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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Shailendra Joshi 

Yesterday at 7:47am ·

जै ढोल दमाऊ कु हमुन नि जानि
क्वी मोल
देखा कन्न भलु बजाणु
अमरिका कु स्टीफन फ्योल
जै ढोल दमाऊ कु हमुन नि जानि
क्वी मोल
देखा कन्न भली बजाणि
दिल्ली मा पली बढ़ी दीपा बार्बी डॉल

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

एक क्लिक मा नाता बणदा
एक क्लिक मा नाता टूटदा
नया जमाना मा दग्डया
दगडू येकू ही बोल्दा
हथगुलियो मा सरकणी च
सरसर टच की दुनिया
टच ह्वैकी भी अनटच सी लगणी
स्या लोली क्लिक की दुनिया ..............शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Shailendra Joshi 

March 19 at 5:27am ·

पहाड़ी सुरों की बार्बी डॉल
जिसके सुरों के बोल में
लय ताल अनमोल
जिसके गले के मुरखे खटके
हैँ जरा सबसे जुदा हटके
पतित पावन गीता
ऐसा ही गाती रहो दीपा

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Sudesh Bhatt with Hema Negi Karasi Hemu and 89 others.
Yesterday at 7:43am ·
ढडुवा बिरलु की लडै मा
चोर मुसु की रसांण अयीं च
गुत्थम गुत्था हुंणी लगीं
दुंली की मुसी भैर अयीं च
गाड गदनु क मुस बिरल
सौब पौंछी गेन ड्यारदूंण
मलै खांण कुन यीं कुर्सी पर
चोर मुसु की टक लगीं च
सरा कुडी खुमडोली तौंन
बिधानसभा भी बांजी करीं च
ढडुवा बिरलु की लडै मा
चौर मुसुक भी रसांण अयीं च
चंट मुस चलगैन दिल्ली
ढडुवा बिरलु की यख लडै मचीं च
गाजा बाजों क दगडी आल
मुस बिरल जब सरकार बंणाल
ढडुवा बिरलु की लडै मा
चोर मुसुक भी रसांण.....
सर्वाधिकार सुरक्षित @लेख..सुदेश भट्ट "दगडया" बुरा ना मानो तो होली है

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Vinod Kukreti

सडको की हालत नाजुक छीन उतराखणड मा।
विधायक घुमणक जया कुई जयपुर कुई कारबेट पार्क।
विधायक ता दिणाकुन 15 करोड़ रुपये छीन।
सडको कु बदहाली सुधरणकुन कोलतार नी च यकक।
क्या इदिन दिखणकू उतराखणड बणै छयाय बलिदान देकिन।
सरकार अपरी आपस मा मिली बाटिक खाणी च।
कुई पान चबाणी च कुई आमरस पीयाणी च।
जनता ता उक हक नी मिलीण च, जब काम करणा टाइम आणी च तब आचार संहिता लगणी च।
आखिर कुई काम त करी लणाव जनता क खातिर ।
या सदैन यननी दिन दिखणा रैली जनता।
ये नीलकंठ महादेव मंदिर के नजदीक पीपलकोटी की पिक्चर है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
22 hrs · New Delhi, India ·
बल भैजि परणाम.....
परणाम,
मैंन बोलि पछाण्नु निछौं,
भैजि हम आपकी कविता,
फेसबुक का माध्यम सी,
रोजाना पढ़दा छौं,
मैंन बोलि सौभाग्य मेरु,
कनि लगदिन मेरी कविता?
कुतग्याळि सी लगदिन,
पहाड़ आधारित होंदिन,
आपकी कविता......
मैं अपणि कविता का पाठकु कू हृदय सी आभार व्यक्त करदु। मंच का माध्यम सी ना सही, फेसबुक का माध्यम सी मैं आप तक अपणा कविमन का कबलाट तैं कविताओं का रुप मा पौंछौंदु रौलु। सच्चाई छ कबरि मेरा कविमन मा या बात औंदि गढ़वाळि कविता लेखन की डगर मा किलै पड़युं छौं। पर मैकु सुखद अहसास होंदु जब देश विदेश बिटि मेरी कविताओं का प्रेमी मैकु फोन करिक या संदेश का माध्यम सी मन की बात व्यक्त करदा छन। गढ़वाळि भाषा कू श्रृंगार मेरु संकल्प छ, जब तक यीं धरती मा रौलु।
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक 28.3.2016

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु 

March 23 at 10:48am · New Delhi, India ·
जुगराजि रै लाल भुला.....
भुला लाल चंद निराला,
देखण लग्युं लाल बुरांस,
भोळ होळी कू त्यौहार छ,
जगणि मन मा आस.....
सोचणु होळी खेलिक,
मन सी माैज मनौलु,
थोड़ा सी लगैक तब,
बिष्ट जी फर रंग लगौलु.....
जग्गू दिदा की जग्वाळ मा,
भ्वीं मा बैठि ध्यान लगौलु,
जथ्गा होलु भाग मा मेरा,
पीक भुरभिताळ बणि जौलु.....
जुगराजि रै लाल भुला तू,
हास्य की गंगा बगौंदु रै,
जथ्गा होलु भाग मा तेरा,
वथ्गा खांदु पेंदु रै......
- तेरु दिदा जग्गू
दिनांक 23.3.2016

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
March 21 at 9:49am · New Delhi, India ·
बखरवैं का बाखरा.....
बितगिक भगिग्यन,
बखरवै बिचारा कू,
मोळ माटु करग्यन,
बाग त पैलि बिटि,
दोब मा पड़युं थौ,
दोष बखरवै कू छ,
समाळि नि सकि,
अपणा बाखरौं,
वेकी नजर त,
घैल घोड़ा फर थै.....
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
कबलाट मेरा कविमन कू
21.3.2016

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
March 18 at 3:48pm · New Delhi, India ·
अहसास मेरु....
दिल्ली अयां मैकु,
कै साल ह्वेग्यन,
ब्वे बाब स्वर्गवासी ह्रवैन,
कूड़ी पुंगड़ि बंजेग्यन,
आवाद रखणु बस कू निछ,
नौकरी आवाद रख्णु छौं,
पर जख्या तख्खि छौं
एक दिन सोचि मन मा,
क्या मिलि मैकु?
मिलि त एक नौकरी,
दंवाळा फर सी बंध्युं छौं,
सुबेर जांदु ब्याखुनि बग्त,
जेब कतरौं सी बचिक,
घर बौड़िक औंदु,
बस की जग्वाळ मा,
जिंदगी बितौन्दु,
गाड़्यौं का भिभड़ाट मा,
मोटर सैकिल चलौण कू,
सूर सांसू नि औन्दु,
बोल्दन लोग मैकु,
आपकी नौकरी सरकारी,
तुमारी मौज छ भारी,
घुण्डु हि जाण्लु या पठठु,
कनि मौज होणि छ।
गढ़वाळि मा बोल्दन,
दिल्ली गयौं भाड़ हि झोकी,
बात सच लगणि छ,
रिटैरमेंट का कुछ साल छन,
मेरा गौं का न्यौड़ु,
प्रधान मंत्री ग्राम सड़क,
योजना का तहत बण्नि छ,
सैत लौटिक जौलु,
अपणा प्यारा गौं मुल्क,
मन मा आस जगणि छ....
अहसास मेरु,
मैकु बाटु बतौणु छ,
उत्तराखंड की धरती कू,
श्रृंगार मेरा हात सी हो,
मन मा आस जगौणु छ......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू,
मेरा कविमन कू कबलाट
दिनांक 18.3.2016

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मेरी गढ़वाली कविताएँ
Updated last Tuesday
पहाड़ को भूल जाऊं... ऐसा कैसे हो सकता है. पहाड़ छोड़ दूर "दर्द भरी दिल्ली" कर्मभूमि प्रवास हो गया...लेकिन! मेरा कविमन मुझे छोड़ विद्रोह करके उत्तराखण्ड की वादियों में कल्पना में विचरण करता है. भाव उतरते हैं और लेखनी से लिखता हूँ।

"कितनी सुन्दर देवभूमि, देखूं उड़कर अनंत आकाश से, नदी पर्वतों को निहारूं, जाकर बिल्कुल पास से....
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जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासू"