो चली
आ रही है हवा

उड़ रही है
ये धूल जैसे
चुभ रही है मेरे साँस
मेरे हर वो खाव्ब में
उस एक भूल की
कीमत चुका रहूँ
कल भी
और आज में
लो चली
आ रही है हवा

कभी वो खाव्ब थे
थे लगे वो मीठे मीठे से
अब सब वो ना सच है
ना जाने वो झूठे कैसे
और वो सारे खारे से हो गये
ज़िंदगी बादल बनी
धुप से सफेद साफ़
और धुंधले से हो गये
लो चली
आ रही है हवा

अब भी अटका हुआ हूँ
साँस के मै उस तार से
सिर्फ तारीखें बदलती रही
मौसम के इस मार से
वो खड़ा यंहा पर उदास है
झुरमुट अब चढ़ी हुई
रोशनी के सांवले अंधेरे में
दुबका कर डूबा सूरज
फिर वो आज है
लो चली
आ रही है हवा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
January 7 at 12:13pm ·

तुम्हरी सोच

तुम्हरी सोच जब यहीं पर टिकी है मै क्या करूँ ?
जब वो अपने और अपनों से ही घिरी है ,तो मै क्या करूँ ?
तुम्हरी सोच .......

एक घेरा वो फेरा बांध रखा है तूने अपने से कहीं
साफ़ नहीं है धुंधली है वो तेरी तस्वीर,तो मै क्या करूँ ?
तुम्हरी सोच .......

कदम बढाऊँ या रोक लूँ क्या अजीब सी कश्मकश है तेरी
एक आगे और एक पीछे छूट जा रहा है तेरा तो मै क्या करूँ ?
तुम्हरी सोच .......

फूलों की वो चाहत फिर काँटों से मै क्यों प्यारा करूँ ?
जिंदगी बन कांटा चुबा जा सीने हुआ जा नासूर, तो मै क्या करूँ ?
तुम्हरी सोच .......

स्वर्ग से ये सुंदर तेरी देवभूमि तू जन्मा जब ये धरती
फिर ऐ मुर्ख झोला लेकर तू कहाँ और किस ओर चला, तो मै क्या करूँ ?
तुम्हरी सोच .......

हँसना रोना सब किस्मत में लिखा है कौन बदल सकता है यंहा
फिर क्यों इस जग में तू जन्मा जब तू कुछ नहीं कर सकता है,तो मै क्या करूँ ?
तुम्हरी सोच .......

बातों पे अल्फ़ाज़ों के मरहम का वो टिका अगर मैं ना लगा सका
लिखा मेरा ऐ व्यर्थ है एक पग भी अगर मै ना मोड़ सका,तो मै क्या करूँ ?
तुम्हरी सोच .......

तुम्हरी सोच जब यहीं पर टिकी है मै क्या करूँ ?
जब वो अपने और अपनों से ही घिरी है ,तो मै क्या करूँ ?
तुम्हरी सोच .......

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बालकृष्ण डी ध्यानी
20 hrs · Edited ·

आज मेरी शादी कि साल गिराह है और आप सबको सुप्रभात, सपरिवार मकर संक्रांति की हार्दिक शुभ कामनायें,.... तेरा साथ

कुछ ऐसा है

एक धागा एक मोती
वो बत्ती वो उसकी ज्योति
कुछ ऐसा है
रिश्ता तेरा मेरा वो सरिता
कुछ ऐसा है

जब से मिली है तू
साँसे चली है मेरी
सुबह शाम है तू ही
वो रात भी हो तुम
बिन तेरे कंही काम नही
मेरा आराम भी हो तुम
कुछ ऐसा है
रिश्ता तेरा मेरा वो सरिता
कुछ ऐसा है

बातें में बातें तेरी
मेरे सांसों में साँसे तेरी
कहाँ कहाँ लिखा तेरा नाम
मेरे नाम के साथ तू ही
आँखें बंद हो या हो खुली
यूँ ही हरपल तू रहे मुझ से जुड़ी
कुछ ऐसा है
रिश्ता तेरा मेरा वो सरिता
कुछ ऐसा है

मैं पहाड़ा हूँ कब से खड़ा
तू है मेरी बलखाती नदी
यूँ ही बह कर संग मेरे तू
वो री अल्हड़ मेरी संगनी
सात जन्मों का साथ तेरे मेरे
हर जन्म में और सात बड़ा
कुछ ऐसा है
रिश्ता तेरा मेरा वो सरिता
कुछ ऐसा है

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
January 12 ·
·

ऐ मोहब्बत

ऐ मोहब्बत तू जरा रोक जा
बैठ पास मेरे तू ,यूँ ना तू उठ के चली जा

जन्नतों से चलकर आ रही है तू
थक गयी होगी आ थोड़ा सुस्ता ले पास मेरे बैठ जा

आँखों ने पड़ी आँखों में वो लिखी भाषा है तू
कोई ना लिख पाये तुझ पर अब तक कैसी अधूरी है तू

जितना तुझ से दूर जाये उतनी याद आती है तू
कहना अगर चाहूँ समीप आते ही तू वो सोच बिखर जाती है क्यों

कोई ना जान पाया कैसे तू आती है इस दिल मे कहां
घर कर जाती है तुम अनजाने में ही क्या ये तुम्हे पता

आ गयी है तू आ सात घोड़ों के आसमानी रंग संग आ
आ साथ मेरे बैठ मै भी तुझे छू लूं जरा

ऐ मोहब्बत तू जरा रोक जा
बैठ पास मेरे तू ,यूँ ना तू उठ के चली जा

एक उत्तराखंडी

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January 11 · Edited ·
·

अब भी

एक बूंद गिरी गर्जना से
उथल पुथल धरती कर गयी
हाय अब क्या होगा इस कल्पना से
मन मेरा मुझसे और भयभीत हुआ

क्या बीता था पिछले साल
आँखों में वो तस्वीर अब भी ज़िंदा है
कुरेदता रहता है अक्सर वो मुझे
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बालकृष्ण डी ध्यानी
January 9 ·
·

लो चली ,आ रही है हवा

लो चली
आ रही है हवा
आज फिर मेरे गाँव से
याद आ रही ऐसे वो
नदी बन बह रही है
मेरे आँख से
लो चली
आ रही है हवा

उड़ रही है
ये धूल जैसे
चुभ रही है मेरे साँस
मेरे हर वो खाव्ब में
उस एक भूल की
कीमत चुका रहूँ
कल भी
और आज में
लो चली
आ रही है हवा

कभी वो खाव्ब थे
थे लगे वो मीठे मीठे से
अब सब वो ना सच है
ना जाने वो झूठे कैसे
और वो सारे खारे से हो गये
ज़िंदगी बादल बनी
धुप से सफेद साफ़
और धुंधले से हो गये
लो चली
आ रही है हवा

अब भी अटका हुआ हूँ
साँस के मै उस तार से
सिर्फ तारीखें बदलती रही
मौसम के इस मार से
वो खड़ा यंहा पर उदास है
झुरमुट अब चढ़ी हुई
रोशनी के सांवले अंधेरे में
दुबका कर डूबा सूरज
फिर वो आज है
लो चली
आ रही है हवा

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