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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


       
  • बालकृष्ण डी ध्यानी with Uttara Bahuguna and 48 others. Photo2Like ·  · Share
  • बालकृष्ण डी ध्यानीSundayखुट्ली मेरी

    देख कंन मेर सवारी च
    झक झक चली जानी चा
    उंदरा उकला तेडा मेडा बाटा लांदी जानी चा
    मीथै मेर गों घार पोछानी चा
    दोई खोटीयूँ की मेर सवारी चा
    खुट्ली मेरी

    दाएँ बैयाँ अग्ने पीछणे
    वा मी थै ले जानी चा
    कास्ट को फल दिलान्दी चा
    मेर जीवन की गाडी चलानी चा
    दोई खोटीयूँ की मेर सवारी चा
    खुट्ली मेरी

    पेटोर्ल ना डीज़ल ना गैस चैनु
    दोई रोटी जब पोट्गी चली जानी चा
    सर सर र र वो दोउड़ी जानी चा
    मन मर्जी दगड़ चली जानी चा
    दोई खोटीयूँ की मेर सवारी चा
    खुट्ली मेरी

    खैरी कमै की वा खिलानी चा
    थकी थकी की दिन भर मेरे खटुली
    रातमा मीथे मस्त निंदी मा सोलाणी चा
    मिल जुल्की रैन सिखान्दी चा
    दोई खोटीयूँ की मेर सवारी चा
    खुट्ली मेरी

    देख कंन मेर सवारी च
    झक झक चली जानी चा
    उंदरा उकला तेडा मेडा बाटा लांदी जानी चा
    मीथै मेर गों घार पोछानी चा
    दोई खोटीयूँ की मेर सवारी चा
    खुट्ली मेरी


    एक उत्तराखंडी

    बालकृष्ण डी ध्यानी
    देवभूमि बद्री-केदारनाथ
    मेरा ब्लोग्स
    http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
    मै पूर्व प्रकाशीत हैं -सर्वाधिकार सुरक्षीत

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

सिलवटें

आज जो बीत गया था
कल क्या वो याद आयेगा
बिस्तर पर पड़े सिलवटों पर
कोई वादा कर जायेगा
दूर से वो मुस्कुरा रहा है
देख वो आज भी याद आ रहा है
लकीरों पर अब भी अपनी
वो तक़दीर बता रहा है
कुछ चुप है कुछ गा रहा है
पल पल बिछड़ कर वो
फिर करीब आ रहा है
समा जो बंधा था अब तक
एक एक कर खुल रहा है
रहा वो अनजानी सी थी
वो मौसम फिसल रहा था
अपना आज भी वो लगा
टूटकर उस पलंग से जो गिरा है
फिर भी वो इस सीने से लगा
दिल अब भी वो धडक रहा है
नाम फिर भी छुप रहा है
आज जो बीत गया था
कल क्या वो याद आयेगा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

सिलवटें

आज जो बीत गया था
कल क्या वो याद आयेगा
बिस्तर पर पड़े सिलवटों पर
कोई वादा कर जायेगा
दूर से वो मुस्कुरा रहा है
देख वो आज भी याद आ रहा है
लकीरों पर अब भी अपनी
वो तक़दीर बता रहा है
कुछ चुप है कुछ गा रहा है
पल पल बिछड़ कर वो
फिर करीब आ रहा है
समा जो बंधा था अब तक
एक एक कर खुल रहा है
रहा वो अनजानी सी थी
वो मौसम फिसल रहा था
अपना आज भी वो लगा
टूटकर उस पलंग से जो गिरा है
फिर भी वो इस सीने से लगा
दिल अब भी वो धडक रहा है
नाम फिर भी छुप रहा है
आज जो बीत गया था
कल क्या वो याद आयेगा

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बालकृष्ण डी ध्यानी
November 3
रै जांदी

रै जांदी रै जांदी बात या
सुर सरुक रूडी जांदी रात या
रै जांदी रै जांदी बात या...............

जुन्यली अंध्यारी का साथ या
छ छनत जुगनी प्रकाश या
रै जांदी रै जांदी बात या...............

बैठी छा म्यारा वो पास या
किले वहाली चुप चाप वा उदास या
रै जांदी रै जांदी बात या...............

यकुली यकुली वा आज या
कीथै खोज्याण वहली पल्या पार या
रै जांदी रै जांदी बात या...............

दिन ग्याई रात ,रात ग्याई दिन या
मीथै णी सम्झेणु ऐ राज या
रै जांदी रै जांदी बात या...............

क्या छुपे की क्या देकी या
रख्युं छ सरला तेरु पास या
रै जांदी रै जांदी बात या...............

रै जांदी रै जांदी बात या
सुर सरुक रूडी जांदी रात या
रै जांदी रै जांदी बात या...............

जुन्यली अंध्यारी का साथ या
छ छनत जुगनी प्रकाश या
रै जांदी रै जांदी बात या...............

एक उत्तराखंडी

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बिरडी

बिरडी गैनी ....२
वो बाटा
वो थाटा
वो मयारू लाटा
बिरडी गैनी ....२

कु लगाणी धयीं
कैमा लगाणी छुंयीं
सब बिसरी गैण
बस घुमाण को ऐणा
बिरडी गैनी ....२

फूटो खीचै की
दुखडी सींची की
आपरू थै खींचै की
चली गै ण
बिरडी गैनी ....२

छुडीकी गैणा
यकुली कैणा
दिन रात इनी गैणा
बारामास की रैणा
बिरडी गैनी ....२

तिर तीर कैकी चुलीगैणा
जिकोड़ी थै भूली गैणा
अब आण कब तिल
ऐ आश भी टूटी गै ण
बिरडी गैनी ....२

बिरडी गैनी ....२
वो बाटा
वो थाटा
वो मयारू लाटा
बिरडी गैनी ....२

एक उत्तराखंडी

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प्यासा

मन तू जाने ना
मन तू माने ना
मन तू दीठ बड़ा
आज तू किस ओर चला

कभी आगे कभी पीछे
कभी अब कभी तब
चाहीये तुझे सब का सब
मन तू उसके पीछे पड़ा

बस दौडे तू कंही ओर
नही तेरा अंत बस तेरा है आगाज
बस निकल पड़े सब के सब
मंजील आखीर करेंगी हैरान

अंत की आयेगी जब बेला
मन साथ तेरा तब भी रहेगा
भटकेगा ऐ मन तू तब भी
मन तब भी तू प्यास रहेगा

मन तू जाने ना
मन तू माने ना
मन तू दीठ बड़ा
आज तू किस ओर चला

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी18 hours agoदेखा गढ़ की लील

देखा गढ़ की लील
पैल जंन छे तन ही वा रहाई
बल टस से मस ना वाहाई
ओर बड़ बड़ ही ग्याई
पलायन समयसा तन ही रहई
बोलों हमोल क्या पाई बस खोई
देखा गढ़ की लील

एक शीश यख एक शीश वख ग्याई
आपरा आपरा मा ल्ग्याँ छा सब का सब
कुर्ती सुलार छोड़ टी शर्ट जींस पेंट आयी
लम्बू हाथ को बिलोज क्ख्क हर्ची ग्याई
उत्तराँचल बस उत्तराखंड वहाई
देहरदुन गैरसैण बीचा राजधानी पीस ग्याई
बोलों हमोल क्या पाई बस खोई
देखा गढ़ की की लील

क्दगा बरस अब बल इनी गयाई
मेरे मया बोली गढ़वाली भाषा नी बाण पाई
शिक्षा का दीक्षा अब भिक ग्याई
माटा कूड़ा सिमेंटों कूड़ा नी लुट दयाई
योजन बणी अपरमपार पार नी वहई
हमारों ना वींकी मलाई खै दयाई
बोलों हमोल क्या पाई बस खोई
देखा गढ़ की की लील

क्ख्क जली मी क्खाक खदे दयाई
क्ख्क दुरु दगड़ा मी बोग ग्याई
कखक रेत भोरी मील कखक लैट ग्याई
कखक बदल फटी सरकी रूडी गयाई
क्ख्क पुंगडा बंजा पड्यां पाणी सुख ग्याई
कखक प्रगती दगड़ा मी लुट दयाई
क्ख्क अपरा झोल्हा पकड़ मी थै छोड़ ग्याई
बोलों हमोल क्या पाई बस खोई
देखा गढ़ की लील

देखा गढ़ की लील
पैल जंन छे तन ही वा रहाई
बल टस से मस ना वाहाई
ओर बड़ बड़ ही ग्याई
पलायन समयसा तन ही रहई
बोलों हमोल क्या पाई बस खोई
देखा गढ़ की लील

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

म्यारी डंडायाली

उत्तरखंड की राणी तू
सैण खाणी धणी तू

मेरा भग्याणी रे मेर डंडायाली
मेर डंडायाली रे मेरा भग्याणी

बांद मा बांद तू
गढ़ देश की शान तू
 
मेर रस्याणी रे मेर डंडायाली
मेरा भग्याणी रे मेर रस्याणी

हिकमत ना हैर तू
तू ही भीतर तू ही भैर तू

मेर बेटी ब्वारी रे मेर डंडायाली
मेरा भग्याणी रे मेर बेटी ब्वारी

तेरु ही सारु गढ़ को
तेर ही उपकार हे भगवती

कुमो गाढवाला थे मेर गाढवाला थे
मेर डंडायाली रे मेरा भग्याणी

उत्तरखंड की राणी तू
सैण खाणी धणी तू

मेरा भग्याणी रे मेर डंडायाली
मेर डंडायाली रे मेरा भग्याणी

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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कंहा चला

सुख की ओर भाग रहे
दुःख स्वयं ओढ़ रहे है
कैसे समझाओं मै उन्हें
पीछे क्या छोड़ रहे हैं

श्रणिक सुख के संग
अलोकिक देह छेद रहे हैं
कंकड़ अपने पर तोल कर
रिश्तों पर मोल कर रहे हैं

कर्म के पथ पर हम
स्तविक पथ क्यों छोड़ रहे है
अर्थ अब वंचित है कया का
मोह माया को ओढ़ रहे हैं

अकेल चला था तू अब
अकेला ही यंहा से जायेगा
तेरा किया धरा ही तेरे संग
अब योनी योनी वो आयेगा

सुख की ओर भाग रहे
दुःख स्वयं ओढ़ रहे है
कैसे समझाओं मै उन्हें
पीछे क्या छोड़ रहे हैं

एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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