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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

परदेश मा भी तेरु साथ

जब छुंयीं लगी तेर ऐ परदेशा मा
मेरा गढ़ देश मेरा माय देशा
आंखी मेरी तू किलॆ भोर जांदी
टप टपरण लागी जिकोड़ी तू किले खुदणी
जब छुंयीं लगी तेर ऐ परदेशा मा
मेरा गढ़ देश मेरा माय देशा

बडुली ऐगै सँकी मा रैबार ऐगे घुगती मा
कंण च्ख्लात होगै आज मेरा साथा
कू याद कंण वहालो कू आज मी थै
कैन भैजी यक्दा दूर भातेक वो साथ
जिकोड़ी णी समझे जिकोड़ी को छाबलाहाट
जब छुंयीं लगी तेर ऐ परदेशा मा
मेरा गढ़ देश मेरा माय देशा

याद दिलान्दी रै तेर माया मॆथै बुल्न्दे रै
ऐ परदेश मा तू मेरा देश तू धै लगन्दी रै
माय मॆथै बोगी कैंदी लाटा बणाकी रुलान्दी
सीण जगी मा तेरा क्नाडू तै ध्यै सुनादी रै
मयारू मना की वो आवाज क्ख्क भतेक आंदी रै
जब छुंयीं लगी तेर ऐ परदेशा मा
मेरा गढ़ देश मेरा माय देशा

जब छुंयीं लगी तेर ऐ परदेशा मा
मेरा गढ़ देश मेरा माय देशा
आंखी मेरी तू किलॆ भोर जांदी
टप टपरण लागी जिकोड़ी तू किले खुदणी
जब छुंयीं लगी तेर ऐ परदेशा मा
मेरा गढ़ देश मेरा माय देशा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Photo माँ कू डोला मुम्बई मा
 
ऊँचा पहाडा की मात तेरु सदा जयकार
कुमो गढ़वाल उत्तराखंड की मात तेरु सदा जयकार

कंन धूम मची चा
मुम्बई की सड़कीयों मा
कंन धूम मची चा हो हो अ
कंन धूम मची चा

माँ कू डोला
जख जख जणू
बोई की जयकार ल्गाणु
बोई की जयकार ल्गाणु या
कंन धूम मची चा
मुम्बई की सड़कीयों मा
कंन धूम मची चा

नाक मा नथुली
मुड्मा सौभग्याईण
बाट्मा श्री फल धैरयुंचा
लाल पिंगली रंगा डोळ सज्युंचा या
कंन धूम मची चा
मुम्बई की सड़कीयों मा
कंन धूम मची चा

माँ नंदा ऐगे
दर्शनों को प्रवाशी घरों मा
उत्तराखंडा छोडयाँ अपरू मा
चल जोंला सखी दर्शनों कू 
कंन धूम मची चा
मुम्बई की सड़कीयों मा
कंन धूम मची चा

कंन धूम मची चा
मुम्बई की सड़कीयों मा
कंन धूम मची चा हो हो अ
कंन धूम मची चा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ सोच बदलनी होगी

परिवर्तन ही संसार है
हर चीज पल पल बदलती है
पर तो क्यों नही बदलती

एक एक चीज यंहा बिकती है
जो तेरे आँखों को खलती है
पर तो क्यों नही बदलती

कल आ रहा है कल के लिये
जी उस बस पल के लिये
पर तो क्यों नही बदलती

मटकी टूटते ही राख है तू
अग्नी पर ही अब साथ है तू
पर तो क्यों नही बदलती

जगदम्बिका है तू माँ भैरवी
माँ ,पत्नी ,तू ही बेटी है यंहा
पर तो क्यों नही बदलती

दर्द समेटे आंचल सदियों से
बार बार हंसकर क्यों ओढ़े तू
पर तो क्यों नही बदलती

नारी तू सिद्धि दात्री
अखंड है तू जीवन-सुख-दात्री
पर तो क्यों नही बदलती

परिवर्तन ही संसार है
हर चीज पल पल बदलती है
पर तो क्यों नही बदलती

एक उत्तराखंडी

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देव भूमि बद्री-केदार नाथ

ऐ जावा बाबा जी

ऐ जावा बाबा जी ऐ जावा बाबा जी अपरू गढ़ धाम अपरू कुमो गढ़वाल ऐ
ऐ जावा बाबा जी ऐ जावा बाबा जी  ऐ जावा बाबा जी ऐ
क्ख्क छन बाबा जी क्ख्क छन बाबा जी खोजनी च ये आँखी खोजनी च ये आँखी ऐ
क्ख्क छन बाबा जी  क्ख्क छन बाबा जी क्ख्क छन बाबा जी  ऐ

दीदी भूली दादा बोई सब ल्ग्याँ छन सार सब ल्ग्याँ छन सार ऐ
कंण छोडी गया मुख मोड़ी गया कंण छोडी गया मुख मोड़ी गया तुम कै घार ऐ
क्ख्क छन बाबा जी क्ख्क छन बाबा जी खोजनी च ये आँखी खोजनी च ये आँखी ऐ
क्ख्क छन बाबा जी  क्ख्क छन बाबा जी क्ख्क छन बाबा जी  ऐ

अपरी छकुली की णी अंद वख याद अपरी छकुली की णी अंद वख याद
जन्म वहैकै  मी वाहैगै दोई साल  जन्म वहैकै  मी वाहैगै दोई साल  बाबा जी मुखडी मिल दयखा ऐ
क्ख्क छन बाबा जी क्ख्क छन बाबा जी खोजनी च ये आँखी खोजनी च ये आँखी ऐ
क्ख्क छन बाबा जी  क्ख्क छन बाबा जी क्ख्क छन बाबा जी  ऐ

याकुल लग्णु मयारू गढ़ देश आज याकुल लग्णु मयारू गढ़ देश आज गढ़ नर क्ख्क गै आज ऐ
यकुलू गों गोठ्यारा आज यकुलू गों गोठ्यारा  आज देखण सब तुम्हरी बाटा ऐ
क्ख्क छन बाबा जी क्ख्क छन बाबा जी खोजनी च ये आँखी खोजनी च ये आँखी ऐ
क्ख्क छन बाबा जी  क्ख्क छन बाबा जी क्ख्क छन बाबा जी  ऐ

टक्का टक्का क्या कंण हमूण टक्का टक्का क्या कंण हमूण खैर विपदा जब समुण ऐ
तुम साथ वहल बाबाजी दोई रोटा लुना मा सुख हमुल माणुण  सुख हमुल माणुण  ऐ
क्ख्क छन बाबा जी क्ख्क छन बाबा जी खोजनी च ये आँखी खोजनी च ये आँखी ऐ
क्ख्क छन बाबा जी  क्ख्क छन बाबा जी क्ख्क छन बाबा जी  ऐ

ऐ जावा बाबा जी ऐ जावा बाबा जी अपरू गढ़ धाम अपरू कुमो गढ़वाल ऐ
ऐ जावा बाबा जी ऐ जावा बाबा जी  ऐ जावा बाबा जी ऐ
क्ख्क छन बाबा जी क्ख्क छन बाबा जी खोजनी च ये आँखी खोजनी च ये आँखी ऐ
क्ख्क छन बाबा जी  क्ख्क छन बाबा जी क्ख्क छन बाबा जी  ऐ

एक उत्तराखंडी

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भाव है मेरे

ये भाव है मेरे इन्हें
आप घाव ना समझना
अक्सर ये आ जाते है
कंही पर भी मुझे मिलने
ये भाव है मेरे

हल्का सा इशारा देकर
कुछ हल्का हलक तपकर
बंद करके रखी थी जो सीने में
शीत उष्ण वो आग है
ये भाव है मेरे

भीगती वो रात
जलते सूरज के लिये
कदमों से चलकर आयी
चाँद के साथ तपकर
ये भाव है मेरे

ग्रहण कर लेता हूँ
मन धारण कर लेता हूँ
बात सच्ची हो या कल्पना
छंद कविता गजल रच देता हूँ
ये भाव है मेरे

ये भाव है मेरे इन्हें
आप घाव ना समझना
अक्सर ये आ जाते है
कंही पर भी मुझे मिलने
ये भाव है मेरे

एक उत्तराखंडी

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देव भूमि बद्री-केदार नाथ23 hours agoकुछ बाकी है 

अब भी दिन बाकी है
हाथ मेरे लाठी है
देखों दूर बूढी नजरों से
जो थोड़ी उम्र अब बाकी है
अब भी दिन बाकी है
हाथ में मेरे लाठी है

यही वो गाँव है
वो ही अब भी मै हूँ
कभी खेला था इन खलिहानों में
बचपन खोजों यंहा
इन कच्ची पगडंडीयों में
अब भी दिन बाकी है
हाथ में मेरे लाठी है

कोई नही आज यंहा
खाली खाली ये वीरान जंहा
किसान अब परेशान यंहा
खोजें दाना वो शहर शहर
अब भी लगा हूँ ताक मै
अब भी दिन बाकी है
हाथ में मेरे लाठी है

आयेगी वो प्रभात कभी तो
मेरे मरने से पहले
या मेरे मरने के बाद
लोटेंगे मेरा वो अपने
पूछेंगे  मेरे अश्रु उन हाथ
जिन हाथ पकड़कर मै
घूमता था दिन रात
अब भी दिन बाकी है
हाथ में मेरे लाठी है

अब भी दिन बाकी है
हाथ मेरे लाठी है
देखों दूर बूढी नजरों से
जो थोड़ी उम्र अब बाकी है
अब भी दिन बाकी है
हाथ में मेरे लाठी है

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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देव भूमि बद्री-केदार नाथMarch 2
देबता बद्री केदार दैणु व्हैजा दैणु व्हैजा !!!
बदरीनाथ भारत के उत्तरी भाग में स्थित एक स्थान है जो हिन्दुओं का प्रसिद्ध तीर्थ है।
परिचय

गांव की चौपाल पर सब लोग बैठ गये तो रामनाथ ने बदरीनाथ की तीरथ-यात्रा की कहानी शुरू की :
वहां जाने के लिए तीन ओर से रास्ता है। रानीखेत से, कोटद्वार होकर पौड़ी (गढ़वाल) से ओर हरिद्वार होकर देवप्रयाग से । ये तीनों रास्ते रूद्वप्रयाग में मिल जाते है। रूद्रप्रयाग में मन्दाकिनी और अलकनन्दा का संगम है। जहां दो नदियां मिलती है, उस जगह को प्रयाग कहते है। बदरी-केदार की राह में कई प्रयाग आते है। रूद्रप्रयाग से जो लोग केदारनाथ जाना चाहतें है, वे उधर चले जाते है।
कभी हरिद्वार से इस यात्रा में महीनों लग जाते थे, लेकिन अब तो सड़क बन जाने के कारण यात्री मोटर-लारियों से ठेठ बदरीनाथ पहुंच जाते है। हफ्ते-भर से कम में ही यात्रा हो जाती है। पर हम लोग जब गये थे तब बात और ही थी। रास्ते में हमें भेंड़-बकरियों पर नमक लादे भोठ लोग मिले। ये तिब्बत और भारत के बीच तिजारत करते है।
रूद्रप्रयाग से नौ मील पर पीपल कोठी आती । पीपल कोटी में जानवरों की खालें, दवाइयां और कस्तूरी अच्छी मिलती है। बस की सड़क बनने से पहले रास्तें में चट्टियां थीं।
''चट्टियां! ये क्या होती थी ?'' चौधरी ने पूछा।
रास्तें में ठहरने के लिए जो पड़ाव बने होते थे, उन्हीं को चट्टी कहते थे। कहीं कच्चे मकान, कहीं पक्के। सब चट्टियों पर खाने-पीने का सामान मिलता था। बरतन भी मिल जाते थे। दूध, दही, मावा, पेड़े सब-कुछ मिलता था, जूते-कपड़े तक। जगह-जगह काली कमली वाले बाबा ने धर्मशालाएं बनवा दी थी। दवाइयां भी मिलती थीं। डाकखाने भी थे।
आगे रास्तें में गरूड़-गंगा आकर अलकनन्दा में मिलती है। यहां गरूडजी का मन्दिर है। कहते है, लौटती बार जो गरूड़-गंगा में नहाकर पत्थर का एक टुकड़ा पूजा करने के लिए घर ले जाता है, उसे सांपों का डर नहीं रहता। यहां से पाताल गंगा की चढ़ाई शुरू होती है। सारे रास्ते में चीड़ और देवदार के पेड़ है। उन्हें देखकर मन खिल उठता है। पातालगंगा सचमुच पाताल में है। नीचे देखों तो डर लगता है। पानी मटमैला । कम है, पर बहाव बड़ा तेज है। किनारे का पहाड़ हमेशा टूटता रहता है। दो मील तक ऐसा ही रास्ता चला गया है। पातालगंगा पर नीचे उतरे, फिर ऊपर चढ़े। गुलाबकोटी पहुंचे। कहते है, सतयुग में यहीं पर पार्वती ने तप किया था। वे शिवजी से विवाह करना चाहती थीं। इसके लिए सालों पत्ते खाके रहीं। इसीसे आज इस वन का नाम 'पैखण्ड' यानी 'पर्ण खण्ड़ है। वहां जाने वाले सब लोग उस पुरानी कहानी को याद करते है और फिर 'जोषीमठ' पहुंच जाते है। जोषीमठ एक विशेष नगर है। सारे गढ़वाल में शायद यहीं पर फल होते है। फूलों को तो पूछों मत। जोषीमठ का नाम स्वामी शंकराचार्य के साथ ही जुड़ा हुआ है। यह शंकराचार्य दो हजार साल पहले हुए है। जब हिन्दू धर्म मिट रहा था तब ये हुए। कुल बत्तीस साल जीवित रहें। इस छोटी सी उमर में वे इतने काम कर गये कि अचरज होता है। बड़े-बड़े पोथे लिखे। सारे देश में धर्म का प्रचार किया। फिर देश के चारों कोनो पर चार मठ बनाये। पूरब में पुरी, पश्चिम में द्वारिका, दक्खिन में श्रृंगेरी और उत्तर में जोषीमठ। इन चारों मठों के गुरू शंकराचार्य कहलाते है। यही शंकराचार्य थे, जिन्होनें बदरीनाथ का मन्दिर फिर से बनवाया था। सरदी के दिनो में जब बदरीनाथ बरफ से ढक जाता है तो वहां के रावल मूर्ति यहीं आकर रहते है। बदरीनाथ के मन्दिर में जो मालाएं काम आती है, वे यहीं से जाती है। यहां के मन्दिर में पैसा नहीं चढ़ाया जाता। किसी बुरी बात को छोड़ने की कसम खाई जाती है। यहां पर कीमू (शहतूत) का एक पेड़ है। कहते है, इसके नीचे बैठकर स्वामीजी ने पुस्तकें लिखी थीं। नीचे नगर में कई मन्दिर है। उनमें से एक में नृसिंह भगवान की मूर्ति है। काले पत्थर की उस सुन्दर मूर्ति का बांया हाथ बड़ा पतला है। पूछने पर पता लगा कि वह हाथ बराबर पतला होता जा रहा है। जब वह गिर जायगा तब यहां से कोई आगे न बढ़ सकेगा। सब रास्ते टूट जायंगें।
यहां से आगें बढ़े तो जैसे पाताल में उतरते चले गये। दो मील की खड़ी उतराई है। पर बीच-बीच में मिलने वाले सुन्दर झरने सब थकान दूर कर देते है। नीचे विष्णु प्रयाग है, जहां विष्णु गंगा और धौली गंगा का मिलन होता है।
इन नदियों का पुल लोहे का बना हुआ है। इस तरह रास्ते की शोभा देखते-देखते पाण्डुकेश्वर पहुंच गये।
पाण्डुकेश्वर के पास फूलों की घाटी है, जिसे देखने दुनिया भर के लोग आते है। यहीं पर लोकपाल है, जहां सिक्खों के गुरू गोविंदसिंह ने अपने पिछले जन्म में तप किया था। कहते है, पाण्डुकेश्वर को पाण्डवों के पिता पाण्डु ने बसाया था। पांडव यहीं पैदा हुए थे। स्वर्ग भी यहीं होकर गये थे। वह वे यहां कई बार आये थे। शिवजी महाराज से धनुष लेने अर्जुन यहीं से गये थे। भीम कमल लेने यही के वनों में आये थे। नदी के बांय किनारे के पहाड़ को 'पाण्डु चौकी कहते है। इसकी चोटी पर चौपड़ बनी हुई है। यहां बैठकर उन लोगों ने आखिरी बार चौपड़ खेली थीं कहते है, यहां का 'योगबदरी का मन्दिर' उन लोगों ने ही बनवाया था। आगे का पहाड़ कहीं काला, कहीं नीला, कहीं कच्चा है। बीच में कहीं निरी मिट्टी, कहीं जमा हुआ बरफ । यहां भोज-पत्र बहुत है। जब कागज नहीं थे तब भोज-पत्र पर किताबें लिखी जाती थीं। यहां गंगा कई बार पार करनी पड़ती है। ''
रास्तें बहुत से मन्दिर और तीर्थ है। यहां हनुमान चट्टी में हनुमान मन्दिर है। यहां पांडवो को हनुमान मिले थे। चढ़ते-चढ़ते कंचनगंगा को पार करके 'कुबेर शिला' आई । आंख उठाकर जो देखा, सामने विशालपुरी थी, जिसके लिए धर्मशास्त्र में लिखा है कि तीनों लोंको में बहुत से तीर्थ है, पर बदरी के समान न था, न होगा।
विशालपुरी अलकनन्दा के दाहिने किनारे पर बसी हुई है। छोटा-सा बाजार है। धर्मधालाएं है। घर है। थाना-डाकघर सबकुछ है। नारायण पर्वत के चरणो में बदरीनाथ का मन्दिर है, जिसके सुनहरे कलश पर सूरज की किरणें पड़ रही थीं। बरफ से ढके हुए आकाश को छूने वाले पहाड़ों के बीच वह छोटी नगरी बड़ी अच्छी लगती थी।
''क्योंजी, बदरीनाथ कितना ऊंचा होगा ?'' किसी ने पूछा।
१0४८० फुट, यानी कोई दो मील । एक समय था जब पथ और भी बीहड़ थे। तुमने ब्रह्मा, विष्णु, महेश का नाम और बदरी विशाल के मन्दिर का कलश तो सुना होगा।
गोपाल पंड़ित एकदम बोले, क्या बात करते हो, रामनाथ ! भारत में रहने वाला ब्रह्मा, विष्णु, महेश को नहीं जानेगा ! ब्रह्मा ठहरे दुनिया को बनाने वाले, विष्णु उसे पालते है और जब दुनिया का काम पूरा हो जाता है तो महेश उसे निपटा देते है।''
ठीक कहा, 'पंड़ितजी ! ब्रह्माजी के बेटे थे। उनमें से एक का नाम था दक्ष। दक्ष की सोलह बेटियां थी। उनमें से तेरह का विवाह धर्मराज से हुआ था। उनमें एक का नाम था श्रीमूर्ति। उनके दो बेटे थे, नर और नारायण। दोनों बहुत ही भले, एक-दूसरे से कभी अलग नहीं होते थे। नर छोटे थे। वे एक-दूसरे को बहुत चाहते थे। अपनी मां को भी बहुत प्यार करते थे। एक बार दोनों ने अपनी मां की बड़ी सेवा की । माँ खुशी से फूल उठी। बोली, ''मेरे प्यारे बेटा, मैं तुमसे बहुत खुश हूं। बोलो, क्या चाहते हो ? जो मांगोगे वही दूंगी।''
दोनों ने कहा, ''माँ, हम वन में जाकर तप करना चाहतें है। आप अगर सचमुच कुछ देना चाहती हो, तो यह वर दो कि हम सदा तप करते रहे।''
बेटों की बात सुनकर मां को बहुत दुख हुआ। अब उसके बेटे उससे बिछुड़ जायंगें। पर वे वचन दे चुकी थीं। उनको रोक नहीं सकती थीं। इसलिए वर देना पड़ा। वर पाकर दोनों भाई तप करने चले गये। वे सारे देश के वनों में घूमने लगे। घूमते-घूमते हिमालय पहाड़ के वनों में पहुंचे।
इसी वन में अलकनन्दा के दोनों किनारों पर दों पहाड़ा है। दाहिनी ओर वाले पहाड़ पर नारायण तप करने लगे। बाई और वाले पर नर । आज भी इन दोनों पहाड़ों के यही नाम है। यहां बैठकर दोनों ने भारी तप किया, इतना कि देवलोक का राजा डर गया। उसने उनके तप को भंग करने की बड़ी कोशिश की, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। तब उसे याद आया कि नर-नारायण साधारण मुनि नहीं है, भगवान का अवतार है। कहते है, कलियुग के आने तक वे वहीं तप करते रहें। आखिर कलियुग के आने का समय हुआ। तब वे अर्जुन और कृष्ण का अवतार लेने के लिए बदरी-वन से चले। उस समय भगवान ने दूसरे मुनियों से कहा, ''मैं अब इस रूप में यहां नहीं रहूंगा। नारद शिला के नीचे मेरी एक मूर्ति है, उसे निकाल लो और यहां एक मन्दिर बनाओं आज से उसी की पूजा करना।
गोपाल पंड़ित बोले, ''तो यह है बदरीनाथ के मन्दिर की कहानी।''
''जीहां, यह कहानी पुराणों में आती है। यह कथा सच हो या झूठ, इससे एक बात साफ हो जाती है, यानी यह मन्दिर बहुत पुराना है। लिखा हैं मुनियों ने मूर्ति को निकाला। वह सांवली है। उसमें भगवान बदरीनारायण पद्मासन लगाये तप कर रहे है। आज भी मन्दिर में यही मूर्ति है। इसको रेशमी कपड़े और हीरे-जड़े गहने पहनाये जाते है। मन्दिर बहुत सुन्दर है। पैड़ियां चढ़कर जो दरवाजा आता है, उसमें बहुत बढ़ियरा जालियां बनी है। ऊपर तीन सुनहरे कलश है। अन्दर चारो ओर गरुड़, हनुमान, लक्ष्मी और घण्टाकर्ण आदि की मूर्तिया है। फिर भीतर का दरवाजा है। अन्दर मूर्ति वाले कमरे का दरवाजा चांदी का बना है। उनके पास गणेश, कुबेर, लक्ष्मी, नर-नारायण उद्वव, नारद और गरूड की मूर्तिया है। यहां बराबर मंत्रों का पाठ, घंटों का शोर और भजनों की आवाज गूंजती रहती है। अखंड़ ज्योति भी जलती रहती है और चढावा ! चढ़ावे की बात मत पूछो। अटका आदि बहुत से चढ़ावे है। वैसे अब सब सरकार के हाथ में है। यहां के सभी पुजारी, जो 'रावल' कहलाते है, दक्षिण के है। इससे पता लगता है कि भारत के रहनेवाले सब एक है। वहां सात कुण्ड है। पांच शिलाएं है। ब्रह्म कपाली है। अनेक धाराएं है। बहुत सी गंगाएं है। जो मुनि, ऋषि या अवतार यहां रहते थे या आये थे, उनकी याद में यहां कुछ-न-कुछ बना है। जैसे नर-नारायण यहां से न लौटे तो उनके माता-पिता भी यहीं आ बसे।
नारद ने भगवान की बहुत सेवा की थी। उनके नाम पर शिला और कुण्ड़ दोनों है। प्रह्राद की कहानी तो आप लोग ही है। उनके पिता को मारकर जब नृसिंह भगवान क्रोध से भरे फिर रहे थे तब यहीं आकर उनका आवेश शान्त हुआ था। नृसिंह-शिला भी वहां मौजूद है। ब्रह्म-कपाली पर पिण्डदान किया जाता है। दो मील आगे भारत का आखिरी गांव माना जाता है। ढाई मील पर माता मूर्ति की मढ़ी है। पांच मील पर वसुधारा है। वसुधारा दो सौ फुट से गिरने वाला झरना है। आगे शतपथ, स्वर्ग-द्वार और अलकापुरी है। फिर तिब्बत का देश है। उस वन में तीर्थ-ही-तीर्थ है। सारी भूमि तपोभूमि है। वहां पर गरम पानी का भी एक झरना है। इतना गरम पानी हैकि एकाएक पैर दो तो जल जाय। ठीक अलकनन्दा के किनारे है। अलकनन्दा में हाथ दो तो गल जाय, झरने में दो तो जल जाय।
उस पुरी में हम तीन दिन ठहरें। फिर आराम से पौड़ी, पौड़ी से कोट-द्वार आ गये। कोटद्वार से रेल मिली और दिल्ली पहुंच गए। — with Tanishka Pant, Our Uttarakhand, Himanshu Bisht and 46 others.

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देव भूमि बद्री-केदार नाथ5 hours agoकोशिश ही हौसला है
   
कोशिश करने वालों की हार नही होती हार नही होती
बैठे बैठे घर के अंदर बात नही बनती बच्चों दल नही गलती
कोशिश करने वालों की हार नही होती हार नही होती

अपने आप को तुम जानो अपने अंतर को पहचानो
बिना खुद से डरे मौत से आंखें चार नहीं होती बच्चों बात नही बनती
कोशिश करने वालों की हार नही होती हार नही होती

पग पथिक बन अकेले चलना होगा आगे खुद को बढना होगा
वो काँटों चलना तेरा अब फूलों से बात नही बनती बच्चों दल नही गलती
कोशिश करने वालों की हार नही होती हार नही होती

एक लक्ष्य हो तेरा द्रिड उठा धनुष भेद दे निशान
देर सवेर आराम की बातें अब कम नही करती बच्चों साथ नही देती
कोशिश करने वालों की हार नही होती हार नही होती

तुझको ही हरना है आँखों के आंसूं  वो मोती हैं तेरे
गुरु चरण माँ पिता आशीष सदा साथ तेरे बच्चों सदा साथ तेरे
कोशिश करने वालों की हार नही होती हार नही होती

देखो देश बोला रहा है बाट तुम्हरी निहार रहा है 
तुम ज्योती हो कल के बच्चों बोलो अब मीलके बच्चों बोलो अब मीलके
कोशिश करने वालों की हार नही होती हार नही होती

कोशिश करने वालों की हार नही होती हार नही होती
बैठे बैठे घर के अंदर बात नही बनती बच्चों दल नही गलती
कोशिश करने वालों की हार नही होती हार नही होती

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

देव भूमि बद्री-केदार नाथ15 hours agoफूलों को

फूलों को अब अंगार बन फिर आगे को बढना होगा
पथ बिछी काली छाया छाटकर निडर बन आगे चलना होगा
फूलों को अब अंगार बन फिर आगे को बढना होगा

माना देश आजाद ,आम इंसान आजाद कंहा
संसंद बैठे सफ़ेद रंग ,कला रंग अब साफ़ कंहा
फूलों को अब अंगार बन फिर आगे को बढना होगा

बच्चों उठो आप को गांधी भगत में चुनना होगा
चमकेगी वो रात हंसकर जब सुलों पर चढ़ना होगा
फूलों को अब अंगार बन फिर आगे को बढना होगा

सबके अंदर ज्योत बसी उसको प्रकाशीत होना होगा
दबी रहेगी दबते जायेगी एक दिन वो दिख ही जायेगी
फूलों को अब अंगार बन फिर आगे को बढना होगा

सत्य अहिंसा हिंसा का मन्त्र दे रहा हों आप को
मन तुझे आज जीवन का मीत दे रहा हों आप को
फूलों को अब अंगार बन फिर आगे को बढना होगा

सम्भलेगा वो कल होगा रोशन उसका हर पद होगा
देश के लिये सोचा पल वो ही पल तेरे वो कल होगा
फूलों को अब अंगार बन फिर आगे को बढना होगा

फूलों को अब अंगार बन फिर आगे को बढना होगा
पथ बिछी काली छाया छाटकर निडर बन आगे चलना होगा
फूलों को अब अंगार बन फिर आगे को बढना होगा
 

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

देव भूमि बद्री-केदार नाथYesterdayसोच बदलनी होगी

परिवर्तन ही संसार है
हर चीज पल पल बदलती है
पर तू क्यों नही बदलती

एक एक चीज यंहा बिकती है
जो तेरे आँखों को खलती है
पर तू क्यों नही बदलती

कल आ रहा है कल के लिये
जी उस बस पल के लिये
पर तू क्यों नही बदलती

मटकी टूटते ही राख है तू
अग्नी पर ही अब साथ है तू
पर तू क्यों नही बदलती

जगदम्बिका है तू माँ भैरवी
माँ ,पत्नी ,तू ही बेटी है यंहा
पर तू क्यों नही बदलती

दर्द समेटे आंचल सदियों से
बार बार हंसकर क्यों ओढ़े तू
पर तू क्यों नही बदलती

नारी तू सिद्धि दात्री
अखंड है तू जीवन-सुख-दात्री
पर तू क्यों नही बदलती

परिवर्तन ही संसार है
हर चीज पल पल बदलती है
पर तू क्यों नही बदलती

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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