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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
August 27 at 8:24am · Edited ·

देहरादूण पाड़ बैरी तू ही बन्यु लाटा
देहरादूण गैरसैण की
सौत बि तू ही बन्यु छुचा
पर देहरादूण पाड़ मा
ह्वैकी तू बेजत भौत होंदु
अर खाणा पिणा स्येणु
तू ह्यु सब्भु
पर फिर गाली लोला तू ही खाणु
पर कभी पाड़ी राजाओं
राज सहारनपुर तक छौ
अब देहरादूंण कन्नू बिराणु ह्यु फिर
देहरादूण सैरा पाड़ कांधी मा चढ़की
तब भि छुचा तू बिराणु ह्यु
कत्गा सैणी छे तू
कै मट्टी कु बन्यु छे तू
पर मन मा सोच्दु पाड़ी छे तू
तेरु ईमान अज्यु तक नि डोली
निथर इत्गा गाली नेतागिरी त्वे
पर हुन्दी क्वी हौर होंदु
खौं बाघ बण जांदू................शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
August 26 at 8:56am ·

तुम को देवी बनाकर दिल मे बसा लिया
अब मंदिर तो बस फोटो
खिचवाने जाते है ................शैलेन्द्र जोशी
गौरा देवी मंदिर देवलगढ़
फोटो क्लिक .........शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
August 23 at 11:24pm ·

कैका दिलै राणी छौ नि छौ
कैका लाडै लाडली छौ नि छौ
कैका प्यारै प्यारी छौ नि छौ
पर अपणा बाबु की
प्यारी राणी लाडली मी ही छौ
कैकु मान छौ नि छौ
कैकु अभिमान छौ नि छौ
कैकी शान छौ नि छौ
पर अपणा बाबु की
मान शान अभिमान मी ही छौ
कैकु सुपन्यु छौ नि छौ
कैकु ख्याल छौ नि छौ
पर अपणा बाबु की
सुपन्यु ख्याल मी ही छौ
कैकु चाँदे टुकड़ी छौ नि छौ
कैका जिकुड़ी बसी छौ नि छौ
पर अपणा बाबु का
जिकुड़ा मा बसी चाँदे टुकड़ी मी ही छौ
कैकी आस छौ नि छौ
कैकु बिस्वास छौ नि छौ
पर अपणा बाबु की
आस बिस्वास मी ही छौ
कैकु सुख छौ नि छौ
कैकु चैन छौ नि छौ
कैकु शांति छौ नि छौ
पर अपणा बाबु की
सुखशांति चैन मी ही छौ
कैकु खेलतमासु छौ नि छौ
कैकु तै बाला छौ नि छौ
कैकु दगडया छौ नि छौ
कैका मुखड़ी हैसी छौ नि छौ
पर अपणा बाबु कु
बाला दगडया खेलतमासु
मुखड़ी हैसी मी ही छौ....................शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shailendra Joshi
August 23 at 3:07am

आबरू लुटे न अब
किसी बहिन की
अब गली बाजार मे
तभी मतलब है राखी
पहनने का भाईयों
नहीं तो राखी शर्मशार है.......................शैलेन्द्र जोशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

दिदाओ... प्रणाम...

आज फिर आपकी सेवा में एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।
रचना का शीर्षक है ----- "दीदी - जीजा की जंग "

दगड्यों मेरी यह रचना महान साहित्यकार, तथा मेरे गिच्चुबोले जीजा श्री डी.डी.सुन्दरियाळ जी को समर्पित है।

दीदी - जीजा की जंग
-----------------------------

एक हमारे जीजाजी , दीदीजी के संग ।
जीजाजी की नाक पे, दीदीजी के नंग ।।

जीजा जुवा खेल कै आया घर की ठौर ।
दीदी की नजरें बढी़ं, तुरत चप्पल की ओर ।।

घर में पहुंचे जीजाजी, दीदी मांगे हिसाब ।
जीजा चुप ह्वै बैठिये, कुछ ना देत जबाब ।।

दीदीजी के सामने , जीजाजी की टंट ।
जैसे गुरा को देखकै , चिलगट होवै संट ।।

किचन में जीजा करे, भांडौं का खिबडा़ट ।
दीदी देखे सीरियल , जीजा करे छिबडा़ट ।।

बाथरूम में जीजाजी, पव्वा पीने जांय ।
फौरन उसके बाद में , लासण प्याज चपाय ।।

दीदीजी के पास में, जीजाजी का पास ।
दीदी सूंघे गिच्चु को, जीजा रोके साँस ।।

बेलण दीदी घुमाय कै , ऐसो कियो बबाल ।
जीजाजी के कपाळ में, अल्लू दिये निकाळ ।।

दीदीजी के हाथ में , डी.डी. टी. का पम्प ।
जीजाजी लेते रहें , उप्पन जैसे जम्प ।।

जीजाजी के चुप्फे को, ऐसे देत रिटाय ।
जैसे डलेबर मोड़ पे, हैंडल देत घुमाय ।।

बात न माने जीजाजी , ऐसो करत उपाय ।
जैसे कुरंगुुळु मोळ का, बुज्या दियो चुटाय ।।

ज्यों ज्यों दीदी नजर की, टिकट्वंटी छड़काय ।
झौड़ू जैसे जीजा का खड़घुंजा ह्वै जाय ।।

जीजा अद्दाराति मा , भ्याळुंद मरने जाय ।
भैर अंधेरा देख कै, टौर्च मांगने आय ।।

दाँत तोड़ने दीदीजी , जीजाजी फर जाँय ।
खळम निखोळे जीजाजी, नकली दांत लुकाय ।।

कुछ दिन कुट्टी हो चली, कुछ दिन बात न होय ।
जीजा अपने हाल पे , ढाडू जैसा रोय ।।

Copyright. Harish Juyal Kutaj

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Sudesh Bhatt
Yesterday at 7:39am ·

आज भग्यान भयूं की
रखडी न हथी भरीं होली
कती भाई बैण्यूं कुन बैणी
भाईयूं कुन टपराणी होली
आज भग्यान भयूं की
रखडी न हथी भरीं होली
मेरी कुंगली हथी आज
बैणी तै खुजणी च
एक डोरी प्यार कुन
मेरी आंखीं भरीं च
मै जणी कती भाई
आज बंद कमरों मा ह्वाल
कती दगडया राखी बंधै की
घर घर मा घुमणा ह्वाल
भग्यान बैणी भयूं की
टीका पीटै करना होली
रंग बिरंगी राखी
भाई तै पैराणा होली
आज भग्यान भयूं की
रखडी न हथी भरीं होली

सर्वाघिकार सुरक्षित@सुदेश भटट(दगडया) आज जब म्यार लक्की न या फोटो मैकुन भेजी त मेरी कलम ..........

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

पंचमी

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रचना --जीत सिंह नेगी (1927 जन्म , अयाल , पैडळस्यूं , पौ . ग. )
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इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती
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पिंगळा प्रभात का घाम तै लेका , सूरज धार मा ऐगे
भैर औं धौं मॉँ की पंचमी , तेरी वसंत ऐगे।
कुंगळो हत्यूं ल देळी देऴयूँ मा, फूलू को रंग चढ़ीगे
दादी -भुल्यूं का गीतूं की ढौळ मा , ऋतुराज नाचण लैगे।
थर थर थतरांदो ह्यूंद की तैलो , घाम बि पैटण लैगे
फर -फर फरांदा रौंतेळा मैना मा , होली को रैबार ऐगे।
रूड़ी का मैनों को ठंडो बथौं , छैल बुलाण लैगे
तपदी हिंवाळी डाँड्यूं का पाणी ला , गंगा भरीण लैगे।
डाँड्यूं का मौऴयार दगड़ा पाखी पिंगळी फ्यूलड़ी कैगे
ग्वेरु का गीतूं मा कृष्ण सी जीतू की , बांसुरी बाजण लैगे।
स्वामी विछो मा खुदेड़ पराणी का , गीतूं मा समळौण ऐगे
हरिद्वार मा जन माळुसाईं तैं , राजुला बुलौण लैगे।

-( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
August 14 at 5:43pm ·

पांच भै कठैत......

श्रीनगर मा जबरि,
जियाजीकनकदेई कू,
राणी राज थौ,
सादर सिंग कठैत का,
पांच बलशाली नौना,
भगोत सिंग, राम सिंग,
उदोत सिंह, सब्‍बल सिंग,
सुजान सिंग सब्‍बि अपणि,
कठैत गर्दी चलौन्‍दा था.........

मेरी पूरी कविता आप मेरा ब्‍लाग फर पढ़ि सकदा छन....

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
August 13 at 10:50am ·

भौत खूब गुरु जी, कथ्‍गा ऊलार सी झलकणु छ आपकी मयाळु मुखड़ि मा।

जल्‍मबार नरु दा कू,
तुम दाळ पिसणा,
झळ झळ हम देखि,
सिलोटि घिसणा....

सब सिख्‍युं काम,
अब काम औणु,
हुनरवान छन आप,
अहसास होणु......

राजि खुशी चैन्‍दा भैजि,
तुमारु उलारया पराण,
खुश होयुं मन तुमारु,
नरु दा कू जल्‍मबार मनौण........

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु,
दिनांक 13.8.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
August 12 at 3:16pm ·

गढ़ रत्‍न श्री नरेन्‍द्र सिंह नेगी जी तैं मेरी जल्‍मबार फर हार्दिक शुभकामना यीं कविता का माध्‍यम सी।

मुखड़ि मा ऊलार अजौं,
ज्‍युकड़ि मा प्‍यार छ,
जल्‍मबार नरु दा कू,
बोला त त्‍यौहार छ......

जुगराजि रै हे दिदा,
गढ़वाळी गीत लगै,
अपणि बोली भाषा त्‍याग्‍दा,
उत्‍तराखण्‍ड्यौं का मन मा,
भाषा का प्रति प्रेम जगै...

जुगराजि रै हे दिदा,
उत्‍तराखण्‍ड शान छैं,
वीर भड़ु की भूमि मा,
जल्‍म ल्‍हीक महान छै.....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु का मन का ऊमाळ
बोला त कविमन कू कबलाट
सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनांक 12.8.2015