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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बग्वाल

प्राचीन काल से चली आ रही यहाँ की एक स्थापित परंपरा के अनुसार माँ वाराही धाम में श्रावणी पूर्णिमा (रक्षाबंधन के दिन) को यहाँ के स्थानीय लोग चार दलों में विभाजित होकर (जिन्हे खाम कहा जाता है, क्रमशः चम्याल खाम, बालिक खाम, लमगडिया खाम,
और गडहवाल,) दो समूहों में बंट जाते हैं और इसके बाद होता है एक युद्ध जो पत्थरों को अस्त्र के रूप में उपयोग करते हुये खेला जाता है।

बग्वाल दिवस

इस पत्थरमार युद्ध को स्थानीय भाषा में 'बग्वाल' कहा जाता है। यह बग्वाल कुमाऊँ की संस्कृति का अभिन्न अंग है। श्रावण मास में पूरे पखवाड़े तक यहाँ मेला लगता है। जहाँ सबके लिये यह दिन रक्षाबंधन का दिन होता है वहीं देवीधुरा के लिये यह दिन पत्थर-युद्ध अर्थात 'बग्वाल का दिवस' होता है। बढती व्यवसायिकता ने कुमाऊँ की संस्कृति की इस प्रमुख परंपरा ने अपनी चपेट में ले लिया है जिसका जीता जागता उदाहरण मुख्य बग्वाल स्थल (पत्थर मार युद्ध स्थल) के ठीक बीचों बीच लगा एक होर्डिग है जिसे लगाया तो गया है, देवीधुरा मेले में आने वाले दर्शनार्थियों के स्वागत पट के रूप मे परन्तु इस होर्डिग पर प्रायोजकों के विज्ञापन के साथ यह स्वागत संदेश छोटे छोटे शब्दों में ठीक उसी तरह लिखा हुआ प्रतीत होता है जैसा सिगरेट की डिब्बियों पर लिखा हुआ चेतावनी संदेश।

देवीधुरा मेला

मेला कब और कहाँ
श्रावण मास की पूर्णिमा को हज़ारों श्रद्धालुओं को आकर्षित करने वाला पौराणिक धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थल देवीधुरा अपने अनूठे तरह के पाषाण युद्ध के लिये पूरे भारत प्रसिद्ध है। श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन जहाँ समूचे भारतवर्ष में रक्षाबंधन के रूप में पूरे हर्षोल्लास के साथ बहनों का अपने अपने भाई के प्रति स्नेह के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है वहीं हमारे देश में एक स्थान ऐसा भी है जहाँ इस दिन सभी बहनें अपने अपने भाइयों को युद्ध के लिये तैयार कर, युद्ध के अस्त्र के रूप में उपयोग होने वाले पत्थरों से सुसज्जित कर विदा करती हैं। यह स्थान है उत्तराखण्ड राज्य का सिद्धपीठ माँ वाराही का देवीधुरा स्थल।


उत्तराखण्ड राज्य में प्रवेश करने के लिये तराई क्षेत्र में स्थित अनेक प्रवेश द्धारों मे से एक टनकपुर से आगे बढने के साथ ही जहाँ आपको ठेठ पर्वतीय संस्कृति के दर्शन मिलने लगते हैं, वहीं प्राकृतिक दृश्यों की मनमोहनी छटा भी देखने को मिलती है। टनकपुर से प्रसिद्ध सीमान्त जनपद पिथौरागढ़ जाने के लिये राष्ट्रीय मार्ग एन. एच. 09 पर लगभग 80 किलोमीटर दूर स्थित है कस्बा लोहाघाट। लोहाघाट से साठ किलोमीटर दूर स्थित है शक्तिपीठ माँ वाराही का मंदिर जिसे देवीधुरा के नाम से जाना जाता हैं। समुद्रतल से लगभग 1850 मीटर (लगभग पाँच हजार फीट) की उँचाई पर स्थित है।[1]

इतिहास



मंदिर परिसर में रखीं बग्वाल (पत्थर मार युद्ध) में बचाव के उपयोग में लायी जाने वाली ढालें
ऐसी मान्यता है कि सृष्टि के पूर्व सम्पूर्ण पृथ्वी जलमग्न थी तब प्रजापति ने वाराह बनकर उसका दाँतो से उद्धार किया उस स्थिति में अब दृष्यमान भूमाता दंताग्र भाग में समाविष्ट अंगुष्ट प्रादेश मात्र परिमित थी। ''ओ पृथ्वी! तुम क्यों छिप रही हो?'' ऐसा कहकर इसके पतिरूप मही वाराह ने उसे जल मे मघ्य से अपने दन्ताग्र भाग में उपर उठा लिया। यही सृष्टि माँ वाराही हैं। देवीधुरा में सिद्धपीठ माँ वाराही के मंदिर परिसर के आस पास भी पर्यटकीय दृष्टि से महत्वपूर्ण अन्य स्थलों में खोलीगाँड, दुर्वाचौड, गुफ़ा के अंदर बाराही शक्ति पीठ का दर्शन, परिसर में ही स्थित संस्कृत महाविद्यालय परिसर, शंखचक्र घंटाधर गुफ़ा, भीमशिला और गवौरी प्रवेश द्वार आदि प्रमुख हैं।


विशेषता

धार्मिक आस्था के साथ ही इस स्थल से लगभग 300 कि.मी. लम्बी हिम श्रंखलाओं के भव्य दृश्य का आनंद लिया जा सकता है।


विभिन्न गांवों में राज दीपावली अर्थात राज बग्वाल धनतेरस की रात्रि को धूमधाम से मनाई गई। इस मौके पर लोगों ने पारंपरिक पकवानों का स्वाद चखा और ढोल-नगाड़ों की थाप पर रातभर नाचते रहे। इतना ही नही लोगों ने जमकर भैले भी खेले।

राजबग्वाल को चम्बा के नजदीकी गांव मखल्वाणू गांव के कुंवर परिवार के लोगों ने राज बग्वाल को पारंपरिक, लेकिन धूमधाम से मनाया। तो वहीं दूसरी कुजणी के रामपुर गांव में रौतेला और सेलूर, डोभालगांव आदि कई गांवों में कभी राज परिवार के दीवान रहे डोभाल परिवार के लोगों ने राज बग्वाल अपने-अपने तरीके से मनाया। मखल्वाणू गांव में कुंवर परिवारों ने राज बग्वाल के मौके पर क ई प्रकार के पारंपरिक पकवानों का स्वाद लेकर और भैले खेलकर राज बग्वाल मनाई। इस मौके पर उन्होंने आस-पास के दूसरे समुदाय को लोगों को भी भोज दिया। यहां के लोगों ने डीजे को दरकिनार कर पारंपरिक वाद्य यंत्र ढोल और दमाऊ का प्रयोग किया और रातभर ढोल की थाप पर नाचते रहे। ग्राम प्रधान भगवान सिंह कुंवर ने बताया कि वे राजपरिवार का होने के कारण पहले से ही राज बग्वाल धूमधाम से मनाते है। इसमें दूसरे लोगों को भी आमत्रिंत किया जाता है। विदित हो कि राज बग्वाल राजपरिवार के अलावा डोभाल और कुंवर व रौतेला लोग मनाते है। डोभाल लोगों को राजपरिवार ने राज बग्वाल मनाने का अधिकार दिया था तो वहीं दूसरी ओर कुंवर और रौतेला लोग अपने को राज परिवार के वंशज बताते हैं और उसी आधार पर राज बग्वाल को धनतेरस की रात्रि को मनाते हैं

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कुछ

कुछ इस तरहं
तेरे बातों मै एक बात और लगा दूँ
शाम का आँचल
आज तुझको मै उड़ा दूँ
रात की चांदनी में
चाँद को तेरा चेहरा दिखा दूँ
कुछ इस तरहं
तेरे बातों मै एक बात और लगा दूँ
अब जाने दू दोस्तों मुझको
आलम मदहोशी का छाया है आज
रात को सपने से मुलकात करा दूँ
एक बार रोक जाओ
दिल में दबी एक बात बथा दूँ
आपने आप मै ही लगा हूँ
नींद को आँखों में सुला दूँ
तेरी नजरों ने चुरा है मुझको
उसको को कंहा से मै लाऊं
कुछ इस तरहं
तेरे बातों मै एक बात और लगा दूँ

ऐ समाप्त नहीं होगा दोस्तों
आज के लिये इतना ही .................शुभ रात्री उत्तराखंड

आपका ध्यानी ....कुछ इस तरहं

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

वो अपना

बंधिशों के तारों से बंधा सामा मेरा
पिंजड़े में जड़ा वो सोने का ताला मेरा
अहम ने खाया मूल जड़ से मुझको
तना ना रहा अब वो तना मेरा
बांध कर रखा मुझ को वो अपना मेरा

जकड़ा सा वो अस्म में इस तरह
अकडा सा वो जिस्म में इस तरह
पंख है पर कटे कटे से क्यों उड़ रहे
आफत में फंसा वो साथ है जैसे
बांध कर रखा मुझ को वो अपना मेरा

औकात हैसियत से निकह हो गयी
इश्तहार अत्फ़ का अदा हो गया
अफ़सुर्दा था अफ़स़ना उस दरफ पर
अब्तर के अंजुमन मै दफन हो गयी
बांध कर रखा मुझ को वो अपना मेरा

आँच के आगोश जल रहा मन मेरा
अब तो आज़माईश के करवाँ चल पड़े
आयन्दा के कोने में सितम छिपे कितने
एक एक कर आये वो गुजर गये
बांध कर रखा मुझ को वो अपना मेरा

फलसफ मेर यूँ ही चलता रहा संग मेरे
वक्ता आता रहा जंजीरों में जकड़ता रहा
रिश्ते के लिये देह मेर अब जी ता रहा
मन अकेले में बैठे बैठे बस रोता रहा
बांध कर रखा मुझ को वो अपना मेरा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

वो अपना

बंधिशों के तारों से बंधा सामा मेरा
पिंजड़े में जड़ा वो सोने का ताला मेरा
अहम ने खाया मूल जड़ से मुझको
तना ना रहा अब वो तना मेरा
बांध कर रखा मुझ को वो अपना मेरा

जकड़ा सा वो अस्म में इस तरह
अकडा सा वो जिस्म में इस तरह
पंख है पर कटे कटे से क्यों उड़ रहे
आफत में फंसा वो साथ है जैसे
बांध कर रखा मुझ को वो अपना मेरा

औकात हैसियत से निकह हो गयी
इश्तहार अत्फ़ का अदा हो गया
अफ़सुर्दा था अफ़स़ना उस दरफ पर
अब्तर के अंजुमन मै दफन हो गयी
बांध कर रखा मुझ को वो अपना मेरा

आँच के आगोश जल रहा मन मेरा
अब तो आज़माईश के करवाँ चल पड़े
आयन्दा के कोने में सितम छिपे कितने
एक एक कर आये वो गुजर गये
बांध कर रखा मुझ को वो अपना मेरा

फलसफ मेर यूँ ही चलता रहा संग मेरे
वक्ता आता रहा जंजीरों में जकड़ता रहा
रिश्ते के लिये देह मेर अब जी ता रहा
मन अकेले में बैठे बैठे बस रोता रहा
बांध कर रखा मुझ को वो अपना मेरा

एक उत्तराखंडी

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लेरवा

मेर लेरवा
गढ़ देशा मा
किले तेर सेरवा
जेरवा भेरवा
गेरवा दिना
जिकोडी डेरवा
डेभरा बकरा
चरनी चरा
घसा कुल्हा
धुंगा चोल्ह
मेरव तेरवा
सेरवा जीरवा झम्प
कंन लगे खंत
संत संत भनी
गंगा ईजा
चेरवा भेरव
कै जीरवा सैरवा
डंगरा गंगरा
चंगर चंगर गेन
भीतर,भैर रैन
सैन जैन कंन कैन
बलदा गोउडा टैर
सड़के फिरदा गैर
जेर जैर फिरनू
कैल पीण सीण
टक्का गीण दीण
मेरावा पिन पीण
छिण छिकडी
काक ककडी
बुरंस सकडी
कूड़ा टरकी
बाटा रडकी
गीची सरकी
देख झरका झरकी
गढ़देश की बरकी
थरका ठरकी
दारू तडका ताडकी
मुंड फुड़ाकी
कुटम्ब पड़छी
दुःख हर्ची
सुख बस परकी
मेर गढ़देशा मा

एक उत्तराखंडी

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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
November 22
जन्मदिन

हम मनाये जन्म दिन
बिता वो साल पुकारे
रह गयी बस अब
यादों की रातें यादों के दिन
हम मनाये जन्म दिन
बिता वो साल पुकारे

नये साल के नये दिन
कुछ खोया कुछ पाया
साल था साल जैसा गया
इस बार ऐसा क्या होया
हम मनाये जन्म दिन
बिता वो साल पुकारे

दर्द रहता है यूँ ही
खाली खाली सा गया बिता साल
खुशी होती है बस
कुछ यूँ ही ऐ पल
हम मनाये जन्म दिन
बिता वो साल पुकारे

पल छिन जाता है पल
हंसता रहता है मोड़ मोड़कर
दे जाता है हर्ष एक ओर दिन
आगे बड़ने के के लिये
हम मनाये जन्म दिन
बिता वो साल पुकारे

हम मनाये जन्म दिन
बिता वो साल पुकारे
रह गयी बस अब
यादों की रातें यादों के दिन
हम मनाये जन्म दिन
बिता वो साल पुकारे

एक उत्तराखंडी

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बसा था
जीवन कल कल
धार वो जो विहल
कर ने तेरी जोड़ में
जन्म बाद मरण प्रतिपल
जीवनकाल देह नश्वर
अस्तित्व की बंदगी
जिन्दगी ही जिन्दगी
आत्मा की कैद में
जीजन थी शैली संभव
संभव है हर भाव
उत्साह आयुष्य का
ऐंठ बस यंहा दो पल
पथ पड़े खंजर
मौजूदगी बस बंजर
जीवनकाल का फल
जीवन कल कल
धार वो जो विहल

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सुण मुरूली

सुण मुरूली सुण
बाँसुरी की धुन रै
सुण मुरूली सुण......

बजी जाली तान
पीड़ा बोगी जाली रै
सुण मुरूली सुण......

धुन सुणेकी
धुन अपरी लगी राली रै
सुण मुरूली सुण......

जानू कै बाटा मी
जानू णी कै ओर ग्याई
सुण मुरूली सुण......

ग्द्यानी जनी खैरी
आंसूं रीता जाली रै
सुण मुरूली सुण......

तेरु ही सारु सुण
तू मेर बाण ही बीन रै
सुण मुरूली सुण......

सुण मुरूली सुण
बाँसुरी की धुन रै
सुण मुरूली सुण......

एक उत्तराखंडी

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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
November 20
लग्युं आसा
कंन भुलला भुल्ला ..२
भूली जाला नाना
डेरा मा का राजा
ककडी वो लेडा रै ककडी वो लेडा
रसली वो चटनी
थींच्यूं हरा लसना का ठेंचा
प्याजा दगडी छोटी आली
कूदो की वो रोटा वो कूदो की रोटा
किंकरालो घीयु
डगल भुल्ला आलो
पीछों पीछों ऐ लाटा..२
नानी नानी खुद
रूले रूले जाला
परते ऐ पिटला की परते ऐ पिटला
ठंडा ठंड मीठू पाणी
कांस्या का ऐ बाटा..२
ऐलू जालू ऐ भी
जब लगेली तिसला
उकला ऐ उंदरा भैजी ऐ उकला ऐ उंदरा
चौक गों कूड़ा ऐ पुंगडा
ले जाला फिर फिर
घुमै घुमै की ऐ बाटा
बेटी ऐ ब्वारी ऐ बेटी ब्वारी
तेरे हिकमत भारी
पह्ड़े के तुछे नारी
वोंका हथ थमला .२
पहाड़ा तब बडला
छोड़ छोड़ की ना जा
जीवना को सांसा
देख लग्युं आसा
एक उत्तराखंडी

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लिखूंगा गीत मै

अश्कों पर लिखूंगा गीत मै
आँखों को अब बहने दू
यादों के संगीत के संग
सुर ताल अब भीगने दू
अश्कों पर लिखूंगा गीत मै .....

गिले गिले हैं शब्द मेरे
कंठ से अब उसे उमड़ ने दू
दिल की महफिल लगी है
उसके कोने में ना छुप ने दू
अश्कों पर लिखूंगा गीत मै .....

बहते रहेंगे ताल पर अब वो
ढोलक की थाप पर बजने दू
बांसुरी की रुदन स्वर में अब
जी भरके अब सिसकने दू
अश्कों पर लिखूंगा गीत मै .....

रोना मेरा ना नकाम हो
अब तो अक्षर बन उभरने दू
मेरे भी तू जज्बात है दोस्त
अश्रु बनकर उसे गिरने दू
अश्कों पर लिखूंगा गीत मै .....

अश्कों पर लिखूंगा गीत मै
आँखों को अब बहने दू
यादों के संगीत के संग
सुर ताल अब भीगने दू
अश्कों पर लिखूंगा गीत मै .....

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