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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

धुआँ ज़िंदगी का

यंह वंहा जंह फैला है धुआँ....२
उड़ रहा कंही कंही बैठा है दिल मे बस है धुआँ
यंह वंहा जंह फैला है धुआँ....२

रह नही सकते  उसके बिन अब उसके बिन
चारों तरफ से घिरा है वो बन मेरी वफ़ा 
अकेला है तू  साथ है वो 
भीड़ मे भी वो पास है   

यंह वंहा जंह फैला है धुआँ....२
उड़ रहा कंही कंही बैठा है दिल मे बस है धुआँ
यंह वंहा जंह फैला है धुआँ....२

अँधेरा अंदर अब पास है धुआँ फिर भी साथ है 
उजालों का कश कहता गला झूलसा देता 
जो भी पास है उसमे भी वो आज है
चैन ना मिले ना मिले वो जब तक ना उड़े वो धुआँ

यंह वंहा जंह फैला है धुआँ....२
उड़ रहा कंही कंही बैठा है दिल मे बस है धुआँ
यंह वंहा जंह फैला है धुआँ....२

फ़िक्र है उसी की नकल  भी है उसी की 
देख सबके सब लगे आज है यंहा धुआँ उड़ता कँहा कँहा
बेकरा बनाने को सब वो धुआँ
निगल जाये सबको एक दिन उड़ता रहेगा बस अब यंह धुआँ

यंह वंहा जंह फैला है धुआँ....२
उड़ रहा कंही कंही बैठा है दिल मे बस है धुआँ
यंह वंहा जंह फैला है धुआँ....२

धुआँ का ही खेल धुआँ से ही मेल है
ज़िंदगी धुआँ कर रहा बस जलता हुआ सिगरेट है
हाथों पर दबा ओंठो पर सुलगा मचल रहा
जिस्म के कोने कोने तक पहुंचा बस धुआँ

यंह वंहा जंह फैला है धुआँ....२
उड़ रहा कंही कंही बैठा है दिल मे बस है धुआँ
यंह वंहा जंह फैला है धुआँ....२

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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मै पूर्व प्रकाशीत हैं -सर्वाधिकार सुरक्षीत

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

फिरदा ही रैग्युं

फिरदा फिरदा ही रैग्युं ओं
फिरदा फिरदा ही रैग्युं ..२
क्ख्क भी नी लग्युं क्ख्क भी जी मेरु
फिरदा फिरदा ही रैग्युं ...२

कुछ ना पाई मिल कुछ भी आपरा बाण
मी भीतर भैर करदा ही रैग्युं ओं
फिरदा फिरदा ही रैग्युं ..२

ना हो सको जी को ना मात्रभूमी को
जिकोडी रेघ मा अलजद ही रैग्युं ओं
फिरदा फिरदा ही रैग्युं ..२

ना नकद ना उधार चल गै पल्या पर
अपरो परयो को मोल चुकद ही रैग्यु जी
फिरदा फिरदा ही रैग्युं ..२

ना रै मेर पास ना तेर पास कुछ भी
सब लुटगै अब भी और तब भी सरण लग्युं रों
फिरदा फिरदा ही रैग्युं ..२

फिरदा फिरदा ही रैग्युं ओं
फिरदा फिरदा ही रैग्युं ..२
क्ख्क भी नी लग्युं क्ख्क भी जी मेरु
फिरदा फिरदा ही रैग्युं ...२

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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गुमनाम मै
काश ! कभी याद आ जाऊँ?

यूँ ही गुमनाम मै रह जाऊँगा
रह रहकर अक्षरों में कंही गुन गुनाऊँगा

लिखे जो लेख गजल गीत मैंने
वो ही आप के लिये छोड़ा जाऊँगा

कभी हसाऊँगा कभी रुलाऊँगा
बीते पल में किसी दिन छुट मै जाऊँगा

दो घड़ी याद भी मै आ जाऊं कभी
पहलों के पलो में तेरी यूँ बंध जाऊँगा

जुदा ही हूँ मै तुझसे यूँ ही अब तक
फिर भी तेरे पास ही सदा पाया जाऊँगा

धुल खा रही होगी मेरी लिखी किताब
कभी तू आके कोई छंटेगा मेरा वो हिजाब

तब जाकर मै अपना मक़ाम पाऊँगी
फिर खिल के कली सी मै गुन गुनाऊँगी

यूँ ही गुमनाम रह जाऊँगा
रह रहकर अक्षरों में कंही गुन गुनाऊँगा

गुमनाम मै
काश ! कभी याद आ जाऊँ?

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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मै हकीकत हूँ

मै झूठ भी हूँ मै सत्य भी
मै राग भी मै द्वेष भी
मै आज भी मै अब भी और मै कल भी
मै सर्वत्र विदयामान हूँ
मै हकीकत हूँ

चरा चर मै फ़ैली है
मेरी ही अनुकम्पा विख्यात
अखंड मेरी भूमी अखंड है आकाश
कल कल जल निरंतर मै बहता
मै हकीकत हूँ

विहंगों के उमंग में
फूलों के सुगंध रंग में
पडी मेरी छाया
फ़ैल जहाँ तक उजाला
मै हकीकत हूँ

मिथ्या लुपित दो पल
सच संग मै हूँ हर पल
मेरे उजागर हर कोना
मुझको ना तुम खोना
मै हकीकत हूँ

मै पहचान तेरी
मै तेरा मान सन्मान
मै ही हूँ तेर बाद भी
मै ही सदा तेरे साथ ही
मै हकीकत हूँ

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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मै पूर्व प्रकाशीत हैं -सर्वाधिकार सुरक्षीत — with Soniya Dhyani and 48 others. Photo: मै हकीकत हूँ मै झूठ भी हूँ मै सत्य भी मै राग भी मै द्वेष भी मै आज भी मै अब भी और मै कल भी मै सर्वत्र विदयामान हूँ मै हकीकत हूँ चरा चर मै फ़ैली है मेरी ही अनुकम्पा विख्यात अखंड मेरी भूमी अखंड है आकाश कल कल जल निरंतर मै बहता मै हकीकत हूँ विहंगों के उमंग में फूलों के सुगंध रंग में पडी मेरी छाया फ़ैल जहाँ तक उजाला मै हकीकत हूँ मिथ्या लुपित दो पल सच संग मै हूँ हर पल मेरे उजागर हर कोना मुझको ना तुम खोना मै हकीकत हूँ मै पहचान तेरी मै तेरा मान सन्मान मै ही हूँ तेर बाद भी मै ही सदा तेरे साथ ही मै हकीकत हूँ एक उत्तराखंडी बालकृष्ण डी ध्यानी देवभूमि बद्री-केदारनाथ मेरा ब्लोग्स http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com मै पूर्व प्रकाशीत हैं -सर्वाधिकार सुरक्षीत1Like ·  · Share

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

हे स्वार्थ की फेरी

अपरा अपरा मा लग्या सब
दुसरा का बार मा कू सुच दू यख
सोच दो त सोच्दु भुल्हा कोई यख
कुछ ना कुछ तब दडयूँ व्हालो वख

हे स्वार्थ की फेरी 
अलग ही तेर क्यारी देखे हैरी भैरी - भैरी
आत उकालो सी खैरी बस गैरी - गैरी
हे स्वार्थ की फेरी 

सब बोल्दा बोल्दा ही रैहन्दा
चरखा बगत को चलद ही रैंदा
उपरी माया का सुख मेरा भुल्हा
जिकोडी पडी दुःख को गैन ऐ कैल ने गिनना

हे स्वार्थ तेरु ना जी ना परण
उड़ादू रैंदू पंख पसैरीकी 
तेरु को ना सीमा ना सीमा ज्ञान
हे स्वार्थ तेरु ना जी ना परण

देख की भी अनदेखी कैर कै भी
तिल तेर भग्या लेखा से ज्याद नी पाई
फिर किले कै तिल सीखेसैरी
जाम आज नी क्दगा पैल च्या मौरी

अपरा अपरा मा लग्या सब
दुसरा का बार मा कू सुच दू यख
सोच दो त सोच्दु भुल्हा कोई यख
कुछ ना कुछ तब दडयूँ व्हालो वख

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

चल अपरू गढ़देश जोंला 

हे रै भुल्ला कंन लगनु 
तै थै मयारू गढ़देश..२ 
हे सच्च बता कुछा ना छुपा 
कंन  लगनु मयारू मायदेश   
हे भुल्ला मेर भुल्हा तू 
कंन लगनु मयारू गढ़देश  ............

हे दीदा क्या बुलाणु तै थै   
सच बोललू लागु तै थै दिल मा ठेस 
हैर दी बौजी आंखी पूछ दी मी थै 
किले गै तेरु दीदा छोडीकी ऐ देश 
हे भुल्ला मेर भुल्हा तू 
कंन लगनु मयारू गढ़देश  ............

हे रै भुल्ला कुछ ना लुका 
आपरी आंखी मा तिल क्या छुपा 
आपरी जिकोडी मा ना कोई भेद छुपा 
ब्याकुल च मन मयारू  कंन  व्हालो मयारू देश
हे भुल्ला मेर भुल्हा तू 
कंन लगनु मयारू गढ़देश  ............

अन्ख्युं छुपा दणमण आंसूं दीदा 
भेद जिकोडी मा लगी एक रेघा
जन का तन च गढ़ देश अपरू 
जन जब छोडीकी गै तू विदेशा 
हे भुल्ला मेर भुल्हा तू 
कंन लगनु मयारू गढ़देश  ............

हे रै भुल्ला मी समझी  गयुं जिकोडी पीड़ा अलजी गयुं   
ना लगा ना लगा  और गढ़देशा की व्यथा   
मै सै ही सब उपजयो विपदा कू काथा 
कंण  प्रगती कारलो मेरु गढ़ देश 
जब हम थै सब बस्याँ यख परदेश   

हे रै भुल्हा चल जोंला  उठा  दगडा दगडी 
चल जोंला आपरू गढ़देश अपरू मायदेश
दोई रोटा कम खोंला मेहनत ज्याद  करोंला 
गढ़देश थै आपरा सरग बनोला 
चल रै भुलाह चला दगडी जोंला चल राइ दीदा 
अपरू गढ़देश अपरू  मायदेश 

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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जब लगी मुझ को

दिल तो  कच्चा है जी
छोटा सा बच्चा है जी
जब लगी मुझ को  ............

सच्चा कहा एक दिन
लगे बून ने वो धागे छुटे छुटे से बीन
जब लगी मुझ को  ............

एक निकर एक पैजामे से छुटे से
भाग रहा वो बचकर अपने से
जब लगी मुझ को  ............

फंस रहा था बेगने में
क्या करता अब गुसल खाने में
जब लगी मुझ को  ............

बेतुक बेबक नजर निहार रही
अजीबो गरीब बाहार आ रही
जब लगी मुझ को  ............

नाक के केश झुलस से गये
धरती कितने बम अब गिर से गये
जब लगी मुझ को  ............

टुकडा था ताड़ बेजार हुआ
फेफड़ों का कपंन धाड़ पर सवार हुआ
जब लगी मुझ को  ............

पेट कब्ज की लहर छायी
नब्ज धमनी धीरे  नजर आ रही अब
जब लगी मुझ को  ............

सुगंध बेस्वाद कर गयी
दिल के बच्चे  बेकरार कर गयी 
जब लगी मुझ को  ............

दिल तो  कच्चा है जी
छोटा सा बच्चा है जी
जब लगी थी मुझ को  ............

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

अब ऐजा दीदा

देर सबैर व्है जाली
पर सबैर हूँन चैन्द दीदा
रात नी व्हैल त नी व्हैल
पर सबैर हूँन चैन्द दीदा

गढ़ देश म्यार माया देशा मा रै दीदा
सुण ले ऐ दीदा रै ध्यानी मणी
पर सबैर हूँन चैन्द दीदा

उजाडो पड़ायूँ पहाड़ा ऐ डंडा ऐ कंठ
हरयालू को बाटा ऐ जोणों रै दीदा
कुछ ना कुछ तै यूँ थै हरयालू दै जा
डंडा कंठी का गीत फिर कु लागेला जो खो जाला रै दीदा

गढ़ देश म्यार माया देशा मा रै दीदा
सुण ले ऐ दीदा रै ध्यानी मणी
पर सबैर हूँन चैन्द दीदा

देखा कूड़ा गों चौक कख्क गै यूँ थै झोंक
अपरी अपरी मा लगी तू क्या तिल पै क्या खोवै रै दीदा
अब भी कोई बाट हेरणु जी जयुकेरणु
वो आँखों का आंसू थै रै दीदा थामे आ

गढ़ देश म्यार माया देशा मा रै दीदा
सुण ले ऐ दीदा रै ध्यानी मणी
पर सबैर हूँन चैन्द दीदा


पुंगडा वो बलीयुला झूम दी सारी
वो गद्नी वो घस्यरी गीतों गूंज दी घाटी रै दीदा
वो तेरु बलदा गोउडा बकरा बंसरी की धुन लगे बौडी आ
तै देश बुलाणु अपरू हर एक बुलाणु ऐजा ईजा खतिर अब ऐजा

गढ़ देश म्यार माया देशा मा रै दीदा
सुण ले ऐ दीदा रै ध्यानी मणी
पर सबैर हूँन चैन्द दीदा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

तुम भी कवी हो

हाँ मै भी कवी हूँ
मै भी कविता लिख सकता हूँ
दो शब्द को जोड़कर
अलंकारों का रुख मोड़ सकता हूँ
हाँ मै भी कवी हूँ

कभी निर्मल बहकर
कभी अति वेग साथ
धाराओं को ओढ़ सकता हूँ
जटा में धर धरा पर छोड़ सकता हूँ
हाँ मै भी कवी हूँ

कविता उन्मुक्त है
स्वछंद है आपने विचारों से
कलम से उसे सींच सकता हूँ
शांती उमंग व्यंग दुःख में भी जी सकता हूँ
हाँ मै भी कवी हूँ

यूँ ही चिला चला जा रहा था वो
एका एक मैंने रोका और पुछा लिया
क्या बात है क्यों हो उदास
उसने कहा कोई नही कहता की कवी हूँ मै आज
हाँ मै भी कवी हूँ

मैंने कहा क्या है तुम्हरे पास
उसने कहा है कल्पनाओं का साथ
झट मैंने कहा तुम भी तो कवी हो मेरे यार
अपनी कल्पना को पन्नों पर उभारो ना करो देर
मै कहता हूँ तुम भी कवी हो आज

एक उत्तराखंडी

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

तू व्यर्थ ही

सोना ना चांदी
से ना कोइ और मोल लगाये
किस मोह में पड़ा तू राही
तू व्यर्थ ही शोर लगाये

बसना दो पल यंहा
मिलना फिर कल कंहा
वो ना आया ना आयेगा
ऐ वक्त यूँ चला जायेगा
तू व्यर्थ ही शोर लगाये

सज रहा क्यों आज
निकली किसकी बारात
सैर फूलों से सजा माथा
भाग में छुपा क्या विधाता
तू व्यर्थ ही शोर लगाये

फुर बैठ फुर उड़ जायेगा 
हथेली रेखा बीच क्या पायेगा
मिटने वाला मिट जायेगा
मिट्टी में ही सकूंन आयेगा
तू व्यर्थ ही शोर लगाये

जीले दो घड़ी
साँस बची थोड़ी सही
दो पल चिंता में चला जायेगा
बाद चिता में जल जायेगा
तू व्यर्थ ही शोर लगाये

सोना ना चांदी
से ना कोइ और मोल लगाये
किस मोह में पड़ा तू राही
तू व्यर्थ ही शोर लगाये

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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