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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

आस
जबैर मेर स्वास
मेर दगड मेर दगड़ू छोड़ देल
तबैर बी मेर ऐ यात्रा खत्म हुलि ना
चार लाकुडु दगड
मेर ऐ आस कया जळलि
राख हुन्दा वो मेरा फिनका
वै माटु का अंग्वाळा दगडी बी
मेरा ऊ सुपनिया स्याळा ना
भटक दा राला वा
पर वैकु छैल पड़लू ना
अंकगणिता का इच्छा
जंण झट कैरी की खत्म नि हुन्दा
वा जलदा रैंदा ठंडू जून जणी
वा जलदा रैंदा चमकदा गैणा जणी
रात हुलि जब
अंधारु गजबज कणु हुलु तब
ब्यौखोनि बेल हुलि
काला कपड़ा पैनी कि ऊ
वै बगता मां
सूरज उदय हुनू हुलु कखि
वैकि आग बी शांत ना हुलि
शांत ह्वैगे हुली माशाल
फिर जळालि
नाराज वो हाथ
फिर शुरू व्हाला
एक नै यात्रा कु
वै बाटा धैरी की ऊ
गाठलु
परिवर्तना कु क्षतिज
तबैर तक वैकि परेली
चक्रचाल मां बी झप नि कैल
जबैर मेर स्वास ....
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कैथे खोज्णु छै
कैथे खोज्णु छै
ऐ जियु तू कैथे खोज्णु छै
ऐ स्वास बी बिराणी रे
बस आंदि जांदी छै
कैथे खोज्णु छै ..........
मौल्यार कु कंडू छै
ऐ उजाड़ा कु तू धांडू छै
ऐ आँखि भाति रौड़ी गैनी
बस अंद्यरु कु बाटु छै
कैथे खोज्णु छै ..........
तन कि पीड़ा छै
ऐ मन कु तू विपदा छै
अपणा बारा अपणु बाना रे
तू कख कख दौड़ी छै
कैथे खोज्णु छै ..........
छैल छबीली दुन्या छै
ऐ रंग रंगीली दुन्या छै
इं भूल भूल्या दुन्यामां
तू कै बाटा बिरड़ी छै
कैथे खोज्णु छै ..........
बालकृष्ण डी ध्यानी
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किलै लग्यां छा
किलै लग्यां छा
तुम सबी मेर जग्वाल मां
मि त एक सुधि ढुंग छो
वै बगदि न्यार मां
क्य मिथे समझि सकद
तुम आच ब्याळ मां
कैपर छ लगणू हुलु
मि घात बणी खडयाळ मां
छन छक्वैक कि
गुसैण रौड़ी जाणी गौठयार मां
कुटुमदारी कु दुधे गिलास
छुटेगे मेर मठयाण मां
किलै लग्यां छा .....
बालकृष्ण डी ध्यानी
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तेरी खुद मां मेरु जग्वाळ बी
तेरी खुद मां मेरु जग्वाळ बी
फीको पौड़ ग्याई ..... निर्भगी फीको पौड़ ग्याई
रो रो की मेरा द्वि आंखा दगड बी
ऐ जिकोडो रो द्याई .. मेरु जिकोडो रो द्याई
बुरांस जनि सजी आँखी डालि डालियों मां
पत्ता पत्ता थे ऊ मेरु दसा सुणणा लगि छे
सुण सुण कि ई लाटी डाली बोटी बी
अब मेर दगड दगड कमल्हण लगीं छे
रो रो की मेरा द्वि आंखा दगड बी
ऐ बुरांस बी रो द्याई .. ऐ पत्ता बी रो द्याई
पिंगली जलेबी देखि देखि खुद तेरी आंद
मिथि मिथि रसीली पाक जनि याद मां तेर ले जांद
फेर फक फके कि तेल कु गरम् उबाल कु तौल मां
रति बेराती मिथे तेरु दगड ऊ खूब पकांद
रो रो की मेरा द्वि आंखा दगड बी
ऐ पिंगली जलेबी रो द्याई .. ऐ रसीली पाक बी रो द्याई
तेरी खुद मां मेरु जग्वाळ बी
फीको पौड़ ग्याई ..... निर्भगी फीको पौड़ ग्याई
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अफी -अफी बिरडणु छौं
अफी -अफी बिरडणु छौं
अप्ड़ी ही बणाई ई बिराणी दुनिया मां
ना त बेल च मेर पास ना त सबेर च
ना त पास छौं मि ना मि फेल च
फिर बी कै दुलण दुलण मि सिरणो छौं
कन क्वे रचाई मिल ऐ खेळ अब सोचणु छौं
अफी -अफी बिरडणु छौं .......
कबि यख छौं मि कबि वख छौं मि
पता नि मिथे मि कख कख छौं मि
जख मिथे छौं जी रैन वखि नि छौं मि
ऊँ सब थे मिल कन क्वे फुंडु चुलाई जी
फिर बी कै दुलण दुलण मि सिरणो छौं
कन क्वे रचाई मिल ऐ खेळ अब सोचणु छौं
अफी -अफी बिरडणु छौं .......
पिछनै पिछनै सरकयली मिल ऊँ बाटा
जै बाटों मिथे कबि चुबदा छन ऊँ कांटा
मेरा मुंडमां बि अबि बी तक ऊ बात नि आई
कन कन कैरी की पौटगी भोरदि छे मेर माई
फिर बी कै दुलण दुलण मि सिरणो छौं
कन क्वे रचाई मिल ऐ खेळ अब सोचणु छौं
अफी -अफी बिरडणु छौं .......
बालकृष्ण डी ध्यानी
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फिर बी त ऐ आस छे
फिर बी त ऐ आस छे
ये जियु किले तू उदास छे
आणि जाणी वाळी सांस ये
ये तर अब बी अप्ड़ पास छे
आज नि हुळू भौळ त हुळू
अजी हां ये बात त छे
पहाड़ मा बिकास को नोऊ छे
ऊ बी नऊ दर्जा द्वि दफा फेल छे
खिल्दा फूल हैंस ही जाला
कंडो थे तिळ किलै इल्जाम दे
माळु ग्वीराळ कु ऊ हैरू घासु
भौरीक अब बी मेरा पास छे
डंडियों मां बांसुरी कि धौण छे
मेरा नेता लुक्यां कै कै कुण छे
गदन्यों कु सुस्यांट आणू ह्वालु
बल अब ये बगता कु पास छे
रूणु-हैंसणु को जोग ये
बिधाता ने लेखि कै का पास ये
हमरु पाड़ा अब कया बुनु
सिंकोलि सैजा खेजा भात ये
फिर बी त ऐ आस छे
बालकृष्ण डी ध्यानी
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मेरा माँ न मेसे कबी ऐ बोलि
कुच इनि छुई हुन्दी दुनिया मां
मेरा माँ न मेसे कबी ऐ बोलि
वे बग्त बेल बदली जान्दु जिबान
जब सचि मां जिकोडी थे ठेश लग्दी
वे आस थे कबी कथै ना छोड़ि
बेटा वै बात थे कैसे कबि ना बोलि
ठंडू मठू कै बाटु बी मिले तैथे
वै अप्ड़ी धास से तू कबी ना छोड़ी
छैल छबीली ऐ दुन्या का रंग
वै बाटा मां कतै , कबी ना दौड़ी
द्वि दिना का मौळयार छन ओ
देखि की दुःख थे,कबी ना परती
त्वैमा मां ही तू लुकियुँ छे
खोजी ले अफ थे पैल तब बोलि
हैंसदर त ,इल मिल जाला तैथे
जैं रुळै तै थे ऊं को साथ कबि ना तोड़ी
मेरा माँ न मेसे कबी ऐ बोलि
कुच इनि छुई हुन्दी दुनिया मां
बालकृष्ण डी ध्यानी
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डाळयोंन माया लगै
ये जंगलात वै गौं मां
तू कख बी रै यों थे लगै
डाळयोंन माया लगै
डाळा डाळा दगडी राला
कदगा फल फूल
वा हम थे कया कया द्याला
डाळयोंन माया लगै
जड़ों मुल्ल हैंसण लगे
धरती कु दुःख झणी कख गे
ऐ उज्यड़ा थे इन तू सजै
डाळयोंन माया लगै
बेबस ना यूँ थे कै जे
आँखों अगनै ये सुपनीय रैं दे
अप्डू जल्म सफल कैजे
डाळयोंन माया लगै
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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ढुंगा मा बैठि....
स्वचणु छौं मैं,
क्या ख्वे अर क्या पाई,
द्वी हजार सोळा बितिगी,
मन अपणु समझाई......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
दिनांक 2/1/2017

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

नयुं साल ऐगि.....
मान पान करा,
पिरेम की गंगा बगावा,
जिंदगी मा सुख खोजा,
दु:ख तैं बिसिरि जवा.....
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
दिनांक 2/1/2017