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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

देव भूमि बद्री-केदार नाथ ऐ जावा बाबा जी

ऐ जावा बाबा जी ऐ जावा बाबा जी अपरू गढ़ धाम अपरू कुमो गढ़वाल ऐ
ऐ जावा बाबा जी ऐ जावा बाबा जी  ऐ जावा बाबा जी ऐ
क्ख्क छन बाबा जी क्ख्क छन बाबा जी खोजनी च ये आँखी खोजनी च ये आँखी ऐ
क्ख्क छन बाबा जी  क्ख्क छन बाबा जी क्ख्क छन बाबा जी  ऐ

दीदी भूली दादा बोई सब ल्ग्याँ छन सार सब ल्ग्याँ छन सार ऐ
कंण छोडी गया मुख मोड़ी गया कंण छोडी गया मुख मोड़ी गया तुम कै घार ऐ
क्ख्क छन बाबा जी क्ख्क छन बाबा जी खोजनी च ये आँखी खोजनी च ये आँखी ऐ
क्ख्क छन बाबा जी  क्ख्क छन बाबा जी क्ख्क छन बाबा जी  ऐ

अपरी छकुली की णी अंद वख याद अपरी छकुली की णी अंद वख याद
जन्म वहैकै  मी वाहैगै दोई साल  जन्म वहैकै  मी वाहैगै दोई साल  बाबा जी मुखडी मिल दयखा ऐ
क्ख्क छन बाबा जी क्ख्क छन बाबा जी खोजनी च ये आँखी खोजनी च ये आँखी ऐ
क्ख्क छन बाबा जी  क्ख्क छन बाबा जी क्ख्क छन बाबा जी  ऐ

याकुल लग्णु मयारू गढ़ देश आज याकुल लग्णु मयारू गढ़ देश आज गढ़ नर क्ख्क गै आज ऐ
यकुलू गों गोठ्यारा आज यकुलू गों गोठ्यारा  आज देखण सब तुम्हरी बाटा ऐ
क्ख्क छन बाबा जी क्ख्क छन बाबा जी खोजनी च ये आँखी खोजनी च ये आँखी ऐ
क्ख्क छन बाबा जी  क्ख्क छन बाबा जी क्ख्क छन बाबा जी  ऐ

टक्का टक्का क्या कंण हमूण टक्का टक्का क्या कंण हमूण खैर विपदा जब समुण ऐ
तुम साथ वहल बाबाजी दोई रोटा लुना मा सुख हमुल माणुण  सुख हमुल माणुण  ऐ
क्ख्क छन बाबा जी क्ख्क छन बाबा जी खोजनी च ये आँखी खोजनी च ये आँखी ऐ
क्ख्क छन बाबा जी  क्ख्क छन बाबा जी क्ख्क छन बाबा जी  ऐ

ऐ जावा बाबा जी ऐ जावा बाबा जी अपरू गढ़ धाम अपरू कुमो गढ़वाल ऐ
ऐ जावा बाबा जी ऐ जावा बाबा जी  ऐ जावा बाबा जी ऐ
क्ख्क छन बाबा जी क्ख्क छन बाबा जी खोजनी च ये आँखी खोजनी च ये आँखी ऐ
क्ख्क छन बाबा जी  क्ख्क छन बाबा जी क्ख्क छन बाबा जी  ऐ

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भाव है मेरे

ये भाव है मेरे इन्हें
आप घाव ना समझना
अक्सर ये आ जाते है
कंही पर भी मुझे मिलने
ये भाव है मेरे

हल्का सा इशारा देकर
कुछ हल्का हलक तपकर
बंद करके रखी थी जो सीने में
शीत उष्ण वो आग है
ये भाव है मेरे

भीगती वो रात
जलते सूरज के लिये
कदमों से चलकर आयी
चाँद के साथ तपकर
ये भाव है मेरे

ग्रहण कर लेता हूँ
मन धारण कर लेता हूँ
बात सच्ची हो या कल्पना
छंद कविता गजल रच देता हूँ
ये भाव है मेरे

ये भाव है मेरे इन्हें
आप घाव ना समझना
अक्सर ये आ जाते है
कंही पर भी मुझे मिलने
ये भाव है मेरे

एक उत्तराखंडी

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देव भूमि बद्री-केदार नाथThursdayवो दर्द

दर्द मेरा
मै खुद ही ढ़ोता हूँ
अपनी हालत में हो .....अ
यूँ ही अकेले रोता हूँ
दर्द मेरा
मै खुद ही ढ़ोता हूँ

आंसूं पसीजते नही
वो दुःख को सींचते है
ये दुःख भी आम है
अब ख़ास नही होता

दर्द मेरा
मै खोकर पाता हूँ
अकेले में जाकर मै हो ....अ
होता आधा हूँ
दर्द मेरा
मै खुद ही ढ़ोंहता हूँ

अंधेरों में
साये मेरे साथी हैं
उजलों में वे भी
कँहा वो मेरे बड़भागी हैं

दर्द मेरा
बस यूँ ही टूटता रहा
आपनों का साथ भी हो ....अ
अब छुटता रहा
दर्द मेरा
मै खुद ही ढ़ोता हूँ

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ घोल मा छों

अब भी रयाँ सोचदा
अब भी रयाँ खोज्दा
ये टाक्कों थे मोज्दा
ये टाक्कों थे मोज्दा ....जल्द पुरु करलो ऐ कबीता आप सुज्वा स्वीकार

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देव भूमि बद्री-केदार नाथ उत्तरखंड गांधी धन्य हो

धन्य अखोडी धन्य हो
धन्य हिंदाव पट्टी धन्य हो
२४ दिसम्बर १९२४ साल धन्य हो
उत्तरखंड कु सपूत जन्मया हो धन्य हो
धन्य अखोडी धन्य हो
धन्य हिंदाव पट्टी धन्य हो

धन्य विश्वनाथ घाटी धन्य हो
धन्य बीर घाटी धन्य हो
नव धरे इंद्रमणि धन्य हो
उत्तरखंड कू बडोनी धन्य हो
धन्य टिहरी गढ़वाल धन्य हो
धन्य मेरु उत्तराखंड धन्य हो

उत्तरखंड कू सपूत धन्य हो
पीड़ा खैकी पीड़ाहरी धन्य हो
उत्तराखंड राज्य आन्दोलन धन्य हो
अलख जगाणु वहलो धन्य हो
धन्य अखोडी धन्य हो
धन्य हिंदाव पट्टी धन्य हो

देवदार डाली झुमैली धन्य हो
गाथा उत्तराखंड लगेली धन्य हो
शहीदों बेल पनपैली धन्य हो
बीर गाथा सुनेली धन्य हो
धन्य टिहरी गढ़वाल धन्य हो
धन्य मेरु उत्तराखंड धन्य हो

अपरा थै भूली आपरों बाणा धन्य हो
कंण पीड़ा हारी कृष्णा मुरारी धन्य हो
लड़दे लड़दे शहीद होगेणी अमर होगेणी धन्य हो
१८ अगस्त १९९९ छोडीकी गै सर्ग धारी धन्य हो
धन्य अखोडी धन्य हो
धन्य हिंदाव पट्टी धन्य हो

वो उत्तरखंड कू गांधी धन्य हो
बुरंसा बनी खिल्याँ धन्य हो
काफल जानी चखा धन्य हो
जुगराज रयां वों सदनी धन्य हो
य्खका मनखी बीरा धन्य हो
धन्य टिहरी गढ़वाल धन्य हो
धन्य मेरु उत्तराखंड धन्य हो

धन्य अखोडी धन्य हो
धन्य हिंदाव पट्टी धन्य हो
धन्य विश्वनाथ घाटी का वो बीर धन्य हो
धन्य टिहरी गढ़वाल धन्य हो
धन्य मेरु उत्तराखंड धन्य हो
धन्य मेरु इंद्रमणि बडोनी धन्य हो
धन्य हिन्द का सपूत धन्य हो

एक उत्तराखंडी

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श्री इंद्रमणि बडोनी

उत्तराखंड राज्य के आन्दोलन के प्रणेता लोकनायक श्री इंद्रमणि बडोनी का जन्म २४ दिसम्बर १९२४ को टिहरी गढ़वाल के ग्यारह गाँव हिंदाव पट्टी के अखोडी (विश्वनाथ घाटी से जाना जाता) हुवा था !

पर्वतीय प्रवेश मैं प्रारंभिक शिक्षा पोर्न कर बडोनी जी ने देहरादून से उच्च शिक्षा प्राप्त की!छात्र जीवन से ही बडोनी जी टिहरी रियासत की राजासाही के चुंगल मैं प्रजा के कष्टों से परिचित थे,स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद टिहरी रियासत का विलय हो जाने पर बडोनी जी न अपने क्षेत्र की सामाजिक सान्स्किर्तिक गति विधियों से जुड़े गए !

वह सन १९६२ में जखोली विकासखंड के प्र्मिख पद पर निर्वाचित हुए तथा १९६७ में प्रथम बार गढ़वाल के देवप्रयाग क्षेत्र से उत्तरप्रदेश विधान सभा के लिए चुने गए थे !ये बडोनी जी का ही सपना था की उनकी जन्म भूमि अखोडी को उत्तराखंड के लोग विश्वनाथ घाटी के नाम से जाने !



एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

PhotoTimeline Photos माँ कू डोला मुम्बई मा
 
ऊँचा पहाडा की मात तेरु सदा जयकार
कुमो गढ़वाल उत्तराखंड की मात तेरु सदा जयकार

कंन धूम मची चा
मुम्बई की सड़कीयों मा
कंन धूम मची चा हो हो अ
कंन धूम मची चा

माँ कू डोला
जख जख जणू
बोई की जयकार ल्गाणु
बोई की जयकार ल्गाणु या
कंन धूम मची चा
मुम्बई की सड़कीयों मा
कंन धूम मची चा

नाक मा नथुली
मुड्मा सौभग्याईण
बाट्मा श्री फल धैरयुंचा
लाल पिंगली रंगा डोळ सज्युंचा या
कंन धूम मची चा
मुम्बई की सड़कीयों मा
कंन धूम मची चा

माँ नंदा ऐगे
दर्शनों को प्रवाशी घरों मा
उत्तराखंडा छोडयाँ अपरू मा
चल जोंला सखी दर्शनों कू 
कंन धूम मची चा
मुम्बई की सड़कीयों मा
कंन धूम मची चा

कंन धूम मची चा
मुम्बई की सड़कीयों मा
कंन धूम मची चा हो हो अ
कंन धूम मची चा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ51 minutes agoआज की प्रेम कहनी

दिल में छुपा रखा था वो मै दिखा रहा हूँ आज
नैनों से प्यार की भाषा चलती थी कभी अब हाथों से जता रहा हूँ आज
क्या सीख था मैने क्या सिखा रहा हूँ आज

दर्द था इतना मुझे कुछ इस तरह उसे अपना बना रहा हूँ आज
कुछ सिक्के इधर तो मै कुछ सिक्के उधर उछाल रहा हूँ आज
दिल में छुपा रखा था वो मै दिखा रहा हूँ आज

बदल गया हूँ मै कुछ इस तरह तुम कुछ बदल गयी हो आज
जो कभी ढंका हुआ था कुछ इस तरह क्यों खुला हुआ है आज
क्या सीख था मैने क्या सिखा रहा हूँ आज

आने दो आने की तरह गुम है वो प्रेम एक दूजे वाला आज
सांसों कि रफ़्तार की तरह चढ़ता उतरता कलयुगी प्रेम बुखार आज
दिल में छुपा रखा था वो मै दिखा रहा हूँ आज

कवी दिल सोचता है कँहा खो गई वो प्रेम की बहार आज
पतझड़ मै भी जिसके आने से कभी आ जाती वो बसंत बहार
क्या सीख था मैने क्या सिखा रहा हूँ आज

दिल में छुपा रखा था वो मै दिखा रहा हूँ आज
नैनों से प्यार की भाषा चलती थी कभी अब हाथों से जता रहो आज
क्या सीख था मैने क्या सिखा रहा हूँ आज

एक उत्तराखंडी

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वो है अटल

अडिग रहा राह बड़ी
ना झुकनेवाला वो ज़िद्दी
कठोर, मज़बूत इरादों पाला
हठीला है वो है अटल

अविचल, अचल, छवी भरा
दृढ़,स्थिर वो मन सरोवर
कवी हिर्दय कमल सुंदर 
समबुद्धि से पग पघारे पथ 
हठीला है वो है अटल

अनिवार्य ही रहा अनंत
ठोस उसका रहा वो पल
कल-कल मुंज मुस्कानधारा
बहती रही वो सतत
हठीला है वो है अटल

अडिग रहा राह बड़ी
ना झुकनेवाला वो ज़िद्दी
कठोर, मज़बूत इरादों पाला
हठीला है वो है अटल


एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
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अटल बिहारी वाजपेयी


जन्म दिन की बहुत बहुत बधाइयां


अटल बिहारी वाजपेयी (जन्म: २५ दिसंबर, १९२४ ग्वालियर) भारत के पूर्व प्रधान मंत्री हैं। वे भारतीय जनसंघ की स्थापना करने वालों में से एक हैं और १९६८ से १९७३ तक उसके अध्यक्ष भी रहे। वे जीवन भर भारतीय राजनीति में सक्रिय रहे। उन्होने लम्बे समय तक राष्ट्रधर्म, पांचजन्य और वीर अर्जुन आदि राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत अनेक पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया। उन्होंने अपना जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रूप में आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प लेकर प्रारम्भ किया था और देश के सर्वोच्च पद पर पहुँचने तक उस संकल्प को पूरी निष्ठा से निभाया।


राजनीतिक जीवन


वह भारतीय जनसंघ की स्थापना करने वालों में से एक हैं और सन् १९६८ से १९७३ तक वह उसके अध्यक्ष भी रह चुके हैं। सन् १९५५ में उन्होंने पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा, परन्तु सफलता नहीं मिली लेकिन हिम्मत नहीं हारी और सन् १९५७ में बलरामपुर (जिला गोण्डा, उत्तर प्रदेश) से जनसंघ के प्रत्याशी के रूप में विजयी होकर लोकसभा में पहुँच कर ही दम लिया। सन् १९५७ से १९७७ तक जनता पार्टी की स्थापना तक वे बीस वर्ष तक लगातार जनसंघ के संसदीय दल के नेता रहे। सन् १९६८ से ७३ तक वे भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर आसीन रहे। मोरारजी देसाई की सरकार में वह सन् १९७७ से १९७९ तक विदेश मंत्री रहे और विदेशों में भारत की छवि बनाई।१९८० में जनता पार्टी से असंतुष्ट होकर इन्होंने जनता पार्टी छोड़ दी और भारतीय जनता पार्टी की स्थापना में मदद की। ६ अप्रैल, १९८० में बनी भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद का दायित्व भी वाजपेयी जी को सौंपा गया। दो बार राज्यसभा के लिये भी निर्वाचित हुए। लोकतन्त्र के सजग प्रहरी अटल बिहारी वाजपेयी ने सन् १९९७ में प्रधानमंत्री के रूप में देश की बागडोर संभाली। १९ अप्रैल, १९९८ को पुनः प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और उनके नेतृत्व में १३ दलों की गठबन्धन सरकार ने पाँच वर्षों में देश के अन्दर प्रगति के अनेक आयाम छुए।सन् २००४ में कार्यकाल पूरा होने से पहले भयंकर गर्मी में सम्पन्न कराये गये लोकसभा चुनावों में भा०ज०पा० के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबन्धन (एन०डी०ए०) ने वाजपेयी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा और भारत उदय (अंग्रेजी में इण्डिया शाइनिंग) का नारा दिया। इस चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। ऐसी स्थिति में वामपंथी दलों के समर्थन से कांग्रेस ने भारत की केन्द्रीय सरकार पर कायम होने में सफलता प्राप्त की और भा०ज०पा० विपक्ष में बैठने को मजबूर हुई। सम्प्रति वे राजनीति से सन्यास ले चुके हैं।


कवि के रूप में अटल


अटल बिहारी वाजपेयी राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ एक कवि भी हैं। मेरी इक्यावन कविताएँ अटल जी का प्रसिद्ध काव्यसंग्रह है। वाजपेयी जी को काव्य रचनाशीलता एवं रसास्वाद के गुण विरासत में मिले हैं। उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी ग्वालियर रियासत में अपने समय के जाने-माने कवि थे। वे ब्रजभाषा और खड़ी बोली में काव्य रचना करते थे। पारिवारिक वातावरण साहित्यिक एवं काव्यमय होने के कारण उनकी रगों में काव्य रक्त-रस अनवरत घूमता रहा है। उनकी सर्व प्रथम कविता ताजमहल थी। इसमें ऋंगार रस के प्रेम प्रसून न चढ़ाकर "यक शहन्शाह ने बनवा के हसीं ताजमहल, हम हसीनों की मोहब्बत का उड़ाया है मजाक" की तरह उनका भी ध्यान ताजमहल के कारीगरों के शोषण पर ही गया। वास्तव में कोई भी कवि हृदय कभी कविता से वंचित नहीं रह सकता। राजनीति के साथ-साथ समष्टि एवं राष्ट्र के प्रति उनकी वैयक्तिक संवेदनशीलता आद्योपान्त प्रकट होती ही रही है। उनके संघर्षमय जीवन, परिवर्तनशील परिस्थितियाँ, राष्ट्रव्यापी आन्दोलन, जेल-जीवन आदि अनेकों आयामों के प्रभाव एवं अनुभूति ने काव्य में सदैव ही अभिव्यक्ति पायी।


अटल जी की प्रमुख रचनायें


उनकी कुछ प्रमुख प्रकाशित रचनाएँ इस प्रकार हैं :मृत्यु या हत्याअमर बलिदान (लोक सभा में अटल जी के वक्तव्यों का संग्रह)कैदी कविराय की कुण्डलियाँसंसद में तीन दशकअमर आग हैकुछ लेख: कुछ भाषणसेक्युलर वादराजनीति की रपटीली राहेंबिन्दु बिन्दु विचार, इत्यादि।


जीवन के कुछ प्रमुख तथ्य


अटल जी एक ऐसे नेता है जिन्होने जो देश-हित में था वही किया|आजीवन अविवाहित रहे।वे एक ओजस्वी एवं पटु वक्ता (ओरेटर) एवं सिद्ध हिन्दी कवि भी हैं।परमाणु शक्ति सम्पन्न देशों की संभावित नाराजगी से विचलित हुए बिना उन्होंने अग्नि-दो और परमाणु परीक्षण कर देश की सुरक्षा के लिये साहसी कदम भी उठाये। सन् १९९८ में राजस्थान के पोखरण में भारत का द्वितीय परमाणु परीक्षण किया जिसे अमेरिका की सी०आई०ए० को भनक तक नहीं लगने दी।अटल सबसे लम्बे समय तक सांसद रहे हैं और जवाहरलाल नेहरू व इंदिरा गांधी के बाद सबसे लम्बे समय तक गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री भी। वह पहले प्रधानमंत्री थे जिन्होंने गठबन्धन सरकार को न केवल स्थायित्व दिया अपितु सफलता पूर्वक से संचालित भी किया।अटल ही पहले विदेश मंत्री थे जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी में भाषण देकर भारत को गौरवान्वित किया था।इन सबसे अलग उनके व्यक्तित्व का सबसे बडा गुण है कि वे सीधे सच्चे व सरल इन्सान हैं। उनके जीवन में किसी भी मोड पर कभी कोई व्यक्तिगत विरोधाभास नहीं दिखा।


वाजपेयी सरकार के कार्य


सौ साल से भी ज्यादा पुराने कावेरी जल विवाद को सुलझाया। संरचनात्मक ढाँचे के लिए कार्यदल; सॉफ्टवेयर विकास के लिए सूचना एवं प्रौद्योगिकी कार्यदल; केन्द्रीय विद्युत नियामक आयोग आदि का गठन किया, साथ ही राष्ट्रीय राजमार्गों एवं हवाई अड्डों का विकास; नई टेलीकॉम नीति तथा कोकण रेलवे की शुरुआत आदि के माध्यम से बुनियादी संरचनात्मक ढाँचे को मजबूत करने वाले कदम उठाये। राष्ट्रीय सुरक्षा समिति, आर्थिक सलाह समिति, व्यापार एवं उद्योग समिति भी गठित कीं। इनके अलावा आवश्यक उपभोक्ता सामग्रियों की कीमतों को नियंत्रित करने के लिये मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन बुलाया, उड़ीसा के सर्वाधिक गरीब क्षेत्र के लिये सात सूत्रीय गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम शुरू किया, आवास निर्माण को प्रोत्साहन देने के लिए अर्बन सीलिंग एक्ट समाप्त किया तथा ग्रामीण रोजगार सृजन एवं विदेशों में बसे भारतीय मूल के लोगों के लिये बीमा योजना शुरू की। ये सारे तथ्य सरकारी विग्यप्तियों के माध्यम से समय समय पर प्रकाशित होते रहे हैं।


अटल जी की टिप्पणियाँ


चाहे प्रधान मन्त्री के पद पर रहे हों या नेता प्रतिपक्ष; बेशक देश की बात हो या क्रान्तिकारियों की, या फिर उनकी अपनी ही कविताओं की; नपी-तुली और बेवाक टिप्पणी करने में अटल जी कभी नहीं चूके। यहाँ पर उनकी कुछ टिप्पणियाँ दी जा रही हैं।"भारत को लेकर मेरी एक दृष्टि है- ऐसा भारत जो भूख, भय, निरक्षरता और अभाव से मुक्त हो।""क्रान्तिकारियों के साथ हमने न्याय नहीं किया, देशवासी महान क्रान्तिकारियों को भूल रहे हैं, आजादी के बाद अहिंसा के अतिरेक के कारण यह सब हुआ ।""मेरी कविता जंग का ऐलान है, पराजय की प्रस्तावना नहीं। वह हारे हुए सिपाही का नैराश्य-निनाद नहीं, जूझते योद्धा का जय-संकल्प है। वह निराशा का स्वर नहीं, आत्मविश्वास का जयघोष है।"


जय हिंद जय भारत

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

घोल मा च्यूं घोल

अब भी रयाँ सोचदा
अब भी रयाँ खोज्दा
ये टाक्कों थे मोज्दा
ये टाक्कों थे मोज्दा
घोल मा च्यूं घोल ...२ ....रै रे भुल्हा घोल मा च्यूं घोल

गोल गोल वा दिखणी
हरालू सी वा जचणी
क्ख्क च ईंको तोल भुल्हा
शाम सबैर जिकोडी मा झोल
घोल मा च्यूं घोल ...२ ....रै रे भुल्हा घोल मा च्यूं घोल

ना ईंको कोई बुबा
ना ईंकीं कोई बोई
ना दादा ना दीदी ना भुला ना भूली ...२
तू कै रास्ता कै बाटा भुली
खीचणे खीचणे वा ले जाँदी
घोल मा च्यूं घोल ...२ ....रै रे भुल्हा घोल मा च्यूं घोल

ब्याल बिसरी परबत बिसरी
घर दूँण गढ़वाल बिसरी
बंजा पुंगडा कैकी अब
ईंकीं माया मा जंगलात बिकी
कैगै गढ़ को बांटा धार
ऐ छाल पल छल वार पार
घोल मा च्यूं घोल ...२ ....रै रे भुल्हा घोल मा च्यूं घोल

अब भी रयाँ सोचदा
अब भी रयाँ खोज्दा
ये टाक्कों थे मोज्दा
ये टाक्कों थे मोज्दा
घोल मा च्यूं घोल ...२ ....रै रे भुल्हा घोल मा च्यूं घोल

एक उत्तराखंडी

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देव भूमि बद्री-केदार नाथYesterdayआज की प्रेम कहनी

दिल में छुपा रखा था वो मै दिखा रहा हूँ आज
नैनों से प्यार की भाषा चलती थी कभी अब हाथों से जता रहा हूँ आज
क्या सीख था मैने क्या सिखा रहा हूँ आज

दर्द था इतना मुझे कुछ इस तरह उसे अपना बना रहा हूँ आज
कुछ सिक्के इधर तो मै कुछ सिक्के उधर उछाल रहा हूँ आज
दिल में छुपा रखा था वो मै दिखा रहा हूँ आज

बदल गया हूँ मै कुछ इस तरह तुम कुछ बदल गयी हो आज
जो कभी ढंका हुआ था कुछ इस तरह क्यों खुला हुआ है आज
क्या सीख था मैने क्या सिखा रहा हूँ आज

आने दो आने की तरह गुम है वो प्रेम एक दूजे वाला आज
सांसों कि रफ़्तार की तरह चढ़ता उतरता कलयुगी प्रेम बुखार आज
दिल में छुपा रखा था वो मै दिखा रहा हूँ आज

कवी दिल सोचता है कँहा खो गई वो प्रेम की बहार आज
पतझड़ मै भी जिसके आने से कभी आ जाती वो बसंत बहार
क्या सीख था मैने क्या सिखा रहा हूँ आज

दिल में छुपा रखा था वो मै दिखा रहा हूँ आज
नैनों से प्यार की भाषा चलती थी कभी अब हाथों से जता रहो आज
क्या सीख था मैने क्या सिखा रहा हूँ आज

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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