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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Umesh Tamta 
January 3 at 6:10pm ·

चोरी कखिड़ि बिराणी सगोड़ी की सी छै वा..
सवदि इनि कि पैणा की पकोड़ी सी छै वा...
मरचण्या खाणा मा खीर जनि मिट्ठी सी..
दूर परदेश मा घौर की चिट्ठी सी कख देखी होली
सुपन्यू ह्वे होलू कि बैम रै होलू..

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Darsansingh Rawat
January 2 at 11:56pm ·
जख रैंदा त्वे सुमरंदा,बद्री तेरी संतान हम।
थान बनाणा वसई म,कोशिश म लग्यां हम
प्रार्थना विश्व शान्ती,बद्री त्वे सी चांदा हम।
गुण गांदा त्यरा प्रभु,तपोभूम्या मनखी हम।
हे नर नारायण देव,कर्म अपणु करणा हम।
करि सुफलु हे देवाधि, चरण वंदना म हम।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Darsansingh Rawat

January 2 at 1:04am ·

सत्रहु साल लगी,बचपन जवनी म बदली।
आश्वासनो की ढेर,पर जिन्दगी नि बदली।
सरकार बदलिणी रै,गौं गल्याऊ भी बदली
गौं का मनख्यो की,गाँव छोड़णु नि बदली।
नि बदली खैरि दुख, पहाड़ो की नि बदली।
हाँ नि बदली भै मुखड़ी, हैंसंदी नि बदली।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Darsansingh Rawat
December 30, 2016 at 8:19pm ·
कथा कृष्ण की,धरती संतभूमि महाराष्ट्र की
वाणी रघुवीरदास की,भूमि बद्री विशाल की
अमृत श्रवण प्रभुलीला,दगड़ी कृष्ण प्रभु की
प्रफुलित पवित्र मन, समलोण जिन्दगी की
मिललु वक्त मनख्यो,भेटि लेण भूमि बद्रीकी
चार दिन की चाॅदनी,मिलली शरण प्रभु की
"""""""""जय""बद्री""विशाल"""""""

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जब बिटी की मोबाईल
बजारू मा क्या आई
तब बिटी की सब
नाता रिस्तेदारू यक
आणू जाणू सब छुटि ग्याई
जब बिटी की मोबाईल
बजारु मा क्या आई
पैली चिठी पत्रियू कू
सार लगयू राद छा
चिठी पत्रियू मा
प्यार और उलार दिख्याद छा
अब त मोबाईल पर
इक घडी मा बात हुव्ये जाद
पल भर मा देश विदेश
की खबर सार मिल जाद
जै टैम पर मैबाईल नी छाई
नौनू द्वि चार मैणा मा
घार ऐ जादू छाई
जब बिटी की मोबाईल
बजारू मा क्या आई
पैली हतयू मा घडी
पैरी राद छाई
बगत दिखण हुआ त
बाबा जी समलोण दी
घडीमा बगत देखी लियाद छाई
अब त मोबाईलू मा
ही बगत दिख्याणा छन
बाबा जी समलोण दि घडी
आलमारी मा बन्द करी
झणी के कुणिया धरिया छन
जब बिटी की मोबाईल
बजारु मा क्या आई
पैली घरू मा सभियू क दगडी
बैठी की ठट्टा मजाक
करद छाई
अब त वू भी खत्म
हुणू लगयू चा
सभी अपडा मोबाईल
हत्यू मा लेकी
व्टस्प और फेशबूक मा
व्यस्त हुया छन
सोशल साईड की बनोटी दुनिया
कुछ पहचाण कुछ आजाण
हजारो दगड्डया बणया छन
अर वास्तव मा सभी का सभी
इखुली छन खाली छन फिर
झणी क व्यस्त हुया छन
जब बिटी की मोबाईल
बजारु मा क्या आई
नाता रिस्तेदारू यख
आण जाण छुटिग्याई
जब बिटी की मोबाईल
बजारू मा क्या आई ।
सर्वाधिकार सुरक्षित@ दीपक नेगी गढप्रेमी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ब्वडा बाग बण्युं थौ.....
चिल्म चोरी कैन वेकि,
तमाखु प्येण कखन थौ,
इलै बाग बण्युं ब्वडा
देखा हयूंद लग्युं छ......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
दिनांक 12.1.2017

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
January 11 at 10:10am · New Delhi ·
मन की बात मन मा रैगि.....
स्वचि थौ मिललु मैं,
कलशा ऊरेयां कवि सम्मेलन मा,
न्यूत्यां कवियौं तैं,
मन की बात मन मा रैगि,
देखि रात भौत ह्वेगि,
तब चलिग्यौं अपणा घौर,
बधाणि जी अर मुरली दीवान की,
कवि केदारखण्डी जी की,
कविता सुणिक छप छपि सी पड़ि,
दर्द भरीं या दिल्ली भारी,
यी हिछन यख लाचारी,
कवि मंच मा कैद था,
कन्न भी क्या थौ तब,
मिन्नु नि रै होलु भाग मा,
मन मा कसक होणि भारी......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
दिनांक 11.1.2017

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
January 3 at 10:13am · New Delhi ·
जब हम नि रौला,
अपणि कालजई रचनाओं मा,
शब्द बणिक बसि जौला.....
-कवि जिज्ञासू, 3/1/2017

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
January 2 at 10:20am · New Delhi ·
ढुंगा मा बैठि....
स्वचणु छौं मैं,
क्या ख्वे अर क्या पाई,
द्वी हजार सोळा बितिगी,
मन अपणु समझाई......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

~मेरा पहाड़ ......~
पहाड़ो से
मेरा रिश्ता कायम है
जन्मभूमि की खुशबू
रची बसी है रोम रोम में
इसलिए उसकी पीड़ा भी
महसूस कर पाता हूँ
विकास के लिए हो या
किसी आपदा का शिकार हो
पहाड़ ने विनाश झेला हो
मेरे पहाड़ ने
जब - तब जख्म खाए है
सहनशीलता का
पर्यायवाची है मेरा पहाड़
और ऊंचाई
उसका मान सम्मान है
कठोरता और अडिगता
ही उसकी पहचान है
लेकिन मेरा पहाड़
संवेद्नाओं से भरपूर है
पहाड़ को पहाड़ में रह कर देखा
पहाड़ को नजदीक से देखा
पहाड़ को दूर से देखा
पहाड़ को दूर रहकर महसूस किया
पहाड़ से प्यार जस का तस है
पहाड़ी पहचान पा गौरंविंत हूँ
पहाड़ कोई भी हो
अपना सा लगता है
मेरे अंदर भी एक पहाड़ है
भूले बिसरे ही सही
पहाड़ जिन्दा हो उठता है
अपनी कहता अपनी सुनाता है
दूर रहकर भी मुझमे बसता है
और मुझमे बसे पहाड़ को
कभी मरने नहीं देता........
- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल १०/०१/२०१७