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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

काली की ताली
हे चामुण्डा अब सरहद पर त्रिशूलों का जाल बिछादे
षडयन्त्रो से फौज मरी है,जा माँ जीवन जोत जगादे
सब राजनीति तू देख रही हैे चोर-चोर मौसेरे भाई
राजनीति के कारण सरहद पर सैना ने जान गवाँयी
ऐसी कूटनीति भारत की, माँ इस पर तू आग लगादे
हे चामुण्डा अब सरहद पर त्रिशूलों का जाल बिछादे
सत्ता के कारण माँ देखो ,दुश्मन के भी गले लगे हैं
भाषण सुनकर समझे थे,अब भारत के भाग्य जगे हैं
चौबीस घण्टे के भीतर ही जहर दिलों का बाहर आया
मेरे घर की रोटी खाकर, पाकिस्तानी फतवा गाया
कुछ तो ऐसा करदे मैय्या, इनको सरहद पार भगादे
हे चामुण्डा अब सरहद पर त्रिशूलों का जाल बिछादे
सात दशक से लावारिस को ये भारत ही झेल रहा हेै
बे-शर्मी और हिम्मत देखो, आतंको से खेल रहा है
रामनाम की माला जपकर मौन हुये हम देख रहे है
ये अल्लाह के गन्दे, बन्दे अपनी रोटी सेंक रहे हेै
बहुत होगया मां सुरकण्डा इनको अब औकात दिखादे
हे चामुण्डा अब सरहद पर त्रिशूलों का जाल बिछादे
पाकस्तिानी औलादों को , मेरा घर ही पाल रहा हेै
अरब खरब का खर्चा करके राष्ट्र-भक्ति में ढाल रहा है
इन सर्पों को दूध पिला कर नाग - पंचमी मना रहा हेै
चिडियाघर के आतंको से अपनी इज्जत बना रहा है
हे रणचण्डी, नर-मुण्डो की कण्ठी - माला पुनःसजादे
हे चामुण्डा अब सरहद पर त्रिशूलों का जाल बिछादे
हाफिज और गिलानी मुर्दे कुत्तों जैसे भौंक रहे हैं
मियां नवाज,आतंकी,फौजी दाल सियासी छौंक रहे हैं
अब चीन को बाप बनाकर चरण चोर के पकड रहे हैं
ये लावारिस नये बाप की धौंस जमाकर अकड रहे हैं
हे राजेश्वरी,हे पुण्यासिनी, इनको अपना ऱूप दिखा दे
हे चामुण्डा अब सरहद पर त्रिशूलों का जाल बिछादे
सभी फिदाइन और आतंकी कुत्ते जैसे गली में घूमें
प्राणों की सब भीख मांगते, भारत के चरणों को चूमें
अमन-चैन को चाहने वाली जनता इनके जूत लगाये
आतंकवाद को पालने वाली फौजों को रस्ते पर लाये
हिंगलास की देवी माता जीवन जीना इन्हे सिखादे
हे चामुण्डा अब सरहद पर त्रिशूलों का जाल बिछादे
भारत में भी राजनीति के सुर-संगम क्यों डोल रहे हैं
अपने ढंग से सभी विरोधी, कर्कस स्वर में बोल रहे हैं
फौज मौन है, सभी विपक्षी नेता ही बस आज जगे हैं
राजनीति की भांषा देखो, लगता है,बस, यही सगे है
कविआग की विनती सुनले,वो रणभेरी फिर से गादे
हे चामुण्डा अब सरहद पर त्रिशूलों का जाल बिछादे।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

पहाड़ को भूल जाऊं... ऐसा कैसे हो सकता है. पहाड़ छोड़ दूर "दर्द भरी दिल्ली" कर्मभूमि प्रवास हो गया...लेकिन! मेरा कविमन मुझे छोड़ विद्रोह करके उत्तराखण्ड की वादियों में कल्पना में विचरण करता है. भाव उतरते हैं और लेखनी से लिखता हूँ।

"कितनी सुन्दर देवभूमि, देखूं उड़कर अनंत आकाश से, नदी पर्वतों को निहारूं, जाकर बिल्कुल पास से....
-
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासू"

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Dinesh Dhyani 
September 26 at 11:19am ·
चला एक दिन यनु काम करदां,
मिलि बैठि कि आपरी भाषा परैं छवीं लगौंदा
भौत टैम ह्वेगे क्वी छव्वी न क्वी बता ह्वेन
तसल्ली से कबरी भाषा की धाद लगौंदा।
कनु रालु?

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

हैंसदी रै ख्यल्दी रै,
टिकुली बिंदुली चमकदी रै,
मुंड मा सिंदूर तेरो,
फूलु सी डाली हैंसदी रै।
द्वी हथी चुडयुं न भरै,
हतेली मा मेहंदी रचदी रैन,
नाक मा फुल की चमक,
खुट्य माुं पैजीब बजदी रैन।
हैंसदी रै ख्यल्दी रै,
टिकुली बिंदुली चमकदी रै,
देवी दयबतों की दीदी भुली
आशीर्वाद तुमतै मिलणा रैन।
घर ह्वा या परदेश स्वामी,
सुखी श्यांदी रखणा रैन,
तेरी दुनिया की डाली मा दीदी,
खुशियों क फूल लगदी रैन।
तेरी जुनी सी ऊज्याली मुखडी,
मुल मुल हैंसदी रैन,
हैंसदी रै ख्यल्दी रै,
तेरी टिकुली बिंदुली....
सर्वाधिकार सुरक्षित@सुदेश भटट(दगडया) व खुदेड़ डाँडी काँठी की करवाचौथ पर दीदी भूल्युं कुन सादर सप्रेम भेंट।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कुडी क यैथर पैथर
डाल जम्यां छन पाड मा
तालों पर भी फांक फूट्यां छन
चाबी धरीं च बंबै मा
बचपन भीतर ग्वाडी गुडी की
तालु लगै की चली गेनी
गोर कसयुं जोग कैकी जु
भांड ठंटर्यों तै दे गेनी
बुबा ददों की समलौंण यख
आज दिखेंणी जरा जरा
यनी डाल जामल भीतर्युं पर
वा भी दबे जाली कैदिन सरा
कुडी क दार पटल टुटगेन
गैंणा गिंण्यांणा भीतर बीटी
यीं कुडी क मौ भग्यानी
बंबै दिल्ली गेन जब बिटी
बौडी की यैजा दगड्यों म्यार
बचपन अपणु टीपी जा
बुबा ददों की यीं समलौंण तै
द्वी हथ्युं न उकरी जा
कुडी क यैथर पैथर
डाल जम्यां छन पाड मा
तालों पर भी डाल जम्यां छन
चाबी धरीं च बंबै.....
सर्वाधिकार सुरक्षित लेख@सुदेश भट्ट "दगडया"फोटो साभार रायल्स आफ मागथा से अलकेश कुकरेती व के.बी.एम से राकेश कुकरेती जी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

गढ़वाली तथ्यों पर रिसर्च
" फुक्यूँ भात " खाने से शादी के दिन बारिस क्यों होती है।
" मनखी को लांघने " से उसकी उम्र कम क्यों होती है।
" रुम्क बक्त " घर में झाड़ू क्यों नही लगाते।
" बरखा अर घाम " अगर एक साथ हो रहा हो तो सियार की शादी हो रही होती है। क्यों
" भांडू हाथ बटी छुटिगी " तो घर में मेहमान आ रहे हैं। क्यों
" लाल साड़ी पहनी तै " खबेस लगता है। क्यों
" ब्वाने मारी तै " बाघ ले जाता है। क्यों
" उल्लू कु बस्यु " खराब होता है। क्यों
" स्याल कु रोयुं " किसी की मृत्यु। क्यों
" जिठाणा कु ब्वारी पर लगण " जेठ को नहाना क्यों पड़ता है।
" बिरला की औंर " देखने से आदमी धनवान क्यों होता है।
" पांणी कु भरयु बंठा " यात्रा के लिए जाते समय देखने से बहुत शुभ क्यों माना जाता है

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Roop Chand Jakhmola with Harak Singh Rawat II and 34 others.
18 hrs ·
श्री नरेन्द्र सिंह नेगी जी के लिये लिखी कविता
गीत गंगा बगै तुमुन / खैरी विपदा लगै तुमुन
कभी सीला - पाखों रीटी / कन घुघूती घुरै तुमुन
मेला खौलौं मा घूमी / कनि बांद खुजै तुमुन
वे विलेती भीना तेइ / रोट अरसा चखै तुमुन
सौ कु नोट सुट्ट करी / बौ की जिकुड़ी झुरै तुमुन
रूआँ धुआँ सी खौलेकि / कनि माया लगै तुमुन
सलण्या साली सुरक-२ / ये मुलुक बुलै तुमुन
नयु २ ब्यो छौउ जबरी / मीठी-२ छवीं लगै तुमुन
दिल्ली वला द्यूर दगड़ी / बौ की खैरी लगै तुमुन
चुल्लु जगान्दि वक़्त भैजि / उंकी याद दिलै तुमुन
ईं ज्वनि कु राज पाठ / कब तै रौलू बतै तुमुन
मेरी शूर्मा सरेला शूर्मा / ज्वांनो तै रटै तुमुन
कनु लड़ीक बिगड़ी मेरु / ब्वारी करी बतै तुमुन
सुरसुरया बथों मा भैजी / ग्यों की दौऊँ रीटै तुमुन
रीता भांडा भोर देनी / अंसधरी चुभै की तुमुन
सौंण बरखी भादों बरखी / हीया भी नि भीजै तुमुन
सर बिरली बणैकी वींतै / इं डंडयाली बुलै तुमुन
ध्यूू करी धूपणू करी / रूसयीं बौ मनै तुमुन
मेरी उमा कै बानो भैजी / डंडयाली भैर बुलै तुमुन
परसी देखि छज्जा मा छैई / ब्याली सुप्न्या बुलै तुमुन
वींका रूपै झौल मा / नौणु सी ज्यू गले तुमुन
हौंसिया उमर मा भैजी / जूनी टक़ लगै तुमुनआंख्यों बटी फरार ह्वे ज्वा / वींतै लाटी चितै तुमुन
स्वीं सैं ना खबर करी / सुरक सुप्न्या बुलै तुमुन
कू ढुंगू नी पूजी इख / कै डांडा नी खुजै तुमुन
जूड़ी माया की हे भैजी / अपड़ा गौला पैरै तुमुन
सला बिरणी , सगोर अपरू / नि खै जाणी बतै तुमुन
ढ़ेबरा बखरा हरचनी त / कख -२ नी खुजै तुमुन
समद्वौला का द्वी दिन / समधणिया धोरा बितै तुमुन
तीलू बाखरी हे दीदा / सैरी मुंथा खुजै तुमुन
दादा अर ह्यूंद क्या बोन / कनि कथा मिसै तुमुन
उठा जागा उत्तराखंडियों / धै लगैकी बिजै तुमुन
ना काटा तौं डाल्यूं बोली / जल जंगल भी बचै तुमुन
मेरी डांडी काठयों का मुल्क़ / बसंती फूल खिलै तुमुन
नौछम्मी नारैण गैकी / सरकार भी हिलै तुमुन
अब कथगा खैल्यू बोलि / नेतौं तैभि दगै तुमुन
बावन गढ़ूं क देश / कनि आस जगै तुमुन
बाग़ मनु उत्तराखंड मा / जसपाल राणा बुलै तुमुन
तिन कपाली पकड़ी रोण / वीमा पैली बतै तुमुन
तीतरी फँसैं चखुली फँसैं / कागा कन्मा फँसैं तुमुन
बनी - बनी का गीत मिसैं / सर्या थाती बचै तुमुन
जुगराज रयां नेगी जी तुम / गीतवीं गंगा बगै तुमुन
जुगराज रयां नेगी जी तुम / गीतवीं गंगा बगै तुमुन ।।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

झपन्यली डाली जब हुलि
झपन्यली डाली जब हुलि
पहाड़ मा डुळ डुळ करणी
घुळयालिन घल्ळकि
कैकी तांसी हुलि हुर हुर करणी
हल्दों औरृ चवलों को
पिठा जबै सेवा हुळो कैकु लगाणु
रूप्योंबाजों का किसा को
मुंड हुळो अब कुर कुर करनू
जख हौळ कुणा मा
अब यकळो यकळो हुळो बैठियों
वख पोट्गी कि लथाडो
हुळो अब चुर चुर करनू
जख देखेन जांद छे
माया को झल्ळ झल्ळ झल्ळर
आज कख ळूकयों हुळो
झणी मेरु मायादार पहाड़
झपन्यली डाली जब हुलि
पहाड़ मा डुळ डुळ करणी .....
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

टेढ़ा मेढ़ा बाटों मा
टेढ़ा मेढ़ा बाटों मा
(हम मिल्दा रयां सदा ) ..... २
ऐ फूल बण बणिक का
इनि खिल्दा रयां सदा
टेढ़ा मेढ़ा बाटों मा ......
पुंगडा अर बणौ को
(दुःख जाणुलू क़्या क्वी ) ..... २
भौत द्यखीन मिल बी
मेरु पहाड़ जनि ना क्वी
टेढ़ा मेढ़ा बाटों मा ......
मजबूरी का नाच
(यख नचदा छन सबी ) ..... २
उम्मीद की झोळो लेकि
अब बी खड़ो च ऐ कबी
टेढ़ा मेढ़ा बाटों मा ......
गंगा की ऐ धारा बी
(अपड़ो मुख खुलालि कबि ) ..... २
एक दिस सुख आलो ऐ बाटा
रोज बोल्नु च ऐ रबि
टेढ़ा मेढ़ा बाटों मा ......
बालकृष्ण डी ध्यानी
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द्वि मन का पिछणे पिछणे
द्वि मन का पिछणे पिछणे
मि अटगी गीयूं
यूँ बीच का घंघतोळ मा
मि फिर फंसीगीयूं
रैं नि मिथे अपड़ी खबर
रोज पड़दो मि दुनिया की खबर
पड़दा पड़दा दुनिया की खबर
लाख चौरासी का बाटा थे
मि फिर बिरड़ी गीयूं
द्वि मन का पिछणे पिछणे
मि अटगी गीयूं
सबैर शाम इन ऐ मेरु सफर
कख चुलै कख मा पकड़
ऐ चुलै औरि पकड़ा पकड़ी मा
वै काल की फांस मा
मि फिर इन फंसीगीयूं
द्वि मन का पिछणे पिछणे
मि अटगी गीयूं
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